THE OSHO सर्वाधिक आनंद उन्हें प्राप्त होता है, जो अकेले रहने की कला सीख जाते है Sun, 06 Nov 2016 13:57:21 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=4.7.3 /wp-content/uploads/2016/08/cropped-the-osho-32x32.jpg THE OSHO 32 32 गीता दर्शन–(प्रवचन–179) /2016/11/06/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-179/ /2016/11/06/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-179/#respond Sun, 06 Nov 2016 09:49:55 +0000 /?p=6999 सुख नहीं, शांति खोजो—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—17     सूत्र:

अशास्‍त्रविहितं धीरं तप्यन्ते ये तपो जना:।

दम्भाहंकारसंयुक्‍ता: कामरागबलान्त्तिता:।। 5।।

कर्शयन्त: शरीरस्थं भूतग्राममचेतस:।

मां चैवान्त:शरीरस्थं तान्‍विद्धय्यासुरीनश्चयान्।। 6।।

और है अर्जुन, जो मनुष्य शास्त्र— विधि से रहित केवल मनोकल्‍पित घोर तप को तपते हैं तथा दंभ और अहंकार से युक्‍त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्‍त हैं तथा जो शरीररूप से स्थित भूत— समुदाय को और अंत:करण में स्थित मुझे अंतर्यामी को भी कृश: करने वाले है, उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाव वाला जान।

पहले कुछ प्रश्न।

 

पहला प्रश्न : भक्त के सामने साक्षात भगवान हैं, फिर भी विरह कम क्यों नहीं हो रहा है?

 

जैसे—जैसे भगवान की प्रतीति होती है, विरह बढ़ता है। जैसे—जैसे निकट आते हैं, वैसे—वैसे दूरी खलती है। जितने पास आते हैं, उतनी ही पीड़ा होती है। क्योंकि पास आने पर ही पहली दफा पता चलता है कि अब तक सारा जीवन व्यर्थ ही गंवाया। और पास आने पर ही पता चलता है कि इतनी थोड़ी—सी दूरी भी अब बहुत दूरी है।

जिसे स्वाद लग गया, उसे ही तो पीड़ा होती है। जिसे स्वाद ही न लगा, उसे पीड़ा भी कैसे होगी? तुमने जिसे थोड़ा जान लिया, उसी को तो जानने की प्यास पैदा होती है। जिसे तुमने बिलकुल नहीं जाना, उसकी खोज भी कैसे पैदा होगी?

जब तुम्हें परमात्मा बिलकुल सामने दिखाई पड़ने लगे, तभी तुम्हारी विरह की अग्नि अपनी प्रगाढ़ता में जलेगी। इसलिए तो भक्त रोते हैं, अभक्त थोड़े ही रोते हैं! अभक्त तो प्रफुल्लित दिखाई पड़ते हैं। संसार में, बाजार में, दुकान पर, तुमने अभक्तों को रोते देखा? वे तो तुम्हें हंसते हुए मुस्कुराते हुए मिल जाएंगे। उन्हें तो उस पीड़ा का कोई पता ही नहीं, जो परमात्मा के द्वार पर अनुभव होती है।

प्रेमियों को रोते देखा जाता है, अप्रेमियों को नहीं। प्रेम रुलाता है, क्योंकि प्रेम निखारता है। और आंसुओ को दुर्भाग्य मत समझना, वे सौभाग्य के लक्षण हैं। और परमात्मा की पीड़ा जब तुम्हें जलाने लगे, मंथने लगे, मारने लगे, तब समझना कि सौभाग्य की आखिरी घड़ी करीब आ गई। क्योंकि परमात्मा जब तुम्हें मार ही डालेगा तुम्हारे विरह में, तभी तुम्हारे भीतर उसका प्रवेश हो सकेगा। जब तुम अपनी ही विरह की अग्नि में पूरे जलकर भस्मीभूत हो जाओगे, तभी उस भस्म से नए का आविर्भाव होगा। वह फिर तुम्हारे भीतर भी भगवान का रूप है।

भक्त मिटता है, तो भगवान पूरी तरह उपलब्ध होता है। तुम्हारे मिटने में ही संभावना है।

लेकिन स्वभावत: प्रश्न उठता है कि भगवान सामने हो, तो विरह समाप्त हो जाना चाहिए। लेकिन विरह भगवान के सामने होने से समाप्त नहीं होता। जब तुम भगवान को पी ही जाओगे, जब वह सामने न होगा, तुम्हारे भीतर हो जाएगा। जैसे कोई प्यासा नदी के किनारे आ गया। किनारे पर खड़े होने से थोड़े ही प्यास बुझती है, नदी में उतरना पड़ेगा। नदी में उतरने से भी प्यास नहीं बुझती, नदी को अपने भीतर उतारना पड़ेगा।

तो जैसे—जैसे नदी दिखाई पड़ने लगेगी, वैसे—वैसे प्यास प्रगाढ़ होने लगेगी। अब तक तो किसी तरह सम्हाला, अब सम्हाले भी न सम्हलेगी। जैसे—जैसे नदी पास आने लगेगी, वैसे—वैसे तुम्हारा कंठ और भी जोर से आकुल होने लगेगा। पानी को पास देखकर दबी हुई प्यास उभरकर उठ आएगी। पानी को पास देखकर अब तक किसी तरह मन को समझाया था, अब समझाया न जा सकेगा। अब तक किसी तरह बांध—बूंधकर चल लिए थे, अब सब व्यवस्था टूट जाएगी। अब तो पागल की तरह दौड़ शुरू होगी।

लेकिन ठीक किनारे पर भी आकर तो प्यास नहीं बुझती। नदी में खड़े होकर भी तो प्यास नहीं बुझती। जब तक कि परमात्मा और तुम एक ही न हो जाओ, कि पानी तुम्हारे खून में न बहने लगे; कंठ में नहीं, तुम्हारे हृदय में न उतर जाए, तब तक प्यास नहीं बुझती। परमात्मा और तुम्हारे बीच जब तक इंचभर का भी फासला है, तब तक तुम जलोगे। उतना फासला भी अनंत फासला है। और पास आकर ही दूरी पता चलती है। तुम इसे विरोधाभास मत समझना। दूरी जब रहती है, तब तो पता ही नहीं चलती। क्योंकि तुम्हें यही पता नहीं कि कोई परमात्मा है, किसी की खोज करनी है। रोओगे किसके लिए?

रोने के पहले थोड़ा स्वाद लग जाना जरूरी है, थोड़ी भनक पड़ जानी जरूरी है। रोने के पहले उसकी याद आ जानी जरूरी है।

लेकिन याद कैसे आएगी अगर उसे बिलकुल न जाना हो? दूर से ही देखी हो उसकी छवि, लेकिन तुम्हारे सपनों में समा जानी चाहिए। फिर तुम सो न सकोगे; फिर तुम जाग न सकोगे, फिर दिन और रात बेचैनी से भर जाएंगी।

कबीर ने कहा है कि वह परमात्मा का प्यासा निशि—बासर जागे। वह न सो सकता है, न जाग सकता है। उसकी बेचैनी का हिसाब नहीं है। विरह की अग्नि भयंकर हो जाती है। एक ही पुकार उठने लगती है। सारा प्राण एक ही पुकार से भर जाता है। प्यास कंठ में ही नहीं होती, रोएं—रोएं में समा गई होती है।

इसलिए भक्तों को ही रोते देखा गया है, परम भक्तों को ही विरह से जार—जार देखा गया है। लेकिन वह सौभाग्य का क्षण है। उन आंसुओ को तुम दुर्भाग्य समझ लोगे, तो भूल हो जाएगी। उन आंसुओ की गलत व्याख्या मत कर लेना, क्योंकि बहुत गलत व्याख्या करके वापस भी लौट जाते हैं। क्योंकि ऐसी नदी से क्या लेना—देना, जिसके पास जाकर प्यास बढ़ती हो। हम तो इसी खयाल से नदी के पास आए थे कि प्यास बुझ जाएगी। ऐसे जल को क्या करना; जिसके पास आने से आग बढ़ती हो। भय पकड़ ले सकता है। और भय यह भी कह सकता है कि जिस जल के पास आने से प्यास बढ़ रही है, उसे भूलकर पी मत लेना। नहीं तो लपटें ही लपटें हो जाएंगी। भाग जाओ।

बहुत लोग परमात्मा के द्वार से लौट गए हैं। उन्होंने आंखें बंद कर लीं। उन्होंने अपने को किसी तरह सम्हाल लिया। गिरने को ही थे, मिलने को ही थे, जरा—सा ही फासला था, एक कदम काफी हुआ होता, लेकिन वे लौट गए। फिर जन्मों—जन्मों तक भटकते हैं। इसलिए ठीक—ठीक व्याख्या बड़ी अर्थपूर्ण है, जब कोई घटना घटे। और गुरु का मूल्य इन्हीं सब आयामों में है कि वह तुम्हें ठीक व्याख्या दे सकेगा। जब तुम्हारे पैर उखड़ रहे होंगे, तब वह उन्हें जमा सकेगा। जब तुम भागने की तैयारी कर लोगे, वह तुमसे कहेगा, जरा और, और सुबह होने के करीब है। मंजिल पास है, और तू भागा जा रहा है!

उस वक्त जरा—सा सहारा चाहिए कि कोई तुम्हें पकड़ ले, कोई तुम्हारे पैरों को रोक दे। लौट न पड़ो तुम कहीं। कहीं तुम गलत व्याख्या न कर लो।

और तुमसे गलत व्याख्या की ही संभावना है। सही व्याख्या तुम कर कैसे सकोगे? तुम्हारा तर्क तो यही कहेगा कि हट जाओ ऐसी जगह से। जहां पास जाने से आग बढ़ती हो, यहां से दूर ही हो जाओ।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं, वे कहते हैं, इतनी अशांति ध्यान के पहले न थी!

अशांति का भी पता तभी चलता है, जब तुम थोड़े शांत होने लगते हो। अशांति को जानेगा कौन? सारी दीवाल काली हो, तो जरा—सी भी सफेद रेखा खींच दो, तो सफेद रेखा भी उभरकर दिखाई पड़ती है और दीवाल भी उभरकर दिखाई पड़ती है। क्योंकि विपरीत में प्रतीति होती है।

तुम अशांत ही रहे हो, अशांति तुम्हारा स्वभाव हो गई है, अशांति के अतिरिक्त तुमने कभी कुछ जाना नहीं, इसलिए अशांति को भी कैसे जानोगे? विपरीत चाहिए। कंट्रास्ट चाहिए। कुछ और तुम जानी, तो तुलना हो सके। इसलिए ध्यान करते ही अशांति बढ़ती है।

लोग चकित होते हैं, क्योंकि वे ध्यान की खोज में आए थे सोचकर कि शांति बढ़ेगी। शांति नहीं बढ़ती, शुरू में तो अशांति बढ़ती है। कहना ठीक नहीं है कि अशांति बढ़ती है। अशांति तो थी, पहले उसका पता न चलता था, अब पता चलता है। और जैसे—जैसे शांति बढ़ेगी, वैसे—वैसे पता चलेगा। जैसे—जैसे तुम जागोगे, वैसे—वैसे पता चलेगा कि कितने सोए रहे!

सोए आदमी को पता ही नहीं चलता कि वह सो रहा है, जागे को पता चलता है। सुबह जिसकी नींद टूटने लगी, जो करवट बदलने लगा, और जिसे भनक पड़ने लगी आस—पास की जागती दुनिया की—बरतन बजने लगे, दूध वाले दूध बेचने लगे, सड़क चलने लगी—जिसे थोड़ी भनक भी पड़ने लगी, अब जो सोया भी नहीं है, जागा भी नहीं है, जो बीच में खड़ा है, संध्याकाल आ गया, उसे पता चलता है कि रातभर सोए रहे।

जागते क्षण में पता चलता है नींद का, शांत होने पर पता चलता है अशांति का। आनंद जब उतरने के करीब होगा, तब तुम जानोगे कि कैसे महादुख से तुम आए हो। स्वर्ग के द्वार पर तुम्हें पता चलेगा कि अब तक की यात्रा नरक में हुई। स्वर्ग के द्वार पर ही पता चलेगा। उसके पहले पता न चलेगा; क्योंकि विपरीत जरूरी है।

परमात्मा के करीब पहुंचकर तुम्हें अपने सारे अस्तित्व का सारा संताप सघनीभूत होकर पता चलता है; इसलिए विरह बढ़ता है। उस विरह में गलत व्याख्या मत करना। वह सौभाग्य है। उस सौभाग्य के क्षण को, उन आंसुओ को, विरह को आंनदभाव से, अहोभाव से स्वीकार करना। रोना, लेकिन नाचना बंद मत करना।

आंसू टपके, लेकिन पैर नाचे। आंखें विरह से भरी हों, लेकिन हृदय मिलन की आकांक्षा से, मिलन की आशा से। कंठ में प्यास हो, लेकिन हृदय में भरोसा हो कि नदी करीब आ गई। क्षणभर की देर और है।

और जब इतनी प्रतीक्षा कर ली, तो यह क्षण भी बीत जाएगा। अनंत कल्प बीत गए, सृष्टियां बनीं और उजड़ी और तुम प्यासे बने रहे, उतना सह लिया, जन्मों—जन्मों इतनी यात्रा की, मंजिल कभी करीब न आई; भटकते ही रहे, वह सब हो गया, अब क्षणभर के लिए क्या घबड़ाहट है! हृदय आश्वासन से भरा रहे। वहीं तुम्हारी आस्था काम आएगी; वहीं तुम्हारी श्रद्धा का पता चलेगा। क्योंकि उस क्षण में बहुत लोग भाग गए हैं।

गुरु के बिना इसीलिए कठिनाई है। गुरु के बिना भी कभी—कभी कोई उपलब्ध हो जाता है, पर कभी—कभी। उसको हम अपवाद मान ले सकते हैं। अन्यथा गुरु के बिना कोई उपलब्ध नहीं होता। क्योंकि ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कौन तुम्हें भरोसा दे? ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कौन तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें रोक ले? ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कि क्षणभर भी अगर ठीक व्याख्या न मिले, तो अनंत काल के लिए भटकाव पुन: शुरू हो जाएगा। और जो व्यक्ति एक बार परमात्मा के मंदिर से वापस लौट आता है, वह सदा—सदा के लिए उस मंदिर की यात्रा को बंद कर देता है। उस तरफ जाने से भय लगता है।

मेरी अपनी प्रतीति यही है कि इस संसार में जिनको तुम नास्तिक मानते हो, वे वे ही लोग हैं, जो कभी परमात्मा के मंदिर के पास से वापस लौट गए हैं। अब वे नास्तिक हो गए हैं। अब वे कहते हैं, परमात्मा है ही नहीं। वे किसी और को नहीं समझा रहे हैं; वे अपने को ही समझा रहे हैं। वह जो उपद्रव उन्होंने परमात्मा के पास अनंत काल की यात्रा में कभी जाना होगा, वह जो विरह, उसने उन्हें इतना घबड़ा दिया है कि उस घबड़ाहट में अब सिर्फ एक ही बचाव है कि वे अपने को समझा लें कि परमात्मा है ही नहीं, इसलिए खोज किसकी करनी है? उसका मंदिर है कहां? यही संसार सब कुछ है। कहीं जाना नहीं है।

वे दूसरों को नहीं समझा रहे हैं। जब नास्तिक तर्क देता है और कहता है कि ईश्वर नहीं है, तो वह तुम्हें नहीं समझा रहा है, वह अपने को समझा रहा है कि कहीं पैर फिर से उस रास्ते पर न मुड़ जाएं। वह डरा हुआ है अपने से कि कहीं फिर कोई वह आग न जला दे, कहीं फिर कोई छू न दे उस घाव को पुन:, फिर कहीं वह विरह न पैदा हो जाए; और फिर कहीं मैं उस तरफ न चल पडुं जहां से भाग आया हूं।

रवींद्रनाथ की एक छोटी—सी कविता है, कि मैं खोजते —खोजते एक दिन परमात्मा के द्वार पर पहुंच गया। अनंत काल तक खोजा। जब तक नहीं पाया था, तब तक बड़ी खोज थी। कितना भटका, कितने श्रम किए, कितने साधन किए! और फिर आज जब द्वार पर खड़ा हो गया, तो मन एकदम उदास हो गया। हाथ में सांकल उठा ली थी, बजाने को था, दस्तक देने को ही था कि तत्क्षण खयाल आया, फिर क्या करोगे? जब परमात्मा मिल जाएगा, फिर क्या करोगे?

भय पकड़ गया, रोआं—रोआं कैप गया। फिर क्या करेंगे? अपना अब तक जो भी करने का जाल था, वह सब व्यर्थ हो जाएगा। अपनी यात्रा समाप्त हो गई। फिर करोगे क्या? फिर कुछ करने को बचता नहीं। परमात्मा का अर्थ है वैसी दशा, जिसके पार पाने को कुछ नहीं, करने को कुछ नहीं, होने को कुछ नहीं। परमात्मा का अर्थ है, पूर्ण विराम।

मन घबड़ा गया। वही मन, जो खोजता था, खोजने के लिए राजी था। क्योंकि काम—धंधा था, व्यस्तता थी और अहंकार को एक तृप्ति भी थी कि खोज रहा हूं परमात्मा को। और दूसरे तो मूढ़ हैं, धन को खोज रहे हैं। दूसरे नासमझ हैं, पद को खोज रहे हैं। दूसरे अज्ञानी हैं, व्यर्थ को खोज रहे हैं, असार को खोज रहे हैं। मैं सार की खोज पर निकला हूं; मैं परम गुह्य की खोज पर निकला हूं; मैं रहस्यों के लोक में जा रहा हूं। अहंकार बड़ा तृप्त था, संतुष्ट था।

द्वार पर खड़े होकर परमात्मा के घबड़ाहट आ गई, पैर कंप गए कि यह तो खतरा है! खोज समाप्त हो जाएगी! करने को कुछ बचेगा नहीं! अहंकार के लिए कोई जमीन न रह जाएगी खड़े होने को! रवींद्रनाथ ने बड़ा अदभुत गीत लिखा है, किसी ने कभी नहीं लिखा। इसलिए रवींद्रनाथ में बड़ी अनुभूतियां थीं, बड़ी सूझें थीं। यह आदमी असाधारण था। यह आदमी सिर्फ कवि नहीं था; यह आदमी ऋषि था। जैसे उपनिषद के ऋषि हैं।

रवींद्रनाथ के वचन वैसे ही समझे जाने चाहिए, जैसे उपनिषद के वचन। रवींद्रनाथ नया उपनिषद है। उनको साधारण कवि मत समझ लेना, जो कवि सम्मेलनों में कविता कर रहा है और तालियां सुन रहा है। उनको तुम कोई काका हाथरसी मत समझ लेना। वे ऋषि हैं। बड़े गहरे प्रगाढ़ अनुभव से उनकी प्रतीति निकली है।

रवींद्रनाथ ने कहा है कि यह देखकर मैं भाग खड़ा हुआ। मैं इतना डर गया कि मैंने सांकल भी धीरे से छोड़ी कि कहीं अनजान में बज न जाए। और मैं इतना डर गया कि मैंने जूते, जिनको पहने हुए मैं मंदिर की सीढ़िया चढ़ गया था, हाथ में ले लिए; कि कहीं पदचाप भीतर सुनाई न पड़ जाए; कहीं वह द्वार खोल ही न दे और कहे, आओ। कहीं वह आलिंगन कर ही ले, तो मिटे। फिर कोई बचाव न रहेगा। और फिर उसको सामने खड़ा देखकर भागना भी अशोभन मालूम होगा।

गीत का आखिरी पद कहता है कि उस दिन से जो भागा हूं, तो बस उस मंदिर की राह को छोड्कर सब राहों पर घूमता हूं। फिर मेरी खोज जारी है। लोगों को कहता हूं परमात्मा खोज रहा हूं योग कर रहा हूं ध्यान कर रहा हूं। और मुझे पक्का पता है कि वह कहां है। उस जगह को भर छोड्कर सब जगह खोजता हूं।

नास्तिक मेरे लिए वही आदमी है, जिसको कोई बहुत गहन पीड़ा का अनुभव किसी जन्म में हो गया। वह पीड़ा इतनी भयंकर थी कि वह दोबारा उसको पुनरुक्त नहीं करना चाहता। वह अपने को समझाता है, परमात्मा है ही नहीं। वह अपने को तर्क देता है। वह अपने चारों तरफ तर्क का एक जाल निर्मित करता है। वह अपने ही खिलाफ षड्यंत्र रचता है। वह किसी दूसरे का धर्म बिगाड़ने को नहीं है, न तुमसे उसे कुछ मतलब है।

अन्यथा तुम सोचो, ऐसे नास्तिक हैं जो जीवनभर, ईश्वर नहीं है, यह सिद्ध करने में समय व्यतीत करते हैं। है ही नहीं जो, उसके लिए तुम अपना जीवन क्यों खराब कर रहे हो? तुम कुछ और कर लो। ईश्वर तो है ही नहीं, बात खतम हो गई। लेकिन जीवनभर व्यतीत करते हैं!

मेरी अपनी प्रतीति यह है कि कभी—कभी भक्तों को भी वे मात कर देते हैं। भक्त भी इतनी संलग्नता से जीवन व्यतीत नहीं करता परमात्मा के लिए, जितना नास्तिक करते हैं। लिखते हैं, सोचते हैं, तर्क जुटाते हैं, समझाते हैं, शास्त्र लिखते हैं बड़े—बड़े कि ईश्वर नहीं है।

इस सब के पीछे कुछ मनोविज्ञान होना चाहिए। जो है ही नहीं, उसकी कौन फिक्र करता है? कोई तो सिद्ध नहीं करता कि आकाश—कुसुम नहीं होते। कोई तो सिद्ध नहीं करता कि गधे को सींग नहीं होते। इसको क्या सिद्ध करना है! और जो सिद्ध करे, वह गधा। क्योंकि इसको क्या प्रयोजन है? गधे को सींग नहीं होते, यह जाहिर बात है, खतम हो गई। इसको कोई भी सिद्ध करने की जरूरत नहीं है।

लेकिन ईश्वर नहीं है, अगर ईश्वर भी ऐसा है जैसे कि गधे के सींग नहीं हैं, तो क्या पागलपन कर रहे हो! किसको सिद्ध कर रहे हो? किसके लिए लड़ रहे हो? क्या प्रयोजन है? सिद्ध भी कर लोगे, तो क्या सार है? जो था ही नहीं, उसको तुमने सिद्ध कर लिया कि वह नहीं है, क्या पाया? कहीं और जीवन ऊर्जा को लगाते, कहीं और खोजते।

लेकिन नास्तिक के पीछे एक ग्रंथि है। वह ग्रंथि यह है कि अगर वह सिद्ध न करे कि ईश्वर नहीं है, तो डर है कि कहीं फिर कदम उसी तरफ न उठने लगें। यह बड़ी अचेतन प्रक्रिया है। यह उसके अनकांशस में है। उसे भी पता नहीं है।

इसलिए जब भी कोई नास्तिक मेरे पास आ जाता है, तो मैं उसमें रस लेता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं यह कभी करीब तक पहुंचा हुआ आदमी है। इसकी यात्रा बस पूरे होने के करीब थी। यह दया के योग्य है। इस पर नाराज मत होना। यह करुणा के योग्य है। और यह वहां पहुंचा है, जहां बहुत—से आस्तिक कभी नहीं पहुंचे हैं। एक छलांग, एक क्षण और, और सुबह हो गई होती। इस पर श्रम करने जैसा है। यह लड़ने जैसा नहीं है। इसका विरोध करने जैसा नहीं है। इसकी आलोचना करने जैसी नहीं है। इसे तो पूरे प्रेम में ले लेने जैसा है। किसी भांति इसे फिर से याद आ जाए, तो एक क्षण में यह फिर वहीं खड़ा हो सकता है, जहां से भागा था।

क्योंकि जो भी हमने अनंत जन्मों में पाया है, उसे हम भूल जाएं, खो नहीं सकते। वह जीवन का नियम ही नहीं है। जो तुमने जान लिया है, उसे तुम भूल सकते हो, खो नहीं सकते। उसकी विस्मृति कर सकते हो, उसे छिपा सकते हो भीतर गहन में, गहन अचेतन में दबा सकते हो कि तुम्हें भी दिखाई न पड़े, तुम ऐसा छिपा सकते हो कि भीतर रोशनी भी लेकर जाओ, तो उसका पता न चले। लेकिन तुम उसे मिटा नहीं सकते। जो जान लिया गया, वह जान लिया गया। वह चेतना का अमिट अंग हो जाता है।

इसलिए नास्तिक क्षणभर में आस्तिक हो सकता है। आस्तिक को आस्तिक होने में बहुत समय लगता है। अभी इसे ईश्वर का भय तो समाया ही नहीं। अभी यह कुतूहल में ही है। एक जिज्ञासा उठी है कि शायद ईश्वर हो; शायद ईश्वर से आनंद मिलता हो। नास्तिक ऐसा आदमी है, जिसके बाबत गांव में प्रचलित कहावत सही है कि दूध का जला छाछ भी फूंक—फूंककर पीता है। वह दूध का जला है, अब वह छाछ भी फूंक—फूंककर पी रहा है। आस्तिक ऐसा आदमी है, जो छाछ ही पीता रहा है। वह गर्म दूध को भी, जलते—उबलते दूध को भी छाछ की तरह पी जाएगा। जलेगा, तभी उसे पता चलेगा। फिर शायद वह भी छाछ को भी फूंक—फूंककर पीने लगे।

इसलिए भगवान के जैसे—जैसे तुम करीब आओगे, जैसे—जैसे तुम भक्त बनोगे।

भक्त का अर्थ मेरे लिए यही है, जो भगवान के करीब आने लगा, जिसे विरह की पीड़ा सताने लगी, जिसका रोआं—रोआं जलने लगा। जो अब ज्वरग्रस्त है, जिसे प्रेम का बुखार है। जो अब विक्षिप्त है, जिसे प्रेम की विक्षिप्तता ने पकड़ लिया।

इसलिए तो कबीर अपने को कहते हैं, कहे कबीर दीवाना। पागल! सारी दुनिया के लिए पागल। कोई उसकी बात सुनने को राजी नहीं। लोग समझते हैं मतवाला। और लोग उसकी पीड़ा भी नहीं समझ सकते। लोग उसके आंसू भी नहीं समझ सकते। लोग तो दूर, वह खुद ही नहीं समझ पाता कि क्या हो रहा है।। अघट घटता है, अनहोना होता है, अनजान से संबंध बनते हैं। सारा जाना—माना जाल टूट जाता है।

नहीं, इसमें कुछ विरोध नहीं है। भक्त के सामने जब साक्षात भगवान होते हैं, तभी विरह पहली दफा जगता है। उस समय चाहिए गुरु, कि रोक ले, हाथ पकड़ ले, सहारा दे, भरोसा दे। कहीं तुम भाग न जाओ मंदिर से। थोड़ी ही देर की बात है। और एक बार तुम कूद गए नदी में और नदी को ले लिया तुमने अपने में, यात्रा पूरी हो गई। और तभी मिलन के आनंद की वर्षा होती है। पहले तो विरह की पीड़ा है, विरह का रेगिस्तान है, फिर मिलन की वर्षा है। और यह भी तुमसे मैं कह दूं कि जितनी बड़ी होगी तुम्हारी विरह की जलन, उतनी ही गहन होगी तुम्हारी मिलन की शांति और मिलन का आनंद। इसलिए अगर तुम्हें कोई शार्टकट बताता हो, कि कहता हो कि हम ऐसा रास्ता बताते हैं कि बिना विरह के तुम पहुंच जाओगे। कोई तुम्हें कहता हो कि नदी जाने की क्या जरूरत! हम पाइप लाइन बिछाए देते हैं, तुम्हारे घर में ही टोंटी से पानी टपकने लगेगा परमात्मा का। तुम उसकी मत सुनना। क्योंकि बिना विरह के अगर परमात्मा मिल जाए. मिल नहीं सकता, यह आदमी धोखा दे रहा है।

लेकिन इसका धोखा धंधा बन सकता है। पंडित, पुरोहित, पुजारी वही कर रहे हैं। वे कहते हैं, हम सस्ता रास्ता बताए देते हैं। तुम क्यों विरह में मरते हो? तुम घर बैठो। हम तुम्हारे लिए पूजा करते हैं। वे कहते हैं, तुम्हें कोई यज्ञ करने की जरूरत नहीं है। हम कर देंगे; तुम सिर्फ पैसा चुका दो। तुम चिंता मत करो; हम जो कहते हैं, वैसा करो। बाकी सब फिक्र हम कर लेंगे। ये मध्यस्थ जो हैं, वे यह कह रहे हैं कि हम तुम्हें पीड़ा से बचा देंगे विरह की। हम तुम्हारे लिए रो लेंगे, हम तुम्हारे लिए हंस लेंगे, तुम घर बैठे रहो; तुम अपना धंधा करते रहो।

भूलकर भी इस भांति में मत पड़ना। क्योंकि वह अगर ऐसा हो भी जाए—जो हो नहीं सकता, मान लें हो जाए—तो वह ऐसा ही होगा, जैसे बिना भूख लगे किसी आदमी के पेट में हम भोजन डाल दें। कोई तृप्ति न होगी। तृप्ति तो नहीं, उलटे वमन हो जाएगा, उलटी हो जाएगी। जिसे प्यास न लगी हो, उसके कंठ में हम पानी उंडेल दें। उससे पेट की भले सफाई हो जाए, लेकिन तृप्ति न होगी।

यह तो ऐसे ही है कि जिसने कभी विरह नहीं जाना, उसके द्वार पर अगर प्रेम भी आकर खड़ा हो जाए, तो वह कैसे पहचानेगा? विरह की आंखें चाहिए। जितनी पीड़ा भूख की, उतनी ही तृप्ति, उतना ही स्वाद का रस। अगर तुम्हारी भूख की पीड़ा इतनी गहन हो कि उससे आगे पीड़ा में जाना संभव न हो, तो रूखी रोटी तुम खाओगे और उपनिषद के वचन तुम्हारे हृदय में गंज जाएंगे, अन्न ब्रह्म! अन्न ब्रह्म है! अगर भूख इतनी गहरी हो, तो भोजन परमात्मा हो जाएगा। प्यास गहरी हो, तो जल के कणों में, साधारण से जल में, अमृत की छाया पड़ने लगेगी।

जो साधारण जीवन में घटता है, वही उस असाधारण जीवन में भी घटता है। नियम तो वही है।

परमात्मा के लिए रोओ, ताकि कभी तुम उसके आनंद से हंस भी सकी। उसके लिए आंसुओ को गिरने दो, तभी तुम्हारे पैर शर बांधकर किसी दिन नाच भी सकेंगे। विरह का जितना गहन तीर तुम्हारे हृदय में छिदेगा, उतना ही अमृत का झरना फूटेगा। विरह का अनुपात ही मिलन के आनंद का अनुपात है।

इसलिए तुम घाटे में न रहोगे। रोने से डरना मत। आंसुओ को रोकना मत। पीड़ा को झेलना, पीड़ा से बचने के उपाय मत करना। पीड़ा से बचने के बहुत उपाय हैं। लेकिन जो पीड़ा से बच गया, वह फिर परमात्मा से भी बच जाएगा। वह फिर आनंद से भी बच जाएगा।

अगर तुम इस सूत्र को ठीक से खयाल में रख सकोगे, तो जब विरह आएगा, तब तुम सौभाग्य समझोगे। तुम समझोगे कि परमात्मा निकट है, इसलिए विरह आया। उसकी छाया कहीं मेरे ऊपर पड़ने लगी। वह कहीं आस—पास है। अन्यथा ये आंसू कैसे बहते? यह हृदय कैसे रोता? यह मेरा रोआं—रोआं कैसे तड़फता? यह आग कैसे जलती?

दूसरा प्रश्न :

 

अहंकार के पूर्ण विसर्जन के लिए आपने शरणागति को अत्यंत आवश्यक बताया और स्वयं अहंकार इस यात्रा के लिए राजी नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें उसकी मृत्यु निहित है। फिर बताएं कि शरणागति की यात्रा किसके द्वारा होती है?

रणागति कोई यात्रा नहीं है। अहंकार नहीं रह जाता, शरणागति फलित होती है। दीया जलाते हो तुम घर में, घर में जो घिरा हुआ अंधकार था, क्या वह द्वार—दरवाजों से बाहर जाता है? उसकी कोई यात्रा होती है? तुमने कभी अंधेरे को बाहर निकलते देखा? कि घर में दीया जल गया, अंधेरा बाहर जा रहा है! खड़े रहो द्वार पर, अंधेरा बाहर जाता न दिखाई पड़ेगा।

अंधेरा कुछ है थोड़े ही, जो बाहर जाता है। अंधेरा तो अभाव है, दीए के न होने की अवस्था है, अनुपस्थिति है। अंधेरा कुछ है थोड़े ही। अंधेरा है ही नहीं; उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

अहंकार अंधेरा है। उसे कहीं जाना थोड़े ही है। वह जा नहीं सकता। उसका कोई अस्तित्व नहीं है। वह कोई तत्व थोड़े ही है! इसलिए तो हम उसे झूठ कहते हैं, सपना कहते हैं। असली सवाल है, दीए का जल जाना।

शरणागति कोई यात्रा नहीं है। क्योंकि यात्रा अगर होगी, तो अहंकार मौजूद रहेगा। शरणागति छलांग है, यात्रा नहीं; एक क्षण में घटी घटना है। शरणागति सडेन, तल्ला घटी घटना है! जैसे दीया जला, प्रकाश हुआ, अंधेरा मिटा। एक क्षण की देरी नहीं होती। शरणागति की यात्रा कौन करता है?

यात्रा तो है ही नहीं, पहली बात। जैसे ही अहंकार गिरता है, वैसे ही शरणागति हो जाती है, उसी क्षण।

अहंकार के भीतर छिपे तुम जो हो, तुम अहंकार ही अगर होते, तो परमात्मा से मिलने का कोई उपाय न था। परमात्मा से तुम मिल सकते हो, क्योंकि तुम परमात्मा से ही हो। समान ही समान से मिल सकता है। तुम परमात्मा से मिल सकते हो, क्योंकि किसी अर्थ में तुम अभी भी परमात्मा हो। पता न हो। विपरीत का तो मिलन कैसे होगा! अहंकार के गिरते ही तत्‍क्षण तुम पाते हो, मिल गए। यात्रा नहीं होती, मंजिल आ जाती है।

तो असली सवाल है, अहंकार कैसे गिरे?

तुम्हारी चेष्टा से न गिरेगा, क्योंकि सभी चेष्टाएं अहंकार की हैं। यही जटिल जाल है। तुम अगर कोशिश करोगे, तो अहंकार ही कोशिश करेगा, गिरेगा नहीं। यह भी हो सकता है कि तुम ठोंक—ठाककर अपने को विनम्र बना लो। तो भीतर से अहंकार नई घोषणा करेगा कि मुझसे ज्यादा विनम्र कोई भी नहीं। देखो, मेरी विनम्रता। कैसे फूल लगे हैं विनम्रता के! दुनिया में हैं और लोग, लेकिन मुझसे ज्यादा विनम्र कोई भी नहीं। बस, मैं आखिरी हूं विनम्रता में, चोटी पर हूं।

यही तो अहंकार है, जो चोटी पर होने की घोषणा करता है। पहले धन के आधार पर करता था, पद के आधार पर करता था, बल के आधार पर करता था। अब त्याग के आधार पर करता है, विनम्रता के आधार पर करता है, साधुता के आधार पर करता है, संतत्व के आधार पर करता है। घोषणा वही है।

चेष्टा से अहंकार न जाएगा। अहंकार जाता है अहंकार को देखने से। चेष्टा नहीं, सिर्फ जांचने से, परखने से, पहचानने से, साक्षी— भाव से।

साक्षी— भाव का परिणाम है शरणागति। तुम सिर्फ देखते रहो अहंकार का खेल, कुछ करो मत। करने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि भीतर जो तुम्हारे छिपा है, वह कर्ता है ही नहीं, वह साक्षी है। तुम सिर्फ देखो। तुम जरा अहंकार के खेल देखो; लीला देखो। कैसी लीला रचता है! और कैसी सूक्ष्म लीला रचता है!

रास्ते पर तुम जा रहे हो अकेले, और देखा कि पास के मकान से दो आदमी निकल आए। भीतर कुछ बदल गया। परखो इसे, जांचो दूर खड़े, क्या हुआ?

अभी ये दो आदमी रास्ते पर नहीं थे, तो तुम और ढंग से चल रहे थे। कोई देखने वाला न था, तो तुम्हारा चेहरा और था, तुम एक गीत गुनगुना रहे थे; एक मस्ती थी, सरल थे, छोटे बच्चे की तरह थे। अचानक दो आदमी पास के मकान से निकल आए, कोई चीज भीतर बदल गई। अकड़ गए, बचपना चला गया, सरलता खो गई, चाल बदल गई, अहंकार आ गया।

तुम घर में अकेले बैठे हो, कोई नहीं है, तब तुम और हो। नौकर कमरे से गुजर गया। पता भी नहीं चलता, शरीर हिलता भी नहीं, और भीतर सब हिल जाता है। जांचो, परखो।

कोई आदमी आया, कहने लगा, आप जैसा बुद्धिमान आदमी कभी नहीं देखा। भीतर एक छलांग लग गई। तुम एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ गए। जरा भीतर देखते रहो, क्या हो रहा है! इस आदमी ने चार शब्द कहे। शब्दों में क्या है? हवा में उठे बबूले हैं। इसने कहा कि तुम बड़े सुंदर, कि तुम बड़े बुद्धिमान, कि आप जैसा त्यागी नहीं देखा। भीतर एक छलांग लग गई। अभी खड़े थे जमीन पर, अचानक एवरेस्ट पर पहुंच गए। गौरीशंकर विजय कर लिया! एक आदमी आया, आलोचना करने लगा, निंदा करने लगा; कहने लगा, तुमसे ज्यादा निम्न और बेईमान कोई भी नहीं है। भयंकर चोट लग गई, घाव हो गया। अहंकार तड़फने लगा बदला लेने को। क्रोध में आ गए। इस आदमी को अब तक मित्र समझा था, यह दुश्मन हो गया। कहा कि बाहर निकल जाओ, अन्यथा उठवाकर फिंकवा दूंगा। धक्का देकर इस आदमी को बाहर कर दिया।

जांचते रहो! अनेक—अनेक रूपों में, अनेक—अनेक परिस्थितियों में, अनेक—अनेक घटनाओं में सिर्फ देखते रहो, क्या हो रहा है खेल! कब अहंकार बनता, कब चोट खाता, कब गिर पड़ता, कब उठकर खड़ा हो जाता; किस—किस ढंग से यह खेल चलता है। तुम सिर्फ देखो। बस, द्रष्टा होना काफी है।

अगर तुम्हारी दृष्टि किसी दिन सध जाएगी.। और सधते— सधते ही सधेगी। कोई अचानक तुम न देख पाओगे। क्योंकि देखना बड़ी से बड़ी कला है।

इसलिए तो जिन्होंने जान लिया, उनको हमने द्रष्टा कहा है, देखने वाले कहा है। जिन्होंने जान लिया, उनके वचनों को हमने दर्शन कहा है कि उन्होंने देख लिया, जान लिया। क्या देख लिया? देख लिया, अहंकार का खेल।

जिस दिन देखना पूरा हो जाता है, अहंकार तल्ला गिर जाता है। उसी क्षण शरणागति हो जाती है। उसी क्षण तुम बचे ही नहीं। समर्पण करना नहीं होता, होता है। समर्पण करोगे, तो झूठा रहेगा। वह करने वाला हमेशा अहंकार रहेगा।

जो समर्पण किया गया है, उसे तुम वापस भी ले सकते हो। उसका मूल्य ही क्या है? लेकिन जो समर्पण होता है, उसे तुम वापस न ले सकोगे। लेने वाला नहीं बचा, करने वाला नहीं बचा, सिर्फ देखने वाला बचा है। तुम सिर्फ देखोगे कि ऐसा हो रहा है। शरणागति देखी जाती है कि हो गई।

अहंकार को देखते—देखते—देखते अचानक एक दिन तुम पाते हो कि उस दर्शन के प्रवाह में ही, उस दर्शन की ज्योति में ही अहंकार का अंधकार खो गया। तुम अपने को पाते हो, मिट गए शून्य हो गए। समर्पण हो गया, शरणागति हो गई। उतर गए तुम नदी की धार में, उतर गई नदी की धार तुममें। अब तुममें और परमात्मा में कोई फासला न रहा। उतने ही अहंकार का फासला था। कर्ता है परमात्मा और जान लिया था तुमने अपने को कर्ता, वही दूरी थी। एक मात्र कर्ता है परमात्मा, वही कर रहा है, सब करना उसका है। तुमने अपने को कर्ता मान लिया था, यही आति थी। वह भांति छूट गई।

जैसे—जैसे तुम जांचोगे, भीतर भांति छूटती जाएगी। तुम पाओगे, तुम कुछ भी तो नहीं कर रहे हो, सब हो रहा है। भूख लगती है, प्यास लगती है, तो पानी की खोज शुरू हो जाती है। नींद आती है, तो बिस्तर तैयार होने लगता है। जवानी आती है, तो कामवासना घेर लेती है। बुढ़ापा आता है, कामवासना धुएं की तरह दूर निकल जाती है।

छोटे बच्चे थे, पता न था काम का। तितलियों के पीछे दौड़ते थे, फूलों को पकड़ते थे, कंकड़—पत्थर बीन लाते थे घर में। घर के लोग कहते थे, फेंको। तुम बड़ा मूल्यवान समझते थे। वह भी हो रहा था। फिर जवानी आई, नया पागलपन आया। अब तुम साधारण तितलियों के पीछे नहीं भागते। अब भी तितलियों के पीछे भागते हो, लेकिन अब उन तितलियों का नाम स्त्री है, धन है, पद है। अभी भी कंकड़—पत्थर इकट्ठा करते हो, पुराने नहीं। अब उनका नाम कोहिनूर है, हीरे—जवाहरात हैं, उनको इकट्ठे करते हो। खेल जारी है। कोई करवा रहा है। और तुम पूरे वक्त सोच रहे हो कि मैं कर रहा हूं।

क्रोध होता है। तुमने कभी किया? प्रेम होता है। तुमने कभी किया? तुम पैदा हुए हो या कि तुमने अपने को पैदा कर लिया है? तुम मरोगे या कि तुम अपने को मारोगे? जो आत्महत्या करते हैं, वे भी अपने को नहीं मारते; वह भी घटती है। वे भी बच नहीं सकते। वह भी होता है। क्या करोगे? आत्महत्या का विचार पकड़ लेता है। वह तुमने थोड़े ही पैदा किया है।

अगर तुम ठीक से विश्लेषण करोगे, तो तुम पाओगे, सब हो रहा है। और अकारण ही तुमने कर्ता को बना लिया कि मैं कर्ता हूं। बस, देखने की क्षमता आ जाए, कर्ता— भाव खो जाता है। करने वाला एक है।

साक्षी शरणागति है। साक्षी समर्पण है। साक्षी तुम्हारा विसर्जन है। और जहां तुम नहीं हो, वहां परमात्मा है।

आखिरी प्रश्न :

 

आपको देखकर बहुत खुशी होती है, आपकी आलोचना सुनकर बहुत दुख। फिर महीने में चार—पांच बार आपकी तस्वीर के सामने कहता हूं? मुझे आनंद नहीं दे सकता, तो मुझे मार ही डाल। इतना दुख क्यों देता है? थोड़ी देर मैं पछताता हूं! झुसिया भगवान से लड़ता था। पर उसकी भाव—दशा पवित्र रही होगी। मुझमें तमस बहुत है। ध्यान कछ समय चलता है, फिर रूक जाता है, फिर चलता है। मेरी तमस, मेरी विक्षिप्तता कैसे दूर हो?

गर मुझे देखकर खुशी होगी, तो मुझे न देख पाओगे, तो दुख होगा। अगर मेरी कोई स्तुति करेगा, प्रसन्नता होगी, तो फिर जब कोई मेरी निंदा करेगा, आलोचना करेगा, तो दुख होगा। सुख और दुख साथ—साथ हैं। अगर एक को चुना, तो दूसरे से बच न सकोगे। अगर दूसरे से बचना हो, तो दोनों को छोड़ देना पड़ेगा।

उ तो मुझे देखकर खुश मत होओ, शांत होओ। मुझे देखकर खुश होओगे, तो जब मुझे न देख पाओगे, तो दुख होगा। सुख अपने साथ दुख ले आता है। इसलिए मुझे देखकर शांत बनो। क्योंकि सुख एक उत्तेजना है। सुख कोई बहुत अच्छी अवस्था नहीं है। एक तनाव है। इसलिए सुख से भी आदमी ऊब जाता है।

तुमने कभी खयाल किया कि ज्यादा देर तुम सुखी नहीं रह सकते। क्योंकि थक जाता है आदमी। ज्यादा देर सुखी रहना मुश्किल है। दुख विश्राम है। अगर सुखी होओगे, थक जाओगे, तब दुख में विश्राम लेना पड़ेगा। सुख दिन जैसा है, दुख रात जैसा है।

अगर दुख से बचना हो, तो ध्यान रखना, सुख से बचना होगा। सुख की उत्तेजना तुमने पाल ली, तो फिर दुख की उत्तेजना कौन सहेगा? वह भी तुम्हीं को सहनी पड़ेगी। वह विपरीत है, पर इसी का दूसरा अति छोर है।

दुख से तो हम बचना चाहते हैं, बच कहा पाते हैं? सुख हम पाना चाहते हैं, मिल कहं। पाता है? इस बोध को जो उपलब्ध हो जाता है कि सुख के साथ दुख जुड़ा है, एक ही सिक्के दो पहलू हैं, वह पूरे सिक्के को फेंक देता है। उस सिक्के को फेंकने में शांति है। तुम जब मेरे पास आओ, तो सुख की भाव—दशा को मत बनाओ। कोई उत्तेजना मत पालो। आओ, शांत बनो। अगर तुम मेरे पास शांत रहोगे, तो तुम मुझसे दूर भी शांत रहोगे। क्योंकि शांति कोई उत्तेजना नहीं है। शांति एक स्वाभाविक दशा है। शांति में कोई तनाव नहीं है। इसलिए कोई व्यक्ति शांत रह सकता है अनंत काल तक।

इसलिए बुद्ध ने मोक्ष में सिर्फ शांति को ही जगह दी है, सुख को कोई जगह नहीं दी। आनंद शब्द का भी प्रयोग नहीं किया। क्योंकि आनंद में भी तुम्हें सुख की छाया पड़ती है, तुम्हें लगता है, आनंद महासुख है, ऐसा सुख जो कभी अंत न होगा। लेकिन ऐसा कोई सुख होता ही नहीं, जो कभी अंत न हो।

तो बुद्ध ने निर्वाण को शांति कहा है। इतनी गहरी शांति कि उसमें तुम भी नहीं हो, बस शांति है। वह अनंत काल तक रह सकती है, उसका कोई अंत नहीं आता है।

सुख तो है संगीत जैसा, कि कोई रविशंकर वीणा बजा रहा है। प्रीतिकर है, लेकिन कितनी देर तुम रविशंकर की वीणा सुन सकते हो? घड़ी दो घड़ी बहुत, अगर रातभर रविशंकर तार ठोंकता रहे, तुम पुलिस में खबर करोगे कि यह आदमी तो जान ले लेगा। अगर वह माने ही न और तुम्हारे पीछे—पीछे ही सितार बजाता घूमे, तो तुम पगला जाओगे दो—चार दिन में। इससे ज्यादा नहीं लगेगी देर।

बड़ा सुख था वीणा में घड़ी दो घड़ी, फिर पीड़ा हो गई, फिर पागलपन आने लगा। क्योंकि उत्तेजना है संगीत भी, चोट है, आघात है। कितना ही मधुर हो, है तो चोट ही। तार पर पड़ी चोट, शब्द की पड़ी चोट, कान पर झनकार है, हृदय पर भी झनकार है। कितनी ही प्रीतिकर हो, चोट करती है। बाजार का शोरगुल कितना ही अप्रीतिकर हो, रेलवे स्टेशन पर चलती खटर—पटर कितनी ही अप्रीतिकर हो, वह भी चोट करती है। उसे तुम क्षणभर भी नहीं सुनना चाहते। रविशंकर की वीणा को तुम थोड़ी देर सुनना चाहोगे।

लेकिन एक ऐसा संगीत भी है, जो अनाहत है, जो आघात से पैदा नहीं होता। उस संगीत में कोई स्वर नहीं है। उसी को हमने ओंकार कहा है। इसलिए ओंकार को अनाहत नाद कहा है। न तो अंगुलियां हैं, न तार हैं, न कोई चोट है। वह संगीत कैसा है? वह संगीत शून्य का है, मौन का है। उसमें तुम अनंत काल तक रह सकते हो, तुम कभी न थकोगे।

सुख से आदमी थकता है, दुख से भी थकता है। और इसलिए बदलाहट चलती रहती है, सुख से दुख में, दुख से सुख में; रात से दिन, दिन से रात। श्रम करता है, विश्राम; विश्राम करता है, श्रम। द्वंद्व जारी रहता है। अशांति जारी रहेगी द्वंद्व के साथ। शांति निर्द्वंद्व हो जाना है।

जब तुम मेरे पास आओ, तो सुख को मत जन्मने दो। क्या करोगे? सिर्फ देखते रहो। अगर तुम जागकर मेरे पास रहे, सुख जन्मेगा ही नहीं। वह नींद में ही जन्मता है। तुम शांत रहो। तुम बैठो मेरे पास ध्यानस्थ। तब तुम पाओगे कि मेरे पास या मुझसे दूर, सब बराबर है।

बुद्ध का मरण दिन आया, तो आनंद छाती पीट—पीटकर रोने लगा। और भी भिक्षु थे, उसमें एक भिक्षु था महाकाश्यप। वह अपने वृक्ष के नीचे बैठा था। खबर पहुंची, किसी ने कहा कि बुद्ध का अंतिम दिन आ गया। उन्होंने कहा है आज मैं विसर्जित हो जाऊंगा। उसने सुना या नहीं सुना, वैसा ही बैठा रहा। आनंद रोने लगा।

बुद्ध ने कहा, आनंद तू क्यों रोता है? तू महाकाश्यप की तरफ क्यों नहीं देखता? उसको भी खबर मिली है, लेकिन वह चुप बैठा है। जैसे कुछ नहीं हुआ है। जैसे लहर ही नहीं आई। कोई बात ही नहीं हुई। जैसे किसी ने कहा ही नहीं कि बुद्ध मरने को हैं।

आनंद ने महाकाश्यप की तरफ देखा। उसने कहा, बेबूझ है बात। मेरी समझ नहीं पड़ती। आपके रहते इतना सुख था, आपके जाते महादुख होगा।

बुद्ध ने कहा, तू महाकाश्यप को पूछ। महाकाश्यप से पूछा। महाकाश्यप ने कहा, उनके रहते बड़ी शांति थी, उनके न रहते भी बड़ी शांति होगी। क्योंकि शांति भीतर की बात है। उसका उनके रहने न रहने से संबंध नहीं। उनके सहारे भीतर को साध लिया, सध गया। बुद्ध न होंगे, तो भी शांति होगी। बुद्ध थे, तो भी शांति थी। आनंद, तू सुख के पीछे पड़ा है। इसलिए मुश्किल में उलझा है। सुख को छोड़। शांत!

