एस धम्‍मो सनंतनो–ओशो (भाग-11)

एस धम्‍मो सनंतनो (भाग—11) ओशो

  बुद्ध को हुए पच्‍चीस सौ साल हो गए, लेकिन जिसको भी थोड़ी सी समझ है, उन्‍हें आज भी उनकी सुगंध मिल जाती है। जिन्‍हें समझ नहीं थी। उन्‍हें तो उनके साथ मौजुद होकर भी नहीं मिली। जितने थोड़ी संवेदनशीलता है, पच्‍चीस जीवंत हो जाते है। फिर तुम्‍हारे नासापुट उनकी गंध से भर जाते है। फिर तुम उनके साथ आनंदमग्‍न हो सकते हो। समय का अंतराल अंतराल नहीं होता; न बाधा बनती है। सिर्फ संवेदनशीलता चाहिए।

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काश! तुम देख लो उसे जो होता है, और वही चाहो, जो होता है, तो चाह मर गयी। चाह का अर्थ ही है : जो होता है, उसके विपरीत चाहना। जैसा नहीं होता है, वैसा चाहना। जो होता है, उसकी स्वीकृति, उसके साथ समरस हो जाना—चाह मर गयी।

जवानी की हो जाती है, तुम भी स्वीकार कर लेते हो। जीवन मृत्यु में परिणत हो जाता है, तुम अंगीकार कर लेते हो। सुख दुखों में बदल जाते हैं; दिन रातों में ढल जाते हैं; तुम जरा भी ना—नुच नहीं करते। तुम कहते हो : जो होता है, होता है। जैसा होता है, वैसा ही होगा। तो कहा वासना है?

वासना सदा विपरीत की वासना है। इस विपरीत की आकांक्षा को बुद्ध ने कहा है—तन्हा, तृष्णा।

किसी से तुम्हारा प्रेम हुआ, अब तुम सोचते हो. यह प्रेम सदा रहे। यहां कुछ भी सदा नहीं रहता। अब तुम कहते हो. इस प्रेम को बांधकर रख लूं। द्वार—दरवाजे बंद कर दूं—कि यह प्रेम का झोंका कहीं बाहर न निकल जाए! हथकड़ियां डाल दूं; बेड़ियां पहना दूं—प्रेम को। तालों पर ताले जड़ दूं; कहीं यह प्रेम चला न जाए! बामुश्किल तो आया है। कितना पुकारा तब आया है!

याद रखना. न तुम्हारे पुकारने से आया है, न तुम्हारे रोकने से रुकेगा। आता है अपने से, जाता है अपने से।

 

ओशो

     एस धम्‍मो सनंतनो

        भाग—11

 

2 COMMENTS

  1. स्वामीजी ,वेबसाइट “द ओशो कॉम ” पर प्रवचन “एस धम्‍मो सनंतनो–(प्रवचन–६२ ) भाग ७ ” उपलब्ध नहीं है, जब कि प्रवचन ६१ और ६३ उपलब्ध है। कृपया उपलब्ध कराये।

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