शांत रस को पकड़ने की कोशिश करो। अन्यथा मैं कितने दिन तुम्हारे पास रहूंगा! फिर तुम दुखी होओगे। तो मैंने तुम्हें जितना सुख दिया, उससे ज्यादा दुख तुम्हें दे दूंगा। क्योंकि रहना तो थोड़ी देर है, न रहना बहुत लंबा होगा।

बुद्ध अस्सी साल रहे। फिर अब ढाई हजार साल बीत गए। और जिन्होंने बुद्ध के साथ सुख पाया होगा, वे अभी भी दुख पा रहे होंगे, ढाई हजार साल! अब वे जनम—जनम तक दुख पाएंगे। वह पीड़ा बनी ही रहेगी। जिसने बुद्ध के साथ सुख पाया, अब बिना बुद्ध के कैसे सुख पाएगा!

नहीं, तुम वह भूल करना ही मत। यह जो आनंद की भूल है, इससे बचना। महाकाश्यप गुणी है। वह राज समझ गया है कि क्या साधना है। जब तक बुद्ध मौजूद हैं, शांति को साध लो।

और अगर तुमने शांति साधी, तो तुम हैरान होओगे, कोई मेरी स्तुति करे तो और कोई मेरी निंदा करे तो, बराबर हो जाएगी। तुम्हें चोट क्यों लगती है जब कोई मेरी निंदा करता है? तुम्हें अच्छा क्यों लगता है जब कोई मेरी स्तुति करता है?

तुम्हें समझ नहीं है। जब कोई मेरी स्तुति करता है, तुम्हारे अहंकार को बढ़ावा मिलता है, तुम ठीक आदमी के साथ हो। जब मेरी कोई निंदा करता है, तुम्हारे अहंकार को घाव लगता है, चोट लगती है, कि तुम गलत आदमी के साथ हो।

इससे मेरा कुछ लेना—देना नहीं है। न तो स्तुति करने वाला मेरी स्तुति कर सकता है, न निंदा करने वाला निंदा कर सकता है। वे दोनों ही नासमझ हैं। दोनों को मेरा कोई पता नहीं है। स्तुति करने वाले को एक हिस्सा पता है, निंदा करने वाले को दूसरा हिस्सा पता है; पूरे का उन दोनों को पता नहीं है, अन्यथा वे चुप हो जाते। क्योंकि जो भी मुझे पूरा समझेगा, वह मेरे संबंध में चुप हो जाएगा। क्योंकि पूरे को जब भी तुम समझोगे, तब तुम पाओगे, न तो वह स्तुति में समा सकता है और न निंदा में समा सकता है।

जो नहीं समझते, उनमें से कुछ निंदा करते हैं; जो नहीं समझते, उनमें से कुछ स्तुति क्तते हैं। जैसे मित्र स्तुति करता है, क्योंकि वह प्रेम करता है। शत्रु निंदा करता है, क्योंकि वह घृणा करता है। लेकिन मित्र कल शत्रु हो सकते हैं, शत्रु कल मित्र हो सकते हैं। इसमें कुछ अड़चन नहीं है।

तुम्हें चोट लगती है निंदा से, क्योंकि तुम्हारा अहंकार अड़चन में पड़ जाता है। तुम्हें प्रसन्नता होती है, कोई स्तुति करता है, क्योंकि तुम्हारा अहंकार फूल जाता है। इसे गौर से देखो। इसे तुम मुझ से बांधो ही मत। इससे मेरा कुछ लेना—देना नहीं है। अपने भीतर पहचानो।

और अगर तुम मेरे पास शांति को साधोगे, तो तुम्हारी दृष्टि निर्मल होती जाएगी। सिर्फ शांति में ही दृष्टि निर्मल और निर्दोष होती है। तब तुम हंस पाओगे। स्तुति करने वाले को भी देखकर तुम शांत रहोगे; निंदा करने वाले को देखकर भी तुम शांत रहोगे। और तब मैं तुमसे कहता हूं कि तुम उन दोनों को बदलने में भी समर्थ हो जाओगे।

अगर कोई मुझे गालियां देता है और तुम चुपचाप सुन लो, और तुम वैसे ही बने रहो, जैसे पानी पर किसी ने लकीर खींची, खींच भी न पाया और मिट गई, लौटकर देखे, वहां कोई लकीर नहीं है; ऐसे तुम बने रहो, तो शायद निंदा करने वाले को पुन: सोचना पड़े कि जिसकी वह निंदा कर रहा है, उस आदमी के पास रहकर अगर इस आदमी को ऐसा कुछ हो गया है, तो एक बार फिर सोच लेना जरूरी है।

लेकिन किसी ने निंदा की और तुम दुखी और परेशान हो गए, बेचैन हो गए, क्रोधित हो गए या तुम मेरी रक्षा करने लगे। कैसे तुम मेरी रक्षा करोगे? या तुम तर्क देने लगे, विवाद में पड़ गए, तो तुम दूसरे आदमी को जो एक मौका दे सकते थे बदलने का, उसे चूक गए।

कोई किसी को विवाद से थोड़े ही कभी राजी कर पाता है। तर्क ने कभी किसी को बदला है? उस भ्रांति में पड़ो ही मत। तुम लाख तर्क दो, ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि तुम्हारे तर्क उस आदमी का मुंह बंद कर दें। लेकिन उसके हृदय को न बदल पाएंगे। वह खोज में रहेगा कि और मजबूत तर्कों को लाकर, सिद्ध करके तुम्हें दिखा दे कि तुम गलत हो। क्योंकि तुमने उसे एक चुनौती दे दी, उसके अहंकार को चोट पहुंचा दी। वह बदला लेकर रहेगा।

तर्क से कुछ सार नहीं है। विवाद में कुछ रस नहीं है। तुम्हें देखकर कुछ घटना घट सकती है। कोई मुझे गाली देता आए और तुम चुपचाप सुन लो, ऐसे कि कुछ भी न हुआ। वह आदमी गंभीर होकर लौटेगा। तुम्हारी शांति उसका पीछा करेगी। तुम उसकी नींद में उतरोगे। तुम उसके सपनों में छा जाओगे। वह बेचैन होगा। उसका आने का मन बार—बार होगा कि फिर तुम्हारे पास आए। मामला क्या है? गाली दी थी, उत्तर आना चाहिए था! इस आदमी को कुछ हो गया है!

और कौन नहीं चाहता कि ऐसी दशा उसकी भी हो जाए कि कोई गाली दे और चोट न पड़े! तुमने इस आदमी को जकड़ लिया, पकड़ लिया। यह आदमी भाग न सकेगा। और यह घटना मेरे पास आने से घटी है; तुमने मेरी तरफ इस आदमी को पहुंचने के लिए पहला उपाय बता दिया। इस आदमी के लिए तुमने दरवाजा खोल दिया।

धक्का मत दो, सिर्फ दरवाजा खोलो। धक्का देकर तुम उसे भीतर न ला पाओगे। धक्का देकर कहीं कोई भीतर आया है? सिर्फ चुपचाप द्वार खोल दो कि उसे पता भी न चले। यह आज नहीं कल आएगा; इसे आना ही पड़ेगा। तुम्हारी शांत मूर्ति इसका पीछा करेगी। शांत हो जाओ। सुख को मत पकड़ो।

और तुम कहते हो मेरी तस्वीर के सामने कि मुझे आनंद नहीं दे सकता, तो मुझे मार ही डाल।

वह भी सुख की ही तलाश है। तुम मरने को राजी हो, लेकिन खुद को छोड़ने को राजी नहीं हो। मैं तुमसे कहता हूं मरने की कोई जरूरत नहीं, सिर्फ अहंकार को मरने दो। तुम काफी मजे से जीयो। तुम्हारे जीने से कहीं कोई अड़चन नहीं है। लेकिन तुम कहते हो, मैं मरने को राज़ी हूं,लेकिन वह जो कहा रहा है कि मैं मरने को राज़ी हूं वह मैं छूटने को राजी नहीं है।

आत्महत्या करते वक्त भी तुम मैं ही बने रहोगे कि मैं आत्महत्या कर रहा हूं मैं कुर्बानी दे रहा हूं। जैसे तुम शिकायत कर रहे हो पूरे परमात्मा से, पूरे अस्तित्व से कि लो, अगर आनंद नहीं, तो मैं जीवन छोड़ता हूं। लेकिन यह छोड़ने वाला अहंकार है।

पकड़ने वाला, छोड़ने वाला, दोनों अहंकार हैं। तुम जागो। पकड़ने—छोड़ने से कुछ न होगा।

आनंद क्यों मांगते हो खर आनंद को तो तुमने सदा से मांगा है और इसीलिए तुम इतने दुखी हो। जागो! शांति, शून्य तुम्हारा स्वर बने। और तब आनंद तुम्हें मिलेगा। आनंद मांगने से नहीं मिलता, शून्य होने से बरसता है। आनंद कोई भिखारी को नहीं मिलता, सिर्फ सम्राटों को मिलता है। और सम्राट मैं उसे कहता हूं, जिसकी मांग बंद हो गई। जो मांगता है, वह भिखारी है।

तुमने अगर कहा, आनंद, तुम्हें कभी न मिलेगा। तुम सिर्फ शांत हो जाओ। और शांत होते ही तुम पाओगे, चारों तरफ से स्रोत आनंद के बहे आ रहे थे, अपनी अशांति के कारण तुम देख न पाए। खजाना सामने पड़ा था, तुम्हारी आंख अंधी थी। द्वार खुले थे, तुमने आंख उठाकर देखा ही नहीं। तुम चूक रहे थे अपने कारण। अस्तित्व क्षणभर को भी तुम्हें चुकाने को उत्सुक नहीं है।

पूरा अस्तित्व सहारा दे रहा है कि आ जाओ, द्वार खुले हैं, खजाना तुम्हारा है। लेकिन तुम भिक्षा—पात्र लिए खड़े हो। और भिक्षा—पात्र में यह खजाना नहीं समा सकता। यह खजाना भिक्षा—पात्रों से बहुत बड़ा है। भिक्षा—पात्र छोड़ना पडेगा।

अहंकार भिक्षा—पात्र है। मत मांगो आनंद। सिर्फ शांत हो जाओ और आनंद मिलेगा। आनंद सदा मिलता है उनको, जो शांत हो गए। जो मांगते हैं, उन्हें दुख मिलता है। फिर दुख और पीड़ा में तुम कहते हो, आत्महत्या तक कर लूंगा; मार डालो, मर जाऊं।

इससे कुछ हल नहीं है। तुम मर भी जाओगे, तो तुम तुम ही रहोगे। फिर पैदा हो जाओगे। फिर आनंद मांगने लगोगे। यही तो तुम करते रहे हो। यह गोरखधंधा बहुत पुराना है। तुम कोई नए थोड़े ही हो। तुम बड़े प्राचीन पुरुष हो। कितनी ही बार तुमने यही किया, मांगा, नहीं मिला। मरे, फिर मांगा। लेकिन मांग को न मरने दिया।

तुम मत मरो, माग को मरने दो, तुम जीओ। तुम तो शाश्वत हो, तुम मर भी नहीं सकते। तुम मारोगे कैसे? कैसे मिटाओगे अपने को? तुम बनाए नहीं अपने को, मिटाने वाले तुम कैसे हो सकते हो? जिसने बनाया, वही मिटा सकता है। और बनाया किसी ने भी तुम्हें नहीं है। तुम ही हो सार इस सारे अस्तित्व के। तुम सदा से हो, सदा रहोगे, अनादि, अनंत। ऐसा कभी न था कि तुम न थे और ऐसा कभी न होगा कि तुम न रहोगे।

मिटाने से क्या होगा? मिट—मिटकर तुम होते रहोगे। उस बात को ही छोड़ो। आनंद मत मांगो, शांति। और मजा यह है कि आनंद मांगना पड़ता है, शांति को मांगने की जरूरत नहीं। शांत तुम ही हो सकते हो। आनंदित तुम कैसे होओगे? मुझे कहो, आनंदित होने का तुम्हारे हाथ में क्या उपाय है? लेकिन शांत तुम हो सकते हो। जो तुम हो सकते हो, वही करो; शेष अपने से होगा।

जैसे वर्षा होती है; पहाड़ खाली रह जाते हैं, क्योंकि पहले से भरे हैं; गड्डे झीलें बन जाते हैं, क्योंकि खाली थे। तुम खाली हो जाओ। शांति यानी खाली हो जाना, गड्डा हो जाना। आनंद बरस रहा है, भर देगा तुम्हें। तुम झील हो जाओगे आनंद की।

झुसिया भगवान से लड़ता था, पूछा है, पर उसकी भाव—दशा पवित्र रही होगी। मुझमें तमस बहुत है।

किसको यह समझ है? कौन कह रहा है कि मुझमें तमस बहुत है? निश्चित ही, सत्व बोल रहा होगा। क्योंकि तमस कभी स्वयं को स्वीकार नहीं करता। तमस का तो लक्षण है, वह अस्वीकार करता है कि मैं और आलसी? तो आलसी भी तलवार लेकर लड़ने खड़ा हो जाता है कि किसने कहा? मैं और आलसी? मैं और तामसी? तो तामसी भी तमस छोड्कर लड़ने को खड़ा हो जाता है। तुम आलसी को भी आलसी नहीं कह सकते। वह भी लकड़ी उठा लेगा। तमस तो स्वीकार ही नहीं करता अपने को।

कौन सोच रहा है? कौन देख रहा है कि मैं तामसी हूं? यही तो सत्व का स्वर है। तुम इस स्वर को ठीक से पहचानो। और तुम इस स्वर की तरफ थोडे ज्यादा झुको। संतुलन भर बदलना है, कुछ बदलना नहीं है। ऊर्जा एक ही है। एक ही ऊर्जा है जो सत्व में, रज में, तम में प्रवाहित होती है।

जो आदमी सो रहा है, यही आदमी तो जागेगा; जो ऊर्जा सो रही है, वही जाग जाएगी, कोई दूसरी ऊर्जा थोड़े ही जागेगी। जो तमस है, वही तो रज बनेगा। जो रज है, वही तो सत्य बनेगा। धारा तो एक ही है, ऊर्जा तो एक ही है, शक्ति एक ही है। ये तीन तो उसके निष्कासन के उपाय हैं।

अभी पूरी की पूरी धारा या ज्यादा ज्यादा धारा सत्व नहीं बह रही है, तमस से बह रही है, रजस से बह रही है। लेकिन थोड़ी—सी बूंदें सत्व से भी बह रही हैं। उन बूंदों का मार्ग पकड़ो। शेष धारा को भी उसी तरफ झुकाओ। थोड़ा संतुलन बदलना है। बस, तीनों पाए बराबर हो जाएं; सत्व, रज, तम, तीनों में बराबर ऊर्जा बहने लगे एक तिहाई, एक तिहाई, एक तिहाई, अचानक तुम पाओगे, संगीत बजने लगा, अनाहत नाद शुरू हो गया। जहां तीनों बराबर हो जाते हैं, तीनों एक—दूसरे को काट देते हैं और वहीं से गुणातीत आयाम का प्रारंभ होता है।

यह कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं सारा गुणत्रय—विभाग, ताकि वह गुणातीत हो जाए।

तुम्हारा स्वभाव गुणातीत है। तुम तीन में बंटे हो, क्योंकि तुम सोए हो, तुम्हें पता नहीं। और सोई दशा में अधिक ऊर्जा तमस से बहेगी, क्योंकि सोई दशा तमस की दशा है। जब तुम महत्वाकांक्षा से भरकर दौड़ोगे पद— धन की तलाश में, तब अधिक ऊर्जा रजस से बहेगी। क्योंकि गति, महत्वाकांक्षा, दौड़ रजस का धर्म है। जब तुम शांत बनोगे, ध्यान और समाधि खोजोगे, मौन, निर्विकल्प, निर्विचार दशा को खोजोगे, तब सत्य से बहने लगेगी यही ऊर्जा। क्योंकि ध्यान, निर्विकल्पता, निर्विचार दशा, सत्व के गुण हैं।

और जब तीनों किसी एक दिन, किसी क्षण संयोग में बैठ जाते हैं, तीनों का स्वर लयबद्ध हो जाता है, उसी त्रिवेणी में एक का जन्म होता है। इसीलिए तो लोग त्रिवेणी जाते हैं तीर्थयात्रा करने। वह तीर्थ तुम्हारे भीतर है। जहां इन तीनों का मिलन होगा, वहीं त्रिवेणी बन जाएगी, वहीं प्रयागराज बन गया, वहीं हो गया तीर्थ, वहीं से एक का अनुभव होगा।

घबड़ाओ मत, चिंतित मत होओ। सब साज—सामान मौजूद है, थोड़ी—सी व्यवस्था जमानी है। सूफी कहते हैं, आटा मौजूद है, पानी मौजूद है, नमक मौजूद है, शाक—सब्जी मौजूद है, लकड़ियां पड़ी हैं, माचिस तैयार है, मगर भोजन तैयार नहीं है।

सब तैयार है। जरा— सा इंतजाम बिठाना है कि लकड़ियों में आग लगा दो, कि चूल्हा तैयार कर लो, कि आटे में थोड़ा पानी मिलाओ, कि थोड़ा नमक; कि आटा गूंथ लो, कि रोटियां पका लो; कि भूख मिट जाएगी, तृप्ति हो जाएगी।

परमात्मा मौजूद है, सिर्फ थोड़ा—सा संयोग बिठाना है। वह तुम्हारे तीन गुणों में मौजूद है, उनको थोड़ा—सा संयोजित करना है। धर्म संयोजन की कला है, उससे ज्यादा कुछ भी नहीं। फिर तुम्हारे भीतर एक का जन्म हो जाता है। जहां तीन मिलते हैं, वहा एक का जन्म हो जाता है। इसलिए त्रिवेणी तीर्थ है।

अब सूत्र :

और हे अर्जुन, जो मनुष्य शास्त्र—विधि से रहित केवल मनोकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा जो दंभ और अहंकार से युक्त हैं, कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं तथा जो शरीररूप से स्थित भूत—समुदाय को और अंतःकरण में स्थित मुझ अंतर्यामी को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को आंसुरी स्वभाव वाला जान।

कौन है आंसुरी स्वभाव वाला? कौन है तामसी?

कृष्ण कहते हैं, जो मनुष्य शास्त्र—विधि से रहित केवल मनोकल्पित घोर तप करते हैं…।

मैं वर्षों तक लोगों से कहता रहा कि न तो गुरु की कोई जरूरत है, न शास्त्र की कोई जरूरत है। उस बात में जरा भी भूल न थी। लेकिन मुझे लगा, बात में बिलकुल भूल नहीं है, लेकिन सुनने वाले पर परिणाम बड़ी भूल का हो रहा है।

बात बिलकुल सही है। क्योंकि परमात्मा तुम्हारे भीतर बैठा है। शास्त्र क्या समझाएंगे तुम्हें? सिर्फ आंख भीतर खोलनी है। वेद कंठस्थ करके क्या होगा? अपनी तरफ आंख खोलनी है, स्वाध्याय करना है। शास्त्र—अध्याय से क्या होगा? और गुरु की क्या जरूरत है? क्योंकि जिसे खोजना है, वह तुम्हें मिला ही हुआ है। जब जरा गरदन झुकाई..! गरदन झुकाने के लिए भी गुरु की जरूरत है? उतनी सी समझ भी तुममें नहीं है? और अगर उतनी ही समझ नहीं है, तो गुरु भी क्या करेगा? शास्त्र भी क्या करेंगे?

बात बिलकुल सही है। लेकिन धीरे—धीरे मुझे अनुभव होना शुरू हुआ, मेरी तरफ से सही है, सुनने वाले की तरफ से बिलकुल गलत है। मैंने पाया कि सौ लोग अगर सुनते हों, तो उसमें से एक को बात सही वैसी ही पहुंचती है, जैसी मैंने कही है। वह सत्वगुणी है। और सत्वगुणी पर क्या परिणाम होते थे, जब मैं यह कह रहा था?

उस पर परिणाम ये नहीं होते थे कि वह शास्त्र को छोड़ देता था, नहीं। या गुरु को छोड़ देता था, नहीं। न तो वह शास्त्र छोड़ता था, न वह गुरु छोड़ता था। सिर्फ पकड़ता नहीं था। यह सत्वगुणी पर परिणाम होता था, पकड़ता नहीं था, सिर्फ पकड़ छोड़ता था। न तो शास्त्र छोड़ता था; न गुरु छोड़ता था; सिर्फ पकड़ छोड़ता था। वह समझ लेता था कि बात क्या है, पकड़ छोड़ देनी है। और जब वह पकड़ छोड़ देता था, तो शास्त्र भी सहयोगी हो जाता था, गुरु भी सहयोगी हो जाता था।

पकड़ के कारण शास्त्र भी बाधा बन जाता है, गुरु भी बाधा बन जाता है। क्योंकि तुम एक आग्रह से भर जाते हो, एक आसक्ति से, एक मोह से। मेरा शास्त्र—वेद हिंदू का, कुरान मुसलमान का। मेरा गुरु—महावीर जैन का, मोहम्मद मुसलमान का। वह मेरा—पन छोड़ देता था, वह जो एक प्रतिशत सत्वगुणी मनुष्य था।

और बड़े मजे की बात यह है कि जैसे ही वह मेरा—पन छोड़ता था, वह वेद का तो लाभ ले ही लेता था, कुरान का भी ले लेता था। वह महावीर के पीछे चलकर तो शांति का मजा ले ही लेता था, वह बुद्ध के पीछे चलकर भी ले लेता था। जब पकड़ ही न रही, तो सभी गुरु हो जाते थे।

सत्वगुणी की व्याख्या यह थी कि जब पकड़ ही नहीं, कोई गुरु नहीं, तो सभी गुरु हो गए। और जब कोई पकड़ ही नहीं, कोई शास्त्र ही नहीं, तो सभी शास्त्र अपने हो गए। बंधन छूट जाता था। वह निर्मुक्त भाव से जीने लगता था। सबसे सीखता था।

सत्वगुणी यह सुनकर कि न गुरु की जरूरत है, न शास्त्र की, गुरु को नहीं पकड़ता था, शास्त्र को नहीं पकड़ता था, लेकिन शिष्यत्व उसका गहरा हो जाता था। पर वह घटता था एक प्रतिशत लोगों में।

फिर मैंने देखा कि नौ प्रतिशत रजोगुणी लोग हैं। उन पर क्या परिणाम होता था? वर्षों उनका अध्ययन करके मुझे समझ में आया कि यह सुनकर कि न शास्त्र को पकड़ना है, न गुरु को पकड़ना है, वे शास्त्र को छोड़ने में लग जाते थे, गुरु को छोड़ने में लग जाते थे। समझ पैदा नहीं होती थी, छोड़ने की दौड़ पैदा होती थी। रजोगुण का वह लक्षण है कि हर चीज में से दौड़ निकाल लेता है।

तो एक रजोगुणी मेरे पास आया, उसने मेरी बात समझी, वह घर गया; कुछ छोटी—मोटी मूर्तियां घर में थीं, शास्त्र थे, सब बांधकर कुएं में फेंक आया। फिर पछताया रात में। फिर डरा कि यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई; कहीं नाराज न हो जाएं देवी—देवता! उनकी पूजा करता रहा था। मेरी बात सुन ली; तब तक पूजा में लगा था वह, और गहन पूजा करने वाला था। घंटों, छ: —छ:, आठ—आठ घंटे वर्षों से यह कर रहा था। मेरी बात सुनी; रजोगुण ने नई दौड़ पकड़ी। पुरानी से थक चुका होगा, कुछ परिणाम भी नहीं हो रहा था। बात समझ में आ गई, तो फिर एक क्षण रुका नहीं।

अब देवी—देवता क्या बिगाड़ते थे? घर में रहे आते। कोई हर्जा न था। और कभी सुबह—सांझ एक फूल भी उन पर रख देते, तो भी कोई हर्जा न था। सजावट थे, घर की रौनक थे, रहने देते। शास्त्र घर में रखे थे, कोई अड़चन न थी। पकड़ना नहीं था, छोड़ने का सवाल नहीं था। मगर रजोगुणी छोड़ने को उत्सुक हो जाता है। वह गया, उसने सब बांधकर देवी—देवताओं का बोरिया—बिस्तर और शास्त्र, सब कुएं में फेंक आया। अब रात सो न सका।

रजोगुणी वैसे ही कठिनाई पाता है रात सोने में। क्योंकि दिनभर जो दौड़ता है, भागता है, चिंता करता है, यह पाना है, वह पाना है, सपने रात भी दौड़ते रहते हैं।

रात घबड़ाया; आधी रात वह मेरे घर आया। अब उनको फेंक चुका कुएं में, वहां जा भी नहीं सकता। और शास्त्र तो गल गए होंगे और अब मुहल्ले वालों से कहे कि निकालना है, लोगों को पता चले, तो और बदनामी होगी कि तुम क्या नास्तिक हो गए!

वह आधी रात मेरे पास आया। कंप रहा था। मैंने पूछा, क्या हुआ? उसने कहा कि मैं बड़ी झंझट में पड़ गया। आपने ही डाला। किस दुर्भाग्य के क्षण में आपको सुनने आ गया! और बात जंच गई। और मैं तो धुनी आदमी हूं। जब जंच गई, तो क्षणभर रुका नहीं कि थोड़ा सोच तो लेता। और अब सो नहीं सकता और घबड़ाहट लगती है, कि वर्षों के देवी—देवता थे! कुल—देवता थे! बाप ने पूजे, बाप के बाप ने पूजे। इतनी पुरानी परंपरा थी घर में, और मैंने सब खंडन कर दिया, पता नहीं नाराज हो जाएं!

रजोगुणी सदा डरता है कि कहीं देवी—देवता नाराज न हो जाएं, नहीं तो महत्वाकांक्षा में बाधा डाल देंगे। रजोगुणी पूजा ही इसलिए करता है कि और धन मिल जाए, और पद मिल जाए। उसने कहा, कहीं नाराज हो गए! और शास्त्र भी फेंक आया, अब मैं क्या करूं?

मैंने देखा कि मुल्क में ऐसे बहुत—से लोग थे, जो समझे नहीं, जिन्होंने शास्त्र पर पकड़ तो न छोड़ी, शास्त्र को छोड़ने की दौड़ में पड़ गए; शास्त्र को छोड़ने की दौड़ पकड़ ली। पकड़ना जारी रहा, मुट्ठी न खुली; सिर्फ जरा एक कदम पीछे हट गई पकड़, और गहरी हो गई।

फिर नब्बे प्रतिशत लोग हैं, जो तमोगुणी हैं, जो कि विराट मनुष्य जाति का समुदाय है। वे वैसे ही किसी गुरु और शास्त्र में उलझे न थे। क्योंकि इतना भी उपद्रव वे लेने को राजी नहीं। वे अपने आलस्य में पडे थे। वे तो शास्त्रों से वैसे ही थके थे, क्योंकि शास्त्र कहते हैं, उठो! जागो! शास्त्रों से वैसे ही नाराज थे, कि नींद हराम करते हैं! गुरुओं के पीछे वे कभी गए नहीं थे, क्योंकि उतना चलने की भी उनमें इच्छा नहीं जगी थी, उतना आलस्य भी छोड़ने की हिम्मत न थी। उन्होंने अपनी नींद में ही मुझे सुना।

उन्होंने कहा, बड़ा धन्यवाद! तो हम बिलकुल ठीक थे कि हम तो पहले ही से न पकड़े थे। न किसी शास्त्र को पकड़ा, न किसी गुरु को पकड़ा, न किसी की झंझट में पड़े। हम तो पहले ही से विश्राम कर रहे थे। आपने हमें निश्चित कर दिया। उन्होंने करवट ली, वे सो गए।

ऐसा पंद्रह वर्ष निरंतर मुल्क में लाखों लोगों के साथ देखकर मुझे लगा कि कुछ करना पड़ेगा। मैं भला सच कह रहा हूं इससे कुछ हल नहीं है। मुझे सोचना पड़ेगा कि सुनने वाले पर क्या हो रहा है।

कृष्णमूर्ति ने अब तक नहीं सोचा कि सुनने वाले पर क्या हो रहा है। वे कहते ही चले गए हैं, जो ठीक है। इसलिए कृष्णमूर्ति के पास सिर्फ एक प्रतिशत सत्वगुणी को तो कुछ लाभ होता है, बाकी निन्यानबे प्रतिशत लोगों को भयंकर हानि होती है। और नब्बे प्रतिशत जो आलसी हैं, उनका तो कहना ही क्या। वे बिलकुल अपनी नींद में ही अपने को मुक्त मान लेते हैं कि बात खतम हो गई। हम तो कुछ पकड़े ही नहीं हैं; पहले ही से नहीं पकड़ा था। यह कृष्णमूर्ति ने तो बाद में बताया, हम तो पहले ही से इसी ज्ञान में जी रहे हैं। तो हम बिलकुल ठीक हैं, जैसे हैं। वे अपनी तंद्रा में गहन हो जाते हैं।

तो कृष्णमूर्ति ने नब्बे प्रतिशत लोगों के लिए नींद की सुविधा बना दी। नौ प्रतिशत लोगों के लिए दौड़ की सुविधा बना दी, शास्त्र छोड़ना है, गुरु छोड़ना है; वे उस दौड़ में लगे हैं। वह छूटता नहीं। क्योंकि कहीं छोड़ने से कुछ छूटा है? यह जानने से कि पकड़ व्यर्थ है, छूटना अपने आप हो जाता है। जब तुम छोड़ने की कोशिश करते हो, तो उसका मतलब है कि तुम पकड़े तो हो ही।

अब जैसे मैंने मुट्ठी बांध ली, और कोई मुझे समझाए कि मुट्ठी खोलो, तो मुट्ठी खोलने के लिए कुछ करना पड़ेगा! मुट्ठी खोलने के लिए कुछ करना ही नहीं पड़ता; सिर्फ बांधो मत, मुट्ठी अपने आप खुल जाती है। मुट्ठी खुलती है जब तुम नहीं बाधते। क्योंकि खुला होना मुट्ठी का स्वभाव है। लेकिन ऐसे लोग हैं, जो मुट्ठी को बांधे हुए हैं और अब खोलने की भयंकर चेष्टा कर रहे हैं। उनकी खोलने की चेष्टा से मुट्ठी और जकड़ती है, क्योंकि खोलने से कोई मुट्ठी नहीं खुलती।

तुमने कभी किसी सम्मोहन करने वाले, हिप्नोटिस्ट को देखा है? वह लोगों को एक छोटा—सा खेल दिखाता रहता है। तुम खुद भी करोगे, तो चकित हो जाओगे। वह कह देता है, दोनों मुट्ठियां बांध लो। एक हाथ में दूसरे हाथ की अंगुलियों को गूंथ लो। और वह तुमसे कहता है कि आंख बंद कर लो। और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम लाख उपाय करो, यह मुट्ठी खुल न सकेगी। और वह कहता है, यह मुट्ठी जकड़ती जा रही है।

जैसे ही वह कहता है, मुट्ठी जकड़ती जा रही है, तुम अपने मन में सोचते हो, यह हो ही कैसे सकता है। मुट्ठी मेरी कैसे जकड़ जाएगी? मैं खोल लूंगा। तुम भीतर खिंचने लगे। तुम खोलने की तैयारी करने लगे। और वह कहता जा रहा है, मुट्ठी जकड़ती जा रही है, तुम लाख उपाय करो, खुलेगी नहीं।

पांच मिनट बाद वह तुमसे कहेगा, अब करो उपाय, लगा दो पूरी ताकत। और तुम पूरी ताकत लगाओगे और तुम चकित हो जाओगे कि तुम्हारी मुट्ठी, तुम्हारे हाथ, जकड़ गए, खुलते नहीं हैं।

मनसविद इसको कहते हैं, ली आफ दि रिवर्स इफेक्ट। इसको वे कहते हैं, विपरीत परिणाम का नियम। अगर तुम बहुत खोलने में उत्सुक हो गए, तो तुम यह बात ही भूल गए कि बांधी तुमने थी,. खोलने का सवाल ही न था। जब तुम खोलने में उलझ गए, तो तुमने पहली बात तो स्वीकार ही कर ली कि बंधी है। बस, वहीं भूल हो गई। अब बंधी है, यह स्वीकार हो गया। और तुम्हारे शरीर ने स्वीकार कर लिया कि यह बंधी है, और तुम उसके विपरीत लड़ने लगे। तुम खोल न पाओगे। तुम खोल नहीं सकते।

तुम जिससे बचना चाहोगे, उसी में उलझ जाओगे। कभी तुमने साइकिल चलानी सीखी शुरू—शुरू में! साठ फीट चौड़ा सुपर—हाईवे हो, कोई न हो रास्ते पर। तुम अकेले साइकिल चलाने वाले हो, सिखाने वाले ने तुम्हें बिठा दिया। थोड़ी दूर साथ चला और फिर तुम्हें छोड़ दिया। दिखाई लाल पत्थर पड़ता है तुम्हें किनारे पर। साठ फीट चौड़ा रास्ता है। और वह लाल पत्थर वहा गणेश जी जैसा शांत बैठा है; कुछ बीच में आएगा नहीं। मील का पत्थर है। तुम घबडाए कि कहीं पत्थर से न टकरा जाएं! बस शुरुआत हो गई।

अब कहीं पत्थर से न टकरा जाएं, यह कोई सवाल था साठ फीट चौड़े रास्ते पर! निशाना लगाने वाला भी अगर निशाना लगाकर जाए, तो ही टकरा सकता है; उसके भी चूक जाने का डर है। मगर यह नया सिक्सडू नहीं चूकने वाला है। जैसे ही इसको खयाल आया कि कहीं टकरा न जाएं, अब इसको रास्ता नहीं दिखाई पड़ता। अब इसकी आंख लाल पत्थर पर जमी है, और इसने बचना शुरू कर दिया, इसका हैंडल घूमने लगा, कि टकराए! मरे! अब इसने बचना शुरू किया कि यह गया।

यह उस चीज से बच रहा है, जिससे बचने का कोई सवाल न था। यह टकराएगा! वह लाल पत्थर हिप्नोटिक हो जाएगा। वह खींच लेगा। यह जाकर भड़ाम से उस पर गिरेगा। और यह कहेगा, हम पहले से ही जानते थे कि यह होगा।

मगर यह साठ फीट चौड़ा रास्ता खाली पड़ा था। तुम इसमें से निकल न सके! कुछ कारण है भीतर। तुम जिससे बचना चाहते हो, तुमने स्वीकार कर लिया कि बचना असंभव है। तुम जिससे बचना चाहते हो, तुमने मान लिया कि फंस गए। तुम्हारी मान्यता में ही सारा सम्मोहन है।

तो जिनको कृष्णमूर्ति कहते हैं, छोड दो, छोड़ दो। चालीस साल से वह कहते आ रहे हैं; वे कह रहे हैं, बचो पत्थर से, लाल पत्थर है। वे सिक्खड जो साइकिल पर सवार हैं, जितना तुम उनसे

कहो कि बची, लाल पत्थर है, लाल पत्थर से बचना, अब वे

मुश्किल में पड़े। अब वह लाल पत्थर ही दिखाई पड़ता है जागते, सोते, सपने में, बच नहीं सकते। वे उसी पत्थर पर गिरेंगे।

और जब गिरेंगे, तो कहेंगे कि कृष्णमूर्ति ठीक ही कह रहे थे। पहले ही से बेचारे समझा रहे थे कि इससे बचो, नहीं तो उलझ जाओगे। अब उलझ गए। अब उनकी हिम्मत टूट जाएगी साइकिल पर चढ़ने की। क्योंकि जब भी वे चढ़ेंगे, सब जगह लाल पत्थर हैं सरकार की कृपा से। जहां जाओ, लाल पत्थर हैं। सब जगह मंदिर हैं, मस्जिद हैं, शास्त्र हैं, गुरु हैं, सब तरफ लाल पत्थर हैं। कहीं भी गए, फंसे।

और वे जो नब्बे प्रतिशत हैं, वे कहते हैं कि बिलकुल ठीक, तुम्हें बाद में पता चला कृष्णमूर्ति, हमें पहले ही मालूम है। इसलिए हम झंझट में पड़े ही नहीं; हम पहले ही से सो रहे हैं! जो ज्ञानी हैं, वे पहले ही से विश्राम कर रहे हैं।

कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन, जो मनुष्य शास्त्र—विधि से रहित…….।

शास्त्र क्या है? शास्त्र की परिभाषा क्या है? शास्त्र किसे कहते हैं? शास्त्र कहते हैं शास्ताओं के वचन को। शास्ता कहते हैं जिसने शासन दिया, अनुशासन दिया, डिसिप्लिन दी; जिसने चलने का मार्ग, व्यवस्था दी। जो चला, जो पहुंचा और जिसने पहुंचकर खबर दी कि थोड़े—से सूचक हैं, तुम्हारे रास्ते पर उपयोगी हो जाएंगे। बुद्ध को हम शास्ता कहते हैं, महावीर को शास्ता कहते हैं। उनके वचनों को हम शास्त्र कहते हैं। और उनके वचनों में जो कहा गया है, उसको हम शासन या अनुशासन कहते हैं।

जिन्होंने जाना, उनके वचनों का संग्रह है शास्त्र। अगर तुम समझदार हो, तो खूब लाभ ले सकते हो। नासमझ हो, तो तुम किसी भी चीज से लाभ नहीं ले सकते, नुकसान ही लोगे। शास्त्र का कसूर नहीं है। कसूर होगा तो तुम्हारा होगा। शास्त्र कोई सिर पर रखकर ढोने की चीज नहीं है; न चंदन—तिलक लगाकर पूजा करने की चीज है। शास्त्र उपयोग करने की चीज है; उसकी उपयोगिता है।

शास्त्र में संगृहीत हैं वचन, जानने वालों के। तुम जरा होशपूर्वक समझने की कोशिश करोगे, तो शास्त्र से तुम्हें बड़े रहस्य उपलब्ध हो जाएंगे। पकड़ना मत उनको। उनको तरल रहने देना, उनको ठोस नियम मत बना लेना। क्योंकि समय बदलता, परिस्थिति बदलती, चेतना भिन्न होती। तो तुम बिलकुल रूढ़ की तरह मत चलने लगना, लकीर के फकीर मत हो जाना, कि शास्त्र में ऐसा लिखा है, तो ऐसा ही करेंगे।

शास्त्र संकेत देते हैं, उपदेश नहीं। और वह रहस्य ऐसा है कि उसे ठीक—ठीक पूरा का पूरा बांधा नहीं जा सकता। सिर्फ इशारे किए जा सकते हैं। इशारे का मतलब होता है, समझने की कोशिश करना इशारे को, उसका उपयोग करने की कोशिश करना। लेकिन उसके लकीर के फकीर होकर अंधे अनुयायी मत हो जाना।

कृष्ण कहते हैं कि शास्त्र—विधि से जो रहित हैं.।

और बहुत—से लोग शास्त्र का उपयोग न करना चाहेंगे, क्योंकि वह भी उनके अहंकार के विरोध में है। उनके रहते कोई दूसरा ज्ञानी कैसे हो गया पहले? उनके रहते वेद लिख लिए गए? यह हो ही नहीं सकता। वेद तो वे ही लिख सकते हैं। और अभी वे ज्ञान को उपलब्ध नहीं हुए!

अज्ञानी शास्त्रों को मानने को राजी नहीं होता; इशारे भी लेने को राजी नहीं होता। वह यह ही नहीं मान सकता कि मेरे सिवाय कोई और भी मुझसे पहले ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है। वही तो अहंकार की पकड़ है, प्रमाद है। तो वह मनोकल्पित साधनाएं करता है, शास्त्रों की नहीं सुनता।

उनमें संकेत हैं, सावधानियां हैं, हिफाजतें हैं; जो चले हैं, उन्होंने रास्ते के कंटकों के संबंध में बताया है। जंगली जानवरों के हमले का डर है, बीहड़ रास्ते हैं, भटक जाने की संभावना है। स्वात पगडंडियां हैं, जिन पर कोई यात्री भी न मिलेगा, जो तुम्हें बताए कि तुम भूल गए, या ठीक हो, या गलत हो। उस अनजान के संबंध में कुछ सूचनाएं शास्त्रों में संगृहीत हैं। वे बहुमूल्य हैं। उनको समझकर—शास्त्र को पकड़कर नहीं—उनको समझकर तुम्हें अपनी यात्रा पर जाना है।

बुद्ध ने कहा है, हम मार्ग बता सकते हैं, लेकिन तुम्हारे लिए चल तो नहीं सकते। चलना तुम्हें ही होगा; पहुंचना भी तुम्हें होगा। तुम हमारी बात को सुन लेना, पकड़ मत लेना। बात को समझ लेना, फिर अपने ही बोध और अपनी ही साक्षी—चेतना और अपने ही ध्यान से गति करना। अंतिम रूप में तो तुम्हीं निर्णायक रहोगे। लेकिन अगर तुमने हमें सुना है, तो कम से कम तुम उन भूलों से बच जाओगे, जो हमने कीं।

इस बात को ठीक से समझ लो। शास्त्र तुम्हें सत्य तक नहीं पहुंचा सकते, लेकिन बहुत—से असत्यों से बचा सकते हैं। उनका उपयोग नकारात्मक है। वे तुम्हें सत्य तक नहीं पहुंचा सकते, लेकिन सत्य के मार्ग पर बहुत—सी भ्रांतिया जो हो सकती हैं, उनसे तुम्हें बचा सकते हैं। तुम्हारा बहुत—सा भटकाव बच सकता है, अगर तुम उनका उपयोग करना जान लो।

लेकिन तुम्हारी हालत ऐसी है, जैसे मैं देखता हूं कई लोगों को, कार में रखे हुए हैं नक्‍शा, लेकिन बस वह रखा रहता है। उस नक्‍शो का न तो उन्हें उपयोग पता है कि कैसे? क्योंकि नक्‍शो को देखना आना चाहिए। नक्‍शो की भाषा आनी चाहिए।

नक्‍शा तो संकेत है, संकेत लिपि है, उसका कोड है। रास्ता तो मीलों का है, नक्‍शो पर इंचभर का है। नक्‍शो को समझना आना चाहिए, नक्‍शो को सीधा रखकर पढ़ना आना चाहिए, नक्‍शो की संकेत लिपि मालूम होनी चाहिए। और नक्‍शा तो केवल सूचक है, वह कोई फोटोग्राफ थोड़े ही है। उसमें कोई सारी चीजें थोड़े ही आ गई हैं। सारी आ भी नहीं सकतीं। और सारी आ जाएं, तो तुम कार में लेकर कैसे चलोगे! वह तो सिर्फ प्रतीक है। जरा से चिह्न हैं। अगर नक्‍शो का तुम ठीक उपयोग करो, तो एक बात पक्की है कि तुम कम भटकोगे। कई मार्ग, जिन पर तुम जा सकते थे, न जाओगे।

शास्त्र का उपयोग नकारात्मक है, गुरु का उपयोग विधायक है। क्योंकि शास्त्र मुरदा है वह विधायक नहीं हो सकता, वह नकारात्मक है। पर उसका मूल्य है। इतना ही क्या कम है कि सौ भूलें होती हों, निन्यानबे हुईं। उतना समय बचा; उतना जीवन बचा। और कौन जानता है, निन्यानबे भूलें करके तुम इतने थक जाते, हताश हो जाते, कि यात्रा ही छोड़ देते।

शास्त्र बचाता है भूल करने से, गुरु संभालता है सही करने की तरफ। शास्त्र और गुरु का उपयोग ऐसा है, जैसे कभी तुमने कुम्हार को घड़ा बनाते देखा हो। चाक पर चढ़ा देता है घड़े को, एक हाथ भीतर कर लेता है, और एक हाथ घड़े के बाहर कर लेता है। बाहर के हाथ से थपकी देता है, घड़े की दीवार बनाता है। भीतर के हाथ से सम्हालता है भीतर के शून्य को। दोनों हाथ घड़े को बनाने में समर्थ हो जाते हैं। बाहर के हाथ से चोट करता जाता है, भीतर के हाथ से सम्हालता रहता है।

शास्त्र बाहर से सम्हालते हैं, गुरु भीतर से। एक दिन तुम्हारा घड़ा पककर तैयार हो जाता है। जब तक तुम कच्चे हो, तब तक सम्हालने वाले की जरूरत है। जब तक तुम आग से नहीं गुजर गए, तब तक तुम अपने ही बल से चलने की कोशिश करोगे, तो पहुंचना करीब—करीब असंभव है।

मनोकल्पित तप करते हैं।

क्योंकि उनका अहंकार यह नहीं मान सकता कि वे किसी का सहारा लें।

दंभ और अहंकार से युक्त हैं, कामना, आसक्ति, बल और अभिमान से युक्त हैं।

अहंकार लक्षण है तामसी व्यक्ति का। अहंकार लक्षण है राजसी व्यक्ति का भी। अहंकार शेष रहता है सात्विक व्यक्ति में भी। लेकिन तीनों में अहंकार की प्रक्रियाएं अलग हो जाती हैं।

तामसी व्यक्ति में अहंकार होता है सोया हुआ। राजसी व्यक्ति में अहंकार होता है दौड़ता हुआ, गतिमान, गत्यात्मक, डायनैमिक। सात्विक व्यक्ति में अहंकार होता है जागा हुआ, लेकिन होता है। साधु में भी अहंकार होता है, जागा हुआ। अभी मिट नहीं गया है। बड़ा विनम्र हो गया है, सूक्ष्म हो गया है, पारदर्शी हो गया है, आर—पार देख सकते हो, लेकिन अभी परदा मौजूद है।

अहंकार मिटता तो है जब तीनों ही शून्य हो जाते हैं। एक एक को जब उपलब्ध होता है, तभी पूरा जाता है।

तामसी वृत्ति का व्यक्ति अपने ही ढंग सोचता रहता है, उलटे—सीधे काम करता रहता है। न शास्त्र की सुनता, न गुरु की, सिर्फ अहंकार की सुनता है।

तथा जो शरीररूप से स्थित भूत—समुदाय को और अंतःकरण में स्थित मुझ अंतर्यामी को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को आंसुरी स्वभाव वाला जान।

ऐसे लोग कई उलटे—सीधे काम करते हैं। कृष्ण बड़ी अनूठी बात कह रहे हैं। कहते हैं कि न केवल वे शरीर को सताते हैं—उपवास करेंगे, भूखे मरेंगे, शरीर को कसेंगे, जलाएंगे, काटेंगे। क्योंकि अहंकार सदा लड़ना चाहता है, या तो दूसरे से लड़े या खुद से लड़े। बिना लड़े अहंकार बच नहीं सकता।

तो जो लोग दूसरों से नहीं लड़ते। दुनिया में दो तरह के लड़ने वाले लोग हैं। एक, जो बाजार में लड़ रहे हैं दूसरों से, प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा। और एक वे हैं, जो जंगलों में चले गए हैं, आश्रमों में बैठ गए हैं, और लड़ रहे हैं अपने से। मगर लड़ाई जारी है।

कृष्ण कहते हैं कि न केवल ऐसे अहंकारी तामसी व्यक्ति अपने शरीर से लड़ने लगते हैं, अपने शरीर को काटने और मारने लगते हैं, बल्कि मुझ अंतर्यामी को, जो उनके भीतर छिपा हूं मुझको भी कृश करते हैं, मुझे भी सताते हैं।

एक बात ध्यान रखना, सताने से कुछ होगा नहीं, वह हिंसा है। शरीर की सुरक्षा करना और भीतर के अंतर्यामी की भी। सुरक्षा का अर्थ यह नहीं है कि तुम सुख और भोग में डूबे रहना। क्योंकि सुख और भोग में डूबा हुआ भी शरीर को नष्ट करता है और भीतर के अंतर्यामी को सताता है। भोगी भी सताते हैं, एक ढंग से, त्यागी भी सताते हैं, दूसरे ढंग से।

तुम मध्य में रहना, निरति। तुम संतुलन साधना। न तो बहुत भोजन देना, क्योंकि बहुत भोजन से भी शरीर को कष्ट होता है। न भूखा रखना, क्योंकि भूखा रखने से भी कष्ट होता है। न तो अति श्रम करना, क्योंकि अति श्रम से कष्ट होता है। न बिस्तर पर ही पड़े रहना, क्योंकि अति विश्राम भी शरीर को गलाता और नष्ट करता है। तुम सदा मध्य में होना, अति मत करना। तो तुम अपने शरीर और अपने भीतर छिपे अंतर्यामी, दोनों को एक शांत समरसता का मार्ग बता सकोगे।

मुझ अंतर्यामी को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को आंसुरी स्वभाव वाला जान।

वे असुर हैं। तमस से घिरे हैं।

अहंकार तमस का गहनतम रूप है, वह अमावस है अंधेरी रातों में। रजस से भरा हुआ व्यक्ति सप्तमी—अष्टमी का चांद है, आधा अंधेरा, आधा ज्योति। सत्व से भरा व्यक्ति पूर्णिमा की रात है, पूरे प्रकाश से भरा। लेकिन रात है। तीनों के जो बाहर आ गया, उसका सूर्योदय होता है; उसके जीवन में सुबह होती है।

अमावस को बदलो धीरे—धीरे आधी रोशनी, आधी अंधेरी रात में। आधी अंधेरी, आधी रोशनी से भरी रात को धीरे— धीरे बदलो पूर्णिमा की रात में। तब तुम्हें वह मार्ग मिल जाएगा, जो सुबह तक ले आता है।

सुबह बहुत दूर नहीं है, थोड़ी—सी समझ और भीतर का थोड़ा—सा नया समायोजन, बस इतना ही चाहिए।

 

आज इतना ही।सुख नहीं, शांति खोजो—(प्रवचन—तीसरा)
अध्‍याय—17 सूत्र:

अशास्‍त्रविहितं धीरं तप्यन्ते ये तपो जना:।

दम्भाहंकारसंयुक्‍ता: कामरागबलान्त्तिता:।। 5।।

कर्शयन्त: शरीरस्थं भूतग्राममचेतस:।

मां चैवान्त:शरीरस्थं तान्‍विद्धय्यासुरीनश्चयान्।। 6।।

और है अर्जुन, जो मनुष्य शास्त्र— विधि से रहित केवल मनोकल्‍पित घोर तप को तपते हैं तथा दंभ और अहंकार से युक्‍त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्‍त हैं तथा जो शरीररूप से स्थित भूत— समुदाय को और अंत:करण में स्थित मुझे अंतर्यामी को भी कृश: करने वाले है, उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाव वाला जान।

पहले कुछ प्रश्न।

पहला प्रश्न : भक्त के सामने साक्षात भगवान हैं, फिर भी विरह कम क्यों नहीं हो रहा है?

जैसे—जैसे भगवान की प्रतीति होती है, विरह बढ़ता है। जैसे—जैसे निकट आते हैं, वैसे—वैसे दूरी खलती है। जितने पास आते हैं, उतनी ही पीड़ा होती है। क्योंकि पास आने पर ही पहली दफा पता चलता है कि अब तक सारा जीवन व्यर्थ ही गंवाया। और पास आने पर ही पता चलता है कि इतनी थोड़ी—सी दूरी भी अब बहुत दूरी है।

जिसे स्वाद लग गया, उसे ही तो पीड़ा होती है। जिसे स्वाद ही न लगा, उसे पीड़ा भी कैसे होगी? तुमने जिसे थोड़ा जान लिया, उसी को तो जानने की प्यास पैदा होती है। जिसे तुमने बिलकुल नहीं जाना, उसकी खोज भी कैसे पैदा होगी?

जब तुम्हें परमात्मा बिलकुल सामने दिखाई पड़ने लगे, तभी तुम्हारी विरह की अग्नि अपनी प्रगाढ़ता में जलेगी। इसलिए तो भक्त रोते हैं, अभक्त थोड़े ही रोते हैं! अभक्त तो प्रफुल्लित दिखाई पड़ते हैं। संसार में, बाजार में, दुकान पर, तुमने अभक्तों को रोते देखा? वे तो तुम्हें हंसते हुए मुस्कुराते हुए मिल जाएंगे। उन्हें तो उस पीड़ा का कोई पता ही नहीं, जो परमात्मा के द्वार पर अनुभव होती है।

प्रेमियों को रोते देखा जाता है, अप्रेमियों को नहीं। प्रेम रुलाता है, क्योंकि प्रेम निखारता है। और आंसुओ को दुर्भाग्य मत समझना, वे सौभाग्य के लक्षण हैं। और परमात्मा की पीड़ा जब तुम्हें जलाने लगे, मंथने लगे, मारने लगे, तब समझना कि सौभाग्य की आखिरी घड़ी करीब आ गई। क्योंकि परमात्मा जब तुम्हें मार ही डालेगा तुम्हारे विरह में, तभी तुम्हारे भीतर उसका प्रवेश हो सकेगा। जब तुम अपनी ही विरह की अग्नि में पूरे जलकर भस्मीभूत हो जाओगे, तभी उस भस्म से नए का आविर्भाव होगा। वह फिर तुम्हारे भीतर भी भगवान का रूप है।

भक्त मिटता है, तो भगवान पूरी तरह उपलब्ध होता है। तुम्हारे मिटने में ही संभावना है।

लेकिन स्वभावत: प्रश्न उठता है कि भगवान सामने हो, तो विरह समाप्त हो जाना चाहिए। लेकिन विरह भगवान के सामने होने से समाप्त नहीं होता। जब तुम भगवान को पी ही जाओगे, जब वह सामने न होगा, तुम्हारे भीतर हो जाएगा। जैसे कोई प्यासा नदी के किनारे आ गया। किनारे पर खड़े होने से थोड़े ही प्यास बुझती है, नदी में उतरना पड़ेगा। नदी में उतरने से भी प्यास नहीं बुझती, नदी को अपने भीतर उतारना पड़ेगा।

तो जैसे—जैसे नदी दिखाई पड़ने लगेगी, वैसे—वैसे प्यास प्रगाढ़ होने लगेगी। अब तक तो किसी तरह सम्हाला, अब सम्हाले भी न सम्हलेगी। जैसे—जैसे नदी पास आने लगेगी, वैसे—वैसे तुम्हारा कंठ और भी जोर से आकुल होने लगेगा। पानी को पास देखकर दबी हुई प्यास उभरकर उठ आएगी। पानी को पास देखकर अब तक किसी तरह मन को समझाया था, अब समझाया न जा सकेगा। अब तक किसी तरह बांध—बूंधकर चल लिए थे, अब सब व्यवस्था टूट जाएगी। अब तो पागल की तरह दौड़ शुरू होगी।

लेकिन ठीक किनारे पर भी आकर तो प्यास नहीं बुझती। नदी में खड़े होकर भी तो प्यास नहीं बुझती। जब तक कि परमात्मा और तुम एक ही न हो जाओ, कि पानी तुम्हारे खून में न बहने लगे; कंठ में नहीं, तुम्हारे हृदय में न उतर जाए, तब तक प्यास नहीं बुझती। परमात्मा और तुम्हारे बीच जब तक इंचभर का भी फासला है, तब तक तुम जलोगे। उतना फासला भी अनंत फासला है। और पास आकर ही दूरी पता चलती है। तुम इसे विरोधाभास मत समझना। दूरी जब रहती है, तब तो पता ही नहीं चलती। क्योंकि तुम्हें यही पता नहीं कि कोई परमात्मा है, किसी की खोज करनी है। रोओगे किसके लिए?

रोने के पहले थोड़ा स्वाद लग जाना जरूरी है, थोड़ी भनक पड़ जानी जरूरी है। रोने के पहले उसकी याद आ जानी जरूरी है।

लेकिन याद कैसे आएगी अगर उसे बिलकुल न जाना हो? दूर से ही देखी हो उसकी छवि, लेकिन तुम्हारे सपनों में समा जानी चाहिए। फिर तुम सो न सकोगे; फिर तुम जाग न सकोगे, फिर दिन और रात बेचैनी से भर जाएंगी।

कबीर ने कहा है कि वह परमात्मा का प्यासा निशि—बासर जागे। वह न सो सकता है, न जाग सकता है। उसकी बेचैनी का हिसाब नहीं है। विरह की अग्नि भयंकर हो जाती है। एक ही पुकार उठने लगती है। सारा प्राण एक ही पुकार से भर जाता है। प्यास कंठ में ही नहीं होती, रोएं—रोएं में समा गई होती है।

इसलिए भक्तों को ही रोते देखा गया है, परम भक्तों को ही विरह से जार—जार देखा गया है। लेकिन वह सौभाग्य का क्षण है। उन आंसुओ को तुम दुर्भाग्य समझ लोगे, तो भूल हो जाएगी। उन आंसुओ की गलत व्याख्या मत कर लेना, क्योंकि बहुत गलत व्याख्या करके वापस भी लौट जाते हैं। क्योंकि ऐसी नदी से क्या लेना—देना, जिसके पास जाकर प्यास बढ़ती हो। हम तो इसी खयाल से नदी के पास आए थे कि प्यास बुझ जाएगी। ऐसे जल को क्या करना; जिसके पास आने से आग बढ़ती हो। भय पकड़ ले सकता है। और भय यह भी कह सकता है कि जिस जल के पास आने से प्यास बढ़ रही है, उसे भूलकर पी मत लेना। नहीं तो लपटें ही लपटें हो जाएंगी। भाग जाओ।

बहुत लोग परमात्मा के द्वार से लौट गए हैं। उन्होंने आंखें बंद कर लीं। उन्होंने अपने को किसी तरह सम्हाल लिया। गिरने को ही थे, मिलने को ही थे, जरा—सा ही फासला था, एक कदम काफी हुआ होता, लेकिन वे लौट गए। फिर जन्मों—जन्मों तक भटकते हैं। इसलिए ठीक—ठीक व्याख्या बड़ी अर्थपूर्ण है, जब कोई घटना घटे। और गुरु का मूल्य इन्हीं सब आयामों में है कि वह तुम्हें ठीक व्याख्या दे सकेगा। जब तुम्हारे पैर उखड़ रहे होंगे, तब वह उन्हें जमा सकेगा। जब तुम भागने की तैयारी कर लोगे, वह तुमसे कहेगा, जरा और, और सुबह होने के करीब है। मंजिल पास है, और तू भागा जा रहा है!

उस वक्त जरा—सा सहारा चाहिए कि कोई तुम्हें पकड़ ले, कोई तुम्हारे पैरों को रोक दे। लौट न पड़ो तुम कहीं। कहीं तुम गलत व्याख्या न कर लो।

और तुमसे गलत व्याख्या की ही संभावना है। सही व्याख्या तुम कर कैसे सकोगे? तुम्हारा तर्क तो यही कहेगा कि हट जाओ ऐसी जगह से। जहां पास जाने से आग बढ़ती हो, यहां से दूर ही हो जाओ।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं, वे कहते हैं, इतनी अशांति ध्यान के पहले न थी!

अशांति का भी पता तभी चलता है, जब तुम थोड़े शांत होने लगते हो। अशांति को जानेगा कौन? सारी दीवाल काली हो, तो जरा—सी भी सफेद रेखा खींच दो, तो सफेद रेखा भी उभरकर दिखाई पड़ती है और दीवाल भी उभरकर दिखाई पड़ती है। क्योंकि विपरीत में प्रतीति होती है।

तुम अशांत ही रहे हो, अशांति तुम्हारा स्वभाव हो गई है, अशांति के अतिरिक्त तुमने कभी कुछ जाना नहीं, इसलिए अशांति को भी कैसे जानोगे? विपरीत चाहिए। कंट्रास्ट चाहिए। कुछ और तुम जानी, तो तुलना हो सके। इसलिए ध्यान करते ही अशांति बढ़ती है।

लोग चकित होते हैं, क्योंकि वे ध्यान की खोज में आए थे सोचकर कि शांति बढ़ेगी। शांति नहीं बढ़ती, शुरू में तो अशांति बढ़ती है। कहना ठीक नहीं है कि अशांति बढ़ती है। अशांति तो थी, पहले उसका पता न चलता था, अब पता चलता है। और जैसे—जैसे शांति बढ़ेगी, वैसे—वैसे पता चलेगा। जैसे—जैसे तुम जागोगे, वैसे—वैसे पता चलेगा कि कितने सोए रहे!

सोए आदमी को पता ही नहीं चलता कि वह सो रहा है, जागे को पता चलता है। सुबह जिसकी नींद टूटने लगी, जो करवट बदलने लगा, और जिसे भनक पड़ने लगी आस—पास की जागती दुनिया की—बरतन बजने लगे, दूध वाले दूध बेचने लगे, सड़क चलने लगी—जिसे थोड़ी भनक भी पड़ने लगी, अब जो सोया भी नहीं है, जागा भी नहीं है, जो बीच में खड़ा है, संध्याकाल आ गया, उसे पता चलता है कि रातभर सोए रहे।

जागते क्षण में पता चलता है नींद का, शांत होने पर पता चलता है अशांति का। आनंद जब उतरने के करीब होगा, तब तुम जानोगे कि कैसे महादुख से तुम आए हो। स्वर्ग के द्वार पर तुम्हें पता चलेगा कि अब तक की यात्रा नरक में हुई। स्वर्ग के द्वार पर ही पता चलेगा। उसके पहले पता न चलेगा; क्योंकि विपरीत जरूरी है।

परमात्मा के करीब पहुंचकर तुम्हें अपने सारे अस्तित्व का सारा संताप सघनीभूत होकर पता चलता है; इसलिए विरह बढ़ता है। उस विरह में गलत व्याख्या मत करना। वह सौभाग्य है। उस सौभाग्य के क्षण को, उन आंसुओ को, विरह को आंनदभाव से, अहोभाव से स्वीकार करना। रोना, लेकिन नाचना बंद मत करना।

आंसू टपके, लेकिन पैर नाचे। आंखें विरह से भरी हों, लेकिन हृदय मिलन की आकांक्षा से, मिलन की आशा से। कंठ में प्यास हो, लेकिन हृदय में भरोसा हो कि नदी करीब आ गई। क्षणभर की देर और है।

और जब इतनी प्रतीक्षा कर ली, तो यह क्षण भी बीत जाएगा। अनंत कल्प बीत गए, सृष्टियां बनीं और उजड़ी और तुम प्यासे बने रहे, उतना सह लिया, जन्मों—जन्मों इतनी यात्रा की, मंजिल कभी करीब न आई; भटकते ही रहे, वह सब हो गया, अब क्षणभर के लिए क्या घबड़ाहट है! हृदय आश्वासन से भरा रहे। वहीं तुम्हारी आस्था काम आएगी; वहीं तुम्हारी श्रद्धा का पता चलेगा। क्योंकि उस क्षण में बहुत लोग भाग गए हैं।

गुरु के बिना इसीलिए कठिनाई है। गुरु के बिना भी कभी—कभी कोई उपलब्ध हो जाता है, पर कभी—कभी। उसको हम अपवाद मान ले सकते हैं। अन्यथा गुरु के बिना कोई उपलब्ध नहीं होता। क्योंकि ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कौन तुम्हें भरोसा दे? ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कौन तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हें रोक ले? ऐसे पड़ाव आते हैं, जहां कि क्षणभर भी अगर ठीक व्याख्या न मिले, तो अनंत काल के लिए भटकाव पुन: शुरू हो जाएगा। और जो व्यक्ति एक बार परमात्मा के मंदिर से वापस लौट आता है, वह सदा—सदा के लिए उस मंदिर की यात्रा को बंद कर देता है। उस तरफ जाने से भय लगता है।

मेरी अपनी प्रतीति यही है कि इस संसार में जिनको तुम नास्तिक मानते हो, वे वे ही लोग हैं, जो कभी परमात्मा के मंदिर के पास से वापस लौट गए हैं। अब वे नास्तिक हो गए हैं। अब वे कहते हैं, परमात्मा है ही नहीं। वे किसी और को नहीं समझा रहे हैं; वे अपने को ही समझा रहे हैं। वह जो उपद्रव उन्होंने परमात्मा के पास अनंत काल की यात्रा में कभी जाना होगा, वह जो विरह, उसने उन्हें इतना घबड़ा दिया है कि उस घबड़ाहट में अब सिर्फ एक ही बचाव है कि वे अपने को समझा लें कि परमात्मा है ही नहीं, इसलिए खोज किसकी करनी है? उसका मंदिर है कहां? यही संसार सब कुछ है। कहीं जाना नहीं है।

वे दूसरों को नहीं समझा रहे हैं। जब नास्तिक तर्क देता है और कहता है कि ईश्वर नहीं है, तो वह तुम्हें नहीं समझा रहा है, वह अपने को समझा रहा है कि कहीं पैर फिर से उस रास्ते पर न मुड़ जाएं। वह डरा हुआ है अपने से कि कहीं फिर कोई वह आग न जला दे, कहीं फिर कोई छू न दे उस घाव को पुन:, फिर कहीं वह विरह न पैदा हो जाए; और फिर कहीं मैं उस तरफ न चल पडुं जहां से भाग आया हूं।

रवींद्रनाथ की एक छोटी—सी कविता है, कि मैं खोजते —खोजते एक दिन परमात्मा के द्वार पर पहुंच गया। अनंत काल तक खोजा। जब तक नहीं पाया था, तब तक बड़ी खोज थी। कितना भटका, कितने श्रम किए, कितने साधन किए! और फिर आज जब द्वार पर खड़ा हो गया, तो मन एकदम उदास हो गया। हाथ में सांकल उठा ली थी, बजाने को था, दस्तक देने को ही था कि तत्क्षण खयाल आया, फिर क्या करोगे? जब परमात्मा मिल जाएगा, फिर क्या करोगे?

भय पकड़ गया, रोआं—रोआं कैप गया। फिर क्या करेंगे? अपना अब तक जो भी करने का जाल था, वह सब व्यर्थ हो जाएगा। अपनी यात्रा समाप्त हो गई। फिर करोगे क्या? फिर कुछ करने को बचता नहीं। परमात्मा का अर्थ है वैसी दशा, जिसके पार पाने को कुछ नहीं, करने को कुछ नहीं, होने को कुछ नहीं। परमात्मा का अर्थ है, पूर्ण विराम।

मन घबड़ा गया। वही मन, जो खोजता था, खोजने के लिए राजी था। क्योंकि काम—धंधा था, व्यस्तता थी और अहंकार को एक तृप्ति भी थी कि खोज रहा हूं परमात्मा को। और दूसरे तो मूढ़ हैं, धन को खोज रहे हैं। दूसरे नासमझ हैं, पद को खोज रहे हैं। दूसरे अज्ञानी हैं, व्यर्थ को खोज रहे हैं, असार को खोज रहे हैं। मैं सार की खोज पर निकला हूं; मैं परम गुह्य की खोज पर निकला हूं; मैं रहस्यों के लोक में जा रहा हूं। अहंकार बड़ा तृप्त था, संतुष्ट था।

द्वार पर खड़े होकर परमात्मा के घबड़ाहट आ गई, पैर कंप गए कि यह तो खतरा है! खोज समाप्त हो जाएगी! करने को कुछ बचेगा नहीं! अहंकार के लिए कोई जमीन न रह जाएगी खड़े होने को! रवींद्रनाथ ने बड़ा अदभुत गीत लिखा है, किसी ने कभी नहीं लिखा। इसलिए रवींद्रनाथ में बड़ी अनुभूतियां थीं, बड़ी सूझें थीं। यह आदमी असाधारण था। यह आदमी सिर्फ कवि नहीं था; यह आदमी ऋषि था। जैसे उपनिषद के ऋषि हैं।

रवींद्रनाथ के वचन वैसे ही समझे जाने चाहिए, जैसे उपनिषद के वचन। रवींद्रनाथ नया उपनिषद है। उनको साधारण कवि मत समझ लेना, जो कवि सम्मेलनों में कविता कर रहा है और तालियां सुन रहा है। उनको तुम कोई काका हाथरसी मत समझ लेना। वे ऋषि हैं। बड़े गहरे प्रगाढ़ अनुभव से उनकी प्रतीति निकली है।

रवींद्रनाथ ने कहा है कि यह देखकर मैं भाग खड़ा हुआ। मैं इतना डर गया कि मैंने सांकल भी धीरे से छोड़ी कि कहीं अनजान में बज न जाए। और मैं इतना डर गया कि मैंने जूते, जिनको पहने हुए मैं मंदिर की सीढ़िया चढ़ गया था, हाथ में ले लिए; कि कहीं पदचाप भीतर सुनाई न पड़ जाए; कहीं वह द्वार खोल ही न दे और कहे, आओ। कहीं वह आलिंगन कर ही ले, तो मिटे। फिर कोई बचाव न रहेगा। और फिर उसको सामने खड़ा देखकर भागना भी अशोभन मालूम होगा।

गीत का आखिरी पद कहता है कि उस दिन से जो भागा हूं, तो बस उस मंदिर की राह को छोड्कर सब राहों पर घूमता हूं। फिर मेरी खोज जारी है। लोगों को कहता हूं परमात्मा खोज रहा हूं योग कर रहा हूं ध्यान कर रहा हूं। और मुझे पक्का पता है कि वह कहां है। उस जगह को भर छोड्कर सब जगह खोजता हूं।

नास्तिक मेरे लिए वही आदमी है, जिसको कोई बहुत गहन पीड़ा का अनुभव किसी जन्म में हो गया। वह पीड़ा इतनी भयंकर थी कि वह दोबारा उसको पुनरुक्त नहीं करना चाहता। वह अपने को समझाता है, परमात्मा है ही नहीं। वह अपने को तर्क देता है। वह अपने चारों तरफ तर्क का एक जाल निर्मित करता है। वह अपने ही खिलाफ षड्यंत्र रचता है। वह किसी दूसरे का धर्म बिगाड़ने को नहीं है, न तुमसे उसे कुछ मतलब है।

अन्यथा तुम सोचो, ऐसे नास्तिक हैं जो जीवनभर, ईश्वर नहीं है, यह सिद्ध करने में समय व्यतीत करते हैं। है ही नहीं जो, उसके लिए तुम अपना जीवन क्यों खराब कर रहे हो? तुम कुछ और कर लो। ईश्वर तो है ही नहीं, बात खतम हो गई। लेकिन जीवनभर व्यतीत करते हैं!

मेरी अपनी प्रतीति यह है कि कभी—कभी भक्तों को भी वे मात कर देते हैं। भक्त भी इतनी संलग्नता से जीवन व्यतीत नहीं करता परमात्मा के लिए, जितना नास्तिक करते हैं। लिखते हैं, सोचते हैं, तर्क जुटाते हैं, समझाते हैं, शास्त्र लिखते हैं बड़े—बड़े कि ईश्वर नहीं है।

इस सब के पीछे कुछ मनोविज्ञान होना चाहिए। जो है ही नहीं, उसकी कौन फिक्र करता है? कोई तो सिद्ध नहीं करता कि आकाश—कुसुम नहीं होते। कोई तो सिद्ध नहीं करता कि गधे को सींग नहीं होते। इसको क्या सिद्ध करना है! और जो सिद्ध करे, वह गधा। क्योंकि इसको क्या प्रयोजन है? गधे को सींग नहीं होते, यह जाहिर बात है, खतम हो गई। इसको कोई भी सिद्ध करने की जरूरत नहीं है।

लेकिन ईश्वर नहीं है, अगर ईश्वर भी ऐसा है जैसे कि गधे के सींग नहीं हैं, तो क्या पागलपन कर रहे हो! किसको सिद्ध कर रहे हो? किसके लिए लड़ रहे हो? क्या प्रयोजन है? सिद्ध भी कर लोगे, तो क्या सार है? जो था ही नहीं, उसको तुमने सिद्ध कर लिया कि वह नहीं है, क्या पाया? कहीं और जीवन ऊर्जा को लगाते, कहीं और खोजते।

लेकिन नास्तिक के पीछे एक ग्रंथि है। वह ग्रंथि यह है कि अगर वह सिद्ध न करे कि ईश्वर नहीं है, तो डर है कि कहीं फिर कदम उसी तरफ न उठने लगें। यह बड़ी अचेतन प्रक्रिया है। यह उसके अनकांशस में है। उसे भी पता नहीं है।

इसलिए जब भी कोई नास्तिक मेरे पास आ जाता है, तो मैं उसमें रस लेता हूं। क्योंकि मैं जानता हूं यह कभी करीब तक पहुंचा हुआ आदमी है। इसकी यात्रा बस पूरे होने के करीब थी। यह दया के योग्य है। इस पर नाराज मत होना। यह करुणा के योग्य है। और यह वहां पहुंचा है, जहां बहुत—से आस्तिक कभी नहीं पहुंचे हैं। एक छलांग, एक क्षण और, और सुबह हो गई होती। इस पर श्रम करने जैसा है। यह लड़ने जैसा नहीं है। इसका विरोध करने जैसा नहीं है। इसकी आलोचना करने जैसी नहीं है। इसे तो पूरे प्रेम में ले लेने जैसा है। किसी भांति इसे फिर से याद आ जाए, तो एक क्षण में यह फिर वहीं खड़ा हो सकता है, जहां से भागा था।

क्योंकि जो भी हमने अनंत जन्मों में पाया है, उसे हम भूल जाएं, खो नहीं सकते। वह जीवन का नियम ही नहीं है। जो तुमने जान लिया है, उसे तुम भूल सकते हो, खो नहीं सकते। उसकी विस्मृति कर सकते हो, उसे छिपा सकते हो भीतर गहन में, गहन अचेतन में दबा सकते हो कि तुम्हें भी दिखाई न पड़े, तुम ऐसा छिपा सकते हो कि भीतर रोशनी भी लेकर जाओ, तो उसका पता न चले। लेकिन तुम उसे मिटा नहीं सकते। जो जान लिया गया, वह जान लिया गया। वह चेतना का अमिट अंग हो जाता है।

इसलिए नास्तिक क्षणभर में आस्तिक हो सकता है। आस्तिक को आस्तिक होने में बहुत समय लगता है। अभी इसे ईश्वर का भय तो समाया ही नहीं। अभी यह कुतूहल में ही है। एक जिज्ञासा उठी है कि शायद ईश्वर हो; शायद ईश्वर से आनंद मिलता हो। नास्तिक ऐसा आदमी है, जिसके बाबत गांव में प्रचलित कहावत सही है कि दूध का जला छाछ भी फूंक—फूंककर पीता है। वह दूध का जला है, अब वह छाछ भी फूंक—फूंककर पी रहा है। आस्तिक ऐसा आदमी है, जो छाछ ही पीता रहा है। वह गर्म दूध को भी, जलते—उबलते दूध को भी छाछ की तरह पी जाएगा। जलेगा, तभी उसे पता चलेगा। फिर शायद वह भी छाछ को भी फूंक—फूंककर पीने लगे।

इसलिए भगवान के जैसे—जैसे तुम करीब आओगे, जैसे—जैसे तुम भक्त बनोगे।

भक्त का अर्थ मेरे लिए यही है, जो भगवान के करीब आने लगा, जिसे विरह की पीड़ा सताने लगी, जिसका रोआं—रोआं जलने लगा। जो अब ज्वरग्रस्त है, जिसे प्रेम का बुखार है। जो अब विक्षिप्त है, जिसे प्रेम की विक्षिप्तता ने पकड़ लिया।

इसलिए तो कबीर अपने को कहते हैं, कहे कबीर दीवाना। पागल! सारी दुनिया के लिए पागल। कोई उसकी बात सुनने को राजी नहीं। लोग समझते हैं मतवाला। और लोग उसकी पीड़ा भी नहीं समझ सकते। लोग उसके आंसू भी नहीं समझ सकते। लोग तो दूर, वह खुद ही नहीं समझ पाता कि क्या हो रहा है।। अघट घटता है, अनहोना होता है, अनजान से संबंध बनते हैं। सारा जाना—माना जाल टूट जाता है।

नहीं, इसमें कुछ विरोध नहीं है। भक्त के सामने जब साक्षात भगवान होते हैं, तभी विरह पहली दफा जगता है। उस समय चाहिए गुरु, कि रोक ले, हाथ पकड़ ले, सहारा दे, भरोसा दे। कहीं तुम भाग न जाओ मंदिर से। थोड़ी ही देर की बात है। और एक बार तुम कूद गए नदी में और नदी को ले लिया तुमने अपने में, यात्रा पूरी हो गई। और तभी मिलन के आनंद की वर्षा होती है। पहले तो विरह की पीड़ा है, विरह का रेगिस्तान है, फिर मिलन की वर्षा है। और यह भी तुमसे मैं कह दूं कि जितनी बड़ी होगी तुम्हारी विरह की जलन, उतनी ही गहन होगी तुम्हारी मिलन की शांति और मिलन का आनंद। इसलिए अगर तुम्हें कोई शार्टकट बताता हो, कि कहता हो कि हम ऐसा रास्ता बताते हैं कि बिना विरह के तुम पहुंच जाओगे। कोई तुम्हें कहता हो कि नदी जाने की क्या जरूरत! हम पाइप लाइन बिछाए देते हैं, तुम्हारे घर में ही टोंटी से पानी टपकने लगेगा परमात्मा का। तुम उसकी मत सुनना। क्योंकि बिना विरह के अगर परमात्मा मिल जाए. मिल नहीं सकता, यह आदमी धोखा दे रहा है।

लेकिन इसका धोखा धंधा बन सकता है। पंडित, पुरोहित, पुजारी वही कर रहे हैं। वे कहते हैं, हम सस्ता रास्ता बताए देते हैं। तुम क्यों विरह में मरते हो? तुम घर बैठो। हम तुम्हारे लिए पूजा करते हैं। वे कहते हैं, तुम्हें कोई यज्ञ करने की जरूरत नहीं है। हम कर देंगे; तुम सिर्फ पैसा चुका दो। तुम चिंता मत करो; हम जो कहते हैं, वैसा करो। बाकी सब फिक्र हम कर लेंगे। ये मध्यस्थ जो हैं, वे यह कह रहे हैं कि हम तुम्हें पीड़ा से बचा देंगे विरह की। हम तुम्हारे लिए रो लेंगे, हम तुम्हारे लिए हंस लेंगे, तुम घर बैठे रहो; तुम अपना धंधा करते रहो।

भूलकर भी इस भांति में मत पड़ना। क्योंकि वह अगर ऐसा हो भी जाए—जो हो नहीं सकता, मान लें हो जाए—तो वह ऐसा ही होगा, जैसे बिना भूख लगे किसी आदमी के पेट में हम भोजन डाल दें। कोई तृप्ति न होगी। तृप्ति तो नहीं, उलटे वमन हो जाएगा, उलटी हो जाएगी। जिसे प्यास न लगी हो, उसके कंठ में हम पानी उंडेल दें। उससे पेट की भले सफाई हो जाए, लेकिन तृप्ति न होगी।

यह तो ऐसे ही है कि जिसने कभी विरह नहीं जाना, उसके द्वार पर अगर प्रेम भी आकर खड़ा हो जाए, तो वह कैसे पहचानेगा? विरह की आंखें चाहिए। जितनी पीड़ा भूख की, उतनी ही तृप्ति, उतना ही स्वाद का रस। अगर तुम्हारी भूख की पीड़ा इतनी गहन हो कि उससे आगे पीड़ा में जाना संभव न हो, तो रूखी रोटी तुम खाओगे और उपनिषद के वचन तुम्हारे हृदय में गंज जाएंगे, अन्न ब्रह्म! अन्न ब्रह्म है! अगर भूख इतनी गहरी हो, तो भोजन परमात्मा हो जाएगा। प्यास गहरी हो, तो जल के कणों में, साधारण से जल में, अमृत की छाया पड़ने लगेगी।

जो साधारण जीवन में घटता है, वही उस असाधारण जीवन में भी घटता है। नियम तो वही है।

परमात्मा के लिए रोओ, ताकि कभी तुम उसके आनंद से हंस भी सकी। उसके लिए आंसुओ को गिरने दो, तभी तुम्हारे पैर शर बांधकर किसी दिन नाच भी सकेंगे। विरह का जितना गहन तीर तुम्हारे हृदय में छिदेगा, उतना ही अमृत का झरना फूटेगा। विरह का अनुपात ही मिलन के आनंद का अनुपात है।

इसलिए तुम घाटे में न रहोगे। रोने से डरना मत। आंसुओ को रोकना मत। पीड़ा को झेलना, पीड़ा से बचने के उपाय मत करना। पीड़ा से बचने के बहुत उपाय हैं। लेकिन जो पीड़ा से बच गया, वह फिर परमात्मा से भी बच जाएगा। वह फिर आनंद से भी बच जाएगा।

अगर तुम इस सूत्र को ठीक से खयाल में रख सकोगे, तो जब विरह आएगा, तब तुम सौभाग्य समझोगे। तुम समझोगे कि परमात्मा निकट है, इसलिए विरह आया। उसकी छाया कहीं मेरे ऊपर पड़ने लगी। वह कहीं आस—पास है। अन्यथा ये आंसू कैसे बहते? यह हृदय कैसे रोता? यह मेरा रोआं—रोआं कैसे तड़फता? यह आग कैसे जलती?

दूसरा प्रश्न :

अहंकार के पूर्ण विसर्जन के लिए आपने शरणागति को अत्यंत आवश्यक बताया और स्वयं अहंकार इस यात्रा के लिए राजी नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें उसकी मृत्यु निहित है। फिर बताएं कि शरणागति की यात्रा किसके द्वारा होती है?

शरणागति कोई यात्रा नहीं है। अहंकार नहीं रह जाता, शरणागति फलित होती है। दीया जलाते हो तुम घर में, घर में जो घिरा हुआ अंधकार था, क्या वह द्वार—दरवाजों से बाहर जाता है? उसकी कोई यात्रा होती है? तुमने कभी अंधेरे को बाहर निकलते देखा? कि घर में दीया जल गया, अंधेरा बाहर जा रहा है! खड़े रहो द्वार पर, अंधेरा बाहर जाता न दिखाई पड़ेगा।

अंधेरा कुछ है थोड़े ही, जो बाहर जाता है। अंधेरा तो अभाव है, दीए के न होने की अवस्था है, अनुपस्थिति है। अंधेरा कुछ है थोड़े ही। अंधेरा है ही नहीं; उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

अहंकार अंधेरा है। उसे कहीं जाना थोड़े ही है। वह जा नहीं सकता। उसका कोई अस्तित्व नहीं है। वह कोई तत्व थोड़े ही है! इसलिए तो हम उसे झूठ कहते हैं, सपना कहते हैं। असली सवाल है, दीए का जल जाना।

शरणागति कोई यात्रा नहीं है। क्योंकि यात्रा अगर होगी, तो अहंकार मौजूद रहेगा। शरणागति छलांग है, यात्रा नहीं; एक क्षण में घटी घटना है। शरणागति सडेन, तल्ला घटी घटना है! जैसे दीया जला, प्रकाश हुआ, अंधेरा मिटा। एक क्षण की देरी नहीं होती। शरणागति की यात्रा कौन करता है?

यात्रा तो है ही नहीं, पहली बात। जैसे ही अहंकार गिरता है, वैसे ही शरणागति हो जाती है, उसी क्षण।

अहंकार के भीतर छिपे तुम जो हो, तुम अहंकार ही अगर होते, तो परमात्मा से मिलने का कोई उपाय न था। परमात्मा से तुम मिल सकते हो, क्योंकि तुम परमात्मा से ही हो। समान ही समान से मिल सकता है। तुम परमात्मा से मिल सकते हो, क्योंकि किसी अर्थ में तुम अभी भी परमात्मा हो। पता न हो। विपरीत का तो मिलन कैसे होगा! अहंकार के गिरते ही तत्‍क्षण तुम पाते हो, मिल गए। यात्रा नहीं होती, मंजिल आ जाती है।

तो असली सवाल है, अहंकार कैसे गिरे?

तुम्हारी चेष्टा से न गिरेगा, क्योंकि सभी चेष्टाएं अहंकार की हैं। यही जटिल जाल है। तुम अगर कोशिश करोगे, तो अहंकार ही कोशिश करेगा, गिरेगा नहीं। यह भी हो सकता है कि तुम ठोंक—ठाककर अपने को विनम्र बना लो। तो भीतर से अहंकार नई घोषणा करेगा कि मुझसे ज्यादा विनम्र कोई भी नहीं। देखो, मेरी विनम्रता। कैसे फूल लगे हैं विनम्रता के! दुनिया में हैं और लोग, लेकिन मुझसे ज्यादा विनम्र कोई भी नहीं। बस, मैं आखिरी हूं विनम्रता में, चोटी पर हूं।

यही तो अहंकार है, जो चोटी पर होने की घोषणा करता है। पहले धन के आधार पर करता था, पद के आधार पर करता था, बल के आधार पर करता था। अब त्याग के आधार पर करता है, विनम्रता के आधार पर करता है, साधुता के आधार पर करता है, संतत्व के आधार पर करता है। घोषणा वही है।

चेष्टा से अहंकार न जाएगा। अहंकार जाता है अहंकार को देखने से। चेष्टा नहीं, सिर्फ जांचने से, परखने से, पहचानने से, साक्षी— भाव से।

साक्षी— भाव का परिणाम है शरणागति। तुम सिर्फ देखते रहो अहंकार का खेल, कुछ करो मत। करने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि भीतर जो तुम्हारे छिपा है, वह कर्ता है ही नहीं, वह साक्षी है। तुम सिर्फ देखो। तुम जरा अहंकार के खेल देखो; लीला देखो। कैसी लीला रचता है! और कैसी सूक्ष्म लीला रचता है!

रास्ते पर तुम जा रहे हो अकेले, और देखा कि पास के मकान से दो आदमी निकल आए। भीतर कुछ बदल गया। परखो इसे, जांचो दूर खड़े, क्या हुआ?

अभी ये दो आदमी रास्ते पर नहीं थे, तो तुम और ढंग से चल रहे थे। कोई देखने वाला न था, तो तुम्हारा चेहरा और था, तुम एक गीत गुनगुना रहे थे; एक मस्ती थी, सरल थे, छोटे बच्चे की तरह थे। अचानक दो आदमी पास के मकान से निकल आए, कोई चीज भीतर बदल गई। अकड़ गए, बचपना चला गया, सरलता खो गई, चाल बदल गई, अहंकार आ गया।

तुम घर में अकेले बैठे हो, कोई नहीं है, तब तुम और हो। नौकर कमरे से गुजर गया। पता भी नहीं चलता, शरीर हिलता भी नहीं, और भीतर सब हिल जाता है। जांचो, परखो।

कोई आदमी आया, कहने लगा, आप जैसा बुद्धिमान आदमी कभी नहीं देखा। भीतर एक छलांग लग गई। तुम एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ गए। जरा भीतर देखते रहो, क्या हो रहा है! इस आदमी ने चार शब्द कहे। शब्दों में क्या है? हवा में उठे बबूले हैं। इसने कहा कि तुम बड़े सुंदर, कि तुम बड़े बुद्धिमान, कि आप जैसा त्यागी नहीं देखा। भीतर एक छलांग लग गई। अभी खड़े थे जमीन पर, अचानक एवरेस्ट पर पहुंच गए। गौरीशंकर विजय कर लिया! एक आदमी आया, आलोचना करने लगा, निंदा करने लगा; कहने लगा, तुमसे ज्यादा निम्न और बेईमान कोई भी नहीं है। भयंकर चोट लग गई, घाव हो गया। अहंकार तड़फने लगा बदला लेने को। क्रोध में आ गए। इस आदमी को अब तक मित्र समझा था, यह दुश्मन हो गया। कहा कि बाहर निकल जाओ, अन्यथा उठवाकर फिंकवा दूंगा। धक्का देकर इस आदमी को बाहर कर दिया।

जांचते रहो! अनेक—अनेक रूपों में, अनेक—अनेक परिस्थितियों में, अनेक—अनेक घटनाओं में सिर्फ देखते रहो, क्या हो रहा है खेल! कब अहंकार बनता, कब चोट खाता, कब गिर पड़ता, कब उठकर खड़ा हो जाता; किस—किस ढंग से यह खेल चलता है। तुम सिर्फ देखो। बस, द्रष्टा होना काफी है।

अगर तुम्हारी दृष्टि किसी दिन सध जाएगी.। और सधते— सधते ही सधेगी। कोई अचानक तुम न देख पाओगे। क्योंकि देखना बड़ी से बड़ी कला है।

इसलिए तो जिन्होंने जान लिया, उनको हमने द्रष्टा कहा है, देखने वाले कहा है। जिन्होंने जान लिया, उनके वचनों को हमने दर्शन कहा है कि उन्होंने देख लिया, जान लिया। क्या देख लिया? देख लिया, अहंकार का खेल।

जिस दिन देखना पूरा हो जाता है, अहंकार तल्ला गिर जाता है। उसी क्षण शरणागति हो जाती है। उसी क्षण तुम बचे ही नहीं। समर्पण करना नहीं होता, होता है। समर्पण करोगे, तो झूठा रहेगा। वह करने वाला हमेशा अहंकार रहेगा।

जो समर्पण किया गया है, उसे तुम वापस भी ले सकते हो। उसका मूल्य ही क्या है? लेकिन जो समर्पण होता है, उसे तुम वापस न ले सकोगे। लेने वाला नहीं बचा, करने वाला नहीं बचा, सिर्फ देखने वाला बचा है। तुम सिर्फ देखोगे कि ऐसा हो रहा है। शरणागति देखी जाती है कि हो गई।

अहंकार को देखते—देखते—देखते अचानक एक दिन तुम पाते हो कि उस दर्शन के प्रवाह में ही, उस दर्शन की ज्योति में ही अहंकार का अंधकार खो गया। तुम अपने को पाते हो, मिट गए शून्य हो गए। समर्पण हो गया, शरणागति हो गई। उतर गए तुम नदी की धार में, उतर गई नदी की धार तुममें। अब तुममें और परमात्मा में कोई फासला न रहा। उतने ही अहंकार का फासला था। कर्ता है परमात्मा और जान लिया था तुमने अपने को कर्ता, वही दूरी थी। एक मात्र कर्ता है परमात्मा, वही कर रहा है, सब करना उसका है। तुमने अपने को कर्ता मान लिया था, यही आति थी। वह भांति छूट गई।

जैसे—जैसे तुम जांचोगे, भीतर भांति छूटती जाएगी। तुम पाओगे, तुम कुछ भी तो नहीं कर रहे हो, सब हो रहा है। भूख लगती है, प्यास लगती है, तो पानी की खोज शुरू हो जाती है। नींद आती है, तो बिस्तर तैयार होने लगता है। जवानी आती है, तो कामवासना घेर लेती है। बुढ़ापा आता है, कामवासना धुएं की तरह दूर निकल जाती है।

छोटे बच्चे थे, पता न था काम का। तितलियों के पीछे दौड़ते थे, फूलों को पकड़ते थे, कंकड़—पत्थर बीन लाते थे घर में। घर के लोग कहते थे, फेंको। तुम बड़ा मूल्यवान समझते थे। वह भी हो रहा था। फिर जवानी आई, नया पागलपन आया। अब तुम साधारण तितलियों के पीछे नहीं भागते। अब भी तितलियों के पीछे भागते हो, लेकिन अब उन तितलियों का नाम स्त्री है, धन है, पद है। अभी भी कंकड़—पत्थर इकट्ठा करते हो, पुराने नहीं। अब उनका नाम कोहिनूर है, हीरे—जवाहरात हैं, उनको इकट्ठे करते हो। खेल जारी है। कोई करवा रहा है। और तुम पूरे वक्त सोच रहे हो कि मैं कर रहा हूं।

क्रोध होता है। तुमने कभी किया? प्रेम होता है। तुमने कभी किया? तुम पैदा हुए हो या कि तुमने अपने को पैदा कर लिया है? तुम मरोगे या कि तुम अपने को मारोगे? जो आत्महत्या करते हैं, वे भी अपने को नहीं मारते; वह भी घटती है। वे भी बच नहीं सकते। वह भी होता है। क्या करोगे? आत्महत्या का विचार पकड़ लेता है। वह तुमने थोड़े ही पैदा किया है।

अगर तुम ठीक से विश्लेषण करोगे, तो तुम पाओगे, सब हो रहा है। और अकारण ही तुमने कर्ता को बना लिया कि मैं कर्ता हूं। बस, देखने की क्षमता आ जाए, कर्ता— भाव खो जाता है। करने वाला एक है।

साक्षी शरणागति है। साक्षी समर्पण है। साक्षी तुम्हारा विसर्जन है। और जहां तुम नहीं हो, वहां परमात्मा है।

आखिरी प्रश्न :

आपको देखकर बहुत खुशी होती है, आपकी आलोचना सुनकर बहुत दुख। फिर महीने में चार—पांच बार आपकी तस्वीर के सामने कहता हूं? मुझे आनंद नहीं दे सकता, तो मुझे मार ही डाल। इतना दुख क्यों देता है? थोड़ी देर मैं पछताता हूं! झुसिया भगवान से लड़ता था। पर उसकी भाव—दशा पवित्र रही होगी। मुझमें तमस बहुत है। ध्यान कछ समय चलता है, फिर रूक जाता है, फिर चलता है। मेरी तमस, मेरी विक्षिप्तता कैसे दूर हो?

अगर मुझे देखकर खुशी होगी, तो मुझे न देख पाओगे, तो दुख होगा। अगर मेरी कोई स्तुति करेगा, प्रसन्नता होगी, तो फिर जब कोई मेरी निंदा करेगा, आलोचना करेगा, तो दुख होगा। सुख और दुख साथ—साथ हैं। अगर एक को चुना, तो दूसरे से बच न सकोगे। अगर दूसरे से बचना हो, तो दोनों को छोड़ देना पड़ेगा।

उ तो मुझे देखकर खुश मत होओ, शांत होओ। मुझे देखकर खुश होओगे, तो जब मुझे न देख पाओगे, तो दुख होगा। सुख अपने साथ दुख ले आता है। इसलिए मुझे देखकर शांत बनो। क्योंकि सुख एक उत्तेजना है। सुख कोई बहुत अच्छी अवस्था नहीं है। एक तनाव है। इसलिए सुख से भी आदमी ऊब जाता है।

तुमने कभी खयाल किया कि ज्यादा देर तुम सुखी नहीं रह सकते। क्योंकि थक जाता है आदमी। ज्यादा देर सुखी रहना मुश्किल है। दुख विश्राम है। अगर सुखी होओगे, थक जाओगे, तब दुख में विश्राम लेना पड़ेगा। सुख दिन जैसा है, दुख रात जैसा है।

अगर दुख से बचना हो, तो ध्यान रखना, सुख से बचना होगा। सुख की उत्तेजना तुमने पाल ली, तो फिर दुख की उत्तेजना कौन सहेगा? वह भी तुम्हीं को सहनी पड़ेगी। वह विपरीत है, पर इसी का दूसरा अति छोर है।

दुख से तो हम बचना चाहते हैं, बच कहा पाते हैं? सुख हम पाना चाहते हैं, मिल कहं। पाता है? इस बोध को जो उपलब्ध हो जाता है कि सुख के साथ दुख जुड़ा है, एक ही सिक्के दो पहलू हैं, वह पूरे सिक्के को फेंक देता है। उस सिक्के को फेंकने में शांति है। तुम जब मेरे पास आओ, तो सुख की भाव—दशा को मत बनाओ। कोई उत्तेजना मत पालो। आओ, शांत बनो। अगर तुम मेरे पास शांत रहोगे, तो तुम मुझसे दूर भी शांत रहोगे। क्योंकि शांति कोई उत्तेजना नहीं है। शांति एक स्वाभाविक दशा है। शांति में कोई तनाव नहीं है। इसलिए कोई व्यक्ति शांत रह सकता है अनंत काल तक।

इसलिए बुद्ध ने मोक्ष में सिर्फ शांति को ही जगह दी है, सुख को कोई जगह नहीं दी। आनंद शब्द का भी प्रयोग नहीं किया। क्योंकि आनंद में भी तुम्हें सुख की छाया पड़ती है, तुम्हें लगता है, आनंद महासुख है, ऐसा सुख जो कभी अंत न होगा। लेकिन ऐसा कोई सुख होता ही नहीं, जो कभी अंत न हो।

तो बुद्ध ने निर्वाण को शांति कहा है। इतनी गहरी शांति कि उसमें तुम भी नहीं हो, बस शांति है। वह अनंत काल तक रह सकती है, उसका कोई अंत नहीं आता है।

सुख तो है संगीत जैसा, कि कोई रविशंकर वीणा बजा रहा है। प्रीतिकर है, लेकिन कितनी देर तुम रविशंकर की वीणा सुन सकते हो? घड़ी दो घड़ी बहुत, अगर रातभर रविशंकर तार ठोंकता रहे, तुम पुलिस में खबर करोगे कि यह आदमी तो जान ले लेगा। अगर वह माने ही न और तुम्हारे पीछे—पीछे ही सितार बजाता घूमे, तो तुम पगला जाओगे दो—चार दिन में। इससे ज्यादा नहीं लगेगी देर।

बड़ा सुख था वीणा में घड़ी दो घड़ी, फिर पीड़ा हो गई, फिर पागलपन आने लगा। क्योंकि उत्तेजना है संगीत भी, चोट है, आघात है। कितना ही मधुर हो, है तो चोट ही। तार पर पड़ी चोट, शब्द की पड़ी चोट, कान पर झनकार है, हृदय पर भी झनकार है। कितनी ही प्रीतिकर हो, चोट करती है। बाजार का शोरगुल कितना ही अप्रीतिकर हो, रेलवे स्टेशन पर चलती खटर—पटर कितनी ही अप्रीतिकर हो, वह भी चोट करती है। उसे तुम क्षणभर भी नहीं सुनना चाहते। रविशंकर की वीणा को तुम थोड़ी देर सुनना चाहोगे।

लेकिन एक ऐसा संगीत भी है, जो अनाहत है, जो आघात से पैदा नहीं होता। उस संगीत में कोई स्वर नहीं है। उसी को हमने ओंकार कहा है। इसलिए ओंकार को अनाहत नाद कहा है। न तो अंगुलियां हैं, न तार हैं, न कोई चोट है। वह संगीत कैसा है? वह संगीत शून्य का है, मौन का है। उसमें तुम अनंत काल तक रह सकते हो, तुम कभी न थकोगे।

सुख से आदमी थकता है, दुख से भी थकता है। और इसलिए बदलाहट चलती रहती है, सुख से दुख में, दुख से सुख में; रात से दिन, दिन से रात। श्रम करता है, विश्राम; विश्राम करता है, श्रम। द्वंद्व जारी रहता है। अशांति जारी रहेगी द्वंद्व के साथ। शांति निर्द्वंद्व हो जाना है।

जब तुम मेरे पास आओ, तो सुख को मत जन्मने दो। क्या करोगे? सिर्फ देखते रहो। अगर तुम जागकर मेरे पास रहे, सुख जन्मेगा ही नहीं। वह नींद में ही जन्मता है। तुम शांत रहो। तुम बैठो मेरे पास ध्यानस्थ। तब तुम पाओगे कि मेरे पास या मुझसे दूर, सब बराबर है।

बुद्ध का मरण दिन आया, तो आनंद छाती पीट—पीटकर रोने लगा। और भी भिक्षु थे, उसमें एक भिक्षु था महाकाश्यप। वह अपने वृक्ष के नीचे बैठा था। खबर पहुंची, किसी ने कहा कि बुद्ध का अंतिम दिन आ गया। उन्होंने कहा है आज मैं विसर्जित हो जाऊंगा। उसने सुना या नहीं सुना, वैसा ही बैठा रहा। आनंद रोने लगा।

बुद्ध ने कहा, आनंद तू क्यों रोता है? तू महाकाश्यप की तरफ क्यों नहीं देखता? उसको भी खबर मिली है, लेकिन वह चुप बैठा है। जैसे कुछ नहीं हुआ है। जैसे लहर ही नहीं आई। कोई बात ही नहीं हुई। जैसे किसी ने कहा ही नहीं कि बुद्ध मरने को हैं।

आनंद ने महाकाश्यप की तरफ देखा। उसने कहा, बेबूझ है बात। मेरी समझ नहीं पड़ती। आपके रहते इतना सुख था, आपके जाते महादुख होगा।

बुद्ध ने कहा, तू महाकाश्यप को पूछ। महाकाश्यप से पूछा। महाकाश्यप ने कहा, उनके रहते बड़ी शांति थी, उनके न रहते भी बड़ी शांति होगी। क्योंकि शांति भीतर की बात है। उसका उनके रहने न रहने से संबंध नहीं। उनके सहारे भीतर को साध लिया, सध गया। बुद्ध न होंगे, तो भी शांति होगी। बुद्ध थे, तो भी शांति थी। आनंद, तू सुख के पीछे पड़ा है। इसलिए मुश्किल में उलझा है। सुख को छोड़। शांत!

शांत रस को पकड़ने की कोशिश करो। अन्यथा मैं कितने दिन तुम्हारे पास रहूंगा! फिर तुम दुखी होओगे। तो मैंने तुम्हें जितना सुख दिया, उससे ज्यादा दुख तुम्हें दे दूंगा। क्योंकि रहना तो थोड़ी देर है, न रहना बहुत लंबा होगा।

बुद्ध अस्सी साल रहे। फिर अब ढाई हजार साल बीत गए। और जिन्होंने बुद्ध के साथ सुख पाया होगा, वे अभी भी दुख पा रहे होंगे, ढाई हजार साल! अब वे जनम—जनम तक दुख पाएंगे। वह पीड़ा बनी ही रहेगी। जिसने बुद्ध के साथ सुख पाया, अब बिना बुद्ध के कैसे सुख पाएगा!

नहीं, तुम वह भूल करना ही मत। यह जो आनंद की भूल है, इससे बचना। महाकाश्यप गुणी है। वह राज समझ गया है कि क्या साधना है। जब तक बुद्ध मौजूद हैं, शांति को साध लो।

और अगर तुमने शांति साधी, तो तुम हैरान होओगे, कोई मेरी स्तुति करे तो और कोई मेरी निंदा करे तो, बराबर हो जाएगी। तुम्हें चोट क्यों लगती है जब कोई मेरी निंदा करता है? तुम्हें अच्छा क्यों लगता है जब कोई मेरी स्तुति करता है?

तुम्हें समझ नहीं है। जब कोई मेरी स्तुति करता है, तुम्हारे अहंकार को बढ़ावा मिलता है, तुम ठीक आदमी के साथ हो। जब मेरी कोई निंदा करता है, तुम्हारे अहंकार को घाव लगता है, चोट लगती है, कि तुम गलत आदमी के साथ हो।

इससे मेरा कुछ लेना—देना नहीं है। न तो स्तुति करने वाला मेरी स्तुति कर सकता है, न निंदा करने वाला निंदा कर सकता है। वे दोनों ही नासमझ हैं। दोनों को मेरा कोई पता नहीं है। स्तुति करने वाले को एक हिस्सा पता है, निंदा करने वाले को दूसरा हिस्सा पता है; पूरे का उन दोनों को पता नहीं है, अन्यथा वे चुप हो जाते। क्योंकि जो भी मुझे पूरा समझेगा, वह मेरे संबंध में चुप हो जाएगा। क्योंकि पूरे को जब भी तुम समझोगे, तब तुम पाओगे, न तो वह स्तुति में समा सकता है और न निंदा में समा सकता है।

जो नहीं समझते, उनमें से कुछ निंदा करते हैं; जो नहीं समझते, उनमें से कुछ स्तुति क्तते हैं। जैसे मित्र स्तुति करता है, क्योंकि वह प्रेम करता है। शत्रु निंदा करता है, क्योंकि वह घृणा करता है। लेकिन मित्र कल शत्रु हो सकते हैं, शत्रु कल मित्र हो सकते हैं। इसमें कुछ अड़चन नहीं है।

तुम्हें चोट लगती है निंदा से, क्योंकि तुम्हारा अहंकार अड़चन में पड़ जाता है। तुम्हें प्रसन्नता होती है, कोई स्तुति करता है, क्योंकि तुम्हारा अहंकार फूल जाता है। इसे गौर से देखो। इसे तुम मुझ से बांधो ही मत। इससे मेरा कुछ लेना—देना नहीं है। अपने भीतर पहचानो।

और अगर तुम मेरे पास शांति को साधोगे, तो तुम्हारी दृष्टि निर्मल होती जाएगी। सिर्फ शांति में ही दृष्टि निर्मल और निर्दोष होती है। तब तुम हंस पाओगे। स्तुति करने वाले को भी देखकर तुम शांत रहोगे; निंदा करने वाले को देखकर भी तुम शांत रहोगे। और तब मैं तुमसे कहता हूं कि तुम उन दोनों को बदलने में भी समर्थ हो जाओगे।

अगर कोई मुझे गालियां देता है और तुम चुपचाप सुन लो, और तुम वैसे ही बने रहो, जैसे पानी पर किसी ने लकीर खींची, खींच भी न पाया और मिट गई, लौटकर देखे, वहां कोई लकीर नहीं है; ऐसे तुम बने रहो, तो शायद निंदा करने वाले को पुन: सोचना पड़े कि जिसकी वह निंदा कर रहा है, उस आदमी के पास रहकर अगर इस आदमी को ऐसा कुछ हो गया है, तो एक बार फिर सोच लेना जरूरी है।

लेकिन किसी ने निंदा की और तुम दुखी और परेशान हो गए, बेचैन हो गए, क्रोधित हो गए या तुम मेरी रक्षा करने लगे। कैसे तुम मेरी रक्षा करोगे? या तुम तर्क देने लगे, विवाद में पड़ गए, तो तुम दूसरे आदमी को जो एक मौका दे सकते थे बदलने का, उसे चूक गए।

कोई किसी को विवाद से थोड़े ही कभी राजी कर पाता है। तर्क ने कभी किसी को बदला है? उस भ्रांति में पड़ो ही मत। तुम लाख तर्क दो, ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि तुम्हारे तर्क उस आदमी का मुंह बंद कर दें। लेकिन उसके हृदय को न बदल पाएंगे। वह खोज में रहेगा कि और मजबूत तर्कों को लाकर, सिद्ध करके तुम्हें दिखा दे कि तुम गलत हो। क्योंकि तुमने उसे एक चुनौती दे दी, उसके अहंकार को चोट पहुंचा दी। वह बदला लेकर रहेगा।

तर्क से कुछ सार नहीं है। विवाद में कुछ रस नहीं है। तुम्हें देखकर कुछ घटना घट सकती है। कोई मुझे गाली देता आए और तुम चुपचाप सुन लो, ऐसे कि कुछ भी न हुआ। वह आदमी गंभीर होकर लौटेगा। तुम्हारी शांति उसका पीछा करेगी। तुम उसकी नींद में उतरोगे। तुम उसके सपनों में छा जाओगे। वह बेचैन होगा। उसका आने का मन बार—बार होगा कि फिर तुम्हारे पास आए। मामला क्या है? गाली दी थी, उत्तर आना चाहिए था! इस आदमी को कुछ हो गया है!

और कौन नहीं चाहता कि ऐसी दशा उसकी भी हो जाए कि कोई गाली दे और चोट न पड़े! तुमने इस आदमी को जकड़ लिया, पकड़ लिया। यह आदमी भाग न सकेगा। और यह घटना मेरे पास आने से घटी है; तुमने मेरी तरफ इस आदमी को पहुंचने के लिए पहला उपाय बता दिया। इस आदमी के लिए तुमने दरवाजा खोल दिया।

धक्का मत दो, सिर्फ दरवाजा खोलो। धक्का देकर तुम उसे भीतर न ला पाओगे। धक्का देकर कहीं कोई भीतर आया है? सिर्फ चुपचाप द्वार खोल दो कि उसे पता भी न चले। यह आज नहीं कल आएगा; इसे आना ही पड़ेगा। तुम्हारी शांत मूर्ति इसका पीछा करेगी। शांत हो जाओ। सुख को मत पकड़ो।

और तुम कहते हो मेरी तस्वीर के सामने कि मुझे आनंद नहीं दे सकता, तो मुझे मार ही डाल।

वह भी सुख की ही तलाश है। तुम मरने को राजी हो, लेकिन खुद को छोड़ने को राजी नहीं हो। मैं तुमसे कहता हूं मरने की कोई जरूरत नहीं, सिर्फ अहंकार को मरने दो। तुम काफी मजे से जीयो। तुम्हारे जीने से कहीं कोई अड़चन नहीं है। लेकिन तुम कहते हो, मैं मरने को राज़ी हूं,लेकिन वह जो कहा रहा है कि मैं मरने को राज़ी हूं वह मैं छूटने को राजी नहीं है।

आत्महत्या करते वक्त भी तुम मैं ही बने रहोगे कि मैं आत्महत्या कर रहा हूं मैं कुर्बानी दे रहा हूं। जैसे तुम शिकायत कर रहे हो पूरे परमात्मा से, पूरे अस्तित्व से कि लो, अगर आनंद नहीं, तो मैं जीवन छोड़ता हूं। लेकिन यह छोड़ने वाला अहंकार है।

पकड़ने वाला, छोड़ने वाला, दोनों अहंकार हैं। तुम जागो। पकड़ने—छोड़ने से कुछ न होगा।

आनंद क्यों मांगते हो खर आनंद को तो तुमने सदा से मांगा है और इसीलिए तुम इतने दुखी हो। जागो! शांति, शून्य तुम्हारा स्वर बने। और तब आनंद तुम्हें मिलेगा। आनंद मांगने से नहीं मिलता, शून्य होने से बरसता है। आनंद कोई भिखारी को नहीं मिलता, सिर्फ सम्राटों को मिलता है। और सम्राट मैं उसे कहता हूं, जिसकी मांग बंद हो गई। जो मांगता है, वह भिखारी है।

तुमने अगर कहा, आनंद, तुम्हें कभी न मिलेगा। तुम सिर्फ शांत हो जाओ। और शांत होते ही तुम पाओगे, चारों तरफ से स्रोत आनंद के बहे आ रहे थे, अपनी अशांति के कारण तुम देख न पाए। खजाना सामने पड़ा था, तुम्हारी आंख अंधी थी। द्वार खुले थे, तुमने आंख उठाकर देखा ही नहीं। तुम चूक रहे थे अपने कारण। अस्तित्व क्षणभर को भी तुम्हें चुकाने को उत्सुक नहीं है।

पूरा अस्तित्व सहारा दे रहा है कि आ जाओ, द्वार खुले हैं, खजाना तुम्हारा है। लेकिन तुम भिक्षा—पात्र लिए खड़े हो। और भिक्षा—पात्र में यह खजाना नहीं समा सकता। यह खजाना भिक्षा—पात्रों से बहुत बड़ा है। भिक्षा—पात्र छोड़ना पडेगा।

अहंकार भिक्षा—पात्र है। मत मांगो आनंद। सिर्फ शांत हो जाओ और आनंद मिलेगा। आनंद सदा मिलता है उनको, जो शांत हो गए। जो मांगते हैं, उन्हें दुख मिलता है। फिर दुख और पीड़ा में तुम कहते हो, आत्महत्या तक कर लूंगा; मार डालो, मर जाऊं।

इससे कुछ हल नहीं है। तुम मर भी जाओगे, तो तुम तुम ही रहोगे। फिर पैदा हो जाओगे। फिर आनंद मांगने लगोगे। यही तो तुम करते रहे हो। यह गोरखधंधा बहुत पुराना है। तुम कोई नए थोड़े ही हो। तुम बड़े प्राचीन पुरुष हो। कितनी ही बार तुमने यही किया, मांगा, नहीं मिला। मरे, फिर मांगा। लेकिन मांग को न मरने दिया।

तुम मत मरो, माग को मरने दो, तुम जीओ। तुम तो शाश्वत हो, तुम मर भी नहीं सकते। तुम मारोगे कैसे? कैसे मिटाओगे अपने को? तुम बनाए नहीं अपने को, मिटाने वाले तुम कैसे हो सकते हो? जिसने बनाया, वही मिटा सकता है। और बनाया किसी ने भी तुम्हें नहीं है। तुम ही हो सार इस सारे अस्तित्व के। तुम सदा से हो, सदा रहोगे, अनादि, अनंत। ऐसा कभी न था कि तुम न थे और ऐसा कभी न होगा कि तुम न रहोगे।

मिटाने से क्या होगा? मिट—मिटकर तुम होते रहोगे। उस बात को ही छोड़ो। आनंद मत मांगो, शांति। और मजा यह है कि आनंद मांगना पड़ता है, शांति को मांगने की जरूरत नहीं। शांत तुम ही हो सकते हो। आनंदित तुम कैसे होओगे? मुझे कहो, आनंदित होने का तुम्हारे हाथ में क्या उपाय है? लेकिन शांत तुम हो सकते हो। जो तुम हो सकते हो, वही करो; शेष अपने से होगा।

जैसे वर्षा होती है; पहाड़ खाली रह जाते हैं, क्योंकि पहले से भरे हैं; गड्डे झीलें बन जाते हैं, क्योंकि खाली थे। तुम खाली हो जाओ। शांति यानी खाली हो जाना, गड्डा हो जाना। आनंद बरस रहा है, भर देगा तुम्हें। तुम झील हो जाओगे आनंद की।

झुसिया भगवान से लड़ता था, पूछा है, पर उसकी भाव—दशा पवित्र रही होगी। मुझमें तमस बहुत है।

किसको यह समझ है? कौन कह रहा है कि मुझमें तमस बहुत है? निश्चित ही, सत्व बोल रहा होगा। क्योंकि तमस कभी स्वयं को स्वीकार नहीं करता। तमस का तो लक्षण है, वह अस्वीकार करता है कि मैं और आलसी? तो आलसी भी तलवार लेकर लड़ने खड़ा हो जाता है कि किसने कहा? मैं और आलसी? मैं और तामसी? तो तामसी भी तमस छोड्कर लड़ने को खड़ा हो जाता है। तुम आलसी को भी आलसी नहीं कह सकते। वह भी लकड़ी उठा लेगा। तमस तो स्वीकार ही नहीं करता अपने को।

कौन सोच रहा है? कौन देख रहा है कि मैं तामसी हूं? यही तो सत्व का स्वर है। तुम इस स्वर को ठीक से पहचानो। और तुम इस स्वर की तरफ थोडे ज्यादा झुको। संतुलन भर बदलना है, कुछ बदलना नहीं है। ऊर्जा एक ही है। एक ही ऊर्जा है जो सत्व में, रज में, तम में प्रवाहित होती है।

जो आदमी सो रहा है, यही आदमी तो जागेगा; जो ऊर्जा सो रही है, वही जाग जाएगी, कोई दूसरी ऊर्जा थोड़े ही जागेगी। जो तमस है, वही तो रज बनेगा। जो रज है, वही तो सत्य बनेगा। धारा तो एक ही है, ऊर्जा तो एक ही है, शक्ति एक ही है। ये तीन तो उसके निष्कासन के उपाय हैं।

अभी पूरी की पूरी धारा या ज्यादा ज्यादा धारा सत्व नहीं बह रही है, तमस से बह रही है, रजस से बह रही है। लेकिन थोड़ी—सी बूंदें सत्व से भी बह रही हैं। उन बूंदों का मार्ग पकड़ो। शेष धारा को भी उसी तरफ झुकाओ। थोड़ा संतुलन बदलना है। बस, तीनों पाए बराबर हो जाएं; सत्व, रज, तम, तीनों में बराबर ऊर्जा बहने लगे एक तिहाई, एक तिहाई, एक तिहाई, अचानक तुम पाओगे, संगीत बजने लगा, अनाहत नाद शुरू हो गया। जहां तीनों बराबर हो जाते हैं, तीनों एक—दूसरे को काट देते हैं और वहीं से गुणातीत आयाम का प्रारंभ होता है।

यह कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं सारा गुणत्रय—विभाग, ताकि वह गुणातीत हो जाए।

तुम्हारा स्वभाव गुणातीत है। तुम तीन में बंटे हो, क्योंकि तुम सोए हो, तुम्हें पता नहीं। और सोई दशा में अधिक ऊर्जा तमस से बहेगी, क्योंकि सोई दशा तमस की दशा है। जब तुम महत्वाकांक्षा से भरकर दौड़ोगे पद— धन की तलाश में, तब अधिक ऊर्जा रजस से बहेगी। क्योंकि गति, महत्वाकांक्षा, दौड़ रजस का धर्म है। जब तुम शांत बनोगे, ध्यान और समाधि खोजोगे, मौन, निर्विकल्प, निर्विचार दशा को खोजोगे, तब सत्य से बहने लगेगी यही ऊर्जा। क्योंकि ध्यान, निर्विकल्पता, निर्विचार दशा, सत्व के गुण हैं।

और जब तीनों किसी एक दिन, किसी क्षण संयोग में बैठ जाते हैं, तीनों का स्वर लयबद्ध हो जाता है, उसी त्रिवेणी में एक का जन्म होता है। इसीलिए तो लोग त्रिवेणी जाते हैं तीर्थयात्रा करने। वह तीर्थ तुम्हारे भीतर है। जहां इन तीनों का मिलन होगा, वहीं त्रिवेणी बन जाएगी, वहीं प्रयागराज बन गया, वहीं हो गया तीर्थ, वहीं से एक का अनुभव होगा।

घबड़ाओ मत, चिंतित मत होओ। सब साज—सामान मौजूद है, थोड़ी—सी व्यवस्था जमानी है। सूफी कहते हैं, आटा मौजूद है, पानी मौजूद है, नमक मौजूद है, शाक—सब्जी मौजूद है, लकड़ियां पड़ी हैं, माचिस तैयार है, मगर भोजन तैयार नहीं है।

सब तैयार है। जरा— सा इंतजाम बिठाना है कि लकड़ियों में आग लगा दो, कि चूल्हा तैयार कर लो, कि आटे में थोड़ा पानी मिलाओ, कि थोड़ा नमक; कि आटा गूंथ लो, कि रोटियां पका लो; कि भूख मिट जाएगी, तृप्ति हो जाएगी।

परमात्मा मौजूद है, सिर्फ थोड़ा—सा संयोग बिठाना है। वह तुम्हारे तीन गुणों में मौजूद है, उनको थोड़ा—सा संयोजित करना है। धर्म संयोजन की कला है, उससे ज्यादा कुछ भी नहीं। फिर तुम्हारे भीतर एक का जन्म हो जाता है। जहां तीन मिलते हैं, वहा एक का जन्म हो जाता है। इसलिए त्रिवेणी तीर्थ है।

अब सूत्र :

और हे अर्जुन, जो मनुष्य शास्त्र—विधि से रहित केवल मनोकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा जो दंभ और अहंकार से युक्त हैं, कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं तथा जो शरीररूप से स्थित भूत—समुदाय को और अंतःकरण में स्थित मुझ अंतर्यामी को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को आंसुरी स्वभाव वाला जान।

कौन है आंसुरी स्वभाव वाला? कौन है तामसी?

कृष्ण कहते हैं, जो मनुष्य शास्त्र—विधि से रहित केवल मनोकल्पित घोर तप करते हैं…।

मैं वर्षों तक लोगों से कहता रहा कि न तो गुरु की कोई जरूरत है, न शास्त्र की कोई जरूरत है। उस बात में जरा भी भूल न थी। लेकिन मुझे लगा, बात में बिलकुल भूल नहीं है, लेकिन सुनने वाले पर परिणाम बड़ी भूल का हो रहा है।

बात बिलकुल सही है। क्योंकि परमात्मा तुम्हारे भीतर बैठा है। शास्त्र क्या समझाएंगे तुम्हें? सिर्फ आंख भीतर खोलनी है। वेद कंठस्थ करके क्या होगा? अपनी तरफ आंख खोलनी है, स्वाध्याय करना है। शास्त्र—अध्याय से क्या होगा? और गुरु की क्या जरूरत है? क्योंकि जिसे खोजना है, वह तुम्हें मिला ही हुआ है। जब जरा गरदन झुकाई..! गरदन झुकाने के लिए भी गुरु की जरूरत है? उतनी सी समझ भी तुममें नहीं है? और अगर उतनी ही समझ नहीं है, तो गुरु भी क्या करेगा? शास्त्र भी क्या करेंगे?

बात बिलकुल सही है। लेकिन धीरे—धीरे मुझे अनुभव होना शुरू हुआ, मेरी तरफ से सही है, सुनने वाले की तरफ से बिलकुल गलत है। मैंने पाया कि सौ लोग अगर सुनते हों, तो उसमें से एक को बात सही वैसी ही पहुंचती है, जैसी मैंने कही है। वह सत्वगुणी है। और सत्वगुणी पर क्या परिणाम होते थे, जब मैं यह कह रहा था?

उस पर परिणाम ये नहीं होते थे कि वह शास्त्र को छोड़ देता था, नहीं। या गुरु को छोड़ देता था, नहीं। न तो वह शास्त्र छोड़ता था, न वह गुरु छोड़ता था। सिर्फ पकड़ता नहीं था। यह सत्वगुणी पर परिणाम होता था, पकड़ता नहीं था, सिर्फ पकड़ छोड़ता था। न तो शास्त्र छोड़ता था; न गुरु छोड़ता था; सिर्फ पकड़ छोड़ता था। वह समझ लेता था कि बात क्या है, पकड़ छोड़ देनी है। और जब वह पकड़ छोड़ देता था, तो शास्त्र भी सहयोगी हो जाता था, गुरु भी सहयोगी हो जाता था।

पकड़ के कारण शास्त्र भी बाधा बन जाता है, गुरु भी बाधा बन जाता है। क्योंकि तुम एक आग्रह से भर जाते हो, एक आसक्ति से, एक मोह से। मेरा शास्त्र—वेद हिंदू का, कुरान मुसलमान का। मेरा गुरु—महावीर जैन का, मोहम्मद मुसलमान का। वह मेरा—पन छोड़ देता था, वह जो एक प्रतिशत सत्वगुणी मनुष्य था।

और बड़े मजे की बात यह है कि जैसे ही वह मेरा—पन छोड़ता था, वह वेद का तो लाभ ले ही लेता था, कुरान का भी ले लेता था। वह महावीर के पीछे चलकर तो शांति का मजा ले ही लेता था, वह बुद्ध के पीछे चलकर भी ले लेता था। जब पकड़ ही न रही, तो सभी गुरु हो जाते थे।

सत्वगुणी की व्याख्या यह थी कि जब पकड़ ही नहीं, कोई गुरु नहीं, तो सभी गुरु हो गए। और जब कोई पकड़ ही नहीं, कोई शास्त्र ही नहीं, तो सभी शास्त्र अपने हो गए। बंधन छूट जाता था। वह निर्मुक्त भाव से जीने लगता था। सबसे सीखता था।

सत्वगुणी यह सुनकर कि न गुरु की जरूरत है, न शास्त्र की, गुरु को नहीं पकड़ता था, शास्त्र को नहीं पकड़ता था, लेकिन शिष्यत्व उसका गहरा हो जाता था। पर वह घटता था एक प्रतिशत लोगों में।

फिर मैंने देखा कि नौ प्रतिशत रजोगुणी लोग हैं। उन पर क्या परिणाम होता था? वर्षों उनका अध्ययन करके मुझे समझ में आया कि यह सुनकर कि न शास्त्र को पकड़ना है, न गुरु को पकड़ना है, वे शास्त्र को छोड़ने में लग जाते थे, गुरु को छोड़ने में लग जाते थे। समझ पैदा नहीं होती थी, छोड़ने की दौड़ पैदा होती थी। रजोगुण का वह लक्षण है कि हर चीज में से दौड़ निकाल लेता है।

तो एक रजोगुणी मेरे पास आया, उसने मेरी बात समझी, वह घर गया; कुछ छोटी—मोटी मूर्तियां घर में थीं, शास्त्र थे, सब बांधकर कुएं में फेंक आया। फिर पछताया रात में। फिर डरा कि यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई; कहीं नाराज न हो जाएं देवी—देवता! उनकी पूजा करता रहा था। मेरी बात सुन ली; तब तक पूजा में लगा था वह, और गहन पूजा करने वाला था। घंटों, छ: —छ:, आठ—आठ घंटे वर्षों से यह कर रहा था। मेरी बात सुनी; रजोगुण ने नई दौड़ पकड़ी। पुरानी से थक चुका होगा, कुछ परिणाम भी नहीं हो रहा था। बात समझ में आ गई, तो फिर एक क्षण रुका नहीं।

अब देवी—देवता क्या बिगाड़ते थे? घर में रहे आते। कोई हर्जा न था। और कभी सुबह—सांझ एक फूल भी उन पर रख देते, तो भी कोई हर्जा न था। सजावट थे, घर की रौनक थे, रहने देते। शास्त्र घर में रखे थे, कोई अड़चन न थी। पकड़ना नहीं था, छोड़ने का सवाल नहीं था। मगर रजोगुणी छोड़ने को उत्सुक हो जाता है। वह गया, उसने सब बांधकर देवी—देवताओं का बोरिया—बिस्तर और शास्त्र, सब कुएं में फेंक आया। अब रात सो न सका।

रजोगुणी वैसे ही कठिनाई पाता है रात सोने में। क्योंकि दिनभर जो दौड़ता है, भागता है, चिंता करता है, यह पाना है, वह पाना है, सपने रात भी दौड़ते रहते हैं।

रात घबड़ाया; आधी रात वह मेरे घर आया। अब उनको फेंक चुका कुएं में, वहां जा भी नहीं सकता। और शास्त्र तो गल गए होंगे और अब मुहल्ले वालों से कहे कि निकालना है, लोगों को पता चले, तो और बदनामी होगी कि तुम क्या नास्तिक हो गए!

वह आधी रात मेरे पास आया। कंप रहा था। मैंने पूछा, क्या हुआ? उसने कहा कि मैं बड़ी झंझट में पड़ गया। आपने ही डाला। किस दुर्भाग्य के क्षण में आपको सुनने आ गया! और बात जंच गई। और मैं तो धुनी आदमी हूं। जब जंच गई, तो क्षणभर रुका नहीं कि थोड़ा सोच तो लेता। और अब सो नहीं सकता और घबड़ाहट लगती है, कि वर्षों के देवी—देवता थे! कुल—देवता थे! बाप ने पूजे, बाप के बाप ने पूजे। इतनी पुरानी परंपरा थी घर में, और मैंने सब खंडन कर दिया, पता नहीं नाराज हो जाएं!

रजोगुणी सदा डरता है कि कहीं देवी—देवता नाराज न हो जाएं, नहीं तो महत्वाकांक्षा में बाधा डाल देंगे। रजोगुणी पूजा ही इसलिए करता है कि और धन मिल जाए, और पद मिल जाए। उसने कहा, कहीं नाराज हो गए! और शास्त्र भी फेंक आया, अब मैं क्या करूं?

मैंने देखा कि मुल्क में ऐसे बहुत—से लोग थे, जो समझे नहीं, जिन्होंने शास्त्र पर पकड़ तो न छोड़ी, शास्त्र को छोड़ने की दौड़ में पड़ गए; शास्त्र को छोड़ने की दौड़ पकड़ ली। पकड़ना जारी रहा, मुट्ठी न खुली; सिर्फ जरा एक कदम पीछे हट गई पकड़, और गहरी हो गई।

फिर नब्बे प्रतिशत लोग हैं, जो तमोगुणी हैं, जो कि विराट मनुष्य जाति का समुदाय है। वे वैसे ही किसी गुरु और शास्त्र में उलझे न थे। क्योंकि इतना भी उपद्रव वे लेने को राजी नहीं। वे अपने आलस्य में पडे थे। वे तो शास्त्रों से वैसे ही थके थे, क्योंकि शास्त्र कहते हैं, उठो! जागो! शास्त्रों से वैसे ही नाराज थे, कि नींद हराम करते हैं! गुरुओं के पीछे वे कभी गए नहीं थे, क्योंकि उतना चलने की भी उनमें इच्छा नहीं जगी थी, उतना आलस्य भी छोड़ने की हिम्मत न थी। उन्होंने अपनी नींद में ही मुझे सुना।

उन्होंने कहा, बड़ा धन्यवाद! तो हम बिलकुल ठीक थे कि हम तो पहले ही से न पकड़े थे। न किसी शास्त्र को पकड़ा, न किसी गुरु को पकड़ा, न किसी की झंझट में पड़े। हम तो पहले ही से विश्राम कर रहे थे। आपने हमें निश्चित कर दिया। उन्होंने करवट ली, वे सो गए।

ऐसा पंद्रह वर्ष निरंतर मुल्क में लाखों लोगों के साथ देखकर मुझे लगा कि कुछ करना पड़ेगा। मैं भला सच कह रहा हूं इससे कुछ हल नहीं है। मुझे सोचना पड़ेगा कि सुनने वाले पर क्या हो रहा है।

कृष्णमूर्ति ने अब तक नहीं सोचा कि सुनने वाले पर क्या हो रहा है। वे कहते ही चले गए हैं, जो ठीक है। इसलिए कृष्णमूर्ति के पास सिर्फ एक प्रतिशत सत्वगुणी को तो कुछ लाभ होता है, बाकी निन्यानबे प्रतिशत लोगों को भयंकर हानि होती है। और नब्बे प्रतिशत जो आलसी हैं, उनका तो कहना ही क्या। वे बिलकुल अपनी नींद में ही अपने को मुक्त मान लेते हैं कि बात खतम हो गई। हम तो कुछ पकड़े ही नहीं हैं; पहले ही से नहीं पकड़ा था। यह कृष्णमूर्ति ने तो बाद में बताया, हम तो पहले ही से इसी ज्ञान में जी रहे हैं। तो हम बिलकुल ठीक हैं, जैसे हैं। वे अपनी तंद्रा में गहन हो जाते हैं।

तो कृष्णमूर्ति ने नब्बे प्रतिशत लोगों के लिए नींद की सुविधा बना दी। नौ प्रतिशत लोगों के लिए दौड़ की सुविधा बना दी, शास्त्र छोड़ना है, गुरु छोड़ना है; वे उस दौड़ में लगे हैं। वह छूटता नहीं। क्योंकि कहीं छोड़ने से कुछ छूटा है? यह जानने से कि पकड़ व्यर्थ है, छूटना अपने आप हो जाता है। जब तुम छोड़ने की कोशिश करते हो, तो उसका मतलब है कि तुम पकड़े तो हो ही।

अब जैसे मैंने मुट्ठी बांध ली, और कोई मुझे समझाए कि मुट्ठी खोलो, तो मुट्ठी खोलने के लिए कुछ करना पड़ेगा! मुट्ठी खोलने के लिए कुछ करना ही नहीं पड़ता; सिर्फ बांधो मत, मुट्ठी अपने आप खुल जाती है। मुट्ठी खुलती है जब तुम नहीं बाधते। क्योंकि खुला होना मुट्ठी का स्वभाव है। लेकिन ऐसे लोग हैं, जो मुट्ठी को बांधे हुए हैं और अब खोलने की भयंकर चेष्टा कर रहे हैं। उनकी खोलने की चेष्टा से मुट्ठी और जकड़ती है, क्योंकि खोलने से कोई मुट्ठी नहीं खुलती।

तुमने कभी किसी सम्मोहन करने वाले, हिप्नोटिस्ट को देखा है? वह लोगों को एक छोटा—सा खेल दिखाता रहता है। तुम खुद भी करोगे, तो चकित हो जाओगे। वह कह देता है, दोनों मुट्ठियां बांध लो। एक हाथ में दूसरे हाथ की अंगुलियों को गूंथ लो। और वह तुमसे कहता है कि आंख बंद कर लो। और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम लाख उपाय करो, यह मुट्ठी खुल न सकेगी। और वह कहता है, यह मुट्ठी जकड़ती जा रही है।

जैसे ही वह कहता है, मुट्ठी जकड़ती जा रही है, तुम अपने मन में सोचते हो, यह हो ही कैसे सकता है। मुट्ठी मेरी कैसे जकड़ जाएगी? मैं खोल लूंगा। तुम भीतर खिंचने लगे। तुम खोलने की तैयारी करने लगे। और वह कहता जा रहा है, मुट्ठी जकड़ती जा रही है, तुम लाख उपाय करो, खुलेगी नहीं।

पांच मिनट बाद वह तुमसे कहेगा, अब करो उपाय, लगा दो पूरी ताकत। और तुम पूरी ताकत लगाओगे और तुम चकित हो जाओगे कि तुम्हारी मुट्ठी, तुम्हारे हाथ, जकड़ गए, खुलते नहीं हैं।

मनसविद इसको कहते हैं, ली आफ दि रिवर्स इफेक्ट। इसको वे कहते हैं, विपरीत परिणाम का नियम। अगर तुम बहुत खोलने में उत्सुक हो गए, तो तुम यह बात ही भूल गए कि बांधी तुमने थी,. खोलने का सवाल ही न था। जब तुम खोलने में उलझ गए, तो तुमने पहली बात तो स्वीकार ही कर ली कि बंधी है। बस, वहीं भूल हो गई। अब बंधी है, यह स्वीकार हो गया। और तुम्हारे शरीर ने स्वीकार कर लिया कि यह बंधी है, और तुम उसके विपरीत लड़ने लगे। तुम खोल न पाओगे। तुम खोल नहीं सकते।

तुम जिससे बचना चाहोगे, उसी में उलझ जाओगे। कभी तुमने साइकिल चलानी सीखी शुरू—शुरू में! साठ फीट चौड़ा सुपर—हाईवे हो, कोई न हो रास्ते पर। तुम अकेले साइकिल चलाने वाले हो, सिखाने वाले ने तुम्हें बिठा दिया। थोड़ी दूर साथ चला और फिर तुम्हें छोड़ दिया। दिखाई लाल पत्थर पड़ता है तुम्हें किनारे पर। साठ फीट चौड़ा रास्ता है। और वह लाल पत्थर वहा गणेश जी जैसा शांत बैठा है; कुछ बीच में आएगा नहीं। मील का पत्थर है। तुम घबडाए कि कहीं पत्थर से न टकरा जाएं! बस शुरुआत हो गई।

अब कहीं पत्थर से न टकरा जाएं, यह कोई सवाल था साठ फीट चौड़े रास्ते पर! निशाना लगाने वाला भी अगर निशाना लगाकर जाए, तो ही टकरा सकता है; उसके भी चूक जाने का डर है। मगर यह नया सिक्सडू नहीं चूकने वाला है। जैसे ही इसको खयाल आया कि कहीं टकरा न जाएं, अब इसको रास्ता नहीं दिखाई पड़ता। अब इसकी आंख लाल पत्थर पर जमी है, और इसने बचना शुरू कर दिया, इसका हैंडल घूमने लगा, कि टकराए! मरे! अब इसने बचना शुरू किया कि यह गया।

यह उस चीज से बच रहा है, जिससे बचने का कोई सवाल न था। यह टकराएगा! वह लाल पत्थर हिप्नोटिक हो जाएगा। वह खींच लेगा। यह जाकर भड़ाम से उस पर गिरेगा। और यह कहेगा, हम पहले से ही जानते थे कि यह होगा।

मगर यह साठ फीट चौड़ा रास्ता खाली पड़ा था। तुम इसमें से निकल न सके! कुछ कारण है भीतर। तुम जिससे बचना चाहते हो, तुमने स्वीकार कर लिया कि बचना असंभव है। तुम जिससे बचना चाहते हो, तुमने मान लिया कि फंस गए। तुम्हारी मान्यता में ही सारा सम्मोहन है।

तो जिनको कृष्णमूर्ति कहते हैं, छोड दो, छोड़ दो। चालीस साल से वह कहते आ रहे हैं; वे कह रहे हैं, बचो पत्थर से, लाल पत्थर है। वे सिक्खड जो साइकिल पर सवार हैं, जितना तुम उनसे

कहो कि बची, लाल पत्थर है, लाल पत्थर से बचना, अब वे

मुश्किल में पड़े। अब वह लाल पत्थर ही दिखाई पड़ता है जागते, सोते, सपने में, बच नहीं सकते। वे उसी पत्थर पर गिरेंगे।

और जब गिरेंगे, तो कहेंगे कि कृष्णमूर्ति ठीक ही कह रहे थे। पहले ही से बेचारे समझा रहे थे कि इससे बचो, नहीं तो उलझ जाओगे। अब उलझ गए। अब उनकी हिम्मत टूट जाएगी साइकिल पर चढ़ने की। क्योंकि जब भी वे चढ़ेंगे, सब जगह लाल पत्थर हैं सरकार की कृपा से। जहां जाओ, लाल पत्थर हैं। सब जगह मंदिर हैं, मस्जिद हैं, शास्त्र हैं, गुरु हैं, सब तरफ लाल पत्थर हैं। कहीं भी गए, फंसे।

और वे जो नब्बे प्रतिशत हैं, वे कहते हैं कि बिलकुल ठीक, तुम्हें बाद में पता चला कृष्णमूर्ति, हमें पहले ही मालूम है। इसलिए हम झंझट में पड़े ही नहीं; हम पहले ही से सो रहे हैं! जो ज्ञानी हैं, वे पहले ही से विश्राम कर रहे हैं।

कृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन, जो मनुष्य शास्त्र—विधि से रहित…….।

शास्त्र क्या है? शास्त्र की परिभाषा क्या है? शास्त्र किसे कहते हैं? शास्त्र कहते हैं शास्ताओं के वचन को। शास्ता कहते हैं जिसने शासन दिया, अनुशासन दिया, डिसिप्लिन दी; जिसने चलने का मार्ग, व्यवस्था दी। जो चला, जो पहुंचा और जिसने पहुंचकर खबर दी कि थोड़े—से सूचक हैं, तुम्हारे रास्ते पर उपयोगी हो जाएंगे। बुद्ध को हम शास्ता कहते हैं, महावीर को शास्ता कहते हैं। उनके वचनों को हम शास्त्र कहते हैं। और उनके वचनों में जो कहा गया है, उसको हम शासन या अनुशासन कहते हैं।

जिन्होंने जाना, उनके वचनों का संग्रह है शास्त्र। अगर तुम समझदार हो, तो खूब लाभ ले सकते हो। नासमझ हो, तो तुम किसी भी चीज से लाभ नहीं ले सकते, नुकसान ही लोगे। शास्त्र का कसूर नहीं है। कसूर होगा तो तुम्हारा होगा। शास्त्र कोई सिर पर रखकर ढोने की चीज नहीं है; न चंदन—तिलक लगाकर पूजा करने की चीज है। शास्त्र उपयोग करने की चीज है; उसकी उपयोगिता है।

शास्त्र में संगृहीत हैं वचन, जानने वालों के। तुम जरा होशपूर्वक समझने की कोशिश करोगे, तो शास्त्र से तुम्हें बड़े रहस्य उपलब्ध हो जाएंगे। पकड़ना मत उनको। उनको तरल रहने देना, उनको ठोस नियम मत बना लेना। क्योंकि समय बदलता, परिस्थिति बदलती, चेतना भिन्न होती। तो तुम बिलकुल रूढ़ की तरह मत चलने लगना, लकीर के फकीर मत हो जाना, कि शास्त्र में ऐसा लिखा है, तो ऐसा ही करेंगे।

शास्त्र संकेत देते हैं, उपदेश नहीं। और वह रहस्य ऐसा है कि उसे ठीक—ठीक पूरा का पूरा बांधा नहीं जा सकता। सिर्फ इशारे किए जा सकते हैं। इशारे का मतलब होता है, समझने की कोशिश करना इशारे को, उसका उपयोग करने की कोशिश करना। लेकिन उसके लकीर के फकीर होकर अंधे अनुयायी मत हो जाना।

कृष्ण कहते हैं कि शास्त्र—विधि से जो रहित हैं.।

और बहुत—से लोग शास्त्र का उपयोग न करना चाहेंगे, क्योंकि वह भी उनके अहंकार के विरोध में है। उनके रहते कोई दूसरा ज्ञानी कैसे हो गया पहले? उनके रहते वेद लिख लिए गए? यह हो ही नहीं सकता। वेद तो वे ही लिख सकते हैं। और अभी वे ज्ञान को उपलब्ध नहीं हुए!

अज्ञानी शास्त्रों को मानने को राजी नहीं होता; इशारे भी लेने को राजी नहीं होता। वह यह ही नहीं मान सकता कि मेरे सिवाय कोई और भी मुझसे पहले ज्ञान को उपलब्ध हो सकता है। वही तो अहंकार की पकड़ है, प्रमाद है। तो वह मनोकल्पित साधनाएं करता है, शास्त्रों की नहीं सुनता।

उनमें संकेत हैं, सावधानियां हैं, हिफाजतें हैं; जो चले हैं, उन्होंने रास्ते के कंटकों के संबंध में बताया है। जंगली जानवरों के हमले का डर है, बीहड़ रास्ते हैं, भटक जाने की संभावना है। स्वात पगडंडियां हैं, जिन पर कोई यात्री भी न मिलेगा, जो तुम्हें बताए कि तुम भूल गए, या ठीक हो, या गलत हो। उस अनजान के संबंध में कुछ सूचनाएं शास्त्रों में संगृहीत हैं। वे बहुमूल्य हैं। उनको समझकर—शास्त्र को पकड़कर नहीं—उनको समझकर तुम्हें अपनी यात्रा पर जाना है।

बुद्ध ने कहा है, हम मार्ग बता सकते हैं, लेकिन तुम्हारे लिए चल तो नहीं सकते। चलना तुम्हें ही होगा; पहुंचना भी तुम्हें होगा। तुम हमारी बात को सुन लेना, पकड़ मत लेना। बात को समझ लेना, फिर अपने ही बोध और अपनी ही साक्षी—चेतना और अपने ही ध्यान से गति करना। अंतिम रूप में तो तुम्हीं निर्णायक रहोगे। लेकिन अगर तुमने हमें सुना है, तो कम से कम तुम उन भूलों से बच जाओगे, जो हमने कीं।

इस बात को ठीक से समझ लो। शास्त्र तुम्हें सत्य तक नहीं पहुंचा सकते, लेकिन बहुत—से असत्यों से बचा सकते हैं। उनका उपयोग नकारात्मक है। वे तुम्हें सत्य तक नहीं पहुंचा सकते, लेकिन सत्य के मार्ग पर बहुत—सी भ्रांतिया जो हो सकती हैं, उनसे तुम्हें बचा सकते हैं। तुम्हारा बहुत—सा भटकाव बच सकता है, अगर तुम उनका उपयोग करना जान लो।

लेकिन तुम्हारी हालत ऐसी है, जैसे मैं देखता हूं कई लोगों को, कार में रखे हुए हैं नक्‍शा, लेकिन बस वह रखा रहता है। उस नक्‍शो का न तो उन्हें उपयोग पता है कि कैसे? क्योंकि नक्‍शो को देखना आना चाहिए। नक्‍शो की भाषा आनी चाहिए।

नक्‍शा तो संकेत है, संकेत लिपि है, उसका कोड है। रास्ता तो मीलों का है, नक्‍शो पर इंचभर का है। नक्‍शो को समझना आना चाहिए, नक्‍शो को सीधा रखकर पढ़ना आना चाहिए, नक्‍शो की संकेत लिपि मालूम होनी चाहिए। और नक्‍शा तो केवल सूचक है, वह कोई फोटोग्राफ थोड़े ही है। उसमें कोई सारी चीजें थोड़े ही आ गई हैं। सारी आ भी नहीं सकतीं। और सारी आ जाएं, तो तुम कार में लेकर कैसे चलोगे! वह तो सिर्फ प्रतीक है। जरा से चिह्न हैं। अगर नक्‍शो का तुम ठीक उपयोग करो, तो एक बात पक्की है कि तुम कम भटकोगे। कई मार्ग, जिन पर तुम जा सकते थे, न जाओगे।

शास्त्र का उपयोग नकारात्मक है, गुरु का उपयोग विधायक है। क्योंकि शास्त्र मुरदा है वह विधायक नहीं हो सकता, वह नकारात्मक है। पर उसका मूल्य है। इतना ही क्या कम है कि सौ भूलें होती हों, निन्यानबे हुईं। उतना समय बचा; उतना जीवन बचा। और कौन जानता है, निन्यानबे भूलें करके तुम इतने थक जाते, हताश हो जाते, कि यात्रा ही छोड़ देते।

शास्त्र बचाता है भूल करने से, गुरु संभालता है सही करने की तरफ। शास्त्र और गुरु का उपयोग ऐसा है, जैसे कभी तुमने कुम्हार को घड़ा बनाते देखा हो। चाक पर चढ़ा देता है घड़े को, एक हाथ भीतर कर लेता है, और एक हाथ घड़े के बाहर कर लेता है। बाहर के हाथ से थपकी देता है, घड़े की दीवार बनाता है। भीतर के हाथ से सम्हालता है भीतर के शून्य को। दोनों हाथ घड़े को बनाने में समर्थ हो जाते हैं। बाहर के हाथ से चोट करता जाता है, भीतर के हाथ से सम्हालता रहता है।

शास्त्र बाहर से सम्हालते हैं, गुरु भीतर से। एक दिन तुम्हारा घड़ा पककर तैयार हो जाता है। जब तक तुम कच्चे हो, तब तक सम्हालने वाले की जरूरत है। जब तक तुम आग से नहीं गुजर गए, तब तक तुम अपने ही बल से चलने की कोशिश करोगे, तो पहुंचना करीब—करीब असंभव है।

मनोकल्पित तप करते हैं।

क्योंकि उनका अहंकार यह नहीं मान सकता कि वे किसी का सहारा लें।

दंभ और अहंकार से युक्त हैं, कामना, आसक्ति, बल और अभिमान से युक्त हैं।

अहंकार लक्षण है तामसी व्यक्ति का। अहंकार लक्षण है राजसी व्यक्ति का भी। अहंकार शेष रहता है सात्विक व्यक्ति में भी। लेकिन तीनों में अहंकार की प्रक्रियाएं अलग हो जाती हैं।

तामसी व्यक्ति में अहंकार होता है सोया हुआ। राजसी व्यक्ति में अहंकार होता है दौड़ता हुआ, गतिमान, गत्यात्मक, डायनैमिक। सात्विक व्यक्ति में अहंकार होता है जागा हुआ, लेकिन होता है। साधु में भी अहंकार होता है, जागा हुआ। अभी मिट नहीं गया है। बड़ा विनम्र हो गया है, सूक्ष्म हो गया है, पारदर्शी हो गया है, आर—पार देख सकते हो, लेकिन अभी परदा मौजूद है।

अहंकार मिटता तो है जब तीनों ही शून्य हो जाते हैं। एक एक को जब उपलब्ध होता है, तभी पूरा जाता है।

तामसी वृत्ति का व्यक्ति अपने ही ढंग सोचता रहता है, उलटे—सीधे काम करता रहता है। न शास्त्र की सुनता, न गुरु की, सिर्फ अहंकार की सुनता है।

तथा जो शरीररूप से स्थित भूत—समुदाय को और अंतःकरण में स्थित मुझ अंतर्यामी को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को आंसुरी स्वभाव वाला जान।

ऐसे लोग कई उलटे—सीधे काम करते हैं। कृष्ण बड़ी अनूठी बात कह रहे हैं। कहते हैं कि न केवल वे शरीर को सताते हैं—उपवास करेंगे, भूखे मरेंगे, शरीर को कसेंगे, जलाएंगे, काटेंगे। क्योंकि अहंकार सदा लड़ना चाहता है, या तो दूसरे से लड़े या खुद से लड़े। बिना लड़े अहंकार बच नहीं सकता।

तो जो लोग दूसरों से नहीं लड़ते। दुनिया में दो तरह के लड़ने वाले लोग हैं। एक, जो बाजार में लड़ रहे हैं दूसरों से, प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा। और एक वे हैं, जो जंगलों में चले गए हैं, आश्रमों में बैठ गए हैं, और लड़ रहे हैं अपने से। मगर लड़ाई जारी है।

कृष्ण कहते हैं कि न केवल ऐसे अहंकारी तामसी व्यक्ति अपने शरीर से लड़ने लगते हैं, अपने शरीर को काटने और मारने लगते हैं, बल्कि मुझ अंतर्यामी को, जो उनके भीतर छिपा हूं मुझको भी कृश करते हैं, मुझे भी सताते हैं।

एक बात ध्यान रखना, सताने से कुछ होगा नहीं, वह हिंसा है। शरीर की सुरक्षा करना और भीतर के अंतर्यामी की भी। सुरक्षा का अर्थ यह नहीं है कि तुम सुख और भोग में डूबे रहना। क्योंकि सुख और भोग में डूबा हुआ भी शरीर को नष्ट करता है और भीतर के अंतर्यामी को सताता है। भोगी भी सताते हैं, एक ढंग से, त्यागी भी सताते हैं, दूसरे ढंग से।

तुम मध्य में रहना, निरति। तुम संतुलन साधना। न तो बहुत भोजन देना, क्योंकि बहुत भोजन से भी शरीर को कष्ट होता है। न भूखा रखना, क्योंकि भूखा रखने से भी कष्ट होता है। न तो अति श्रम करना, क्योंकि अति श्रम से कष्ट होता है। न बिस्तर पर ही पड़े रहना, क्योंकि अति विश्राम भी शरीर को गलाता और नष्ट करता है। तुम सदा मध्य में होना, अति मत करना। तो तुम अपने शरीर और अपने भीतर छिपे अंतर्यामी, दोनों को एक शांत समरसता का मार्ग बता सकोगे।

मुझ अंतर्यामी को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को आंसुरी स्वभाव वाला जान।

वे असुर हैं। तमस से घिरे हैं।

अहंकार तमस का गहनतम रूप है, वह अमावस है अंधेरी रातों में। रजस से भरा हुआ व्यक्ति सप्तमी—अष्टमी का चांद है, आधा अंधेरा, आधा ज्योति। सत्व से भरा व्यक्ति पूर्णिमा की रात है, पूरे प्रकाश से भरा। लेकिन रात है। तीनों के जो बाहर आ गया, उसका सूर्योदय होता है; उसके जीवन में सुबह होती है।

अमावस को बदलो धीरे—धीरे आधी रोशनी, आधी अंधेरी रात में। आधी अंधेरी, आधी रोशनी से भरी रात को धीरे— धीरे बदलो पूर्णिमा की रात में। तब तुम्हें वह मार्ग मिल जाएगा, जो सुबह तक ले आता है।

सुबह बहुत दूर नहीं है, थोड़ी—सी समझ और भीतर का थोड़ा—सा नया समायोजन, बस इतना ही चाहिए।

आज इतना ही।

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गीता दर्शन–(प्रवचन–178) /2016/11/03/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-178/ /2016/11/03/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-178/#respond Thu, 03 Nov 2016 12:50:14 +0000 /?p=6996 भक्‍ति और भगवान—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—17    सूत्र

सत्‍वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो वो यव्छुद्ध: स एव सः।। 3।।

यजन्ते सात्‍विका देवान्यक्षरक्षांति राजसाः।

प्रेतान्धूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना: ।। 4।।

 

है भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरूष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।

उनमें सात्‍विक पुरूष तो देवों को पूजते हैं और राजस परुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य जो तामस मनुष्य है, वे ने और भूतगणों को पूजते हैं।

 

पहले कुछ प्रश्न।

 

पहला प्रश्न : भक्त जब भगवान को मिलता है, तब उसे पुलक और आनंद का अनुभव होता है। क्या भगवान को भी उस क्षण वैसी ही पुलक और आनंद का अनुभव होता है?

 

गवान कोई व्यक्ति नहीं जिसको भक्त जैसी पुलक और आनंद का अनुभव हो सके। भगवान तो पूरा ही अस्तित्व है। इसलिए पुलक और आनंद की घटना तो घटती है, लेकिन वहां कोई अनुभव करने वाला नहीं है। जैसे भक्त के छोटे—से हृदय में आनंद गज जाता है, वैसा कोई हृदय परमात्मा का नहीं है, जहां आनंद गंज जाए। परमात्मा तो पूरा अस्तित्व है, इसलिए पूरा अस्तित्व ही पुलक से भर जाता है। इतना फर्क है। पुलक तो घटेगी ही, क्योंकि भटका हुआ घर लौट आया। दूर गया पास आ गया। खो गया था, वापस मिल गया। अस्तित्व की तरफ जिसकी पीठ थी, उसने मुंह कर लिया। तो आनंद की घटना तो घटेगी ही। लेकिन भगवान कोई व्यक्ति नहीं है, वहां कोई व्यक्ति के भीतर छिपा हुआ हृदय नहीं है। इसलिए जैसा अनुभव भक्त को होगा, वैसा कोई अनुभव करने वाला भगवान में नहीं है। वह तो परम शून्यता है।

पुलक होगी; वह पुलक बादलों में सुनी जाएगी; वह पुलक नदियों में गूंजेगी; वह पुलक फूलों से खिलेगी; वह पुलक चांद—तारों में ज्योति देगी। लेकिन कोई हृदय नहीं है, जो अनुभव करेगा। या तुम ऐसा कहो—वह भी कहना ठीक है—कि ह्रदय ही हृदय है; सारा अस्तित्व उसका हृदय है। सारा अस्तित्व एक सिहरन से, एक आनंद की मधुर घड़ी से भर जाएगा।

इसे भक्त ही जान पाएगा; तुम न पहचान पाओगे। तुम्हें भक्त का आनंद तो दिखाई पड़ेगा, क्योंकि भक्त तुम्हारे जैसा ही व्यक्ति है। उससे तुम्हारा ‘थोड़ा तालमेल है। वह कितना ही भिन्न हो गया हो, उसकी यात्रा बदल गई हो, उसने परमात्मा की तरफ मुंह कर लिया हो, तुमने पीठ कर रखी है, तो भी वह तुम्हारे जैसा है, व्यक्ति है। उसके हृदय में कुछ घटेगा; आंसू बहेंगे, तो तुम आंसुओ को पहचान सकते हो। वह नाचने लगेगा, तो तुम नाच को समझ सकते हो। उसके चेहरे पर अहोभाव की छाया पड़ेगी, तो पूरा न समझ सको, तो भी थोड़ा तो समझ ही लोगे। वह भाषा तुमसे परिचित है। लेकिन परमात्मा में जो पुलक घट रही है, वह तुम न देख पाओगे; वह तुम न समझ पाओगे।

इसलिए तो बहुत—सी कथाएं हैं, जो कथाएं जैसी मालूम होने लगी है; वे सत्य घटनाएं है। कि बुद्ध को परम ज्ञान हुआ और वृक्षों में फूल खिल गए, बिना ऋतु के। ये फूल दूसरों ने देखे हों, यह संदिग्ध है। ये फूल बुद्ध ने ही देखे होंगे। ये फूल साधारण फूल न थे, जो रोज ऋतु में खिलते हैं और गिरते हैं। ये तो वृक्ष के अंतर्भाव के फूल थे। इन्हें तुम बाजार में न बेच सकते थे, इन्हें तुम तोड़ भी न सकते थे, इन्हें तुम देख भी न सकते थे। ये तो अदृश्य के फूल थे, जो बुद्ध को दिखाई पड़े होंगे।

कहते हैं, मोहम्मद को जब ज्ञान हुआ, तो रेगिस्तान की तपती दुपहरियों में बादल उन्हें छाया देने लगे। मगर ये बादल किसी और को दिखाई न पड़े होंगे। ये बादल जो छतरियां बन गए और मोहम्मद के ऊपर मंडराने लगे, यह मोहम्मद ने ही खबर की होगी औरों को। तुम्हारी आंखें इतनी सूक्ष्म घटना को न देख पाएंगी। वस्तुत: कोई बादल बने भी, यह भी जरूरी नहीं है। लेकिन छाया मोहम्मद को मिलने लगी, यह पक्का है। तपती दुपहरी में भी सूरज जलाता नहीं, भयंकर रेगिस्तान में भी कंठ में प्यास नहीं जगती, ऐसी शीतलता मोहम्मद को मिलने लगी। एक संवाद शुरू हो गया अस्तित्व के साथ।

निश्चित ही, जब तुम प्यार से भरोगे अस्तित्व के प्रति, तो अस्तित्व भी अपने प्यार को तुम्हारी तरफ लुटाका। अस्तित्व जड़ नहीं है, यही तो मतलब है कहने का कि अस्तित्व परमात्मा है। अगर जड़ होता, तो तुम रोओ, तो पत्थर रोएगा नहीं; उसमें कोई संवेदना नहीं है। तुम हंसो, तो पत्थर हंसेगा नहीं। पत्थर से कोई प्रत्युत्तर न मिलेगा। यही तो मतलब है पत्थर होने का।

तो हम कभी कहते हैं कि उस आदमी का हृदय पाषाण है। उसका क्या मतलब होता है? इतना ही मतलब होता है। कहीं पाषाण के हृदय होते हैं! इतना ही मतलब होता है कि उसमें से प्रतिसवेदन नहीं उठता। वह तुम्हें दुखी देखकर दुखी न होगा। तुम्हारी गीली आंखें उसके हृदय को गीला न करेंगी। तुम्हारा नाच उसे छुएगा नहीं। तुम्हारे भाव तुम्हारे ही रहेंगे; वह कोई प्रत्युत्तर न देगा। उसका हृदय पाषाण है।

इस अस्तित्व को परमात्मा कहने का अर्थ है कि यहां पाषाण कुछ भी नहीं है। पाषाण झूठा शब्द है। यहां पत्थर भी आंदोलित होते हैं। क्योंकि सभी तरफ सचेतन, सभी तरफ चैतन्य का विस्तार है।

तो प्रतिसवेदना होगी। लेकिन इतनी सूक्ष्म है वह घटना कि भक्त ही जान पाएगा कि भगवान को क्या हो रहा है, साधारणजन न पहचान पाएंगे। क्योंकि वे करीब—करीब अंधे हैं, बहरे हैं। न तो उनके पास कान हैं उस अमृत—नाद को सुनने के, न उनके पास आंखें हैं उस अरूप को देखने की।

इसलिए तुम्हें मीरा नाचती हुई दिखाई पड़ेगी और तुम्हें मीरा थोड़ी पागल भी मालूम पड़ेगी। क्योंकि जिसके साथ वह नाच रही है, वह तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता। मीरा तो अपने कृष्ण के साथ नाच रही है। वह कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं है। हवाओं के झोंके में भी वही कृष्ण हैं; हवा छूती है मीरा को, तो कृष्ण के हाथ ही छूते हैं। और मैं तुमसे कहता हूं कि निश्चित जब तुम्हारे पास मीरा का हृदय होगा, तो हवा तुम्हें और ढंग से छुएगी। छूने—छूने में कितना फर्क है!

राह से तुम चलते हो और एक आदमी से शरीर छू जाता है; फिर तुम्हारी प्रेयसी तुम्हें छूती है या तुम्हारी मां तुम्हारे सिर को छूती है या तुम अपने बेटे को छूते हो। दोनों छूना एक—से हैं। अगर हम शरीरशास्त्री से पूछें कि जांच करके बताओ कि दोनों तरह के स्पर्श में कोई फर्क है?

वह कोई फर्क न बता पाएगा। वह कहेगा, दोनों स्थितियों में चमड़ी चमड़ी को छूती है। थोड़े—से ताप का आदान—प्रदान होता है। गरमी एक शरीर से दूसरे शरीर में थोड़ी—सी जाती है। बस, इतना ही। मां छुएगी, तो भी यही होता है। राह पर चलता राहगीर छू लेगा, तो भी इतना ही होता है। कोई प्रेम से थपथपाएगा, तो भी यही होता है। कोई क्रोध से मारेगा, तो भी यही होता है। जहां तक शरीरशास्त्री की पकड़ है, दोनों एक—सी घटनाएं हैं।

हवा का झोंका तुम्हें भी छूता है, मुझे भी छूता है, मगर तुम्हें ऐसे ही छूता है जैसे राह पर कोई अजनबी से धक्का लग गया। मीरा को भी छूता है, लेकिन वह प्रेमी का हाथ है। उस झोंके में कुछ आया है। उस झोंके में सिर्फ स्पर्श नहीं है, स्पर्श के पीछे छिपा हुआ राज है, एक भाव—दशा है।

वृक्षों में फूल तुम्हें भी खिलते हैं, तुम भी देख लेते हो उनके रंग—रूप को। मीरा भी देखती है, लेकिन वहां वृक्षों में उसका प्रेमी ही खिल रहा है। आषाढ़ आता है, मोर नाचते हैं। तुम भी देख लेते हो, पर मीरा के लिए उसका कृष्ण ही नाचता है। असल में मीरा के लिए सारा अस्तित्व कृष्ण—रूप हो गया.। इसलिए अब जो भी होता है, वह कृष्ण में ही हो रहा है। और पूरी भाषा बदल जाती है, पूरे अर्थ बदल जाते हैं।

अगर मनोवैज्ञानिकों को कहो कि मीरा के पदों का विश्लेषण करो, तो तुम बहुत धक्का खाओगे। क्योंकि मनोवैज्ञानिक जो बातें कहेंगे, उनका तुम्हें भरोसा भी न आएगा। चाहे भरोसा न आए, लेकिन तुम्हारा भी भीतर भरोसा वही है।

जब मीरा कृष्ण की बात कहती है और कहती है, सेज सजा ली है, फूल बिछा दिए हैं, अब तुम आओ। तो मनोवैज्ञानिक कहेगा, यह तो कुछ काम—दमन मालूम पड़ता है; यह तो सेक्स सप्रेशन है। यह तो कृष्ण में पति को ही खोज रही है। ऐसा लगता है, राणा से मन नहीं भर पाया। ऐसा लगता है, कुछ बात चूक गई; काम अतृप्त रह गया। वह जो शरीर की वासना थी, वह प्रकट नहीं हो पाई, वह दब गई। और अब वही शरीर की वासना नए भ्रम बन रही है। तो कृष्ण को पति मान रही है, सेज सजा रही है।

यह सेज का सजाना और बुलाना, यह कामवासना मालूम पड़ेगी मनसविद को। वह तो मनोवैज्ञानिकों ने अभी मीरा पर कृपा नहीं की है। उनको मीरा का ज्यादा पता नहीं है, क्योंकि मनोविज्ञान का जन्म पश्चिम में हो रहा है। यहां भी मनोवैज्ञानिक हैं, लेकिन वे अधकचरे हैं और वे, पश्चिम में जो होता है, उनके पीछे चलते हैं। वे सीधे कुछ करते नहीं।

लेकिन उन्होंने जीसस की काफी खोज—खबर ली है। और मीरा जैसी स्त्रियां पश्चिम में हुई हैं, उनकी उन्होंने काफी खोज—खबर ली है। संत थेरेसा हुई है पश्चिम में। मनोवैज्ञानिकों ने उसका विश्लेषण किया है। वह ठीक मीरा है पश्चिम की। और उसके प्रतीक तो सब कामवासना के हैं। करोगे भी क्या! मनुष्य के पास जितने भी मधुर शब्द हैं, सभी कामवासना के हैं। जब वह परम मधुरिमा घटती है, तो कौन से शब्दों का उपयोग करोगे?

दो ही तरह की भाषाएं हैं तुम्हारे पास। या तो बाजार की भाषा है, वह बहुत ही क्षुद्र है। उस भाषा में तो परमात्मा को पकड़ा नहीं जा सकता। और या फिर दो प्रेमियों की स्वात की भाषा है। वह जरा कम क्षुद्र है, लेकिन है तो क्षुद्र ही, क्योंकि वे प्रेमी भी बाजार के ही रहने वाले लोग हैं।

और जब मीरा जैसी घटना घटती है या थेरेसा जैसी, तो वह क्या करे? भाषा कहां से लाए? तुम्हारे बाजार की भाषा का उपयोग करे, तो बिलकुल ही व्यर्थ मालूम होती है। क्या कहे कि परमात्मा के झोंके में लाखों रुपये आ गए! क्या कहे कि पूरा रिजर्व बैंक उलटा दिया परमात्मा के झोंके में!

वह भी भद्दा लगेगा; वह भी कुछ सार्थक न मालूम पड़ेगा। तुम उसे भी न पकड़ पाओगे। ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि इनकम टैक्स आफिसर मीरा के पीछे पड़ जाएंगे कि कहां हैं? वे करोड़ों रुपये कहां हैं?

दूसरी भाषा प्रेम की है, जो प्रेमी एक—दूसरे से बोलते हैं। वह बड़ी निजी है। लेकिन उसमें कामवासना की धुन पकड़ में आती है। तड़पते हैं प्रेमी, राह देखते हैं, मिलन होता है, अहोभाव से भरते हैं। वही भाषा समझ में आती है। मीरा उसका उपयोग करती है, थेरेसा ने भी उसका उपयोग किया है।

पश्चिम के मनोवैज्ञानिकों ने बड़ी छीछालेदर की है थेरेसा की। वही वे मीरा के साथ करेंगे। उनको मीरा का पता नहीं है। वे कहते हैं, यह तो कामवासना है। वे तो हर चीज में कामवासना खोज लेते हैं, क्योंकि दूसरी तो किसी चीज का पता ही नहीं है।

यह सेज सजी है, पिया घर नहीं आए। ये फूल बिछा रखे हैं, मैं तुम्हारी राह देखती हूं। तुम आओ, सुहागरात के लिए तैयारी है। अब यह सारी भाषा तो प्रेम की है। या तो हम कहेंगे कि मीरा का मन कामवासना से ग्रस्त है, इसलिए परमात्मा के नाम पर वही वासना निकल रही है। या हम समझेंगे, मीरा पागल है। क्योंकि हम मीरा की बिछी हुई सेज देख सकते हैं, पड़े हुए फूल देख सकते हैं, मीरा बैठकर रोती है, किसी की प्रतीक्षा करती है, यह भी देख सकते हैं। लेकिन वह कभी आता है? कभी आया है? कभी आएगा? उसकी हम द्वार पर दस्तक भी नहीं सुनते।

मीरा को फिर हम कभी रोते भी देखते हैं कि उसका विरह हो गया है और कभी नाचते भी देखते हैं कि मिलन हो गया। न तो हमें विरह के क्षण में कोई उसके घर से जाता दिखाई पड़ता, और न मिलन के क्षण में कोई घर आता दिखाई पड़ता।

मीरा पागल है। लोग खूब हंसे होंगे मीरा पर। इसलिए तो मीरा कहती है, सब लोक—लाज खोई। इज्जत सब चली गई। राणा ने जो बार—बार मीरा को जहर के प्याले भेजे, वह इसीलिए कि उसकी भी इज्जत इसके पीछे डूबती थी।

यह किस प्रेमी की बात कर रही है? यह किस कृष्ण के पीछे दीवानी है? लोग इसको तो पागल समझते या रुग्ण समझते या मनोविकार से ग्रस्त समझते। पति भी मुश्किल में पड़ा हुआ था। हमने जहर तो आते देखा, हमने मीरा को जहर पीते भी देखा, लेकिन मीरा पर हमने उस जहर का असर होते नहीं देखा। तब जरा हम बेचैन हुए। यह तो अनूठी बात है। यह कैसे असर न हुआ? अगर तुम मनसविद से पूछोगे, उसके पास इसके लिए भी व्याख्या है। वह कहता है, यह भी आत्म—सम्मोहन है। अगर मीरा को पक्का भरोसा है कि यह जहर नहीं है या परमात्मा की कृपा से यह अमृत हो जाएगा, तो इस भरोसे के कारण ही जहर शरीर में प्रवेश नहीं कर पाता। मनोवैज्ञानिक उसके लिए भी कुछ न कुछ तो व्याख्या खोजेगा!

हम परमात्मा से बचने को इस तरह आतुर हैं कि हम सब मान सकते हैं, व्यर्थ से व्यर्थ बात मान सकते हैं, परमात्मा को नहीं मान सकते।

मनोवैज्ञानिक कहता है कि यह तो मन का इतना प्रगाढ़ रूप से भाव है कि यह जहर नहीं है, इसलिए शरीर में जहर प्रवेश नहीं करता, मन के कारण ही। कोई कृष्ण थोड़े ही जहर को अमृत में बदल रहे हैं!

जहर भी अमृत में बदल जाए, तो भी हम अंधे हैं; तो भी हम कोई व्याख्या अपनी ही खोज लेंगे। इतनी बड़ी घटना भी हमें तृप्त नहीं कर पाएगी। उसका कारण है, हमें वह कृष्ण दिखाई नहीं पड़ता। और अनदेखे को हम कैसे मान लें? इतने मूढ़ हम कैसे हो जाएं?

घटना तो घटती है। जब भक्त भगवान को मिलता है, तो जितनी पुलक भक्त में घटती है, अगर तुम मुझ से ठीक पूछो, तो उससे अनंत गुना पुलक भगवान में घटती है। घटनी ही चाहिए; क्योंकि अनंत गुना है भगवान भक्त से। भक्त तो एक बूंद है, भगवान तो एक सागर है। अगर बूंद इतनी नाचती है, तो तुम सोचो, सागर कितना नाचता होगा!

लेकिन वह कोई व्यक्ति नहीं है। यह सारी समष्टि वही है। इसलिए वह सब रूपों में नाचता है, सब रूपों में हंसता है, सब रूपों में पुलकित होता है। हरियाली में और हरा हो जाता है। रंग में और रंगीन हो जाता है। इंद्रधनुष में और गहरा हो जाता है। लेकिन वह दिखाई पड़ता है उसी को, जिसके हृदय में अहोभाव भरा है, जो नाच रहा है आज। उसे परमात्मा साथ ही नाचता हुआ दिखाई पड़ता है।

यही तो अर्थ है कि सोलह हजार गोपियां नाचती हैं और प्रत्येक गोपी को लगता है कृष्ण उसके साथ नाच रहे हैं। कृष्ण अगर व्यक्ति हों, तो एक ही गोपी के साथ नाच सकते। कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं हैं। कृष्ण तो एक तत्व का नाम है। वह तत्व सर्वव्यापी है। जब तुम नाचते हो और तुम नाचने की क्षमता जुटा लेते हो, तब तुम अचानक पाते हो कि सारा अस्तित्व तुम्हारे साथ नाच रहा है।

फिर अस्तित्व बहुत बड़ा है, वह दूसरों के साथ भी नाच रहा है। इसलिए भक्त को कोई ईर्ष्या पैदा नहीं होती। अन्यथा तुम सोच सकते हो कि सोलह हजार स्त्रियों ने क्या गति कर दी होती कृष्ण की! अगर यह बात साधारण संसार की बात हो, जैसा कि इतिहासविद मानते हैं.।

और यह कठिन नहीं है, सोलह हजार स्त्रियां हो सकती हैं; उस जमाने में हुआ करती थीं। अभी निजाम हैदराबाद मरा, तब उसकी पांच सौ स्त्रियां थीं। बीसवीं सदी में अगर पांच सौ हो सकती हैं, तो सोलह हजार कोई ज्यादा तो नहीं हैं। सिर्फ बत्तीस गुनी। कोई बहुत बड़ा गणित नहीं है। आज से पाच हजार साल पहले सोलह हजार स्त्रियां हो सकती थीं। सम्राटों के पास होती थीं। जितनी सुंदर स्त्रियां होतीं, वे सब इकट्ठी कर लेते पूरे राज्य से। यह कठिन नहीं है।

लेकिन सोलह हजार स्त्रियां! अगर तुम्हें एक भी स्त्री का अनुभव है, तो तुम समझ सकते हो। कृष्ण की हत्या कर दी होती, अगर कृष्ण कोई व्यक्ति हैं। सोलह हजार स्त्रियां कितनी भयंकर ईर्ष्या से न भर गई होतीं। और कृष्ण एक के साथ नाच सकते, कोई एक राधा हो जाती और बाकी पिछड़ जातीं। उपद्रव खड़ा होता। लेकिन कोई ईर्ष्या पैदा न हुई।

यह बड़ी मीठी कथा है कि गोपियों में कोई ईर्ष्या पैदा न हुई। उनका विरह भी साथ—साथ था, उनका मिलन भी साथ—साथ था। क्योंकि कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं हैं, तत्व की बात है। सारा अस्तित्व है, जहां भी तुम नाचो, अस्तित्व तुम्हें घेरे हुए है। कृष्ण के हाथ तुम्हारे गले में पड़े हैं। आलिंगन है—हवा में, धूप में।

सब तरफ से कृष्ण तुम्हें घेरे हुए हैं। वे तुम्हारे साथ नाचने को तैयार हैं। बस, तुम्हारे पैरों के उठने की कमी है। तुम जरा नाच सीख लो, परमात्मा नाचने को राजी है। तुम जरा हंसना सीख लो, परमात्मा हंसने को राजी है। तुम रोओगे, तो अकेले रोओगे; तुम हंसोगे, तो सारा अस्तित्व तुम्हारे साथ हंसेगा। क्योंकि परमात्मा रो नहीं सकता। इसे थोड़ा समझ लो।

परमात्मा दुखी नहीं हो सकता। इसलिए जब मैं कहता हूं कि जब भक्त आनंदित होता है, तो पूरा अस्तित्व आनंदित होता है। लेकिन तुम यह मत सोचना कि जब भक्त रोता है, तो पूरा अस्तित्व रोता है। पूर्ण रोना जानता ही नहीं। पूर्ण की कोई पहचान ही रोने से, रुदन से, उदासी से नहीं है। पूर्ण का कोई संबंध ही दुख—पीड़ा से नहीं है। कहावत है कि जब तुम हंसते हो, तब सारा अस्तित्व तुम्हारे साथ हंसता है। जब तुम रोते हो, तब तुम अकेले रोते हो। रोना निजी है, व्यक्तिगत है।

इसलिए तो जब तुम रोना चाहते हो, तो तुम अकेले होना चाहते। हो। द्वार—दरवाजा बंद कर लेते हो। तुम नहीं चाहते कोई आए। तुम। नहीं चाहते कि पत्नी भी भीतर आए। तुम चाहते हो, अकेला छोड़ दो, बिलकुल अकेला छोड़ दो। क्योंकि रोना निजी घटना है।

लेकिन जब तुम हंसते हो, तब तुम पास—पड़ोस के लोगों को बुला लेते हो। जब तुम हंसते हो, तब तुम निमंत्रण भेज देते हो। जब तुम आनंद में होते हो, तब तुम भोज का आयोजन कर लेते हो, कि आएं मित्र, पड़ोसी, संबंधी, हम सब साथ ही नाचे, हम सब साथ ही प्रसन्न हों।

प्रसन्नता निजी नहीं है, फैलती है, विस्तीर्ण होती है। दुख निजी है, सिकुड़ता है, सड्ता है। तुम अकेले ही दुखी रह जाते हो। और अचानक तुम पाते हो कि सारे जगत से तुम्हारा तालमेल टूट गया। जितने तुम ज्यादा दुखी हो, उतना ही परमात्मा से दूर। या उलटा चाहो तो उलटा कहो, जितने तुम परमात्मा से दूर, उतने ज्यादा दुखी। वे दोनों एक ही बातें हैं। जितने तुम परमात्मा के पास, उतने तुम सुखी। दूसरी बात भी सही है, जितने तुम सुखी, उतने तुम परमात्मा के पास।

इसलिए मेरी शिक्षा आनंद की है। मैं तुम्हें उदास नहीं बनाना चाहता कि तुम आंखें बंद करके ध्यान लगाकर उदास होकर, मुरदा होकर बैठ जाना लंबे चेहरे करके; कि तुम कोई बहुत बड़ा काम कर रहे हो, कि तुम जैसे परमात्मा पर कोई अनुग्रह कर रहे हो, कि तुम्हारी बड़ी कृपा है कि घंटे भर तुम चेहरा बनाकर, हाथ में माला लेकर और पत्थर की तरह बैठे रहते हो। नहीं, पत्थर बहुत हैं। तुम्हारे और पत्थर होने की जरूरत नहीं है। तुम नाचो।

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, ये आपके ध्यान कैसे हैं? क्योंकि हम तो यही सोचते थे कि आंख बंद करके पद्यासन जमाकर और शांत होकर बैठ जाना है। नाचना! संगीत! यह ध्यान कैसा?

मैं उनसे कहता हूं कि तुमने कभी परमात्मा को ऐसा बैठा देखा है उदास? चारों तरफ देखो, पक्षी गीत गा रहे हैं, हवा नाच रही है, वृक्षों की पुलक का क्या कहना! समारंभ चल रहा है, उत्सव चल रहा है। तुम इसके भागीदार होना चाहते हो? नाचो! नाचो कि मोर फीके पड़ जाएं। गाओ कि पक्षी चुप होकर सुनने लगें। पुलकित हो उठो कि हवाएं झेंप जाएं। तभी तुम परमात्मा के निकट आओगे। जो आनंदित है, वह निकट आ जाता है; जो निकट आ जाता, वह महा आनंद से भर जाता। जैसे—जैसे तुम निकट आते हो, वैसे—वैसे तुम पाते हो कि यह उत्सव तुम्हारा नहीं है, यह उत्सव तो सब का है।

धर्म उत्सव है। और मंदिर दुष्टों के हाथ में पड़ गए हैं; वे उदास लोगों के हाथ में पड़ गए हैं। कुछ कारण हैं।

उदास लोग आक्रामक हो जाते हैं। और आक्रामक लोग बकवासी हो जाते हैं। आक्रामक लोग दूसरों पर कब्जा करने लगते हैं। आक्रामक लोग दूसरों को रास्ता बताने लगते हैं। जो उदास हैं, वे दूसरों को उदास करने में रस लेने लगते हैं।

लेकिन महावीर उदास नहीं हैं, न बुद्ध उदास हैं। कृष्ण तो बिलकुल ही नहीं; उनके होंठों पर बांसुरी रखी है। लेकिन मैं तुमसे कहता हूं बुद्ध के होंठों पर भी बांसुरी रखी है। अदृश्य है, तुम्हें दिखाई नहीं पड़ती। मैंने देखी है, इसलिए कहता हूं।

जब भी कोई बुद्ध हुआ है, होंठ पर बांसुरी जरूर रही है, दिखाई पड़े, न दिखाई पड़े। कृष्ण की बांसुरी दिखाई पड़ती है; बुद्ध की बांसुरी दिखाई नहीं पड़ती। लेकिन उस बोधि—वृक्ष के नीचे भी वेणु बज रही है, गीत उठ रहा है। बुद्ध को तुमने शांत बैठे देखा है। वह तुम्हारी भांति है। तुम अगर गौर से देखते, तो तुम उस भीतर के नाच को देख लेते। जब भी कोई परमात्मा को पाया है, नाचा है। और जब भी कोई नाचा है, तो परमात्मा तो नाच ही रहा है, वह तत्‍क्षण तुम्हारे साथ हो जाता है; उसकी गलबहियां तुम्हारे कंधों पर पड़ जाती हैं।

लेकिन परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है, इसे खयाल रखना। परमात्मा यानी समष्टि।

 

दूसरा प्रश्न :

 

गुरु शिष्य की निरंतर सहायता करता रहता है, पर वह कई मौकों पर बार —बार पूछने पर भी चुप रह जाता है। ऐसा क्यों कर घटित होता है?

 

भी जरूरी होता है कि चुप होने से ही सहायता की जा सकती है। कभी बोलकर सहायता की जा सकती है। कभी बोलकर नुकसान होगा। कभी चुप रहने में ही सहायता पहुंचेगी। कभी संदेश शब्दों में दिया जा सकता है, और कभी संदेश शब्दों में दिया नहीं जा सकता।

फिर कभी तुम तैयार होते हो, जो तुमने पूछा है, उसके लिए। और कभी तुम तैयार नहीं होते, और तुमने असमय में पूछ लिया होता है। और असमय में कुछ भी नहीं दिया जा सकता।

तुम्हें पता न हो, गुरु को पता होता है कि तुम जो मांग रहे हो, अभी उसके लेने के हकदार नहीं हो। अभी देना व्यर्थ होगा। अभी हीरे—मोती तुम्हें दे दिए जाएंगे, तुम कंकड़—पत्थरों में मिला लोगे। अभी तुम्हें हीरे—मोती का बोध नहीं है, अभी पारखी पैदा नहीं हुआ।

कभी इसलिए गुरु चुप रह जाता है कि अभी तुम तैयार नहीं हो। तुमने असमय में प्रश्न पूछा। और तुम्हारी जिद्द हो जाती है कि तुम उस प्रश्न में अटक जाते हो, तुम बार—बार पूछते हो। तुम लाख बार पूछो, तो भी असमय में उत्तर नहीं दिया जा सकता। तुम्हें पता न हो समय का, तुम्हें पता न हो परिपक्वता का, गुरु को तो पता है। वह उसी दिन उत्तर देगा, जिस दिन तुम तैयार हो जाओगे। तुम्हारे लाख पूछने का सवाल नहीं है। तुम न भी पूछो, जिस दिन तुम तैयार होगे, उत्तर दिया जाएगा। तुमने कभी न भी पूछा हो, तो भी।

तुम्हारी तैयारी पर उत्तर निर्भर करेगा, तुम्हारी जिज्ञासा पर निर्भर नहीं है बात। और तुम्हारी जिज्ञासा और तुम्हारी तैयारी में अक्सर तालमेल नहीं होता। तुम पूछते आकाश की हो, तुम खड़े होते जमीन पर हो। तुम पूछते प्रेम की हो, चित्त कामवासना से भरा होता है। अगर कुछ भी कहा जाएगा, तो तुम कामवासना के अर्थों में ही समझोगे। तुम पूछते परमात्मा की हो, आकांक्षा पद—प्रतिष्ठा की बनी होती है। परमात्मा भी तुम्हारे लिए एक तरह की पद—प्रतिष्ठा है। परम पद होगा, लेकिन है पद ही। परम संपदा होगी, लेकिन है संपदा ही।

जरूरी नहीं है कि तुम जब पूछो, तब तुम तैयार हो। गुरु उत्तर देता है तुम्हारी तैयारी से। इसलिए बहुत बार चुप रह जाएगा। चुप रह जाने में उसकी अनुकंपा है। क्योंकि गैर—समय में दिया गया उत्तर घातक हो जाता है। तुम समझोगे कि तुमने उत्तर पा लिया। और उत्तर तुम्हें मिला नहीं, क्योंकि अभी तो प्रश्न ही पैदा न हुआ था। तुम इस उत्तर को कंठस्थ कर लोगे। तुम इस उत्तर को दूसरों को भी देने लगोगे।

तुम्हें खुद भी कुछ पता नहीं है। तुम्हारी प्यास ही अभी न थी और पानी दे दिया गया। तुम उसे पीओगे कैसे? प्यास होगी, तो पीओगे, कंठ सूखेगा, तो पीओगे। और यह पानी तुम्हें मिल गया, तुम करोगे क्या? तुम दूसरों के गले में जबरदस्ती उतारोगे। तुम्हें ज्ञान मिल जाए असमय में, तो तुम पंडित हो जाओगे, ज्ञानी नहीं।

तो गुरु बहुत बार चुप रह जाता है। वह तुम से यह कह रहा है कि रुको, जल्दी मत करो। तुम लाख बार पूछो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि सवाल तुम्हारा है, तुम्हारे पूछने का नहीं है। गुरु तुम्हें देखता है, तुम क्या पूछते हो, यह गौण है। तुम न भी पूछो, तो भी वह तुम्हें देखता रहता है। तुम्हें जब जिस चीज की जरूरत है, वह कहेगा।। फिर बहुत बार तुम तैयार भी होते हो, लेकिन तुम्हारा प्रश्न ही! ऐसा होता है, जिसका उत्तर शब्दों में नहीं हो सकता, तब वह चुप रह जाता है। चुप रह जाने का मतलब यह नहीं है कि उसने उत्तर नहीं दिया; चुप रह जाने का मतलब है कि उसने चुप रहकर उत्तर दिया। चुप रहना एक उत्तर है।

एक नए नाटककार ने बर्नार्ड शा को अपना नाटक देखने आमंत्रित किया। बर्नार्ड शा गया। पर शुरू से उसने कोई एक—दो मिनट तो देखा और आंख बंद करके वह घर्राटे लेने लगा। वह नाटककार बगल में बैठा बड़ा पीड़ित हुआ कि यह आदमी आया न आया बराबर। और इससे तो बेहतर न आता। यह भी कोई बात हुई! यह कोई शिष्टाचार हुआ! लेकिन के बर्नार्ड शा को उठाना भी ठीक नहीं। और वह आदमी जरा तेज और नाराज प्रकृति का था। इसलिए वह नाटककार नया—नया था, कुछ बोला भी नहीं कि ठीक है, अब जो हुआ; आया यही बहुत।

पूरा नाटक हो जाने पर बर्नार्ड शा ने आंख खोली, उठकर चलने लगा। उस नाटककार ने पूछा, और आपका मंतव्य? आपने कुछ कहा नहीं! बर्नार्ड शा को चुप देखकर उस नाटककार ने कहा, मंतव्य आप देंगे भी कैसे? आप पूरे वक्त सोए रहे। बर्नार्ड शा ने कहा, सोए रहना मंतव्य है। कूड़ा—कर्कट है, सब बेकार है। सोए रहना मंतव्य है। मैंने कह दिया, जो कहना था। जान होती, तो मैं जागा रहता। जान ही न थी। मुरदा नाटक। घर्राटे ही ज्यादा बेहतर थे। मंतव्य मैंने दे दिया।

कभी सोना भी मंतव्य होता है, कभी चुप रहना उत्तर होता है। गुरु जो भी करे! बोले, तो गौर से सुनना। न बोले, तो और भी गौर से सुनना। क्योंकि बोलने को तो तुम कम गौर से सुनोगे, तो भी सुन लोगे, न बोलने को तो बहुत गौर से सुनोगे, तो ही सुन पाओगे। और जब तुम एक ही प्रश्न बहुत बार पूछते चले जाओ और गुरु हर बार चुप रह जाता हो, तब तो बात बहुत साफ है कि वह एक ही उत्तर बार—बार दोहरा रहा है और तुम बार—बार चूकते जा रहे हो।

गुरु के पास होना एक कला है, जो खोती गई है। बड़ी बारीक कला है। पूरब के मुल्कों ने उसे विकसित की थी, वह धीरे—धीरे क्षीण हो गई और खो गई। वह सूक्ष्मतम संवाद है दो व्यक्तियों के बीच। और शिष्य को जिद्द नहीं होनी चाहिए के मेरे प्रश्न का उत्तर मिले। उसे तो जो मिले उसमें अनुकंपा माननी चाहिए, तो ही उसकी पात्रता बढ़ेगी।

पश्चिम से लोग आते हैं, उनको गुरु—शिष्य के संबंध का कोई भी बोध नहीं है, इसलिए बड़ी अड़चन खड़ी होती है। एक लेखिका पश्चिम से आई। बड़ी लेखिका है, कई किताबें लिखी हैं, सो उपद्रव भी बहुत है उसके मन में, विचारों का बड़ा जाल है। उसने कुछ पूछा। मैं टाल गया। वह बड़ी नाराज वापस लौटी। वह कहकर गई संन्यासियों को कि मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं मिला। मैं नाराज जा रही हूं। मैं बड़ी आतुरता से प्रश्न का उत्तर पाने आई थी।

थोड़ा समझने की कोशिश करो। जब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता, तो तुम्हें चोट किस कारण लगती है? उत्तर नहीं मिला, इसलिए; या तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं मिला, इसलिए।

और बड़े मजे की बात है कि दस दिन वह यहां थी; दस दिन एक भी दिन ऐसा नहीं था, जिस दिन मैंने उसके प्रश्न का उत्तर न दिया हो। एक भी दिन ऐसा नहीं था, जिस दिन उसके प्रश्न का उत्तर न दिया हो। सीधा नहीं दिया। वह चाहती थी कि मैं उसके प्रश्न का उत्तर सीधा दूं ताकि वह पकड़ पाए कि उसके प्रश्न का उत्तर मिला। प्रश्न मूल्यवान नहीं है, अहंकार मूल्यवान है। दस दिन मैंने निरंतर उसके प्रश्न का उत्तर दिया है, बहुत बहानों से दिया है। लेकिन वह उसकी पकड़ में न आया। प्रश्न उसका था ही नहीं मूल्यवान। प्रश्न अगर मूल्यवान होता, अगर प्यास लगी होती, तो रोज जो मैं पानी बहाए जा रहा था, उसने पी लिया होता।

लेकिन नहीं, प्रश्न तो मूल्यवान था ही नहीं। प्यास तो लगी ही न थी। प्रश्न तो एक बौद्धिक खुजलाहट की तरह था; कोई प्यास नहीं थी। एक खुजलाहट थी दिमाग में। और चाहती थी कि सीधा, जब वह पूछे, जिस भाषा में पूछे, उसको मैं उत्तर दूं। गहरे में आकांक्षा थी, उसको उत्तर दूं र उसके अहंकार को ध्यान दूं र उसका अहंकार तृप्त हो।

वह भूल मैं नहीं कर सकता। यहां मैं अहंकार तोड्ने को बैठा हूं। यहां अहंकार सजाने और संवारने का काम नहीं चल रहा है। यहां तो जो मिटने को राजी हैं, उनके ही टिकने की सुविधा है। यहां जो किसी तरह अपने को बचा रहे हैं, वर्षा होती रहेगी और वे प्यासे लौट जाएंगे।

शिष्य का अर्थ ही है, जिसने गुरु के हाथों में छोड दिया। वह जवाब दे, तो ठीक, वह न दे, तो और भी ठीक। वह बुलाए, उसकी कृपा; वह हटाए, और बड़ी कृपा। गुरु तभी गुरु है, जब शिष्य ने इतना छोड दिया हो कि उसकी आज्ञा सब हो जाए। वह कह दे, चुप रहो जिंदगीभर, तो वह चुप रह जाए; फिर पूछे ही न। इसलिए श्रद्धा मूल्यवान है।

लेकिन जैसा कि कृष्ण ने कहा, श्रद्धा तीन तरह की होगी। इस संबध में भी समझ लेना जरूरी है।

जब तुम पूछते हो, तब भी तुम्हारी श्रद्धा तीन तरह की होती है। एक तरह का पूछने वाला आता है, उसकी श्रद्धा तामसी है। तामसी श्रद्धा का अर्थ है कि वह चाहता है, गुरु सब करके दे दे; उसे कुछ करना न पड़े। वह सोया रहे, घर्राटे ले, और गुरु ध्यान करे, समाधि लगाए। और जब भोजन पक जाए, तो वह चबाने तक को राजी नहीं है। वह चाहता है कि तुम्हीं चबाकर भी दे दो। कोई तरकीब अगर हो कि ध्यान—समाधि को इंट्रावेनस इंजेक्शन की तरह दिया जा सके, तो वह कहेगा, बस, तुम लगा दो इंजेक्शन, लटका दो बोतल समाधि की, भर दो मुझे समाधि से। अब मुझसे तो हाथ—पैर भी नहीं हिलाया जाता!

एक तामसी व्यक्ति की श्रद्धा है, जो गुरु के पास आता है कि गुरु सब करे। और वह समर्पण भी करता है, तो इसीलिए करता है कि लो, अब सम्हालो। और वह सोचता है कि बड़ी अनुकंपा कर रहा है गुरु पर कि समर्पण कर दिया।

तुम्हारे पास था क्या समर्पण करने को? तुम्हारा अंधकार! तुम्हारी नींद! तुम्हारा अज्ञान! तुम समर्पण क्या कर रहे हो?

मेरे पास लोग आते हैं उस वर्ग के। वे कहते हैं कि सब आप पर समर्पित, अब आप ही जानो, अब आप जो करो। और अगर मैं उनको कहूं कि उठकर जरा इधर बैठ जाओ, तो वे नाराज हो जाते हैं। अगर मैं उनको कहूं कि जरा जाओ, मकान के चार चक्कर लगा आओ, तो वे नाराज होते हैं। वे कहते हैं, सब आप पर ही छोड़ दिया, अब आप हमसे यह क्यों करवा रहे हैं? जब आप पर ही छोड़ दिया, तो आप ही चक्कर लगाओ। जब सभी छोड़ दिया, हम बचे ही नहीं……! मगर यह छोड़ने का अर्थ होता है? यह तामसी की श्रद्धा है। वह छोड़ता है इसलिए, ताकि करने की झंझट से बचे।

फिर राजसी की श्रद्धा है। वह भी कहता है, छोड़ दिया, लेकिन छोड़ नहीं पाता। वह जारी रखता है, वह अपना करना जारी रखता है। वह कहता है, सब छोड़ दिया। छोड़ नहीं पाता। क्योंकि वह छोड्कर खाली नहीं बैठ सकता। वह कहता है, कुछ बताओ। वह हमेशा चाहता है, कुछ करने को बताओ। अगर तुम उससे कहो कि कुछ करने का नहीं है, बस, वहीं संबंध छूट जाता है। ध्यान अक्रिया है, संबंध छूट गया।

तामसी मानने को राजी है कि ध्यान अक्रिया है। अक्रिया का मतलब है अकर्मण्यता, उसकी भाषा में। अक्रिया अकर्मण्यता नहीं है। अक्रिया तो क्रिया का सूक्ष्मतम रूप है, श्रेष्ठतम रूप है। वह तो नवनीत है किया का। वह तो सूक्ष्मतम क्रिया है। अक्रिया का मतलब न करना नहीं है। अक्रिया का मतलब है इस भांति करना कि करने और न करने में फर्क न रह जाए। इस भांति उठना कि उठने वाला भीतर न हो, कर्ता न रहे। इस भांति चलना, जैसे कि शून्य चल रहा हो। कहीं भनक न पड़े, आवाज न हो, पगध्वनि न आए।

अक्रिया का अर्थ है, करना तो सब, लेकिन कर्ता न रह जाए। तो फिर कौन क्रिया कर रहा है? फिर परमात्मा ही कर रहा है। जिस दिन तुम्हारा कर्ता मिट जाता है और परमात्मा ही तुम्हारे भीतर कर्ता बन जाता है। करते तुम बहुत हो, लेकिन अब क्रिया नहीं होती। क्योंकि तुम ही नहीं, तो क्रिया कैसी होगी! अब तुम बांस की पोगरी हो; अब तुम नहीं गाते, गीत उसके हैं, तुम सिर्फ मार्ग देते हो, बस इतना। लेकिन आलसी, तमस श्रद्धा से भरा आदमी बिलकुल राजी है अक्रिया के लिए। लेकिन अक्रिया का उसका अर्थ है, अकर्मण्यता। वह कहता है, बिलकुल ठीक। यह जमती है बात। हम लेटे जाते हैं। वह ध्यान का अर्थ समझता है, नींद। वह ध्यान का अर्थ समझता है, कुछ न करना।

अगर राजसी श्रद्धा वाले व्यक्ति को कहो, अक्रिया, तो वह उसे जमती नहीं। अगर समझ में भी आ जाए थोड़ी, तो वह कहता है, अक्रिया करने के लिए क्या करें? अक्रिया करने के लिए क्या करें? कुछ करना बताओ, ताकि अक्रिया सध जाए! अक्रिया का मतलब ही है न करना, कर्ता को छोड़ देना। वह कर्ता को नहीं छोड़ पाता।

मेरे पास उस तरह के लोग आते हैं। उनको अगर मैं कहता हूं तुम शांत बैठो। और राजसी व्यक्ति को मैं निरंतर कहता हूं कि तुम शांत बैठो, क्योंकि वही उसको रजस के बाहर ले जाएगा। तामसी को कहता हूं नाचो, कूदो, उछलो, कुछ क्रिया करो, ताकि तुम तमस के बाहर आओ। तुम जहां हो; वहां से बाहर ले आना है।

राजसी को मैं कहता हूं कुछ मत करो, शांत बैठ जाओ। वह कहता है, यह न चलेगा। थोडा आलंबन, मंत्र कर सकते हैं? वह कह रहा है कि शांत हम बैठ नहीं सकते। राम—राम, राम—राम, अगर इतना भी सहारा हो, तो चलेगा। हम इसी को पगलापन बना देंगे, भीतर राम—राम, राम—राम इतने जोर से करेंगे कि सारा राजस इसमें लग जाए। कुछ करने को बता दो, माला फेरे? गीता का पाठ करें? योगासन करें? उपवास करें? करने की भाषा उसको समझ में आती है। न करने की बात उसको समझ में नहीं आती।

सत्य की श्रद्धा वाला ही ठीक से समझ पाता है कि अक्रिया क्या है। अक्रिया अकर्मण्यता नहीं है। अक्रिया अकर्म भी नहीं है। अक्रिया अकर्ता भाव है। अक्रिया बड़ी सूक्ष्म क्रिया है, शुद्धतम किया है। इतनी शुद्ध है कि वहां कर्ता की मौजूदगी से अशुद्धि पैदा होती है, इसलिए कर्ता शून्य है।

जैसे हवाएं बहती, आकाश में बादल तिरते, ऐसा ही सत्व को उपलब्ध या सत्य की श्रद्धा का व्यक्ति तिरता है, बहता है, नदी बहती है, ऐसा बहता है। लेकिन कोई भाव नहीं होता कि मैं बह रहा हूं। सागर पहुंच जाता है, लेकिन कोई यात्रा नहीं होती। यह नहीं सोचता कि सागर जा रहा हूं।

तुमने गंगा को देखा, टाइम—टेबल हाथ में लिए, नक्शा फैलाए, कि सागर जा रही हूं! न कोई टाइम—टेबल है, न कोई नक्शा है। इसीलिए तो ठीक समय पर पहुंच जाती है। अगर टाइम—टेबल हो, उसी में वक्त लग जाएगा। और सब गड़बड़ हो जाएगा।

एक स्टेशन पर मैं बैठा था कोई आठ घंटे से, ट्रेन लेट होती गई, लेट होती गई। पहले दो घंटा लेट थी, फिर चार घंटा, फिर छ: घंटा। मैंने जाकर स्टेशन मास्टर को पूछा कि समझ में आता है, दो घंटा लेट थी। लेकिन क्या ट्रेन पीछे की तरफ जा रही है! चार घंटा हो गई, अब छ: घंटा, अब आठ घंटा—मामला क्या है? अगर ऐसे ही चला, तो आएगी कैसे? फिर मैंने उसको कहा कि फिर यह टाइम—टेबल छापने की जरूरत क्या है?

उसने कहा, साहब, अगर टाइम—टेबल न हो, तो कैसे पता चलेगा कि कितनी लेट है? यह बात मुझको भी जंची। टाइम—टेबल का एक ही उपयोग है, उससे पता चलता है कि गाड़ी कितनी लेट है।

गंगा पहुंच जाती है ,समय पर। न कोई नक्‍शा है, कहां से जाना है। कोई लिए जाता है।

अनंत तुम्हें लिए ही जा रहा है। तुम नाहक ही शोरगुल मचाते हो। उस शोरगुल में तुम्हें देर हो जाती है, उससे तुम्हारा अनंत से संबंध टूट जाता है।

अक्रिया का अर्थ है, मैं जाने वाला नहीं हूं; मैं तेरे हाथ में हूं तू ले जाने वाला है। इसका यह मतलब नहीं है कि मैं कुछ न करूंगा। इसका मतलब है, तू जो करवाएगा करूंगा। इसका यह अर्थ नहीं कि अब तू कर, हम आराम करेंगे। इसका अर्थ है कि अब जो तू करवाएगा, हम करेंगे। न हमारा अब कोई आराम है और न हमारा अब कोई कर्म है। जब तू आराम करवाएगा, तब आराम करेंगे। जब तू कर्म करवाएगा, तब कर्म करेंगे। लेकिन हर घड़ी तू ही होगा, हम न होंगे।

यह हमारे न हो जाने की कला ही शिष्य होने की कला है। और तब बिना कुछ किए बहुत होता है। तब बिना मांगे बहुत मिलता है। तब बिना भटके यात्रा पूरी हो जाती है। बिना चले मंजिल भी मिलती है। तुम नाहक ही चल रहे हो, उस श्रम से तुम व्यर्थ ही दबे जा रहे हो।

शिष्य का अर्थ है, छोड़ा जिसने गुरु के हाथों में कि अब वह जो करवाएगा, करेंगे। और यह श्रद्धा तीन तरह की होगी। अगर यह सत्व की श्रद्धा हो, तो ही क्रांति घटेगी। आलस्य की हो, चूक जाओगे। रजस की हो, चूक जाओगे।

पूरब से जो लोग आते हैं…… भारत से जो लोग मेरे पास आते हैं, उनकी श्रद्धा अक्सर तमस की होती है। पश्चिम से जो लोग आते हैं, उनकी श्रद्धा अक्सर रजस की होती है। क्योंकि पूरब में शिक्षा बड़ी प्राचीन है आलस्य की, भाग्य की। उसको हमने अपना तमस बना लिया है। बड़े अच्छे शब्दों के जाल में हमने अपने आलस्य को, अकर्मण्यता को छिपा लिया है।

पश्चिम की सारी शिक्षा है रजस की, दौड़ो, पाओ; घर बैठे कुछ न मिलेगा; करना पड़ेगा। वे दौड़ने में इतने कुशल हो गए हैं कि जब उन्हें मंजिल भी मिल जाती है, तो रुक नहीं पाते; तब वे आगे की मंजिल बना लेते हैं। वे दौडते ही रहते हैं।

पूरब सो रहा है, पश्चिम भाग रहा है। तामसी सोता है, राजसी भागता है। दोनों चूक जाते हैं। सोया हुआ इसलिए चूक जाता है कि वह मंजिल तक चलता ही नहीं है। और भागने वाला इसलिए चूक जाता है कि कई बार मंजिल पास आती है, लेकिन वह रुक नहीं सकता। वह जानता ही नहीं कि रुके कैसे। एक जानता नहीं कि चले कैसे, एक जानता नहीं कि रुके कैसे।

सत्य का अर्थ है, संतुलन। सत्य का अर्थ है, जानना कब चलें, जानना कब रुके। जानना कि कब जीवन में गति हो, और जानना कि कब जीवन में विश्राम हो। जिसने ठीक—ठीक विश्राम जाना और ठीक—ठीक कर्म जाना, वह सत्व को उपलब्ध हो जाता है, सम्यकत्व को उपलब्ध हो जाता है। सम्यक गति और सम्यक विश्राम, ठीक—ठीक जितना जरूरी है, बस उतना, उससे रत्तीभर ज्यादा नहीं। इस ठीक की पहचान का नाम ही विवेक है।

और तुम अपने भीतर जांच करना, अक्सर तुम पाओगे, अति है। या तो एक अति होती है, नहीं तो दूसरी अति होती है। निरति चाहिए अति से मुक्ति चाहिए। श्रम भी करो, विश्राम भी करो। दिन श्रम के लिए है, रात्रि विश्राम के लिए है। और दोनों के बीच अगर एक सामंजस्य सध गया, तो तुम पाओगे, तुम न दिन हो और न तुम रात हो; तुम तो दोनों का चैतन्य हो, दोनों का साक्षी— भाव हो। वही सत्य में अनुभव होगा।

 

तीसरा प्रश्न :

 

कृष्ण ने गोपियों को समझाने के लिए उद्धव को वृंदावन भेजा था, पर वे सफल क्यों न हो पाए?

 

हो ही न सकते थे, बात ही संभव न थी। उद्धव थे ज्ञानी, और ज्ञान कब प्रेमियों को समझा पाया है? कृष्ण ने मजाक किया होगा। ज्ञानी को भेजकर मजाक किया। ज्ञानी कभी प्रेमी को नहीं समझा सकता, क्योंकि ज्ञानी के पास होते हैं शब्द कोरे। पंडित थे उद्धव; बड़े पंडित होगे, कुशल होंगे समझाने में। लेकिन उन्होंने जिनको समझाया होगा तब तक, वे गोपियां नहीं थीं, जिनको प्रेम का रस लग गया था।

पंडित तभी तक तुम्हें सार्थक मालूम होगा, जब तक तुम्हें प्रेम का रस नहीं लगा। प्रेम के काटे को पंडित नहीं झाडू सकता। पंडित उन्हीं को झाड़ सकता है, जो प्रेम के काटे नहीं हैं। पंडित उनके काम का है, जिनकी प्यास ही नहीं जगी। पंडित उनको बडा महापंडित मालूम होता है, कितनी जानकारी लाता है! लेकिन जिसको प्यास जग गई, और प्रेम की भनक पड़ गई, और जिसके हृदय में कोई धुन बजने लगी अशांत की, पंडित कूड़ा—कर्कट है। उद्धव व्यर्थ थे।

मेरी जो समझ है, वह यह है कि उन्होंने उद्धव को गोपियों को समझाने भेजा ही नहीं था; उद्धव को समझने भेजा था गोपियों को। ऐसा किसी ने कभी कहा नहीं, लेकिन मेरी यही समझ है। वह उद्धव को मूर्ख बनाया, उसको अकल दी, कि तू जरा जा! यहां तू बड़ा पंडित हुआ जा रहा है। क्योंकि जिनको तू समझा रहा है, उनको प्रेम का रस ही नहीं लगा है, उनकी प्यास ही नहीं जगी है। तो तू ज्ञान की बातें कर, वे सिर हिलाते हैं। जब प्रेमी मिलेगा, तब तुझे अड़चन आएगी, तब तेरी ज्ञान की बातें जरा भी काम न आएंगी। जिसको प्यास लगी है, तुम पानी का शास्त्र समझाओगे, क्या फल होगा? वे कहेंगे, पानी चाहिए।

गोपियों ने कहा, कृष्ण चाहिए, तुम किसलिए आए हो? उद्धव बड़े बुद्ध बने। जाना ही नहीं था, अगर थोड़ी अकल होती। लेकिन पंडित में अकल होती ही नहीं। पंडित से ज्यादा बेअकल आदमी नहीं होता। जाना ही नहीं था, पहले ही हाथ जोड़ लेना था, कि गोपियों के? मैं जाने वाला नहीं। क्योंकि वहां हम व्यर्थ ही सिद्ध होंगे।

वे कृष्ण को मांगती थीं, उद्धव को नहीं। संदेशवाहक नहीं चाहिए; चिट्ठी—पत्री लाने से क्या होगा! बुलाया था प्रेमी को, आ गया पोस्टमैन! इनसे क्या लेना—देना है? उन्होंने उद्धव को बैरंग भेज दिया वापस।

वह उद्धव को समझाने के लिए ही कृष्ण ने खेल किया होगा। इतना तो पक्का था कि गोपियां नहीं समझाई जा सकतीं, कृष्ण तो समझते हैं कि नहीं समझाई जा सकतीं। कृष्ण से कम पर वे राजी न होंगी।

प्रेमी का अर्थ है, परमात्मा से कम पर जो राजी न होगा। तुम परमात्मा के संबंध में समझाओ, प्रेमी कहेगा, क्यों व्यर्थ की बातें कर रहे हो? परमात्मा के संबंध में नहीं जानना है उसे। उसे परमात्मा को जानना है।

परमात्मा के संबंध में वेद क्या कहते हैं, उपनिषद क्या कहते हैं, शास्त्रों में क्या लिखा है, क्या नहीं लिखा है! वह कहेगा, बंद करो यह बकवास। मुझे परमात्मा चाहिए। परमात्मा मिल गया, तो मुझे वेद मिल गए। परमात्मा ही मेरा वेद है।

लेकिन पंडित कहता है, वेद भगवान! पंडित वेद को भगवान! बतलाता है। प्रेमी को भगवान ही वेद है। और बड़ा फर्क है; जमीन—आसमान का फर्क है। तुम मांगते हो भगवान को, वह ले आता है वेद की पोथियों को। वह कहता है, सब इसमें लिखा है।

यह ऐसे ही है, जैसे कोई भूखा मर रहा हो और तुम जाकर पाक—शास्त्र का ग्रंथ सामने रख दो और कहो कि सब तरह के भोज—मिष्ठान्न, सब इसमें लिखे हैं। वह तुम्हारे पाक—शास्त्र को उठाकर फेंक देगा भूखा आदमी। ही, भरा पेट होगा, तो विश्राम से बैठकर पाक—शास्त्र को पड़ेगा। लेकिन भूखे को पाक—शास्त्र का क्या अर्थ है?

जिसको परमात्मा की भूख लग गई है, वेद व्यर्थ है, उपनिषद बकवास है, गीता असार है। वह परमात्मा को चाहता है; उससे कम पर वह राजी नहीं है। और गोपियां न केवल परमात्मा को चाहती थीं, बल्कि उनको परमात्मा का स्वाद भी लग गया था, वे परमात्मा को जान भी चुकी थीं।

हां, जिसने न जाना हो परमात्मा को, उसको प्यास भी लगी हो, तो शायद थोड़ी—बहुत देर पंडित उसको भरमा ले। क्योंकि उसके पास कोई कसौटी तो नहीं है अनुभव की। इसलिए अज्ञानी को पंडित भरमा लेता है। लेकिन जिसको ध्यान की जरा—सी भी भनक आ गई, फिर पंडित उसको नहीं भरमा सकता।

ये गोपिया कृष्ण के साथ नाच चुकी थीं; वह उनकी स्मृति में संजोया हुआ मंदिर था। वह स्मृति भूलती नहीं थी, बिसरती नहीं थी। वह तो निशि—वासर, दिन—रात भीतर कौंधती रहती थी। एक दफा जिसने चख लिया कृष्ण का साथ, नाच लिया कृष्ण के साथ वृक्षों के तले पूर्णिमा की रातों में, अब इसे पंडित धोखा नहीं दे सकता, भरमा नहीं सकता।

उद्धव खूब समझाए होंगे, ज्ञान की बातें की होंगी। गोपियों ने उनकी जरा भी न सुनी। बल्कि गोपिया नाराज हुईं कि कृष्ण ने यह कैसा मजाक किया! यह बरदाश्त के बाहर है। और प्रेमी परमात्मा से नाराज हो सकता है, सिर्फ प्रेमी! पंडित कभी नहीं नाराज हो सकता। पंडित तो डरता है। प्रेमी थोड़े ही डरता है, प्रेम तो अभय है। गोपियां नाराज हुईं। यह मजाक बरदाश्त के बाहर है। इस उद्धव को किसलिए भेजा? इससे क्या लेना—देना है? आना हो, कृष्ण आ जाएं; कम से कम पंडितों को तो न भेजें। परमात्मा चाहिए, शास्त्र नहीं; ज्ञान नहीं, अनुभव चाहिए। गोपिया बहुत नाराज हुईं। प्रेमी नाराज हो सकते हैं।

मैंने यहूदी फकीर झुसिया का जीवन पढ़ा है। वह प्रार्थना करने जाता—बड़ा फकीर था; बड़े उसके भक्त थे, अनूठा आदमी था—वह जब यहूदी मंदिर में प्रार्थना करता, तो कभी—कभी लोगों से कह देता, अब तुम बाहर हो जाओ, सुनने वालों से। इस परमात्मा के बच्चे को ठीक करना ही पड़ेगा। तुम बाहर हो जाओ। एक सीमा है बरदाश्त की।

लोग बाहर हो जाते, तब उसका झगड़ा शुरू होता। वह परमात्मा से सीधी—सीधी बातें करता। झगड़ा ऐसा होता कि मौका आ जाए, तो मार—पीट हो जाए। अगर गॉव में कोई भूखा मर रहा है, तो वह गुस्से में आ जाता। वह कहता कि तेरे रहते यह कैसे हो रहा है? तेरा प्रेमी भूखा मर रहा है, यह हम बरदाश्त नहीं कर सकते। हम तेरी सब पूजा—पत्री बंद कर देंगे।

कहते हैं, झुसिया जैसा आदमी यहूदी परंपरा में नहीं हुआ। कैसा उसका गहन प्रेम रहा होगा कि परमात्मा से लड़ने को राजी है। कलह हो जाए; कई दिन तक मंदिर ही न जाए फिर वह। कि पड़ा रहने दो उसको वहीं; कोई पूजा मत करो, कोई प्रार्थना मत करो। जब हमारी नहीं सुनी जा रही है, हम भी क्यों उसकी सुनें!

झुसिया ने कहा है अपनी प्रार्थनाओं में कि देख, तू एक बात ठीक से समझ ले; हमें तेरी जरूरत है, वह पक्का; तुझे भी हमारी जरूरत है! इसलिए तू यह मत समझ कि तू हम पर कोई अनुग्रह कर रहा है। हमारे बिना तू भगवान न होगा। भक्त के बिना भगवान कैसे होगा? माना कि हम भक्त न होंगे, वह भी ठीक। लेकिन तू भी भगवान न होगा। जितनी हमें तेरी जरूरत है, उतनी तुझे हमारी जरूरत है। इसका सदा खयाल रख; इसको भूल मत जा।

प्रेमी लड़ सकता है, प्रेमी ही लड़ सकता है, भय नहीं है। पंडित तो डरता है, कंपता है। पंडित तो देखता है, कहीं क्रियाकांड में कोई भूल न हो जाए; कि शास्त्र में जैसी विधि लिखी है, वैसी पूरी होनी चाहिए। उसमें कहीं भूल—चूक न हो जाए। पता नहीं परमात्मा नाराज हो जाए।

इसने परमात्मा को जाना नहीं। परमात्मा कहीं नाराज होता है? यह पहचाना ही नहीं। यह मूढ़ है। इसे पता ही नहीं कि परमात्मा नाराज होता ही नहीं। नाराज होने जैसी घटना परमात्मा में घटती ही नहीं। और उस घड़ी में, जब कोई झुसिया जैसा भक्त परमात्मा को कहता होगा कि बंद कर देंगे तेरी प्रार्थना, तो परमात्मा नाचता होगा कि जरूर कोई प्रेमी मौजूद है।

गोपियां बहुत नाराज हुईं उद्धव पर। और उन्होंने उनको बैरंग ही भेज दिया कि तुम जाओ, तुम्हें किसने बुलाया? और वे खूब हंसी उद्धव पर, उनकी ज्ञान की बातों पर। पंडित खूब बुद्ध बना होगा। पंडित सदा ही प्रेमी के पास आकर मुश्किल में पड़ जाएगा। यह कथा बड़ी प्रतीकात्मक है।

पंडित कभी भी सफल नहीं हो सकता प्रेमी के सामने। अगर वह सफल होता दिखाई पड़ता है, तो उसका कुल कारण इतना है कि प्रेमी मौजूद नहीं है; परमात्मा को कोई खोज नहीं रहा है। इसलिए पंडित तुम्हें सब तरफ सिंहासनों पर बैठे दिखाई पड़ते हैं।

तुम जिस दिन परमात्मा को खोजोगे, उसी दिन पंडित सिंहासनों से नीचे उतर जाएंगे; उनकी कोई जगह नहीं है। तब तो तुम उसे सिंहासन पर विराजमान करोगे, जो ज्ञान नहीं, अनुभव दे सकता है; जो तुम्हें परमात्मा के संबंध में नहीं बताता, जो तुम्हें परमात्मा बता सकता है। उसको ही हमने गुरु कहा है।

इसलिए कबीर कहते हैं, गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय। दोनों सामने खड़े हैं। बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं कबीर, किसके पैर लगै? क्योंकि अगर परमात्मा के पैर लगै, उचित न होगा। अगर गुरु के पैर लग, तो भी अड़चन मालूम पड़ती है। परमात्मा सामने खड़े थे, पहले मैं गुरु के पैर लगा! पद बड़ा मधुर है और उसके दो अर्थ हो सकते हैं।

गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय।

बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।।

इसके दो अर्थ संभव हैं। एक अर्थ तो यह है कि शिष्य को अड़चन में पड़ा देखकर गुरु ने गोविंद की तरफ इशारा कर दिया कि तू गोविंद के पैर लग।

यह अर्थ से मैं राजी नहीं। यह मुझे जंचता नहीं। मुझे तो दूसरा अर्थ जंचता है। वह दूसरा अर्थ कभी किया नहीं गया। वह दूसरा अर्थ मुझे यह लगता है कि—

गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय।

मुश्किल में पड़ गए हैं कबीर। किसके पैर पडूं? दोनों सामने खड़े हैं। तब वे गुरु के पैर पर गिर पड़े, क्योंकि उन्होंने जाना, सोचा—

बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।।। तुमने ही गोविंद बताया, नहीं तो गोविंद को हम देख ही कैसे पाते! इसलिए तुम्हारे पैर पहले छू लेते हैं।

गुरु का अर्थ है, जिसने जाना हो और जो तुम्हें जना दे। जिसने देखा हो और जो तुम्हें दिखा दे। जिसने चखा हो और जो तुम्हें चखा दे। शब्द यह न कर पाएंगे।

 

गुरु भी शब्दों का उपयोग करता है, लेकिन निशब्द की तरफ ले जाने के लिए; शास्त्र का सहारा लेता है, तुम्हें कभी बेसहारा कर देने के लिए; समझाता है, तुम्हारे मन को उस घड़ी में ले जाने के लिए, जहां सब समझ—नासमझ छूट जाती है। इसलिए गुरु के लिए शब्द अंत नहीं है, केवल साधन है। पंडित के लिए शब्द सब कुछ है, साधन भी, साध्य भी, उसके पार कुछ भी नहीं है।

उद्धव हारे। पंडित सदा हारता रहा है। और कृष्ण ने बिलकुल ठीक ही किया उद्धव को भेजकर, जो फजीहत करवाई। उससे उद्धव को कुछ समझ आ गई हो तो अच्छा, नहीं तो अभी तक भटक रहे होंगे।

अब सूत्र:

 

हे भारत, कृष्ण ने कहा, सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है। उसमें सात्विक पुरुष देवों को पूजते हैं और राजस पुरुष यक्ष और राक्षस को तथा अन्य जो तामस पुरुष हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।

नुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है…….।

तुम्हारा अंतःकरण तमस से भरा हो, तो तुम्हारी श्रद्धा सात्विक नहीं हो सकती। क्योंकि श्रद्धा तो तुममें उगती है, तुम्हारे अंतःकरण की भूमि में ही वह बीज टूटता है, तुम्हारी भूमि ही उसे रसदान देती है, पुष्टि देती है, वह पौधा तुम्हारा है। तो तुम्हारा अंतःकरण कैसा

 

है, वैसी ही तुम्हारी श्रद्धा होगी। अपने अंतःकरण की ठीक—ठीक पहचान तुम्हारी श्रद्धा की पहचान बन जाएगी।

इस सूत्र में कृष्ण साधक के लिए बड़ी महत्वपूर्ण बातें कह रहे हैं। एक तो यह जानना जरूरी है कि तुम्हारा अंतःकरण कैसी दशा में है। ऐसा मत सोचना कि जो लोग तामसिक हैं, वे बिलकुल। तामसिक हैं। शुद्ध तामसिक व्यक्ति हो ही नहीं सकता। शुद्ध। तामसिक वृत्ति का व्यक्ति हो ही नहीं सकता। क्योंकि इन तीन के जोड़ के बिना कोई भी नहीं हो सकता।

इसलिए जब हम कहते हैं तामसी, तो हमारा मतलब सापेक्ष होता है, रिलेटिव होता है। हमारा मतलब होता है कि तामसी ज्यादा, राजसी कम, सात्विक कम। तमस का अनुपात ज्यादा है, इतना ही अर्थ होता है। कोई व्यक्ति पूर्ण तामसी नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो टूट जाएगा। होने के लिए तीन ही आवश्यक हैं। इसलिए कोई व्यक्ति अगर तामसी होता है, तो समझो सत्तर

परसेंट तामसी है, उनतीस परसेंट राजसी, एक परसेंट सात्विक। पर एक परसेंट सात्विक भी होना जरूरी है। नहीं तो, जैसे तीन पैर की तिपाई में से एक पैर निकाल लो, तिपाई फौरन गिर जाए; ऐसा व्यक्ति जी नहीं सकता, जिसका एक पैर गिर गया हो।

तुम तिपाई हो, वे तीनों गुण चाहिए; मात्रा कम—ज्यादा हो सकती है। यह हो सकता है कि एक टल बिलकुल पतली हो तिपाई की, धागे जैसी हो, मगर उतनी जरूरी है। एक टांग बहुत मोटी हो, हाथी—पांव की बीमारी हो गई हो, यह हो सकता है। लेकिन टांगें तीन ही होंगी। तुम्हारी मुर्गी तीन टांग से ही चलती है, उससे कम में न चलेगा।

तामसिक वृत्ति का व्यक्ति गहन तमस से भरा होता है, लेकिन दूसरे तत्व भी मौजूद होते हैं।

यह पहली बात समझ लेना कि कोई पूर्ण तामसी नहीं है, कोई पूर्ण राजसी नहीं है, कोई पूर्ण सात्विक नहीं है। शुद्धतम व्यक्ति में भी, बुद्ध में भी, जब तक उनकी देह नहीं छूट जाती, तमस की टांग रहेगी। पतली होती जाएगी; उलटा हो जाएगा अनुपात, तुम्हारी तमस की टांग हाथी—पांव है, बुद्ध की तमस की टल, समझो मच्छड़ की टांग है। पर रहेगी; उतना अनुपात रहेगा। जब तक शरीर है, तब तक तीनों रहेंगे।

इसलिए बुद्ध ने निर्वाण की दो अवस्थाएं कही हैं। पहला निर्वाण, जब समाधि उपलब्ध होती है, लेकिन शरीर बचता है। वह पूर्ण निर्वाण नहीं है। जीवनमुक्त हो गया व्यक्ति, जंजीरें टूट गईं, लेकिन कारागृह मौजूद है। कैदी न रहा, जंजीरें नहीं हैं हाथ—पैर पर, यह भी हो सकता है कि जेलर प्रसन्न हो गया हो इस व्यक्ति से और इसने उसको कैदियों के ऊपर सुपरिनटेंडेंट या सुपरवाइजर बना दिया हो। बाकी है कारागृह के भीतर; अभी दीवालें मौजूद हैं। इतना प्रसन्न हो गया हो जेलर इसकी सात्विकता से कि इसको बाहर— भीतर आने की भी सुविधा हो गई हो; सब्जी खरीदने बाहर चला जाता हो, इसके भागने का डर न रहा हो। लेकिन इसे भी लौट आना पड़ता है। कभी—कभी घर के लोगों से भी मिल आता हो, गपशप भी कर आता हो, लेकिन फिर भी लौट आना पड़ता है।

अभी इसकी नाव भी शरीर के किनारे से’ ही बंधी रहेगी। इसकी स्वतंत्रता बढ़ गई, बहुत बढ़ गई। यह करीब—करीब ऐसा स्वतंत्र हो गया है, जैसा कि कारागृह के बाहर के लोग हैं; लेकिन करीब—करीब, एप्रॉक्सिमेट। जरा—सी बात तो अभी अटकी है, अभी शरीर से बंधा है। इसको हम जीवनमुक्त कहते हैं, क्योंकि यह निन्यानबे प्रतिशत मुक्त है। कुछ बचा नहीं, सब हो गया है। सिर्फ शरीर के गिरने की बात है।

इसलिए बुद्ध ने कहा, जब शरीर गिर जाता है, तब महापरिनिर्वाण, तब महासमाधि लगती है। जीवनमुक्त तब मोक्ष को उपलब्ध हो जाता, तब मुक्तत्व उसका स्वभाव हो जाता। अब दीवाल भी गिर गई, अब कारागृह न रहा; जंजीरें भी टूट गईं।

रजस से भरे व्यक्ति में भी तमस होता है, सत्य होता है। तीनों सभी में होते हैं। और तीनों सभी में होते हैं, इससे ही क्रांति की संभावना है। नहीं तो मुश्किल हो जाए। अगर कोई व्यक्ति पूरा ही तामसी हो, सौ प्रतिशत, चौबीस कैरेट तामसी हो, तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता, कोई उपाय न रहा। यह तो करीब—करीब लाश की तरह पड़ा रहेगा, कोमा में रहेगा, बेहोश रहेगा, क्योंकि होश के लिए भी थोड़ा रजस चाहिए। यह तो हाथ—पैर भी न हिलाएगा; यह तो आंख भी न खोलेगा; इसका तो जीना भी जीना न होगा, यह तो मुरदे की भांति होगा, जीते जी मुरदा होगा। नहीं, इसकी फिर कोई संभावना क्रांति की न रह जाएगी।

दूसरे तत्व मौजूद हैं, उनसे ही क्रांति का द्वार खुला है, उन्हीं के सहारे एक से दूसरे में जाया जा सकता है। जैसे तुम अंधेरे कमरे में बैठे हो, लेकिन छपरैल से, खपड़ों की संध से एक छोटी—सी सूरज की किरण भीतर आ रही है। सब घना अंधकार है, पर एक छोटी किरण अंधकार में उतर रही है। वही द्वार है। तुम उसी किरण के सहारे चाहो तो सूरज तक पहुंच जाओगे, चाहे वह दस करोड़ मील दूर हो। तुम उसी का किरण का अगर मार्ग पकड़ लो, तो तुम सूरज के स्रोत तक पहुंच जाओगे। वह गहन अंधकार पीछे छूट सकता है, यात्रा संभव है। इसलिए तीनों तत्व सभी में हैं, पहली बात समझ लेनी जरूरी है।

दूसरी बात समझ लेनी’ जरूरी है कि तीनों तत्वों का अनुपात भी सदा थिर नहीं रहता। रात तमस बढ़ जाता है, दिन में रजस बढ़ जाता, संध्याकाल में सत्य बढ़ जाता है। इसलिए हिंदुओं ने संध्याकाल को प्रार्थना का क्षण समझा।

सुबह, जब रात जा चुकी और सूरज अभी नहीं उगा, वही ब्रह्ममुहूर्त है। उसको ब्रह्ममुहूर्त कहने का कारण है भीतर की गुण—व्यवस्था से। रात जा चुकी, पृथ्वी जाग गई, पक्षी बोलने लगे, वृक्ष उठ आए, लोग नींद के बाहर आने लगे, सारी पृथ्वी पर तमस का जाल सिकुड़ने लगा। सूरज करीब है क्षितिज के, जल्दी ही उसका किरण—जाल फैल जाएगा, जल्दी ही सब उठ बैठेगा, रजस पैदा होगा। सूरज के उगते ही काम— धाम की दुनिया शुरू होगी। अभी सूरज नहीं उगा, अभी रजस उगने को है। अभी रात गई, तमस जा चुका, मध्य की छोटी—सी घड़ी है, वह संध्या है।

संध्या का अर्थ है, बीच का काल, मध्य की घड़ी। उस मध्य की घड़ी में सत्व का प्रमाण ज्यादा होता है। वह दोनों के बीच की घड़ी है। इसलिए उस क्षण को ध्यान में लगाना चाहिए। क्योंकि अगर ध्यान सत्व से निर्मित हो, तो दूरगामी होगा। उस सत्व को अगर तुम ध्यान बनाओ, तो धीरे— धीरे तुममें सत्व बढ़ता जाएगा।

ऐसे ही सांझ को सूरज डूब गया, रजस का व्यापार बंद होने लगा, सूर्य ने समेट ली अपनी दुकान, द्वार—दरवाजे बंद करने लगा। रात आने को है, आती ही है, उसकी पहली पगध्वनिया सुनाई पड़ने लगीं। मध्य का छोटा—सा काल है, वह संध्या है। दुनिया के सभी धर्मों ने मध्य के काल चुने हैं। क्योंकि उस मध्य के काल में, जब दो तत्वों के बीच की थोड़ी—सी संधि होती है, तो सत्य का क्षण महत्वपूर्ण होता है।

तुम्हारे भीतर हो सकता है पचास प्रतिशत या साठ प्रतिशत तमस हो, तीस या चालीस प्रतिशत रजस हो, एक प्रतिशत सत्व हो, तो उस मध्यकाल में वह एक प्रतिशत प्रमुख होता है। और उसका अगर तुम उपयोग कर लो, तो ब्रह्ममुहूर्त का तुमने उपयोग कर लिया। इसलिए हिंदुओं के लिए तो प्रार्थना शब्द संध्या का पर्यायवाची हो गया। वे जब प्रार्थना करते हैं, तो वे कहते हैं, संध्या कर रहे हैं। वे भूल गए हैं कि उसका अर्थ क्या था!

इस्लाम में भी नियम है, सूरज उगने के समय, सूरज डूबने के समय, सूरज जब मध्य आकाश में हो, तब—ऐसी सूरज की पांच घड़ियां उन्होंने चुनी हैं। लेकिन दो घड़ियां वह। भी मौजूद हैं, सुबह

 

और सांझ। उन घड़ियों में सत्व तेज होता है। रात्रि तमस तेज हो जाता है, दिन रजस तेज हो जाता है।

तो तुम्हारे भीतर चौबीस घंटे अनुपात एक—सा नहीं रहता। इसलिए तो भिखारी सुबह—सुबह तुमसे भीख मांगने आते हैं। उस वक्त सत्व की थोड़ी—सी छाया होती है; तुम शायद दे सको। भिखारी दिनभर के बाद भीख मांगने नहीं आते। क्योंकि वे जानते हैं, रजस से थका आदमी चिड़चिड़ा हो जाता है, नाराज होता है। भिखारी को देखकर ही गुस्से में भर जाएगा; देने की जगह छीनने का मन होगा।

सुबह—सुबह तुम उठे हो और एक भिखारी द्वार पर आ गया है, इनकार करना जरा मुश्किल होता है। तुम्हीं हो, सांझ को भी तुम्हीं रहोगे, दोपहर भी तुम्हीं रहोगे। लेकिन सुबह जरा इनकार अटकता है, एकदम से कह देना नहीं, संभव नहीं मालूम होता। भीतर से कोई कहता है, कुछ दे दो। सत्व प्रगाढ़ है।

जो आदमी समझदार है, वह अपनी जीवन—विधि को इस तरह से बनाएगा कि वह इन गुणों का ठीक—ठीक उपयोग कर ले। अगर तुम्हें कोई शुभ कार्य करना हो, तो संध्याकाल चुनना; तो तुम्हारी गति ज्यादा हो सकेगी। अगर कोई अशुभ कार्य चुनना हो, तो मध्य—रात्रि चुनना, तो तुम्हारी गति ज्यादा हो सकेगी। हत्यारे, चोर, सब मध्य—रात्रि चुनते हैं।

सुबह भोर के क्षण में तो चोर को भी चोरी करना मुश्किल हो जाएगा, हत्यारे को भी हत्या करना मुश्किल हो जाएगा, उसकी जीवन— धारा भिन्न होगी। भरी दोपहर में सब दफ्तर और दुकानें खुलती हैं दुनिया की; ग्यारह बजे, वह रजस का व्यापार है। बाजार धूम में होता है, जब सूरज आकाश में होता है। फिर सब क्षीण हो जाता है। रात्रि लोग क्लबघरों में इकट्ठे होते हैं, शराब पीने, नाचने। वेश्याओं के घर—द्वार पर दस्तक देते हैं। तमस प्रगाढ़ है।

तुम कभी—कभी हैरान होओगे, सुबह जिसको तुमने भोर में प्रार्थना करते देखा, दोपहर में बाजार में तुम लोगों को लूटते देखोगे उसी आदमी को, उसी आदमी को रात तुम वेश्याघर में शराब पीते पाओगे। तुम बड़े हैरान होओगे कि बात क्या है! यह आदमी वही है?

तुम सोचोगे, इसकी प्रार्थना झूठी है। जरूरी नहीं। प्रार्थना सही रही हो। तुम सोचोगे, यह दुकान पर जो तिलक—चंदन लगाकर बैठता है, वह सब बकवास है। जब इसने तिलक—चंदन लगाया था, तब तिलक—चंदन का भाव रहा हो, झूठ मत समझना। तिलक—चंदन हटा नहीं, क्योंकि तिलक—चंदन तो चमड़ी पर लगा है। भीतर के तमस, रजस, सत्य का रूपांतरण हो गया।

तो दुकान पर यह आदमी बैठकर हरि बोल, हरि बोल भी करता रहता है और जेब भी काटता रहता है। जरूरी नहीं कि इसका हरि बोल सदा ही झूठ होता हो; कभी—कभी किन्हीं क्षणों में बिलकुल सच होता है। और यही आदमी रात वेश्याघर चला जाता है।

तुम भरोसा नहीं कर पाते, क्योंकि तुम्हें पता नहीं है, आदमी एक नहीं है, तीन है। हर आदमी के भीतर कम से कम तीन आदमी हैं। तेरह होंगे, वह दूसरी बात है। मगर तीन तो हैं ही। कहावत है, जब कोई आदमी बिलकुल भ्रष्ट हो जाता है, तो लोग कहते हैं, तीन तेरह हो गए। तीन तो हैं ही, लेकिन अब तेरह हो गए; अब मामला ही खराब हो गया, अब सब खंड—खंड हो गया।

ठीक से अगर तुम अपने जीवन का निरीक्षण करो, तो तुम बहुत—सी बातें समझ पाओगे। प्रत्येक समझपूर्वक जीने वाले आदमी को अपने जीवन की निरंतर निरीक्षणा करते रहनी चाहिए और देखना चाहिए, किन क्षणों में शुभ प्रगाढ़ होता है। उन क्षणों का शुभ के लिए उपयोग करो। और उन क्षणों को जितना बढ़ा सको, बढ़ाओ। तुम्हारी भोर जितनी बड़ी हो जाए, उतना अच्छा। तुम्हारी संध्या जितनी लंबी हो जाए उतना अच्छा। और जो तुमने शुभ क्षण में पाया है, उसकी सुवास को दूसरे क्षणों में भी खींचने की कोशिश करो। तो ही रूपांतरण होगा; नहीं तो रूपांतरण न होगा।

फिर दिन के चौबीस घंटे में ही यह बदलाहट होती हैं, ऐसा नहीं; जीवन की हर घड़ी में! बच्चे में सत्व का अनुपात ज्यादा होता है, क्योंकि वह जीवन की भोर है। जवान में रज का अनुपात ज्यादा होता है, क्योंकि वह जीवन की आपा— धापी, बाजार है। बूढ़े में रजस और सत्य दोनों क्षीण हो जाते हैं, तमस बढ़ जाता है; क्योंकि वह मौत का आगमन है। मौत यानी पूर्ण तमस में गिर जाना।

अब यह बड़े मजे की बात है, लेकिन सभी बूढ़े दूसरों को शिक्षा देते हैं। वे बच्चों को भी चलाने की कोशिश करते हैं। होना उलटा चाहिए कि के बच्चों के पीछे चलें। सांझ भोर का पीछा करे। इसलिए तो दुनिया उलटी है। यहां नाव नदी पर नहीं है, यहां नदी नाव पर है। के बच्चों को चला रहे हैं; गलत हो रहा है। सांझ सुबह को चलाए, गलत हो जाएगा। बुढो को बच्चों का अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि बच्चे निर्दोष हैं।

जीसस ने कहा है, जो बच्चों की तरह भोले— भाले होंगे, वे ही मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे।

का आदमी तो चालाक हो जाता है। हो ही जाएगा, जीवनभर का अनुभव, जीवनभर की दाव—पेंच, कलाएं, राजनीति, चालबाजियां—धोखे जो दिए, धोखे जो खाए—सब का अनुभव। का आदमी निर्दोष हो, बड़ा मुश्किल है, हो जाए, तो संत।

बच्चा निर्दोष होता है, लेकिन संत नहीं। सभी बच्चे निर्दोष होते हैं, वह स्वाभाविक है। वह कोई गुण नहीं है। क्योंकि बच्चों का संतत्व सब खो जाएगा। चौदह वर्ष के होंगे, कामवासना जगेगी, रजस पैदा होगा। सब भूल जाएंगे, सब निर्दोषता बच्चों की खो जाएगी।

तुमने कभी सोचा, सभी बच्चे जब पैदा होते हैं, तो सुंदर मालूम होते हैं। कोई बच्चा कुरूप नहीं होता। और सभी लोग बड़े होते—होते कुरूप हो जाते हैं। शायद ही कोई आदमी सुंदर बचता है। क्या मामला है?

बच्चे सत्व को उपलब्ध होते हैं। अभी आ रहे हैं सीधे परमात्मा के घर से। अभी वह सुवास उनके शरीर को घेरे है। अभी—अभी पैदा हुए भोर का क्षण है, ब्रह्ममुहूर्त। बच्चे यानी ब्रह्ममुहूर्त। अभी प्रार्थना गंज रही है; अभी मंदिर की घंटियां बज रही हैं; अभी तिलक ताजा है, अभी हाथों में लगे चंदन में गंध है; अभी—अभी आते हैं मूल स्रोत से, उत्स से। खो जाएंगे कल।

अगर दुनिया कभी समझदार होगी, तो बूढ़े बच्चों का अनुसरण करेंगे, उनसे सीखेंगे। उनका बालपन संतत्व की कीमिया है। और जब कोई का आदमी बच्चे जैसा हो जाता है, तो इस जगत में अनूठी घटना घटती है। जब कोई का आदमी बच्चे जैसा हो जाता है, तो इस जगत में अपूर्व सौंदर्य घटता है।

ऐसे के आदमी के सौंदर्य की तुम कोई तुलना नहीं कर सकते, कोई जवान आदमी इतना सुंदर नहीं हो सकता। क्योंकि जवानी में बड़ा तनाव है, बेचैनी है, दौड़ है, उपद्रव है, आपा— धापी है। कैसे कोई जवान इतना सुंदर हो सकता है? तूफान है, आधी है। बुढ़ापे में सब शांत हो गया। आधी जा चुकी; तूफान विदा हो गया। तूफान के पीछे के क्षण हैं, जब सब शांत हो जाता है और एक सन्नाटा घेर लेता है।

अगर बूढ़े आदमी ने बचपन को फिर से पुनरुज्जीवित कर लिया, तो वह संत हो जाता है। नहीं तो वह महान तामसी हो जाता है। इसलिए के आदमी बहुत तामसी हो जाते हैं। उनका जीवन करीब—करीब मुरदे जैसा हो जाता है। चिड़चिड़े, नाराज, हर चीज उनके लिए की जाए, कुछ करने को तैयार नहीं! हर चीज की अपेक्षा और हर चीज से शिकायत। कोई चीज तृप्त नहीं करती। सारा जगत असार मालूम पड़ता है; व्यर्थ मालूम पड़ता है। और आकांक्षा मरती नहीं, महत्वाकांक्षा जगी रहती है। मल कायम रहती है। करना कुछ नहीं है, मल भारी है।

तो जीवन में भी घड़ियां बदलती हैं, जब अनुपात बदल जाता है। और जीवन का ही सवाल नहीं है। अनुपात रोज भी बदल जाता है। परिस्थिति भी अनुपात को बदल देती है।

तुम दोपहर बड़ी दौड़ में थे। अचानक एक शुभ—संवाद किसी ने दे दिया, तत्‍क्षण भीतर की मात्रा में भेद हो जाता है। किसी ने शुभ—संवाद दे दिया, तुम्हारी दौड़ ठिठक गई; किसी ने खुशी की एक खबर दे दी, तुम प्रसन्न हो गए, तुम्हारे भीतर की मात्रा बदल गई। तुम भोर में बड़े सात्विक थे और किसी ने खबर दी कि कोई मर गया, उदासी छा गई, तमस ने घेर लिया।

तो प्रति क्षण परिस्थिति भी बदलती है। लेकिन ये सारी बातें तुम्हें अपने भीतर ठीक से स्वाध्याय करनी चाहिए, ताकि तुम इनका ठीक—ठीक उपयोग कर सको। और जो व्यक्ति अपने अनुपात को न तो परिस्थिति से प्रभावित होने देता है, न समय की धारा से प्रभावित होने देता है, न जीवन की अवस्थाओं से प्रभावित होने देता है, वही व्यक्ति साधक है।

इसलिए साधना बड़ी कठिन मालूम पड़ती है। जो भरी दोपहरी में ऐसा होता है, जैसे ब्रह्ममुहूर्त में कोई हो, जो बुढ़ापे में ऐसा होता है, जैसे बचपन में कोई हो, तब साधना का सूत्र शुरू होता है। पहले ठीक से निरीक्षण करो। फिर निरीक्षण को ठीक से सोचकर अपने जीवन की गति को बदलो। और गति बदलनी है इस भांति कि अति न हो जाए। तीनों की मात्रा समान हो जाए।

एक तिहाई हो तमस, वह जरूरी है। इसलिए चौबीस घंटे में आठ घंटे सोना जरूरी है, वह एक तिहाई तमस है। उससे कम सोओगे, नुकसान होगा, उससे ज्यादा सोओगे, नुकसान होगा। आठ घंटा सोना जरूरी है। आठ घंटा जीवन की दौड़—धूप जरूरी है। रजस, भागो—दौड़ो; महत्वाकांक्षा का विस्तार है। उसको भी अनुभव करो। क्योंकि गैर अनुभव के गुजर गए, तो पकोगे नहीं, पार न होओगे, अतिक्रमण न होगा। आठ घंटा व्यापार, व्यवसाय, दौड़— धूप। आठ घंटा सत्व—प्रार्थना, पूजा, ध्यान। ऐसा एक तिहाई, एक तिहाई जीवन को बांट दो।

अगर तुम्हारा सारा समय एक तिहाई, एक तिहाई की मात्रा में बंट जाए, तुम धीरे— धीरे पाओगे, यह अनुपात घिर हो जाता है। तब न तो रात में यह बदलता, न दिन में बदलता, न जवानी में, न बुढ़ापे में। यह अनुपात धीरे— धीरे, धीरे— धीरे घिर हो जाता है। इस थिरता का नाम ही सत्व की उपलब्धि है। क्योंकि जब तीनों समान होते हैं, तब तुम्हारे भीतर एक संगीत बजने लगता है अनजाना, जिसे तुमने पहले कभी नहीं सुना।

इसलिए मैं कहता हूं हिमालय मत भागना, क्योंकि वह कोशिश है चौबीस घंटे सत्व में जीने की। वह भी अतिशय है। इसलिए मैं संन्यासी को भी कहता हूं, घर में रहना। आठ घंटा संन्यासी, आठ घंटा दुकानदार। आठ घंटा निद्रा में पडे हैं, न संन्यासी, न दुकानदार। विश्राम भी तो चाहिए, संन्यास से भी, दुकान से भी! चौबीस घंटे संन्यासी बनने की कोशिश में भारत ने बहुत गंवाया। कि न तो वे संन्यासी संन्यासी हो पाए, क्योंकि वे हो नहीं सकते। उन्होंने कोशिश की कि तिपाई के दो पैर तोड़ दें और एक ही पैर पर खड़े हो जाएं; लंगड़ा गए। तो भारत का संन्यास बुरी तरह लंगड़ा गया और बुरी तरह धूल— धूसरित होकर गिरा। गरिमा पैदा नहीं हुई। संन्यासी संतुलित न रहा।

और तुम तोड़ नहीं सकते दूसरे दो पैर, क्योंकि जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं। पीछे के द्वार से वे प्रवेश कर गए। तो संन्यासी बाहर से दिखाएगा, उसकी कोई धन में उत्सुकता नहीं है, और भीतर से धन जोड़ेगा। बाहर से दिखाएगा, उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, लेकिन विस्तार में मन लगा रहेगा। बाहर से दिखाएगा कि मेरे जीवन में कोई तमस नहीं है, लेकिन भीतर भयंकर तमस घिरा रहेगा।

भाग नहीं सकते, जीवन के नियम के विपरीत नहीं चल सकते। जीवन के नियम का उपयोग करो। समझदार वह है, जो जीवन के नियम का उपयोग करके जीवन के पार उठ जाता है। नासमझ वह है, जो जीवन के नियम को तोड़ने की कोशिश करके बाहर होना चाहता है। वह और उलझ जाता है।

संन्यास एक कला है संतुलन की।

 

हे भारत, सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।

तुम्हारी श्रद्धा ही तुम हो। अगर तुम्हारी श्रद्धा आलस्य की है, तो तुम्हारा जीवन आलस्य की कहानी होगा। अगर तुम्हारी श्रद्धा रजस की है, महत्वाकांक्षा की है, दौड़ की है, तुम्हारा जीवन एक दौड़— भाग होगा। अगर तुम्हारी श्रद्धा सत्व की है, शांति की है, शून्य की है, शुभ की है, तो तुम्हारे जीवन में एक सुवास होगी, जो स्वर्ग की है, जो इस पृथ्वी की नहीं है। तुम्हारी श्रद्धा ही तुम हो।

अपनी श्रद्धा को ठीक से पहचान लो, क्योंकि न पहचानने से बड़ी जटिलता बढ़ती है। आदमी तो होता है आलसी, अंतःकरण आलसी। और आकांक्षा करता है उन सुखों को पाने की, जो राजसी को मिलते हैं। तुम मुश्किल में पड़ोगे। तुम्हारी श्रद्धा तुम हो। आदमी तो होता है राजसी, दौड़— धूप में पड़ा। और चाहता है, वह शांति मिल जाए, जो सात्विक को मिलती है। यह हो नहीं सकता।

मेरे पास, एक राजनीतिज्ञ हैं, वे कभी—कभी आते हैं। वे कहते हैं, शांति चाहिए। तुम्हें शांति मिल नहीं सकती। इसमें किसी का कसूर नहीं है। राजनीति की दौड़— धूप, तुम शांत हो कैसे सकते हो! और तुम अगर शांत हो गए, तो जिस दौड़— धूप में तुम लगे हो कि किस तरह मंत्री, किस तरह मुख्यमंत्री, किस तरह यह हो जाएं, वह हो जाएं—यह फिर कौन करेगा? तुम अगर शांत हो गए, तो यह भी शांत हो जाएगी।

तो मैंने उनसे कहा, तुम दो में चुन लो। मैं तुम्हें शांत कर सकता हूं, लेकिन तब राजनीति जाएगी; यह दौड़— धूप न रह जाएगी; यह पागलपन न रह जाएगा। और अगर तुम्हें यह पागलपन पूरा करना है, तो शांति की बात मत करो। मेरे पास आओ ही मत। तो उन्होंने कहा, ऐसा करता हूं एक दो साल का समय दें। दो साल और कोशिश कर लूं।

मंत्री वे हो गए हैं एक राज्य में, अब मुख्यमंत्री होने की चेष्टा है। एक दो साल! फिर तो शांत होना ही है!

यह आदमी शायद ही शांत हो पाए क्योंकि दो साल में कुछ पक्का है कि मुख्यमंत्री हो जाओ? और मुख्यमंत्री होकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में जाने की आकांक्षा न उठे, इसका कुछ पक्का है? दौड़ के लिए तो सदा दौड़ कायम रहती है। और की आकांक्षा तो सदा और की बनी रहती है।

वे कभी नहीं आएंगे। क्योंकि जिसे आना है, वह अभी आता है। जिसको समझ आ गई, वह अभी आता है। जो कहता है, कल आएंगे, उसको समझ नहीं है, तभी तो कल के लिए टाल रहा है। कल का किसको भरोसा है? और जो आज कल के लिए टाल रहा है, वह कल भी कल के लिए टालेगा। उसकी कल पर टालने की आदत हो जाएगी।

अपनी श्रद्धा को ठीक से पहचानो और अपनी श्रद्धा से भिन्न मत मांगो। अगर भिन्न मांगना है, तो अपनी श्रद्धा को रूपांतरित करो। अन्यथा तुम बड़ी बिगचन में पड़ जाओगे, भीतर बड़ा बेबूझ हो जाएगा; एक पहेली हो जाओगे।

सभी लोग पहेली हो गए हैं। लोग ऐसा सुख चाहते हैं, जो राजसी को मिलता है; और ऐसी शांति चाहते हैं, जो सात्विक को मिलती है; और ऐसा विश्राम चाहते हैं, जिसको आलसी भोगता है। बड़ी मुश्किल है; वे सभी एक साथ चाहते हैं। कुछ भी उपलब्ध नहीं होता।

भीतर को ठीक से पहचानो, क्योंकि तुम्हारी श्रद्धा ही तुम्हारा जीवन है।

जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है। और अगर तुमने ठीक से भीतर को पहचाना, तो तुम जल्दी ही यह समझ जाओगे कि तृप्ति किसी एक से नहीं हो सकती। उन तीनों का संयोग चाहिए। और तीनों के संयोग में ही तृप्ति फलती है, परितोष झरता है। और तीनों के संयोग से ही एक की प्रतीति शुरू होती है। और तीनों का संयोग धीरे— धीरे— धीरे तुम्हें उस एक की तरफ ले जाता है, जो गुणातीत है।

पाना तो उसे ही है, जो त्रिगुण के बाहर है। उस एक की ही खोज करनी है। तीनों पैरों को तुम एक ही अनुपात का बना लो, एक ही बल का, और तुम पाओगे कि तिपाई सध गई। तिपाई सध गई, कि सब सध गया। अब तुम तिपाई पर पैर रख सकते हो और एक की तरफ यात्रा शुरू हो सकती है।

जो सात्विक हैं, वे देवों को पूजते हैं……।

 

ये प्रतीक हैं। इन्हें भी खयाल में ले लो। जो सात्विक है, उसके मन की पूजा सत्व की तरफ होती है, स्वभावत:। क्योंकि तुम जो हो, और तुम जो होना चाहते हो, उसी का तुम्हारे मन में आदर होता है। अगर तुम राजनेता आता है और उसके स्वागत के लिए स्टेशन पर पहुंच जाते हो, तो भला तुम राजनीति में न हो, लेकिन उसके स्वागत की खबर बताती है कि तुम राजसी हो। मौका न मिला होगा तुम्हें उपद्रव में पड़ने का, जिंदगी में उलझन होगी, पत्नी है, बच्चे हैं, काम—धंधा है और तुम नहीं पड़ पाते, लेकिन दर्शन करने तुम राजनीतिज्ञ का पहुंच जाते हो। तुम्हारी श्रद्धा! कि फिल्म अभिनेता आया है, उसके पास भीड़ लगा लेते हो—तुम्हारी श्रद्धा। कि संन्यासी आया, और तुम उसके दर्शन को पहुंच जाते हो—तुम्हारी श्रद्धा। तुम्हारी श्रद्धा ही तुम्हें संचारित करती है।

सात्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, दिव्यता को पूजते हैं।

दिव्यता का अर्थ है, जिनके जीवन में संगीत बजने लगा तीनों की एकता का। अभी वे एक को उपलब्ध नहीं हुए हैं; अभी यात्रा बाकी है, लेकिन बड़ा पड़ाव आ गया, तिपाई सध गई। उनके जीवन में स्वर्ग का संगीत बजने लगा। बाकी तो प्रतीक हैं कि स्वर्ग में देवता रहते हैं। ऐसा स्वर्ग कहीं नहीं है। यहीं जमीन पर तुम्हारे आस—पास रहते हैं। लेकिन तुम्हारी सत्य की श्रद्धा होगी, तो दिखाई पड़ेंगे। सत्व की श्रद्धा न होगी, तो दिखाई न पड़ेंगे। क्योंकि श्रद्धा आंख है।

तुम्हारे पास ही, हो सकता है कि तुम्हारे पड़ोस में कोई रहता हो; हो सकता है, तुम्हारे घर में रहता हो, हो सकता है, तुम्हारी पत्नी में हो; हो सकता है, तुम्हारे पति में हो। लेकिन सत्व की आंख होगी, तो दिखाई पड़ेगा। नहीं होगी, तो नहीं दिखाई पड़ेगा। अगर पति सात्विक हो जाए और पत्नी की आंख सत्व की न हो, तो उसे कुछ और दिखाई पड़ेगा।

मेरे पास कई स्त्रियां शिकायत लेकर आती हैं कि आप बरबाद मत करो, हमारे पति को मत उलझाओ इस ध्यान में। अभी तो बाल—बच्चे बड़े हो रहे हैं। और अभी तो काम— धंधा शुरू ही हुआ है। और अगर वे ध्यान में उलझ गए, तो क्या होगा?

पति में अगर सत्व पैदा हो रहा है, तो पत्नी को दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि उसकी श्रद्धा अभी रजस की है; वह कहती है, अभी थोड़े और गहने चाहिए। वह पति के ध्यान की कुर्बानी के लिए राजी है, अपने और थोडे गहनों की कुर्बानी के लिए राजी नहीं है। वह कहती है, अभी तो मकान बहुत छोटा है, थोड़ा मकान तो बड़ा हो जाने दो। अभी बैंक में बैलेंस है ही क्या! बुढ़ापे में क्या होगा? अगर कल पति को कुछ हो जाए, तो हम क्या करेंगे?

न तो पति की आत्मा से कोई मतलब है, न पति के जीवन से कोई मतलब है। अगर पति को कुछ हो जाए, इसकी चिंता है। तो बैंक में बैलेंस होना चाहिए, चाहे पति रहे, चाहे जाए। श्रद्धा रजस की है।

तो पति ध्यान करने बैठे, तो पत्नियां बाधा डालती हैं। अगर पत्नी में श्रद्धा पैदा हो जाए सत्व की, तो पति बेचैन हो जाता है। पति मेरे पास आते हैं, वे कहते हैं, यह आपने क्या कर दिया! एक उपद्रव खड़ा कर दिया। अब पत्नी को ज्यादा रस नहीं है कामवासना में। वह ध्यान में लगी रहती है! हम कहां जाएं? हमारी कामवासना तो मर नहीं गई! तो कृपा करें। अभी तो मैं जवान हूं वे कहते हैं। ये तो बुढ़ापे की बातें हैं। पचास साल के बाद आप इसको सिखाते ध्यान, तो ठीक था।

जो श्रद्धा होती है, वह दिखाई पड़ता है। ध्यान जैसी घटना घट रही हो, उसमें भी सौभाग्य नहीं मालूम पड़ता। पत्नी शांत हो रही है, इसमें भी पीड़ा लगती है।

तुम चकित होओगे, लोगों ने मुझसे आकर कहा है, पत्नियों ने कहा है कि पति अब क्रोध नहीं करते, इससे हमें हैरानी होती है। वे पहले क्रोध करते थे, तो ठीक था। अब ऐसा लगता है कि उन्हें उपेक्षा हो गई है। अक्रोध में उपेक्षा दिखती है। अक्रोध में एक घटना नहीं दिखती कि इस आदमी के जीवन में एक फूल खिला है, हम आनंदित हों। अक्रोध में दिखता है कि इस आदमी को अब रस नहीं रहा; इसलिए हम गाली भी दें, तो यह सुन लेता है। क्योंकि इसको कोई मतलब ही नहीं है। उपेक्षा से भर गया है यह आदमी।

और ध्यान रखना, लोग उपेक्षा पसंद नहीं करते, चाहे गाली दो, वे उसके लिए भी राजी हैं, कम से कम इतना रस तो रखते हो कि गाली देते हो। उपेक्षा बहुत काटती है। तटस्थ हो गए! उदासीन हो गए! पत्नी घबडाती है कि यह तो हाथ के बाहर चला आदमी। ऐसे उदास होते—होते एक दिन घर से भाग जाएगा; फिर हम क्या करेंगे? वह चाहती है कि पति नाराज हो, लड़े, मारे—पीटे, तो भी चलेगा, ध्यान न करे।

सत्य की श्रद्धा हो, तो ही सत्व दिखाई पड़ता है।

देवता का अर्थ है, जिनके जीवन में संतुलन आ गया, जिनके जीवन में सत्व ने ऐसी संतुलन की सुगंध दे दी कि जो अब करीब—करीब मुक्ति के किनारे खड़े हैं। स्वर्ग वह सीमा है, जहां से आदमी मोक्ष में छलांग मार ले। थोड़े अटके हैं, अटकाव यह है कि उनको अभी संगीत से ही रस पैदा हो गया है; इसको भी बड्वे की हिम्मत करनी पड़ेगी। यह सोने की जंजीर है, बड़ी प्यारी लगती है।

इसलिए हम देवताओं को मुक्त पुरुष नहीं कहते। और जब कोई बुद्ध पुरुष पैदा होते हैं, तो हमारे’ पास कथाएं हैं कि देवता उन्हें सुनने आते हैं कि हमें मुक्ति का मार्ग दें। उनको आना पड़ेगा, क्योंकि अब वे सत्व के सुख से बंध गए हैं। स्वर्ग भी बंधन है। बड़ा प्यारा बंधन है, बड़ी मिठास है उसमें, लेकिन है काटा। कितनी ही मीठी पीड़ा देता हो, उसे भी निकाल देना होगा।

जिनकी सत्य की श्रद्धा है, वे देवों को पूजते हैं। वे जहां भी दिव्यता को पाएंगे, वहा उनका सिर झुक जाएगा।

जिनकी राजस श्रद्धा है, वे यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं.। राक्षस का अर्थ है, जिसके जीवन में रजस प्रगाढ़ हो गया। सत्व और तम दोनों दब गए, बस रजस प्रगाढ़ हो गया।

बड़े राजनेता यानी राक्षस। तुम उस तरह सोचते नहीं अब, क्योंकि तुम इन प्रतीकों का अर्थ भूल गए। तुम सोचते हो, रावण राक्षस था। किसलिए? सफल से सफल राजनीतिज्ञ था! स्वर्ण की लंका बसा दी थी। और क्या चाहिए सफल राजनीतिज्ञ के लिए? तुम्हारे सफल राजनीतिज्ञ मिट्टी के घर भी तो नहीं बसा पाते हैं लोगों के लिए; भूखा मरता है समाज। लेकिन लंका में स्वर्ण का बसा दिया था नगर। और कैसा सफल राजनीतिज्ञ चाहिए?

रावण सफल से सफल राजनीतिज्ञ था, कुशल से कुशल कूटनीतिज्ञ था; प्रगाढ़ शक्तिशाली था। दौड़ उसकी महान थी। कथा तो यह है कि अगर उसे न हटाया गया होता स्वयंवर से, तो उसने सीता को जीत लिया होता; राम खाली हाथ घर वापस लौटे होते। उसे हटाया गया। डर था। क्योंकि वह इतना कुशल राजनीतिज्ञ था और इतना शक्तिशाली था कि एक सिर नहीं था उसके; उसके दस सिर थे। सभी राजनीतिज्ञों के होते हैं। एक चेहरा नहीं, दस!

सभी राजनीतिज्ञ दशानन हैं। उनका कुछ पक्का नहीं है कि वे कौन—सा चेहरा तुम्हें दिखा रहे हैं। जब जैसी जरूरत हो, वे वैसा चेहरा दिखाते हैं। जब वोट मांगनी हो, तो मुस्कुराते हैं—एक चेहरा। जब वोट मिल गई, तब वे ऐसा देखते हैं, जैसे तुम्हें पहचानते ही नहीं—दूसरा चेहरा। जब वे ताकत में हैं, तब एक चेहरा; जब वे ताकत में नहीं, तब उनके कैसे हाथ जुड़े हैं और सिर झुका है, कि आपके चरणों के सेवक हैं। दशानन! उनके दस चेहरे हैं। और एक काटो, तत्‍क्षण दूसरा पैदा हो जाता है। इसलिए राजनीतिज्ञ को मारना मुश्किल है।

स्वयंवर भरा था, तो कथा यह है कि यह देखकर देवताओं ने कि रावण बाजी मार ले सकता है..। कई कारण थे, एक तो वह शिव का भक्त था।

तुम राजनीतिज्ञों को सदा पाओगे किसी न किसी का भक्त। कोई जा रहा है सत्य सांईबाबा। कोई नहीं तो दिल्ली में बहुत ज्योतिषी बैठे हैं, उनकी ही भक्ति में लगा है। हनुमान चालीसा पढ़ रहा है, इलेक्शन जीतना है!

इस रावण ने अपने सिर चढ़ा—चढ़ाकर, कहते हैं, शिव को भी राजी कर लिया था। शिव का भक्त था और वह धनुष भी शिव का था। यह तोड़ देता; और यह आदमी बलशाली था।

तो कथा यह है कि देवताओं ने यह देखकर कि यह तो खतरा हो जाएगा। और राम तो विनम्र व्यक्ति हैं, वे आगे आकर खड़े भी न होंगे, यह रावण तो उछलकर खड़ा हो जाएगा और धनुष तोड़ देगा। राम को शायद मौका ही न मिले; शायद कोई पूछे ही न कि राम भी आए थे। और राम तो पीछे खड़े रहेंगे। राम के होने का अर्थ ही है कि जो पीछे खड़ा रहे, जिसको आगे आने की दौड़ न हो; जो महत्वाकांक्षी न हो।

लक्ष्मण भी ज्यादा महत्वाकांक्षी था राम से। वह दो—चार दफा उठ आया बीच—बीच में। और उसने कहा कि भाई, अगर मुझे आज्ञा दें, तो अभी इस धनुष—बाण को तोड़ दूं। उसको रोकना पड़ा, कि तू बैठ, तू थोड़ा तो ठहर। वह भी तोड्ने को बहुत तत्पर था। वह भी महत्वाकांक्षी था; वह भी राजनीतिज्ञ था।

रावण को हटाया। देवताओं ने जोर से शोरगुल किया आकर स्वयंवर के आस—पास, कि रावण तू यहां क्या कर रहा है? लंका में आग लग गई है! और जब लंका में आग लगी हो.।

यह भी बड़ा सोचने जैसा है। राजनीतिज्ञ प्रेम की कुर्बानी दे सकता है; राजधानी में आग लगी हो, इसकी कुर्बानी नहीं दे सकता। भागा लंका की तरफ, भूल गया सीता और सब और यह प्रेम और यह सब उपद्रव। क्योंकि राजनीतिज्ञ प्रेम की कुर्बानी दे सकता है, पद की कुर्बानी नहीं दे सकता। इसलिए तुम राजनीतिज्ञों को हमेशा पाओगे कि अगर उनको पत्नी का त्याग करना पड़े, वे तैयार हैं। अगर विवाह न कर पाएं, तो तैयार। लेकिन उनका स्वयंवर पद से है।

अन्यथा रावण ने कहा होता, हो जाए; जल जाए लंका। अगर सच में ही प्रेम होता सीता के प्रति। लेकिन हृदय होता ही नहीं राजनीतिज्ञ के पास, प्रेम कहां से होगा! वह तो जीतने आया था। इसको भी एक जीत बनाने आया था। इसको भी, अपने जीत के जो हजार चांद थे, उसमें एक चांद और जोड़ देना था, कि सीता को भी जीत लाया। जैसे— लोग ट्राफी जीत लाते हैं। सीता एक ट्राफी थी, जिसको वह बैंड—बाजे बजाकर लंका में ले जाता और कहता कि देखो, इसको भी जीत लाया। रानियां उसके पास और भी बहुत थीं। कुछ रानियों की कमी न थी। कोई सीता से सुंदर कम थीं, ऐसा भी न था। भरा—पूरा रनिवास था। कोई सीता से लेना—देना न था। अन्यथा वह कहता कि ठीक।

भाग गया। वह देवताओं की साजिश थी, सत्व का षड्यंत्र था कि इस राजसी व्यक्ति को हटा लिया जाए। सीता राम के योग्य थी, राम के लिए थी। सत्व का सत्व से मिलन हो सके, इसलिए देवताओं ने व्यवस्था की।

यह रावण राक्षस है। इससे तुम यह मत समझना कि राक्षस कोई जाति है मनुष्यों की। राक्षस गुण है, वह राजनीतिज्ञ का नाम है; पद—लोलुप का नाम है।

राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं…….।

वे उनको पूजते हैं, जिनके पास शक्ति है, या जिनके पास पद है, या जिनके पास धन है। कुबेर यक्ष है। कुबेर का अर्थ है, जिसके पास सब से बड़ा धन है सारे जगत में। जो खजांची है स्वर्ग के देवताओं का, ट्रेजरर, कुबेर, वह यक्ष है। तो या तो धन की पूजा है या पद की पूजा है। लेकिन दोनों ही पूजा के पीछे शक्ति की पूजा है।

अगर ऐसा व्यक्ति देवी—देवताओं की भी पूजा करता है, तो भी शक्ति के लिए ही करता है। वह मलता है, और दो शक्ति! ऐसी शक्ति दो कि सब को पराजित कर दूं! मैं पराजित न हो पाऊं, अपराजेय हो जाऊं! राजस शक्ति की मांग करता है।

और अन्य जो तामस पुरुष हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं। फिर तीसरा वर्ग है तमस से भरे लोगों का। उनकी आकांक्षा इतनी ही है कि उनका आलस्य अखंडित रहे। कोई उन्हें जगाए न; उनकी आकांक्षाएं कोई और पूरा कर दे; वे पड़े रहें। वे अपनी मूर्च्छा में सोए रहें, वे शराब पीए रहें, वे नींद में डूबे रहें, वे प्रमाद में रहें; कोई और पूरा कर दे उनकी जरूरतों को। तो भूत और प्रेत।

भूत—प्रेत से अर्थ है, ऐसे लोग जो खुद भी तमस—प्रधान हैं. ऐसी आत्माएं जो खुद भी तमस—प्रधान हैं। वे इनकी पूर्ति करती रहती हैं। इस तरह के लोग हैं। तुम्हें वेश्या के घर ले जाने वाला एक एजेंट भी होता है, वह भूत—प्रेत है। तुम्हें धन की ओर लगाने वाला, जुआ खिलाने वाला भी होता है। तुम्हें लाटरी में दाव लगाने की उत्सुकता पैदा करवाने वाला, टिकट बेचने वाला भी होता है। वे तुम्हारे आलस्य को’ बढ़ाते हैं। वे कहते हैं, हम कर देंगे; तुम मजे से सोए रहो, तुम जरा—सा इतना सहारा दे दो, सब ठीक हो जाएगा।

ठीक वैसी ही व्यवस्था आत्माओं की भी है। जैसे ही शरीर छोड़ती हैं आत्माएं…। तीन तरह की आत्माएं हैं, क्योंकि तीन तरह के गुण हैं। प्रेत को तुम राजी कर सकते हो।

तुममें से बहुत—से प्रेत को ही राजी करने को उत्सुक हैं। कोई तुम्हें ताबीज दे दे, जिससे बीमारी ठीक हो जाए; कोई तुम्हें भभूत दे दे, जिससे खजाना मिल जाए। तुम्हारी आकांक्षा ऐसी है, तुम्हें कुछ न करना पड़े, तुम ऐसे आलस्य में पड़े रहो, खजाने तुम्हारी तरफ आते जाएं। प्रेत उत्सुक कर लेते हैं ऐसे लोगों को। वे जीवित भी हैं, शरीर में भी हैं, और शरीर के बाहर भी हैं।

तुम्हारी श्रद्धा तुम्हें ले जाती है। तुम जाते हो साधु—संतों के पास, लेकिन हो सकता है, तुम साधु—संतों के पास जा ही न रहे हो। तुम्हारी श्रद्धा पर निर्भर है। हो सकता है, तुम साधु के पास जा रहे हो कि उसके पास जाने से धन की वर्षा हो जाएगी।

एक आदमी, मैं दिल्ली से बंबई आ रहा था, हवाई जहाज पर मुझे मिल गए। मेरे पास ही बैठे थे। उन्होंने कहा कि बड़ी कृपा हो गई, यह मौका मिल गया, संयोग। बस, आपका आशीर्वाद चाहिए। मैंने कहा कि ठीक; इसमें भी क्या कोई नहीं करता है, आशीर्वाद देने में।

पंद्रह दिन बाद वे जबलपुर पहुंचे मुझसे मिलने। पैर पर गिर पड़े, और कहने लगे, गजब हो गया आपके आशीर्वाद से। मैंने कहा, क्या हुआ? मुझको मत फंसाना। वह आशीर्वाद मैंने तुम्हें दिया, यह भी पक्का नहीं है। सिर्फ न कहना भद्दा लगेगा, इसलिए मैं चुप रहा। हुआ क्या?

उसने कहा, अब आप कुछ भी कहो। मैं मुकदमा जीत गया। दस लाख रुपए मुकदमे में जीतने से मिल रहे हैं। और सच बात यह है कि जीतना मुझे था नहीं; नियमानुसार मुझे हारना चाहिए था। वह दावा मेरा गलत था, लेकिन आपकी कृपा! मैंने कहा कि तुम मुझे मत फंसाओ!

अब यह आदमी आशीर्वाद मांग रहा है; एक गलत मुकदमा है, वह जीतने की आकांक्षा है। यह आदमी संत के पास पहुंच ही नहीं सकता। यह जहां भी जाएगा, इसकी श्रद्धा ही इसको खराब करती रहेगी।

लोग मुझसे आशीर्वाद तब से मलते हैं, तो मैं पूछता हूं पहले बता दो, तुम्हारा इरादा क्या है? तुम किसी भूत—प्रेत की तलाश में तो नहीं हो? नहीं तो पीछे तुम मुझे फसाओगे।

क्या है तुम्हारी आकांक्षा? किसलिए आशीर्वाद चाहते हो? तुम क्या मांगते हो, वह तुम्हारे अंतःकरण की श्रद्धा से उपजता है।

कृष्ण कहते हैं, ऐसे तीन तरह के लोग हैं। तुम जरा अपनी खोज करना, तुम किस तरह के हो।

तुम्हें भीड़ दिखाई पड़ेगी साईंबाबा के पास। वह भीड़ उनकी है, जो भूत—प्रेत की तलाश कर रहे हैं। क्योंकि ऐसे ही लोग चमत्कृत हो सकते हैं इस बात से कि हाथ से घड़ी निकल आई। तुम किसी जादूगर को खोज रहे हो, मदारी को खोज रहे हो कि संत को खोज रहे हो? कि हाथ से राख गिर गई और हाथ बिलकुल खाली था; कि हाथ से शंकरजी की पिंडी निकल आई। तुम पागल हो गए हो! और कितनी ही पिंडी निकल आएं शंकरजी की, क्या होगा?

और कितनी घड़िया निकालते हैं! और बड़े मजे की बात है, स्विस मेड घड़ियां निकलती हैं। दो ही उपाय हैं। या तो बाजार से खरीदी जाती हैं। नहीं तो स्वर्ग मेड होतीं! स्विस मेड! और या फिर भूत—प्रेत लगा रखे हैं, जो चोरी करके ले आते हैं। दोनों हालत में नाजायज बात है।

सब घड़िया बाजार से खरीदी जा रही हैं।

साईंबाबा एक घर में बंबई मेहमान होते थे, पारसी घर में। वह महिला मेरे पास आई। और उसने कहा, मेरी आंखें खुल गईं। लेकिन अब मैं दूसरों को समझाती हूं वे मेरी सुनते नहीं। मेरे ही घर में रुकते थे और मैंने ही दूसरे पारसियों में उनका नाम प्रचारित किया। और जिनमें मैंने नाम प्रचारित किया, वे भी मेरी अब नहीं सुनते हैं।

मैंने पूछा, हुआ क्या? उसने कहा, बड़ी उलझन की बात हो गई। पिछली बार जब वे जाने लगे, तो एक बैग भूल से छूट गया, उसमें सात सौ घड़ियां थीं। तब मेरी आंख खुली कि घड़ियां कहां से निकलती हैं! अब मैं लोगों को समड़ाती हूं तो साईंबाबा ने उन लोगों को कह दिया है कि मेरे विपरीत अशुभ शक्तियां काम कर रही हैं। उन्होंने उसका मन भ्रष्ट कर दिया है। अशुभ शक्तियां, शैतान काम कर रहा है। और उसी शैतान ने वह बैग और घड़ियां घर में रख दीं, ताकि उसकी श्रद्धा उठ जाए। और लोग मानते हैं कि साईंबाबा ठीक कह रहे हैं और यह बुढ़िया गलत कह रही है।

लोगों की श्रद्धा, लोग मानना चाहते हैं, इसलिए मानते हैं। लोग चमत्कार चाहते हैं, क्योंकि उनकी वासना चमत्कार से ही तृप्त हो सकती है। आलसी हैं। घड़ी पानी हो सौ रुपये की, तो कौन—सी मुश्किल है! थोड़ी—सी मेहनत करो और सौ रुपये की घड़ी मिल जाती है। उसके लिए सत्य साईंबाबा के होने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन आलसी उतनी मेहनत भी नहीं करना चाहता। वह चाहता है, कोई पैदा कर दे घड़ी।

फिर भरोसा भी आता है कि जो घड़ी पैदा करता है, अगर चाहे तो घड़ियाल भी पैदा कर सकता है। जो इतनी सी चीज पैदा कर देता है, वह बड़ी भी चीज पैदा कर सकता है। है तो चमत्कारी, अब कृपा की जरूरत है। तो आज घड़ी पैदा की, कल घड़ियाल पैदा करेगा; आज जरा—सी राख दी, कल देखना अमृत दे देगा। आकांक्षा बढ़ती चली जाती है।

तुम जब तक मांगते हो, तब तक तुम संत के पास न आ सकोगे।

देवों की पूजा वे लोग करते हैं, जो धन्यवाद देने आते हैं; जो अहोभाव प्रकट करने आते हैं; जो कहते हैं, इतना मिला है वैसे ही कि उसका धन्यवाद देने आए हैं। संतों के निकट वे ही लोग पहुंच पाते हैं, जो सिर्फ अहोभाव प्रकट करने आते हैं। नहीं तो तुम राजसी पुरुषों के पास पहुंचोगे या तुम तामसी पुरुषों के पास पहुंचोगे।

कहां तुम जाते हो, ठीक से पहचानना। अगर तुम्हें हिंदुस्तान भर के तामसी इकट्ठे देखने हों, तो सत्य साईंबाबा के पास मिल जाएंगे। अलग— अलग खोजने की जरूरत नहीं है। तुम अकारण कहीं नहीं जाते हो। तुम्हारी श्रद्धा ही तुम्हें कहीं ले जाती है।

 

आज इतना ही।

 

 

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/2016/11/03/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-178/feed/ 0
गीता दर्शन–(प्रवचन–177) /2016/11/03/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-177/ /2016/11/03/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-177/#respond Thu, 03 Nov 2016 11:35:43 +0000 /?p=6994 सत्‍य की खोज और त्रिगुण का गणित—(प्रवचन—पहला)

अध्‍याय—17   सूत्र—

(श्रीमद्भगवद्गीता अथ सप्तदशोऽध्याय)

अर्जन उवाच:

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धायान्विता।

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण तत्त्वमाहो रजस्तम:।। 1।।

श्रॉभगवानवाच:

त्रिविधा भवति आ देहिनां आ स्वभावजा।

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु।। 2।।

 

इस प्रकार भगवान के वचनों को सुनकर अर्जुन बोला, हे कृष्ण, जो मनुष्य शास्त्र— विधि को त्यागकर केवल श्रृद्धा मे युक्त हुए देवादिकों का पूजन करते है, उनकी स्थिति फिर कौन—सी है? क्या सात्विकी है अथवा राजसी है या तामसी है?

इस प्रकार अर्जुन के पूछने पर श्री भगवान बोले हे अर्जुन, मनुष्यों की वह बिना शास्त्रीय संस्कारों से केवल स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रृद्धा सात्विकी और राजसी तथा तामसी, ऐसे तीनों कार की ही होती ह्रै उसको तू मेरे ते सुन।

 

त्य की खोज उतनी ही पुरानी है, जितना मनुष्य। शायद उससे भी ज्यादा पुरानी है। मेरे देखे ऐसा ही है, मनुष्य से भी ज्यादा पुरानी सत्य की खोज है। स्वभावत:, प्रश्न उठेगा कि मनुष्य से पुरानी यह खोज कैसे हो सकती है! खोजेगा कौन?

मनुष्य से पुरानी है खोज सत्य की, ऐसा जब मैं कहता हूं तो उसका अर्थ है कि सत्य को खोजने की आकांक्षा से ही मनुष्य का जन्म हुआ है। मनुष्य—मनुष्य है, क्योंकि सत्य को खोजता है। पशुओं में से जो चेतना निखरकर मनुष्य हुई है, वह सत्य की किसी अज्ञात खोज के कारण हुई है।

सभी पशु मनुष्य नहीं हो गए हैं; सभी पौधे मनुष्य नहीं हो गए हैं। अनंत आत्माएं हैं, उनमें से बड़ा छोटा—सा खंड मनुष्य हुआ है। यह मनुष्य कैसे हो गया है? यह सारा अस्तित्व क्यों मनुष्य नहीं हो गया है? छोटी—सी चेतना की धारा ऊपर उठी है। कौन इसे ऊपर उठा लाया है? सत्य की एक अनजानी खोज इसे ऊपर उठा लाई है। मनुष्य और पशुओं में यही भेद है। पशु तृप्त हैं; जी रहे हैं।

लेकिन जीवन क्या है, इसे जानने की अभीप्सा नहीं है। जीवन कहां से है, इसे जानने की कोई जिज्ञासा नहीं है। पशुओं के जीवन में जीवन तो है, चैतन्य का आविर्भाव नहीं; ध्यान नहीं जागा, समाधि की आकांक्षा नहीं जागी; सत्य को जानने की प्यास नहीं उठी। इसलिए कहता हूं, मनुष्य से भी ज्यादा पुरानी खोज है सत्य की।

मनुष्य के कारण तुम सत्य की खोज करते हो, ऐसा नहीं; सत्य की खोज करने के कारण तुम मनुष्य हुए हो, ऐसा। लेकिन मनुष्य हो जाने से सत्य की खोज पूरी नहीं हो जाती; बस शुरू होती है। जो अब तक अचेतन थी, वह चेतन बनती है, जो अब तक अनजानी थी, वह जानी—मानी बनती है, जिसे अभी तुम ऐसे अंधेरे में टटोलते थे, अब तुम उसे दीया जलाकर खोजते हो।

इसलिए मनुष्यों में भी केवल थोड़े से ही लोग मनुष्य हो पाते हैं; शेष मनुष्य होकर भी चूक जाते हैं। सभी मनुष्य भी सत्य के खोजी नहीं मालूम पड़ते। उनमें भी बड़ा न्यूनतम अंश सत्य की खोज पर निकलता है। कठिन है यात्रा; दुर्गम है मार्ग, फिसलने की, गिर जाने की अनंत संभावनाएं हैं, पहुंचने की बहुत कम।

लेकिन जो पहुंच जाते हैं, वे धन्यभागी हैं। वे जीवन के शिखर को उपलब्ध होते हैं। वे सत्य को ही नहीं पा लेते, वे सत्यरूप हो जाते हैं। वे परमात्मा को ही नहीं जान लेते, वे परमात्मा ही हो जाते

अर्जुन खोजती हुई मनुष्यता का प्रतीक है। अर्जुन पूछ रहा है। और पूछना किसी दार्शनिक का पूछना नहीं है। पूछना ऐसा नहीं कि घर में बैठे विश्राम कर रहे हैं और गपशप कर रहे हैं। यह पूछना कोई कुतूहल नहीं है, जीवन दाव पर लगा है। युद्ध के मैदान में खड़ा है। युद्ध के मैदान में बहुत कम लोग पूछते हैं। इसलिए तो गीता अनूठी किताब है।

वेद हैं, उपनिषद हैं, बाइबिल है, कुरान है; बड़ी अनूठी किताबें हैं दुनिया में, लेकिन गीता बेजोड़ है। उपनिषद पैदा हुए ऋषिओं के ख्यात कुटीरों में, उपवनों में, वनों में। जंगलों में ऋषिओं के पास बैठे हैं उनके शिष्य। उपनिषद का अर्थ है, पास बैठना। ऐसे पास बैठे शिष्यों से एकांत गुफ्तगू है। ऐसी दो चेतनाओं के बीच चर्चा है। लेकिन बड़ी विश्रामपूर्ण है। आसान है कि उपनिषदों में महाकाव्य भरा हो। उपनिषद पैदा हुए शांत गिल मौन एकांत में। लेकिन गीता अनूठी है; युद्ध के मैदान में पैदा हुई है। किसी शिष्य ने किसी गुरु से नहीं पूछा है; किसी शिष्य ने गुरु की एकांत कुटी में बैठकर जिज्ञासा नहीं की है। युद्ध की सघन घड़ी में, जहां जीवन और मौत दाव पर लगे हैं, वहां अर्जुन ने कृष्ण से पूछा है। यह दाव बड़ा महत्वपूर्ण है। और जब तक तुम्हारा भी जीवन दाव पर न लगा हो अर्जुन जैसा, तब तक तुम कृष्ण का उत्तर न पा सकोगे।

कृष्ण का उत्तर अर्जुन ही पा सकता है। इसलिए गीता बहुत लोग पढ़ते हैं, कृष्ण का उत्तर उन्हें मिलता नहीं। क्योंकि कृष्ण का उत्तर पाने के लिए अर्जुन की चेतना चाहिए।

इसलिए मैं नहीं चाहता कि मेरे संन्यासी भाग जाएं पहाड़ों में। जीवन के युद्ध में ही खड़े रहें, जहां सब दाव पर लगा है, भगोड़ापन न दिखाएं, पलायन न करें, जीवन से पीठ न मोडे; आमने—सामने खड़े रहें। और उस जीवन के संघर्ष में ही उठने दें जिज्ञासा को। तो तुम्हें किसी दिन कृष्ण का उत्तर मिल सकता है। पर अर्जुन की चेतना चाहिए; युद्ध चाहिए चारों तरफ।

और युद्ध है। तुम जहां भी हो—बाजार में, दुकान में, दफ्तर में, घर में—युद्ध है। प्रतिपल युद्ध चल रहा है, अपनों से ही चल रहा है। इसलिए कथा बड़ी मधुर है कि उस तरफ भी, अर्जुन के विरोध में जो खड़े हैं, वे ही अपने ही लोग हैं, भाई हैं, चचेरे भाई हैं, मित्र हैं, सहपाठी हैं, संबंधी हैं।

अपनों से ही युद्ध हो रहा है। पराया तो यहां कोई है ही नहीं। जिससे भी लड़ रहे हो, वह भी अपना ही है; दूर का, पास का, कोई नाता—रिश्ता है। सारा जीवन ही संबंधी है। यह पूरा जीवन ही परिवार है और परिवार ही बंटा है और लड़ रहा है। युद्ध दुश्मनों के बीच में नहीं है, युद्ध अपनों के ही बीच में है। युद्ध में तुम किसी और को न मारोगे, अपनों को ही मारोगे। युद्ध में तुम अपनों से ही मारे जाओगे।

पराए होते, कठिनाई न थी; दुश्मन होते, कठिनाई न थी। अर्जुन के मन में द्वंद्व खड़ा हो गया है, सब अपने हैं। और इनको मारकर क्या पाऊंगा? क्या मिलेगा?

अर्जुन भागना चाहता है। वह चाहता है, किसी ऋषि की कुटी में चला जाए; अरण्य में वास करे; शांत बैठे; ध्यान में डूबे। उसके मन में बड़ा विराग उठा है। लेकिन कृष्ण उसे खींचते हैं, भागने नहीं देते। उसके मन में विराग उठा है, वह जंगल जाना चाहता है। कृष्ण उसे युद्ध के मैदान में रोके रखते हैं।

कृष्ण का प्रयोजन क्या है? वे क्यों समझा रहे हैं कि तू रुक; भाग मत! क्योंकि जो भाग गया स्थिति से, वह कभी भी स्थिति के ऊपर नहीं उठ पाता। जो परिस्थिति से पीठ कर गया, वह हार गया। भगोड़ा यानी हारा हुआ। जीवन ने एक अवसर दिया है पार होने का, अतिक्रमण करने का। अगर तुम भाग गए, तो तुम अवसर खो दोगे।

भागों मत, जागो। भागो मत, रुको। ज्यादा जागरूक, ज्यादा सचेतन बनो; ज्यादा जीवंत बनो, ज्यादा ऊर्जावान बनो, ज्यादा विवेक, ज्यादा भीतर की मेधा उठे। तुम्हारी मेधा इतनी हो जाए कि समस्याएं नीचे छूट जाएं।

समस्याओं से भागकर तुम समस्याओं से छोटे रह जाओगे। उनसे लड़कर उठो। उनको सीढ़ियां बनाओ। जिनको तुमने पत्थर समझा है मार्ग का, वे पत्थर ही हैं, ऐसा मत समझो, वे सीढ़ियां भी बन सकते हैं। उन पर पैर रखो और तुम ऊंचाई पर पहुंचोगे।

कृष्ण चाहते हैं, अर्जुन युद्ध से निखरकर उठे। अर्जुन चाहता है, भाग जाए।

कृष्ण ने भागने न दिया अर्जुन को और जगत को संन्यास का पहला ठीक—ठीक संदेश दिया है। वैसा संदेश बुद्ध से भी नहीं मिला, महावीर से भी नहीं मिला; क्योंकि उन सब ने भागने वाले

 

को स्वीकार कर लिया। कृष्ण की व्यवस्था जटिल है, लेकिन बड़ी बहुमूल्य है।

और इसलिए मैं राजी हुआ गीता पर बोलने को, क्योंकि गीता में मनुष्य का भविष्य छिपा है। अब न तो महावीर का संन्यासी बच सकता है दुनिया में, न बुद्ध का संन्यासी बच सकता है। दुनिया ही न रही वह; भगोड़ों का उपाय ही न रहा। अब तो सिर्फ कृष्ण का संन्यासी बच सकता है दुनिया में। जो भागता नहीं है, जो पैर जमाकर खड़ा हो जाता है, जो हर परिस्थिति का उपयोग कर लेता है, विपरीत परिस्थिति का भी उपयोग कर लेता है, जो युद्ध के बीच में ध्यान को उपलब्ध होता है।

यही तो कला है। भागकर शांत हो जाने में कला भी क्या है? हिमालय पर बैठकर तो कोई भी शांत हो जाएगा, कोई भी। तुम्हारी विशिष्टता क्या है? लेकिन वह शांति हिमालय की है, तुम्हारी नहीं। और जब तुम लौटोगे, तुम पाओगे, तुम उतने ही अशांत हो, जितने तब थे, जब गए। बीच का समय व्यर्थ ही गंवाया। तीस साल बाद भी वापस आओगे, तुम पाओगे, वही राग, वही क्रोध, वही लोभ, वही मोह, सब बैठे हैं। हिमालय में मौका न मिला निकलने का, इसलिए सोए थे। लौटते ही समाज में, समूह में, भीड़ में मौका मिलेगा; जगने शुरू हो जाएंगे।

सुंदर स्त्री दिखाई पड़ेगी, वर्षों सोई हुई वासना उठ आएगी। धन दिखाई पड़ेगा, वर्षों सोया लोभ कुंडली खोलकर सर्प की तरह फैल जाएगा। कोई जरा सा अपमान कर देगा, वर्षों तक बेजान पड़ा क्रोध

एक झटके में जीवंत हो उठेगा।

नहीं; कोई भागकर कभी जीता नहीं। भागना तो हार की स्वीकृति है। वह तो तुमने मान ही लिया कि तुम जीत न सकोगे।

कृष्ण अर्जुन को कहते हैं, रुक। इसलिए संदेश बड़ा अनूठा है। अर्जुन की जिज्ञासा भी अनूठी है। जीवन—मरण दांव पर लगा है। तुम्हारा भी अगर जीवन—मरण दाव पर लगा है, तो मैं तुमसे जो कहूंगा, वह भगवद्गीता हो जाएगी। तुम्हारा अगर जीवन—मरण दांव पर नहीं लगा है, तुम ऐसे ही चले आए हो, जैसे तुम ताश खेलने चले गए हो। किसी मित्र ने बुलाया; वर्षा के दिन हैं; फुरसत का समय है; तुम ताश खेल आए हो। कुछ दाव पर नहीं लगा है। नहीं; ऐसे न चलेगा। अगर ताश खेलने में भी तुमने पूरा जीवन दाव पर लगा दिया है, अगर तुम जुआरी भी हो, तो बात बदल जाती है। अगर तुमने सब कुछ दाव पर लगाया है, ती मैं तुमसे जो कहूंगा, वह तुम्हारे लिए भगवद्गीता हो जाएगी। अकेले मेरे कहने से न होगा। तुम्हें अर्जुन जैसी चेतना चाहिए।

मनुष्य की खोज मनुष्य से भी पुरानी है; वही खोज तुम्हें यहां ले आई है। और तुम भाग मत जाना। क्योंकि यही वह जगह है, जहां सत्य का अंतिम उदघाटन होगा—संसार में, भीड़ में, गहन में, बाजार में, उपद्रव में, युद्ध में। यही कुरुक्षेत्र है, जहां किसी दिन पांडव और कौरव इकट्ठे हो गए थे युद्ध को।

और ध्यान रखना, जिनसे तुम्हारा संघर्ष है, वे अपने ही हैं। और ध्यान रखना कि जिससे तुम्हें पूछना है, वह तुम्हारे कहीं बाहर नहीं, तुम्हारी चेतना का ही सारथी है।

यह प्रतीक बड़ा मधुर है। अशोभन भी लगता है सोचकर कि अर्जुन तो रथ में सवार था और कृष्ण सारथी थे! लेकिन बड़े पुराने नियमों के अनुसार सारी कथा को रूप दिया गया है। तुम्हारे भीतर तुम्हारा सारथी है। तुमने कभी उससे पूछा नहीं, तुमने कभी उस पर ध्यान ही न दिया। सारथियो पर कोई ध्यान देता है? अर्जुन अनूठा रहा होगा। क्योंकि बैठा तो ऊपर था, रथ में था, असली तो वही

था। सारथी तो सारथी ही था। घोड़ों की साज—सम्हाल कर लेता था, ठीक, रथ को चला लेता था, ठीक।

तुम्हें कभी जिज्ञासा उठ आए, तो कहीं तुम कोचवान से पूछते हो? लेकिन अर्जुन ने सारथी से पूछा।

तुम्हें खोजना होगा, तुम्हारे भीतर सारथी कौन है? रथ तो साफ है कि शरीर है। मालिक भी तुम्हें पक्का पता है कि तुम्हारा अहंकार है। सारथी कौन है? समस्त ज्ञानी कहते हैं, तुम्हारा विवेक, तुम्हारा बोध, साक्षी— भाव सारथी है। उससे ही पूछना होगा। तुम्हारे सारथी से ही उठेगी वह आवाज, जिससे तुम्हारे लिए गीता का प्रकाश साफ हो जाएगा और गीता का मार्ग साफ हो जाएगा। गीता क्या कहती है, तुम तब तक न समझ पाओगे, जब तक तुम्हारा सारथी तुम्हें मिला नहीं।

रथ तुम्हारे पास है; मालिक भी बने तुम बैठे हो; घोड़े भी इंद्रियों के भागे जाते हैं। इन सबके बीच सारथी जैसे खो ही गया है, उसे खोजो। सारी ध्यान की प्रक्रियाएं सारथी को खोजने के लिए हैं। मीठी कथा है महाभारत में कि युद्ध के पूर्व अर्जुन, दुर्योधन अपने सभी मित्रों, सगे —संबंधियों के घर गए प्रार्थना करने कि युद्ध में हमारी तरफ से सम्मिलित होना। सभी नाते—रिश्तेदार थे, सभी जुड़े थे, गृहयुद्ध था। अर्जुन भी पहुंचा कृष्ण के पास; दुर्योधन भी पहुंचा। दोनों एक ही समय पहुंच गए।

दोनों सदा ही एक समय पहुंचते हैं तुम्हारे भीतर भी। तुम्हारी बुराई और तुम्हारी भलाई सदा साथ—साथ खडी हैं। तुम्हारा असत रूप, तुम्हारा सत रूप सदा साथ—साथ खड़ा है। दोनों तुम्हीं से तो ऊर्जा लेते हैं; दोनों की शक्ति तो तुम्हीं हो; दोनों तुम्हीं से तो मांगते हैं और सदा साथ—साथ मांगते हैं।

जब भी तुम चोरी करने जाते हो, तब भी तुम्हारे भीतर का अचोर कहता है, मत करो। जब तुम झूठ बोलते हो, तुम्हारे भीतर वह स्वर भी रहता है, जो कहता है, नहीं, उचित नहीं है। जब तुम सत्य बोलते होते हो, तब भी कोई भीतर से कहता है कि लाभ न होगा, हानि होगी। जरा—सा झूठ बोल लेने में हर्ज भी क्या है? जीवन में थोड़ा—बहुत तो चलता ही है, ऐसे बिलकुल संन्यासी होकर तो लुट जाओगे। जब नहीं चोरी करते हो, तब भी मन कहता है कि क्या कर रहे हो? चूके जा रहे हो। उठा लो! कोई देखने वाला भी नहीं है। और चोरी तो तभी चोरी है, जब पकड़ी जाए। यहां तो पकड़े जाने का कोई उपाय भी नहीं दिखता, कोई है भी नहीं आस—पास; उठा लो। चोर और अचोर साथ—साथ हैं; झूठ और सच साथ—साथ हैं।

अर्जुन और दुर्योधन साथ—साथ पहुंच गए हैं कृष्ण के पास। लेकिन स्वभावत: दोनों के पहुंचने में बुनियादी फर्क है। वही फर्क निर्णायक हो गया।

दुर्योधन तो बैठ गया सिर के पास। कृष्ण सोए थे; दोपहर का वक्त होगा, विश्राम करते होंगे। विश्राम में खलल देना उचित नहीं। दुर्योधन तो बैठ गया जाकर सिरहाने के पास, अर्जुन बैठ गया पैर के पास।

वहीं निर्णय हो गया। उस क्षण में सारी गीता का निर्णय हो गया। उस क्षण में सारा महाभारत जीत लिया गया, हार लिया गया। उसके बाद तो विस्तार है। बीज तो घट गया। अर्जुन के पैरों के पास बैठने में बीज घट गया।

अगर तुम्हें अपने साक्षी को खोजना है, तो विनम्र होना पड़ेगा। तुम्हें अगर अपने सारथी को खोजना है, तो विनम्र होना पड़ेगा। क्योंकि अहंकार ही तो धुंआ पैदा करता है और देखने नहीं देता। अहंकार ही तो अटकाता है, उलझाता है। अहंकार ही तो परदा बन जाता है सख्त।

दुर्योधन कैसे बैठ सकता है पैरों में? दुर्योधन! बात ही पैर में बैठने की उसके मन में न उठी होगी। वह सहज अपने स्वभाववश ही जाकर सिर के पास बैठ गया।

अहंकार सदा सिर के पास है। और जहां अहंकार है, वहीं चूक हो जाती है। फिर तुम अपने सारथी से नहीं मिल पाते। फिर सब मिल जाएगा, सारथी न मिलेगा।

अर्जुन बैठा है पैर के पास। वह विनम्र निवेदन है, वह निरअहंकार भाव है। साक्षी मिल ही जाएगा।

कृष्ण की आंख खुली। कथा कहती है, स्वभावत: पहले अर्जुन दिखाई पड़ा।

विनम्र पर आंख पड़ेगी साक्षी की, अहंकारी पर आंख नहीं पडेगी। अहंकारी तो अपने में ऐसा अकड़ा है, वह तो सिर के पीछे बैठा है। वह सम्राट होकर बैठा है; वह कृष्ण से बडा होकर बैठा है, वह कृष्ण से ऊपर बैठा है।

तुम्हारा अहंकार रथ में सवार है। और सारथी से इतने ऊपर बैठ गया है कि सारथी भी अगर देखना चाहे, तो तुम दिखाई न पड़ोगे। और तुम तो अंधे हो, इसीलिए तुम सिर के पास बैठे हो। अगर थोड़ी भी आंख होती, तो तुम पैर पकड़ लिए होते, तुम पैर के पास बैठे होता।

वहीं युद्ध जीत लिया गया। निर्णय तो सब हो ही गया उसी क्षण। फिर तो बाकी विस्तार की बातें हैं, वे छोड़ी भी जा सकती हैं। जो जानते हैं, उनके लिए कथा पूरी हो गई।

अर्जुन पर आंख पड़ी, तो कृष्ण ने स्वभावत: पूछा, कैसे आए? जिस पर आंख पड़ी, उससे पहले पूछा। तत्क्षण दुर्योधन बोला, मैं भी साथ ही आया हूं। मुझे न भूल जाएं; मैं भी यहां मौजूद हूं। अहंकार को बतलाना पड़ता है कि मैं मौजूद हूं। विनम्र, पता ही चल जाता है कि मौजूद है। और जब बतलाना पड़े, तो शोभा चली जाती है।

तो कृष्ण ने कहा, ठीक, तुम दोनों साथ ही आए हो। लेकिन मेरी। नजर अर्जुन पर पहले पड़ी, इसलिए पहले स्वभावत: मैं उससे पूछूंगा, कैसे आए हो? क्या मांगने आए हो?

दुर्योधन डरा, भयभीत हुआ। यह तो गलती हो गई। गलती इसलिए नहीं कि मैंने विनम्रता न दिखाई, गलती इसलिए हो गई कि यह तो लाभ का क्षण चूक गया।

अगर कभी अहंकारी विनम्र भी होना चाहता है, तो लोभ के कारण। विनम्रता उसका आधार नहीं होती। अगर अहंकारी कभी अक्रोधी भी होना चाहता है, तो कारण निरअंहकारिता या अक्रोध नहीं होता, कारण कुछ और ही होते हैं—लोभ, पद, प्रतिष्ठा, वासना, महत्वाकांक्षा।

डरा कि यह तो मुश्किल हो जाएगी। अर्जुन ने कहा कि मैं भी उसी लिए आया हूं; दुर्योधन भी उसी लिए आया है। हम मांगने आए हैं आपकी सहायता। युद्ध टाला नहीं जा सकता; युद्ध होकर रहेगा। हम प्रार्थना करने आए हैं कि हमारे साथ हों।

कृष्ण ने कहा, तुम दोनों आए हो, तो एक ही उपाय है कि एक मेरी फौजों को मांग ले और एक मुझे।

दुर्योधन कैप गया होगा कि अर्जुन निश्चित फौजों को मांग लेगा। क्योंकि कृष्ण को लेकर क्या करेंगे? इस अकेले को क्या करेंगे? खाएंगे कि पीएंगे? इस अकेले का मूल्य क्या है? विराट फौजें हैं इसकी! और पहला मौका अर्जुन को मिला है, मैं गया। यह तो बाजी चूक गया। अच्छा हुआ होता, चरणों में बैठ गया होता; अच्छा हुआ होता, चरण पकड़ लिए होते।

चौंका होगा दुर्योधन भी, जब अर्जुन ने निर्णय दिया। अर्जुन ने कहा कि अगर यही निर्णय है, तो मैं आपको मांग लेता हूं। छाती फूल गई होगी दुर्योधन की। सोचा होगा, ये मूढ़ ही रहे पांडव। अहंकारियों को विनम्र व्यक्ति मूढ़ ही मालूम पड़ते हैं। अज्ञानियों को ज्ञानी पागल मालूम पड़ते हैं। नासमझों को समझदार नासमझ मालूम पड़ते हैं। रोगियों को स्वस्थ लगता है कि कुछ महारोग से पीड़ित हैं। पीलिया के मरीज को सभी कुछ पीला दिखाई पड़ने लगता है। बहुत बुखार के बाद उठे आदमी को स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन भी तिक्त मालूम पड़ते हैं, स्वाद नहीं मालूम पड़ता; मिठाई में भी मिठास नहीं मालूम पड़ती।

दुर्योधन हंसा होगा, प्रसन्न हुआ होगा; हाथ में आई बाजी यह मूढ़ अर्जुन फिर हार गया! ऐसे ही ये सदा हारते रहे हैं। ऐसे ही वहां हारे थे, जब शकुनि ने दाव फेंके। ऐसे ही फिर हार गए। वहां तो मेरी चालाकी से हारे थे। यहां अपनी ही बुद्धिहीनता से हार गए। ये हारने को ही हैं; इनकी विजय का कोई उपाय नहीं। ऐसा शुभ अवसर चूक गया! मांग लेता फौजों को, कृष्ण को लेकर क्या करेगा? एक कृष्ण, अकेला कृष्ण किस मूल्य का है!

लेकिन यहीं निर्णय हो गया। एक कृष्ण एक तरफ, सारा संसार दूसरी तरफ, तो भी एक कृष्ण चुनने जैसा है। एक चुनने जैसा है। इक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। एक को पकड़कर अर्जुन जीत गया।

लेकिन यह कोई जीतने के लिए एक को नहीं पकड़ा था, यह खयाल रखना। नहीं तो भूल हो जाएगी। तब तो फिर दुर्योधन और अर्जुन के गणित में कोई फर्क न रह जाएगा। यह जीतने के लिए एक को नहीं पकड़ा था। एक को पकड़ने के कारण जीत गया, यह बात और है। अपनी बुद्धि से भी पूछा होता, तो खुद की बुद्धि भी कहती कि चुन लो फौज—फाटा, वहां शक्ति है। लेकिन जो समझदार है, वह शक्ति नहीं चुनता, शांति चुनता है।

कृष्ण को चुनकर अर्जुन ने शांति चुन ली, साक्षी— भाव चुन लिया, बोध चुन लिया, बुद्धत्व चुन लिया। वही वक्त पर काम आया। अंधी फौजें, अंधी ऊर्जा को चुनकर दुर्योधन ने क्या पाया? नौकर—चाकर इकट्ठे कर लिए; मालिक खो गया।

तुम भी जीवन में ध्यान रखना, क्योंकि सौ में निन्यानबे मौके पर मैं भी देखता हूं कि तुम भी दुर्योधन के गणित से ही सोचते हो। फौज—फाटा चुनते हो। एक को छोड़ देते हो। रोज वही घटना घट रही है। वह एक तुम्हारे भीतर छिपा तुम्हारा विवेक है, उसे तुम छोड़ देते हो। कभी धन चुनते हो, कभी मकान चुनते हो, कभी पद चुनते हो, प्रतिष्ठा चुनते हो, हजार चीजें चुनते हो, फौज—फांटा। और एक को छोड़ देते हो।

तुम सोचते भी हो, उस एक में रखा भी क्या है! इतना विस्तार है संसार का, इसे पा लो। इतना बड़ा साम्राज्य है, उस एक को पाकर करोगे भी क्या? होगी आत्मा, होगी विवेक की अवस्था, होगा ध्यान, होगी समाधि, लेकिन एक ही है। और इतना विराट संसार पड़ा है अभी जीतने को; पहले इसे कर लो। फिर उस एक को देख लेंगे।

अगर तुम्हारे सामने यह सवाल उठे कि तुम एक परमात्मा को चुन लो या सारे संसार को, तुम क्या करोगे? सौ में निन्यानबे मौके पर तुम वही करोगे, जो दुर्योधन ने किया; और तुम प्रसन्न होओगे। वहीं तुम करते रहे हो। करोगे, यह कहना ही गलत है। तुम कर ही रहे हो।

लेकिन अर्जुन धन्यभागी हुआ। कृष्ण को पाकर सब पा लिया। मालिक को पा लिया, स्वामी को पा लिया। नौकर—चाकरों का क्या हिसाब है? घोड़े—रथों की क्या कीमत है? और वक्त पर यही एक काम आया। वक्त पर सदा एक काम आता है।

युद्ध के सघन मैदान में, जब अर्जुन के प्राण कंपने लगे, होश खोने लगा, गांडीव थरथराने लगा, पैर के नीचे की जमीन खिसक गई, कुछ सूझ न पड़े, सब तरफ अंधेरा हो गया। एक क्षण में सब शुरू हो जाने को है, योद्धा तत्पर हो गए, शंखनाद होने लगे, अर्जुन की प्रतीक्षा होने लगी कि देर क्यों हो रही है! और उसके गात शिथिल हो गए, उसका गांडीव मुरदा हो गया, उसकी ऊर्जा जैसे कहीं खो गई। अचानक उसने अपने को असहाय पाया। और इस क्षण में उस एक से ही ज्योति मिली। इस एक क्षण में वही सारथी काम आया।

खोजो भीतर, कौन है सारथी? ध्यान की खोज सारथी की खोज है। कौन है, जो तुम्हें वस्तुत: चलाता है? वही सारथी है। कौन है असली मालिक? अहंकार! तो तुम सिर के पास बैठे दुर्योधन हो। विवेक! तो तुम पैर के पास बैठे अर्जुन हो। वही काम आएगा जीवन के सघन युद्ध में।

अर्जुन बनो, तो कृष्ण की गीता तो सदा तुममें जन्म लेने को तत्पर है। तुम जरा गर्भ दो, तुम जरा जगह दो। तो जैसी गीता अर्जुन को मिली, वैसी ही तुम्हें भी मिल सकती है।

अर्जुन बोला, हे कृष्ण, जो मनुष्य शास्त्र—विधि को त्यागकर केवल श्रद्धा से युक्त हुए देवादिको का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन—सी है? सात्विकी अथवा राजसी अथवा तामसी?

इसके पहले कि हम इस सूत्र में प्रवेश करें, जीवन के गणित को समझ लेना जरूरी, उपयोगी है।

जिन्होंने भी जाना है कभी, अनंत काल में जो भी जागे हैं और बुद्ध हुए हैं, भगवत्ता पाई है, उन सब ने कुछ बातों पर सहमति दी है, अपने हस्ताक्षर की मोहर लगाई है। वे बातें बहुत थोड़ी हैं। बहुत—सी बातों में उनमें भेद है; भेद ही नहीं विरोध भी है। क्योंकि वे विभिन्न लोगों से बोले, इसलिए भेद है। क्योंकि वे विभिन्न समयों में बोले, इसलिए भिन्नता है। और क्योंकि वे विभिन्न दृष्टिओं से बोले, इसलिए विरोध भी है। सत्य बहुत बड़ा है, दृष्टि बड़ी छोटी है। विपरीत, दृष्टि में नहीं समाता, सत्य में समाता है।

तो कृष्ण बोले अर्जुन से, वह बात अलग, परिस्थिति अलग। महावीर बोले गौतम से, वह बात अलग, परिस्थिति अलग। गौतम भिन्न व्यक्ति है उतना ही जितने महावीर भिन्न हैं कृष्ण से, उतना ही गौतम भिन्न है अर्जुन से।

और सारी स्थिति भिन्न है। वन के एकांत में, सुबह पक्षियों की चहचहाहट में, महावीर से गौतम कुछ पूछता और महावीर बोलते। वृक्ष की छाया के तले आनंद बुद्ध से कुछ पूछता और बुद्ध बोलते। जीसस बोले, मोहम्मद बोले, परिस्थितियां भिन्न थीं, इसलिए बहुत बातें भिन्न हैं। लेकिन मूल सत्य भिन्न नहीं हो सकते।

उन कुछ मूल सत्यों में एक है, तीन का गणित। जीसस कहते हैं ट्रिनिटी, उस तीन के गणित को। वे कहते हैं, परमात्मा तीन हो गया। हिंदू कहते हैं, त्रिमूर्ति। वही ट्रिनिटी, परमात्मा तीन हो गया। ईसाइयों के नाम अलग हैं। हिंदू कहते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश। ईसाई कहते हैं, परमात्मा पिता, बेटा जीसस और दोनों के बीच में पवित्र आत्मा, ऐसे तीन चेहरे हैं। लेकिन तीनों के भीतर छिपा है एक।

योगी कहते हैं, त्रिकुटी, जहां तीन मिलते हैं, वहां एक का अनुभव होता है। तांत्रिक कहते हैं, त्रिपुटी, जहां तीन तीन की तरह खो जाते हैं और एक समन्वय सधता है, वहीं परम का आविर्भाव होता है।

हिंदू जैन, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान, सभी ने तीन की बात कही है। और इन सब में सर्वाधिक गहरी जिन्होंने तीन की चर्चा की है, वे हैं सांख्य दार्शनिक। उनका नाम ही सांख्य पड़ गया, क्योंकि उन्होंने पहली दफा जीवन के गणित की संख्या खोजी। सांख्य का अर्थ है संख्या। जिन्होंने पहली दफे गणित बिठाया। वह सबसे प्राचीन है। सबसे पहले उन्होंने तीन का राज प्रकट किया। उसकी वजह से वे सांख्य ही कहलाने लगे। उन्होंने जीवन के पूरे गणित को ठीक से पकड़ लिया।

उन्होंने कहा, एक से तीन होते हैं और फिर तीन से नौ होते हैं। और फिर नौ से अनंत—अनंत होते चले जाते हैं। और जब वापसी में यात्रा होती है, तो फिर अनंत घटकर नौ बनते हैं, नौ घटकर तीन बनते हैं; तीन घटकर एक हो जाता है। सारा संसार संख्या का विस्तार है, एक से तीन, तीन से नौ, नौ से इक्यासी, फिर इक्यासी गुणित इक्यासी, और आगे, और आगे। फिर ऐसे ही पीछे लौटना पड़ता है।

परसों रात एक इटालियन संन्यासिनी वापस लौटती थी नेपल्स। उसे मैंने नाम दिया है, कृष्ण—राधा। उसने कभी पूछा न था अब तक कि अर्थ क्या है। जाते समय मैंने उससे पूछा, कुछ पूछना है? उसने कहा कि और कुछ नहीं पूछना है, बड़ी तृप्त, शांत होकर जाती हूं। एक बात भर पूछनी है जो पहले दिन मैं पूछने से चूक गई, कृष्ण—राधा का अर्थ क्या है? आपने मुझे राधा क्यों पुकारा है? तो उसे मैंने जो कहा है, वह मैं तुमसे भी कहना चाहूंगा, क्योंकि इन सूत्रों से उसका बड़ा गहरा संबंध है।

उसे मैंने कहा कि पुराने शास्त्रों में राधा का कोई उल्लेख नहीं है। गोपियां हैं, सखियां हैं, सोलह हजार हैं। कृष्ण उनके साथ नाचते हैं; उनकी बांसुरी बजती है। और सारा वन—प्रांत आनंद से गूंज उठता है, रास की लीला चलती है। लेकिन राधा का कोई नाम पुराने शास्त्रों में नहीं है। सिर्फ इतना ही कहीं—कहीं उल्लेख है कि और सारी सखियों में, और सारी गोपियों में एक गोपी है, जो कृष्ण के बहुत निकट है, जो उनकी छाया की तरह है। लेकिन उसका कोई नाम नहीं है।

यह भी उचित ही है, क्योंकि कृष्ण के करीब नाम रहेगा, तो करीब ही न आ सकोगे। इसलिए पुराने शास्त्रों ने उसे कोई नाम नहीं दिया। छाया की तरह है, कृष्ण के निकट है।

अपनी तरफ से कृष्ण के निकट है, तो स्वभावत: कृष्ण की तरफ से भी निकटता है। क्योंकि भक्त जितना निकट भगवान के आ जाए, उतना ही निकट भगवान भक्त के आ जाता है। वह भक्त पर ही निर्भर है कि तुम कितने निकट भगवान को चाहते हो, उतने निकट तुम पहुंच जाओ। जो तुम भगवान से चाहते हो तुम्हारे प्रति, वही तुम भगवान के प्रति करो, यही तो सूत्र है।

तो शास्त्र कहते हैं कि निकट है, बहुत निकट है, छाया की तरह है। लेकिन किसी नाम का उल्लेख नहीं है। अच्छा किया। क्योंकि नाम—रूप खो जाए, तभी तो कोई कृष्ण के निकट आता है। इसलिए नाम क्या देना! लेकिन फिर हजारों साल तक नाम नहीं दिया गया। कुछ सात सौ वर्ष पहले अचानक राधा का नाम प्रकट हुआ। गीत गाए जाने लगे; महाकवियों ने परम रचनाएं रची; जयदेव ने गीतगोविंद गाया; राधा का आविर्भाव हुआ। राधा शब्द बहुमूल्य होने लगा। इतना बहुमूल्य हो गया कि अगर तुम अकेला अब कृष्ण कहो, तो आधा मालूम पड़ता है। राधा—कृष्ण ही पूरा मालूम पड़ता है। और न केवल महत्वपूर्ण हो गया, कृष्ण को पीछे हटा दिया; राधा आगे आ गई। कोई नहीं कहता, कृष्ण—राधा। लोग कहते हैं, राधा—कृष्ण।

यह भी बड़ा महत्वपूर्ण है। जब भक्त इतने निकट आ जाता है कि परमात्मा में एक हो जाता है, तो पहले तो भक्त परमात्मा की छाया होता है; फिर परमात्मा भक्त की छाया हो जाता है। राधा आगे आ गई।

गम कैसे खोज लिया यह जब नाम शास्त्रों में था ही नहीं? नाम की खोज अलग है। नाम की खोज के पीछे बड़ा गणित है, सांख्य का गणित है। राधा शब्द बनता है धारा शब्द को उलटा देने से। योगियों की खोज है कि धारा का अर्थ होता है, बहिर्गमन। जैसे गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है, तो स्रोत से दूर जाती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम है, धारा। और राधा धारा का उलटा शब्द है। उसका अर्थ है, जो स्रोत की तरफ वापस आती है। जब एक से तीन बनते हैं, तीन से नौ बनते हैं, नौ से इक्यासी बनते हैं, तो धारा। जब इक्यासी से नौ बनते हैं, नौ से तीन बनते हैं, तीन से एक बनता है, तो राधा।

राधा योगियों और सांख्य अनुभोक्ताओं के अनुभव से निकला —हुआ शब्द है। उन्होंने जाना कि जीवन की धारा बहिर्गामी है, बाहर जाती है, दूर जाती है, मूल से दूर जाती है, उत्स से दूर जाती है, उत्स की तरफ पीठ होती है, आंखें अनंत क्षितिज पर लगी होती हैं—यह धारा की अवस्था है। जब कोई लौटता है मूल उत्स की तरफ, स्रोत की तरफ, जब गंगा वापस लौटने लगती है गंगोत्री की तरफ, उलटी यात्रा शुरू होती है, अप—स्ट्रीम। अब धारा बाहर की तरफ नहीं जाती है, भीतर की तरफ आती है। बहिर्मुखता बंद होती है, अंतर्मुखता शुरू होती है; तभी तो कृष्ण के पास आती है राधा। धीरे — धीरे, धीरे— धीरे, गंगोत्री में गिर जाती है गंगा। गंगा विलीन हो जाती है, एक रह जाता है।

उस छाया की तरह घूमने वाली सखी को हजारों साल तक नाम न मिला। कोई सात सौ वर्ष पहले अचानक नाम का आविर्भाव। हुआ। और जिन्होंने नाम दिया, बड़े अदभुत लोग रहे होंगे। जिन्होंने नाम नहीं दिया, वे भी बड़े अदभुत लोग थे। और जिन्होंने नाम दिया, वे कुछ कम अदभुत लोग न थे। क्योंकि नाम उन्होंने ऐसा गहरा दिया कि उसमें सारे शास्त्र को समा दिया।

मैंने जो प्रतीक चुना है आश्रम के लिए, वह एक से तीन, तीन से नौ, इसका ही प्रतीक है। वह सृष्टि और प्रलय दोनों उसमें हैं। अगर धारा की तरह जाओ, तो एक से तीन, तीन से नौ और अनंत होता जाता है। अगर लौटने लगो, घर वापस आने लगो, तो नौ से तीन, तीन से एक हो जाता है।

इस संबंध में समस्त ज्ञानियों की सहमति है कि अस्तित्व का ढंग, सृष्टि का ढंग है, एक से अनेक। तीन पहला पड़ाव है। और फिर प्रलय, जब सृष्टि सिकुडती है और यात्रा समाप्त होती है, लीन होती है; सृष्टि की रात आती है, ब्रह्मा का दिन पूरा होता है, तब फिर एक पड़ाव है, आखिरी पड़ाव, तीन। पहला पड़ाव भी तीन है, आखिरी पड़ाव भी तीन है। इसलिए तीन बडा महत्वपूर्ण है—ट्रिनिटी, त्रिमूर्ति, त्रिकुटी, त्रिपुटी।

महावीर के त्रि—रत्न, बुद्ध की त्रि—शरण, लाओत्से के थी ट्रेजर्स, वह सब तीन पर उनका जोर है। क्योंकि वही पहला पड़ाव है, वही। अंतिम पड़ाव है। वहीं से तुम शुरू होते हो, वहीं तुम समाप्त होते हो। क्योंकि फिर एक में तो परमात्मा ही बचता है। जब तक एक है, तुम शुरू नहीं हुए; जब फिर एक हो गया, तुम न रहे। तीन से अहंकार शुरू होता है और तीन पर ही अहंकार समाप्त हो जाता है। ये जो सांख्यों ने तीन सूत्र खोजे, वे हैं, सत्य, रज, तम। इन तीन से, सांख्य कहते हैं, सारा अस्तित्व बना है। ये त्रिगुण, इन तीन का ही सारा खेल है। जिसने इन तीन को जान लिया, उसके हाथ में कुंजी आ गई; वह चाहे तो वापस लौट जाए, एक में लीन हो जाए। तो इन तीन के स्वभाव को हम थोड़ा समझ लें।

तम का अर्थ है, आलस्य। तम का अर्थ है, ठहरना। तम का अर्थ है, रुकना। तम बांधने वाली शक्ति है। अगर तम न हो, तो चीजें चलती ही जाएंगी और रुक न सकेंगी। तुम एक पत्थर उठाकर फेंकते हो, अगर तम न हो जगत में, कुछ रोकने की शक्ति न हो, अवरोध न हो जगत में, तो पत्थर फिर चलता ही जाएगा, चलता ही जाएगा, रुकेगा कैसे? तम है अवरोधक ऊर्जा।

तो तुम फेंकते हो पत्थर को, जब तुम फेंकते हो, तो तुम उसे रज की शक्ति देते हो। इसलिए तुम्हारा हाथ दुखता है, शक्ति हाथ से गई। तुमने कुछ गंवाया पत्थर को फेंकने में। और जितनी शक्ति तुमने दी, जितने जोर से फेंका, जितना गंवाया, जितनी ऊर्जा दे दी पत्थर को, उतनी दूर पत्थर जाता है। जैसे ही ऊर्जा खतम हो जाती है, तम की शक्ति उसे नीचे खींच लेती है।

जिसको न्यूटन ने ग्रेविटेशन कहा है, वह तम का ही एक स्थानीय उपयोग है, तम का ही एक रूप है। तम के और बहुत रूप हैं; लेकिन जिसको न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण कहा। क्योंकि वह बैठा है बगीचे में और एक फल को उसने गिरते देखा। और उसे सवाल उठा कि जब फल गिरता है वृक्ष से, तो ऊपर की तरफ क्यों नहीं जाता? बाएं क्यों नहीं जाता? दाएं क्यों नहीं जाता? नीचे ही क्यों आता है?

तम है नीचे की तरफ खींचने वाली शक्ति। तो जिससे तुम नीचे गिरते हो, वह तम है। जिससे तुम नरक में गिरते हो, वह तम है। जब तुम्हारे भीतर चोरी तुम करते हो, तो तम है, झूठ बोलते हो, तम है। जहां—जहां तुम नीचे उतरते हो, वहां तम है। तम है एक आलस्य, एक निद्रा।

गुरुत्वाकर्षण तम का एक रूप है, और आध्यात्मिक अंधापन भी तम का एक रूप है। जिन्होंने भी समाधि जानी, वे कहते हैं, हलके हो गए, जैसे पंख लग गए, आकाश में उड़ जाएं। जब तुम्हारे भीतर भी ध्यान थोड़ा गहरा होगा, तो तुम अचानक किसी दिन पाओगे बैठे—बैठे, जैसे शरीर जमीन से ऊपर उठ गया। आंख खोलकर पाओगे, जमीन पर बैठा है। सोचोगे, भ्रांति हो गई, कल्पना हो गई। फिर आंख बंद करोगे, फिर थोड़ी देर में पाओगे, शरीर ऊपर उठ गया। शरीर नहीं उठ रहा है, लेकिन तम की शक्ति कम हो रही है। इसलिए भीतर अनुभव होता है, जैसे शरीर ऊपर उठ गया, हलका हो गया।

जितना तमस होगा, उतना बोझ होगा। लोगों को चलते देखो, ऐसे चल रहे हैं, जैसे सिर पर बोझ रखे हों। बोझ बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता, वह तम का बोझ है। उसे तुम किसी तराजू पर न तौल सकोगे। वह आत्मिक बोझ है। वह चिंताओं का बोझ है, दुर्गुणों का बोझ है, गलत आदतों का बोझ है, गलत संस्कारों का बोझ है, गलत संबंधों का बोझ है, गलत निर्णयों का बोझ है, वह सब बोझ वहां है। वह सब तमस का फैलाव है।

तमस यानी जो रोकता, तमस यानी जो अटकाता, तमस यानी जो अवरोध बनता। तुम्हारे पैर अगर जमीन में गड़े हैं, तो वह तमस है। तुम अगर अपनी चेतना स्थिति में ऊपर नहीं उठ पाते, तो तमस का बहुत वजन है।

तमस जरूरी है, याद रखना। क्योंकि तमस के बिना जीवन न हो सकेगा। पर उसकी एक सीमा जरूरी है। जैसे नमक भोजन में जरूरी है, पर नमक ही नमक का भोजन करने मत बैठ जाना। और माना कि नमक के बिना भोजन बेस्वाद लगता है, लेकिन इससे तुम यह गणित मत बिठाना कि नमक ही नमक खाओगे, तो बहुत स्वाद आएगा। गणित सीधा है। नमक के बिना भोजन बेस्वाद लगता है, इसलिए स्वाद नमक में है। तो नमक ही नमक खाओ, स्वाद ही स्वाद मिलेगा!

तमस जरूरी है, अपरिहार्य है, लेकिन उसका एक निश्चित अंश। और जिस दिन कोई व्यक्ति उसके निश्चित अंश को पहचान लेता है, उस दिन तमस का भी उपयोग शुरू हो जाता है। फिर तमस तुम्हें रोकता नहीं है। फिर पत्थर सीढ़ियां बन जाती हैं, फिर तुम ऊपर जाने के लिए भी तमस का उपयोग करते हो। क्योंकि पत्थर पर भी तो पैर जमाना पड़ेगा!

एक सीढ़ी से तुम पैर उठाते हो, एक पैर उठाते हो; एक पैर को तो तुम जमाए रखते हो। और जब तुम एक पैर उठाते हो, तो दूसरे पैर को ठीक से जमाकर रखना पड़ता है। वह तमस का उपयोग है। फिर दूसरे को तुम ऊंची सीढ़ी पर जमा लोगे ठीक से, तब पहले पैर को उठाओगे। वह भी तमस का उपयोग है।

तमस नीचे ला सकता है, अगर अतिशय हो जाए। और तमस ऊर्ध्वारोहण बन सकता है, अगर समझपूर्वक उसका उपयोग किया जाए। कोई योगी तमस को काट नहीं डालता। सिर्फ तमस का सम्यक उपयोग सीखता है। अति मारता है; सम्यक उपयोग सदा सहयोगी है, साथी है।

वैज्ञानिक भी कहते हैं कि तमस के बिना अस्तित्व नहीं हो सकता। वैज्ञानिकों ने भी पदार्थ के अन्वेषण में इलेक्ट्रान, न्‍यूट्रान और पॉजिट्रान की विभाजना की है। और वे कहते हैं कि इनमें से एक रोकता है, अन्यथा परमाणु विस्फोट हो जाए। रोकने वाला तत्व चाहिए, जो बांधकर रखता है रस्सी की तरह।

दूसरा तत्व है, रजस। रजस है ऊर्जा, गति, त्वरा, तेजी। तुम जब एक पत्थर फेंकते हो, तो तुम रजस से फेंकते हो। वह तुम्हारी ऊर्जा है। आकाश में तारे घूमते हैं, पृथ्वी परिक्रमा लगाती है सूरज की, तुम सुबह उठते हो, वह रजस है। अगर तमस ही हो, तो तुम एक बार सोओगे, फिर कभी उठोगे नहीं। उठेगा कौन?

इसलिए जो आदमी सुबह उठने में देर करता है, उसको हम तामसी कहते हैं। उसको तमस पकड़ रहा है। रातभर सो लिया है, फिर भी बिस्तर नहीं छोड सकता। उठता भी है, तो ऐसी शिकायत से भरा उठता है। दिन का स्वागत नहीं है उसके मन में। सूर्योदय की प्रसन्नता नहीं है उसके मन में। पक्षियों के गीत उसे सुनाई नहीं पड़ते। वह एक ही सुख जानता है, अपनी दुलाई में दबा हुआ पड़े रहना और अपनी ही गंदी सांस को चलाते रहना, पीते रहना। वह एक ही सुख जानता है, मुरदे की भांति पड़े रहना।

यह आदमी आत्मघाती है। क्योंकि जीवन का क्या अर्थ है फिर? जीवन तो ऊर्जा है, जागना है; जीवन तो गति है। मृत्यु में तमस पूर्ण को घेर लेता है।

इसे समझ लो। मृत्यु में तमस इतना अति हो जाता है कि उसमें रज और सत्व दोनों डूब जाते हैं, तो आदमी मर गया।

जो आदमी सुबह उठने में मुश्किल पा रहा है, वह थोड़ा— थोड़ा मरा हुआ आदमी है, ठीक जिंदा आदमी नहीं है। उसके चेहरे पर तुम दिनभर मक्खियां उड़ते हुए पाओगे। उसके चेहरे पर एक उदासी, उसके चेहरे पर धूल जमी हुई मिलेगी, नींद की एक पर्त उसके चेहरे पर तुम पाओगे। उसकी आंखें ताजी नहीं होंगी; उसकी आंखों में स्फटिक मणि की चमक न होगी। उसकी आंखों पर धुंआ जमा होगा। वह किसी तरह ढो रहा है, वह राह देख रहा है सांझ की कि किस तरह बिस्तर पर फिर पड़ जाए।

ऐसा आदमी शराब पीएगा; क्योंकि शराब तमस को बढ़ा देती है। ऐसा आदमी धूम्रपान करेगा, क्योंकि धूम्रपान में छिपा हुआ निकोटिन तमस को बढ़ाता है। ऐसे आदमी की अगर तुम जीवन—विधि पहचानोगे, तो तुम पा जाओगे, कहा—कहा तमस है। तमस का एक रूप निकोटिन है, वह सिगरेट में है छिपा हुआ, तंबाकू में है छिपा हुआ। ऐसा आदमी तंबाकू चबाता रहेगा। और हद के लोग हैं! ऐसे आदमियों ने अगर शास्त्र लिखे, तो उनमें उन्होंने यह भी लिख दिया कि वैकुंठ में बैठे विष्णु भगवान तांबूल चर्वण करते हैं।

निकोटिन की तुमको जरूरत होगी, विष्णु भगवान को है, तो उनका विष्णु होना भी संदिग्ध है। वह तो शास्त्र पुराने जमाने में लिखे, नहीं तो पता नहीं वह सिगरेट पीते विष्णु भगवान या क्या करते! या हुक्का गुडगुडाते!

तामसी आदमी की जीवन व्यवस्था देखो! ज्यादा खाएगा; क्योंकि ज्यादा भोजन नींद लाता है, तमस बढ़ता है। अतिशय खाएगा; भर लेगा इस तरह कि सारी ऊर्जा पेट में चली जाए और मस्तिष्क की ऊर्जा खाली हो जाए, तो वह सो सके। इसलिए तो भरे पेट नींद अच्छी आती है। उपवास करो, रात नींद नहीं आती। अति भोजन तमस को बढ़ाता है।

ऐसे आदमी की आदतें गौर से देखो, तो तुम पाओगे, अगर उसे मौका मिले सोने का, तो वह बैठेगा नहीं। अगर बैठना ही पड़े, तो वह चलेगा नहीं, खड़ा नहीं होगा। अगर खड़ा ही होना पड़े, तो चलेगा नहीं। उसका सार यह है कि अगर उसको मरने का मौका मिले, तो वह मरना चाहेगा, जीएगा नहीं। ऐसे लोग आत्मघात कर लेते हैं। और अगर नहीं कर पाते, तो केवल इस कारण कि आलस्य की वजह से। इतना उपद्रव भी वे नहीं कर पाते, कौन जाए जहर खरीदने!

मुल्ला नसरुद्दीन एक घर में नौकर था। बड़ा घर था। बहुत नौकर—चाकर थे। और जैसा बड़ा घर था, शाही ठाठ—बाठ था, बड़े नौकर—चाकर थे, भयंकर आलस्य था नौकरों में। पता ही नहीं चलता कि कौन क्या करता है, कौन क्या नहीं करता। काम बड़ा अस्तव्यस्त था। मालिक चिंतित हुआ। सब उपाय कर लिए, लेकिन काम में कोई सुधार न हुआ। तो उसने एक इफिशिएसि एक्सपर्ट को बुलाया कि जो थोड़ी सलाह दे कि क्या करना।

उस विशेषज्ञ ने कहा, बुलाओ सब नौकरों को। सारे नौकर पंक्तिबद्ध खड़े किए गए। उस विशेषज्ञ ने कहा कि तुममें जो सबसे ज्यादा अलाल हो, वह बाहर निकल आए। क्योंकि मैं उसे ऐसा काम दे दूंगा, जिसमेँ ज्यादा काम करना ही न पड़े। लेकिन एक सड़ी मछली पूरी नदी को गंदा कर देती है। तो मुझे ऐसा लगता है कि तुममें कोई एक महा अलाल है, जो सब को खराब कर रहा है। वह बाहर निकल आए। हम उसे कोई दंड न देंगे; नौकरी न छुडाएंगे, आश्वासन पक्का है। हम उसे ऐसा ही काम दे देंगे, जिसमें कुछ करना ही ज्यादा न पड़े। पहरेदार की तरह स्कूल पर बैठा सोता रहे या मालिक की दुकान है कपड़े—लत्ते की, और कई दुकानें हैं, उसे ऐसी जगह बिठा देंगे। जैसे उदाहरण के लिए उसने कहा कि जहां मालिक के कपड़े की दुकान में पाजामे और नाइट ड्रेस और इस तरह की चीजें बेची जाती हैं, वहां बिठा देंगे कि वहा सोया रहे। और वहा तख्ती लिख देंगे कि हमारे कपड़े पहनने से ऐसी गहरी नींद आती है। कोई रास्ता निकाल लेंगे। बाहर आ जाए जो आदमी सब से ज्यादा अलाल है!

सब लोग बाहर आ गए सिर्फ मुल्ला नसरुद्दीन को छोड्कर। उस विशेषज्ञ ने पूछा कि नसरुद्दीन, मालिक को भी संदेह है और मुझको भी संदेह है कि तुम ही हो उपद्रवी। लेकिन तुम बाहर क्यों नहीं आए? उसने कहा, मालिक, जहां हम हैं, बड़े आनंद में हैं। दो पैर कौन चले!

अगर आलसी आत्महत्या नहीं करता, तो सिर्फ इसीलिए कि उसमें भी कुछ करना पड़ेगा, अन्यथा वह आत्मघाती की तरह जीता है।

रजस है ऊर्जा, त्वरा, शक्ति। रजस का अगर अति हो जाए, तो आदमी राजनीतिज्ञ हो जाता है, भागता है, महत्वाकांक्षा! या धन की दौड़ हो जाती है, या पद की दौड शुरू हो जाती है; वह रुक नहीं सकता। उसे रुकना मुश्किल है। उसे तुम हमेशा भागता हुआ पाओगे। वह कहां जा रहा है, इसका उसे पक्का पता न हो; लेकिन एक बात पक्की होती है कि वह तेजी से जा रहा है। उससे तुम यह मत पूछो कि कहां जा रहे हो। इतनी उसको फुरसत नहीं। इतना समय भी नहीं है रुककर सोचने का। गति!

पूरब में तमस ज्यादा है, इसलिए लोग गरीब हैं, भिखमंगे हैं, मूढ़ हैं। पश्चिम में रजस ज्यादा है, इसलिए लोग महत्वाकांक्षी हैं, तनाव से भरे हैं, परेशान हैं, पागल हैं। धन खूब पैदा कर लिया, बड़ी विशाल अट्टालिकाएं बना ली हैं, विज्ञान के बड़े साधन आविष्कृत कर लिए हैं और स्पीड को बढ़ाए चले जाते हैं रोज। उनसे पूछो, जा कहा रहे हो? पैदल जाओ कि जेट पर जाओ, लेकिन जाना कहां है? वे कहते हैं, जाने का कोई सवाल नहीं है। लेकिन तेजी से जा रहे हैं। मंजिल का सवाल ही क्या है! जाने में मजा आ रहा है। पागलपन है पश्चिम में।

अगर रज ज्यादा हो जाए, तो आदमी को विक्षिप्त करता है। तुम जानते हो राजस आदमी को कि वह खाली नहीं बैठ सकता। उसे बैठना भी पड़े थोड़ी देर, तो पच्चीस दफे करवटें बदलता है। वह रात सो नहीं सकता, करवटें बदलता है। नींद में भी उसका रजस सक्रिय है। उसे कुछ न कुछ करने को चाहिए। कोई भी गोरखधंधा हो, तो भी वह करना चाहेगा, चाहे उसका कोई परिणाम न हो। खाली नहीं बैठ सकता। बैठने की कला उसे नहीं आती। तमस का ?तत्व थोड़ा कम है, रजस का तत्व थोड़ा ज्यादा है।

ऐसे आदमी ही दुनिया में उपद्रव करते हैं। चंगेजखा, तैमूरलंग, नादिरशाह, हिटलर, मुसोलिनी, माओत्से तुंग, इंदिरा, जयप्रकाश, सब—रजस ज्यादा है। अब के जयप्रकाश को खाली बैठना नहीं जमता। पूर्ण क्रांति करनी है! किसी ने कभी पूर्ण क्रांति की है? कभी पूर्ण क्रांति होती है? अगर पूर्ण क्रांति होगी, तो फिर बचेगा क्या? पूर्ण क्रांति तो प्रलय में ही हो सकती है। उपद्रव करना है।

उपद्रवी पैदा होते हैं, समाज—सुधारक पैदा होते हैं, समाज—सेवक पैदा होते हैं। तुम्हारे पैर भी न दुख रहे हों, तो भी वे दबाते हैं। तुम उनसे कितना ही कहो, संकोचवश तुम एकदम मना भी नहीं कर सकते। पर वे कहते हैं, हमें सेवा करनी है।

दुनिया में जितनी मिस्वीफ और जितना उपद्रव होता है, वह रजस गुणधर्मा व्यक्तियों का परिणाम है। तमस वाला आदमी अपने लिए कितना ही नुकसान करता हो, दूसरे को नहीं करता, यह उसकी खूबी है। आलसी कहां दूसरे को नुकसान करने जाए? तुम झगड़ा भी करो, तो वह कहता है कि झगड़े में हमें पड़ना नहीं। क्योंकि कुछ करना पड़े! तुम उसका कोट छीनो, तो वह कमीज भी दे देता है, कि तू ले जा, दोबारा न आना पड़े।

सारा उपद्रव संसार का, क्रांतिया, इतिहास, रजस, अति रजस से पीड़ित लोगों का परिणाम है, जिनको बुखार चढ़ा है। वे व्यस्तता चाहते हैं; कोई न कोई काम चाहिए। क्योंकि काम के बिना वे खाली नहीं बैठ सकते। खाली बैठते हैं, तो उन्हें बेचैनी मालूम पड़ती है, उनकी ऊर्जा उन्हें भगाती है, दौड़ाती है। फिर इससे कोई प्रयोजन नहीं है, कहां भागते हैं, कहा दौड़ते हैं। लेकिन दौड़ने में राहत मिलती है। ऐसे लोग खूब धन कमा लेते हैं। धन कमाने के बाद बड़ी मुश्किल में पड़ते हैं कि अब इसका क्या करें? तो उस धन से और धन कमाते हैं। फिर खड़े होकर सोचते हैं, अब इसका क्या करें? तो उस धन से और धन कमाते हैं। और कोई उपाय नहीं मालूम पड़ता।

शुरू में धन कमाने वाले लोग सोचते हैं कि जब धन कमा लेंगे, तो आराम करेंगे। लेकिन आराम वे कर नहीं सकते, क्योंकि आराम करने वाले लोग धन नहीं कमा सकते। आराम करने वाले पहले से ही आराम कर रहे हैं। जो सोचता है कि धन कमाकर आराम करूंगा, महल बन जाएगा, सब सुविधा होगी, नौकर—चाकर होंगे, बस, फिर आराम। उसको पता नहीं है कि इतना तुम जो करोगे, वह तुम्हारा रजस धर्म बढ़ेगा। और एक घड़ी ऐसी आएगी, जब सब तो होगा, लेकिन तुम पाओगे, आराम कैसे करें! वह तो भूल ही गए। आराम हो ही न सकेगा।

अति रज हो जाए, तो विक्षिप्तता में ले जाता है; जैसे अति तम हो जाए, तो आत्मघात में ले जाता है। पूरब आत्मघाती है, पश्चिम विक्षिप्त है।

लेकिन रजस की एक मात्रा चाहिए; उतनी मात्रा चाहिए, जितने से जीवन का संतुलन बन जाए। क्योंकि बुद्ध में भी उतना रजस तो है, अन्यथा कौन तपश्चर्या करेगा? उतना रजस तो है, अन्यथा कौन ध्यान करेगा? उतना रजस तो है, अन्यथा कौन साक्षी को खोजेगा? बस, उतना ही है। उतना तमस है, जितने से विश्राम हो जाता, उतना रजस है, जिससे जरूरी श्रम हो जाता।

और जिसने रज और तम की, दोनों की संतुलित मात्रा को उपलब्ध कर लिया, उसके जीवन में तीसरे तत्व का उदय होता है, वह है सत्व। सत्व का अर्थ है, संतुलन। संतुलन परम शुद्धि है। सत्व का अर्थ है, भीतर की सारी विक्षिप्तताएं शांत हो गईं; आलस्य शांत हो गया; कोई अति न रही। जिसको कबीर ने कहा निरति; कोई अति न रही। जब कोई अति नहीं रह जाती, तो सुरति जगती है।

वह सुरति ही सत्व है। तब तुम्हारे भीतर एक सात्विक भाव का जन्म होता है, एक कुंआरेपन का। तुम एक संगीत की तरह मधुर हो जाते हो। तुम्हारा तम भी उस संगीत का अंग है और तुम्हारा रज भी उस संगीत का अंग है, उन दोनों के तारों पर ही तुम्हारी सात्विकता की धुन उठती है। सात्विकता का अर्थ है, हार्मनी, लयबद्धता, कुछ भी ज्यादा नहीं, कुछ भी कम नहीं।

इसलिए सत्व संतोष लाता है और सत्व एक परितृप्ति देता है और सत्य तुम्हें योग्य बनाता है कि तुम इन तीनों के ऊपर जा सको। एक त्रिकोण बनाओ, एक ट्राएंगल; उसमें नीचे के दो आधार कोण तो हैं तम और रज के और ऊपर का शिखर कोण है सत्व का।

सत्व अंत नहीं है, सत्व तो केवल संतुलन की दशा है। इसलिए वह व्यक्ति सात्विक है, जिसके जीवन में अति नहीं है। जो न तो अति गृहस्थ ही है और न अति संन्यस्त ही है, जो न तो अति धन में लगा है, न अति त्याग में लगा है; जो न अति भोग में है, न अति विरोध में है, जो न अति राग में है, न अति विराग में है। जिसके जीवन में एक गहन शांति, जिसके भीतर लय सध गई, जिसने अपने भीतर के विरोधों में सामंजस्य खोज लिया। जिसने अपने तमस और रज को जीवन के रथ में जोत लिया, वे दोनों बैल हो गए और दोनों अब जीवन के रथ को खींचने लगे, साथ—साथ—विरोध में नहीं, एक—दूसरे की दुश्मनी में नहीं—स्व—दूसरे के गहन सहयोग में।

तम और रज का जहां सहयोग होता है, वहीं तीसरे का जन्म हो जाता है। जहां तम और रज का सहयोग होता है, वहा सत्व का जन्म हो जाता है। सत्व गौरीशंकर का शिखर है। वही अंत नहीं है, लेकिन छलांग के लिए आखिरी जगह है। वहां से छलांग एक में लगती है, आदमी तीन के पार हो जाता है।

उस एक को तुम समझ सकते हो इस ट्राएंगल, इस त्रिकोण के बीच का बिंदु। वह तीनों से बराबर दूरी पर है। इसलिए कोई चाहे तो तमस से भी उसकी तरफ जा सकता है, यद्यपि यात्रा बहुत कठिन होगी।

कोई वाल्मीकि तमस से भी सीधा चला जाता है, मरा—मरा जपकर राम को उपलब्ध हो जाता है। पक्के आलसी रहे होंगे और पक्के तमस से भरे रहे होंगे, अंधकार से भरे रहे होंगे। यह भी फिक्र न की पता लगाने की कि मरा—मरा जप रहा हूं यह ठीक भी मंत्र है या नहीं? डाकू हैं, लुटेरे हैं, हत्यारे हैं। गहन तमस रहा होगा, नीचे की तरफ प्रवाह रहा होगा। लेकिन यात्रा कर ली, सीधे उपलब्ध हो गए। कोई अंगुलीमाल सीधा उपलब्ध हो जाता है।

तो वह जो एक है, जो मूल उदगम है, वह इन त्रिकोणों के ठीक बीच का बिंदु है। तीनों कोने से बराबर फासला है—सत्व से, रज से, तम से।

लेकिन तम से यात्रा बहुत कठिन है, क्योंकि यात्रा करने का मन ही नहीं होता। यात्रा करे कौन?

रज से भी यात्रा करनी कठिन है, उतनी कठिन नहीं, जितनी तम से है, पर फिर भी कठिन है। यात्रा तो करनी हो जाती है, लेकिन रुकना नहीं आता। और उस परम में तो रुकना पड़ेगा। तम वाला आदमी ऐसे बैठा रहता है, जैसे मंजिल पर पहुंच गया, और रज वाला आदमी मंजिल के पास से भी गुजर जाता है, लेकिन समझता है, यह भी मार्ग है। क्योंकि उसे चलने की धुन है; वह रुक नहीं सकता।

तुमने कहानी सुनी होगी, एक जंगल में आग लग गई। और एक अंधा आदमी है, जो चल सकता है, लेकिन देख नहीं सकता। और एक लंगड़ा आदमी है, जो देख सकता है, लेकिन चल नहीं सकता। वह लंगड़ा है तमस का प्रतीक, वह अंधा है रजस का प्रतीक। अंधा चल सकता है, दौड़ सकता है, लेकिन देख नहीं वह मंजिल के पास से भी दौडता निकल जाएगा, मंजिल के से भी दौड़ता निकल जाएगा। चल सकता है, लेकिन देख नहीं सकता। और जो देख नहीं सकता वह रुकेगा कैसे?

और लंगड़ा है, जो देख सकता है, मंजिल दिखाई पड़ती रहेगी कि दूर आकाश में उतुंग— शिखर दिखाई पड़ते हैं, स्वर्ण कलश परमात्मा के। मगर वह लंगड़ा है, वह बैठा अपने वृक्ष के नीचे ही रहेगा; वह चल नहीं सकता है।

वह जो कहानी है, वह सांख्यों की कहानी है। उन दोनों का जोड़ चाहिए। सांख्यों ने जोड़ करवा दिया। वह बच्चों की कहानी नहीं है। तुम समझना मत कि बच्चों के लिए लिखी गई है। बच्चों की किताबों में है, बूढ़ों के लिए है। दोनों तो व्यर्थ थे, एक लयबद्धता चाहिए थी कि दोनों सहयोगी हो जाएं।

दोनों सहयोगी हो गए। समझी उन्होंने अपनी हालत। अंधे ने कहा कि मैं चल सकता हूं दौड़ सकता हूं पैर मेरे परिपूर्ण स्वस्थ हैं। मगर कहां जाऊं? कहां दौडूं? कैसे निकलूं बाहर इस आग के? कहां है मार्ग? कौन ऐसी जगह है, जहां लपटें न हों और मैं बाहर निकल जाऊं, यह मैं नहीं जानता। तो दौड़ तो मैं काफी रहा हूं लेकिन दौड़ने में उलटा मैं जल जाऊंगा, खतरा है।

 

 

उस लंगड़े ने कहा, मैं तुम्हारे काम आ सकता हूं। मैं देख रहा हूं कि कहां मार्ग है, कहां मंजिल है। पैर नहीं मेरे पास। तुम मुझे अपने कंधों पर ले लो। अंधे ने लंगडे को कंधे पर ले लिया, लय बंध गई। जिस दिन रजस के कंधे पर तमस बैठ जाता है, उसी दिन लय बंध जाती है। उसी दिन संगीत पैदा हो जाता है। अब मार्ग खोजने में कोई कठिनाई नहीं है। दोनों मिलकर सत्व की यात्रा पर निकल जाते हैं; सत्व दूर नहीं है।

तमस से भी यात्रा हो सकती है, हुई है, लेकिन अति कठिन है। अंधा भी कोशिश करे, तो निकल सकता है टटोल—टटोलकर, लेकिन बड़ा मुश्किल होगा। और लंगड़ा भी घसिट—घसिटकर बाहर हो सकता है, लेकिन बडा मुश्किल होगा। जो तमस से यात्रा करते हैं सीधे, उनकी घसिट—घसिटकर यात्रा होती है। जो रजस से यात्रा करते हैं, उनको अंधे की तरह टटोल—टटोलकर यात्रा करनी पड़ती है। संयोग है निकल जाएं तो, अन्यथा आग तो भस्मीभूत कर ही लेगी। जो समझदार हैं, वे दोनों का जोड़ बिठा लेते हैं। उनके जोड़ से संगीत पैदा होता है, वही सत्व है।

वह सत्व भी अंतिम नहीं है, लेकिन उस संगीत से फिर मध्य के बिंदु की तरफ सुगमता से यात्रा हो जाती है। जैसे कोई टहलता हुआ बाहर हो गटिहलता हुआ कहता हूं। खेल—खेल में बाहर हो जाए; कुछ श्रम नहीं पड़ता। सत्व से छलांग बडी आसान है। क्योंकि वहा पैर भी हैं, ऊर्जा भी है, आंखें भी हैं और बंधी हुई लयबद्धता में सब साफ दिखाई पड़ता है। जैसे झील शांत हो गई और कोई लहरें नहीं और झील दर्पण बन गई।

अर्जुन ने कृष्ण से पूछा……।

यह है श्रद्धात्रय—विभाग—योग। क्योंकि अगर तीन हैं, तो श्रद्धाएं भी तीन होंगी। तामसी की भी श्रद्धा होगी, आलसी की भी श्रद्धा तो होती है। राजसी की भी श्रद्धा होगी, सत्य को उपलब्ध व्यक्ति की भी श्रद्धा होगी।

तो अर्जुन ने कहा, हे कृष्ण, जो मनुष्य शास्त्र—विधि को त्यागकर केवल श्रद्धा से युक्त हुए देवादिको का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन—सी है? सात्विकी अथवा राजसी अथवा तामसी?

कृष्ण ने कहा, मनुष्यों की वह स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्विकी और राजसी तथा तामसी, ऐसी तीन प्रकार की होती है। इससे बड़ी हैरानी होगी, क्योंकि तुम तो सदा सोचते रहे होंगे कि श्रद्धा सदा सात्विक होती है। श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है।

तमस से भरे हुए व्यक्ति की श्रद्धा कैसी होगी? तमस से भरा हुआ व्यक्ति अगर प्रार्थना भी करेगा, तो इसीलिए करेगा, ताकि उसे कुछ करना न पडे। वह परमात्मा पर भरोसा करेगा, तो इसीलिए करेगा, ताकि खुद करने से बच जाए। वह कहेगा, सब करने वाला वही है। बातें वह बड़ी ज्ञान की करेगा। कहता है, सब करने वाला वही है, देने वाला वही है। चलने—फिरने से क्या होगा? करने से क्या होगा? वह कहेगा, हम तो भाग्य में श्रद्धा करते हैं। वह कहेगा, जो होना है, वह हो ही जाता है। उसकी बिना आशा के तो पता भी नहीं हिलता। तो कहता है कि वह तो पशु—पक्षियों को पालता है, तो हमें न पालेगा?

बड़ी ज्ञान की बातें करता है आलसी भी। लेकिन छिपा रहा है तमस को। वह यह कह रहा है कि हम कुछ करना नहीं चाहते। असल में वह यह नहीं कह रहा है कि परमात्मा सब करता है, वह यह कह रहा है कि हम कुछ करना नहीं चाहते। परमात्मा की ओट में वह तमस को छिपा रहा है।

इस मुल्क में करोड़ों की संख्या है ऐसे लोगों की जिनकी श्रद्धा तमस की है, जो कुछ न करेंगे। लेकिन उनके जीवन में कोई परम संगीत भी बजता हुआ सुनाई नहीं पड़ता। जीवन तो उदास थका—मादा दिखाई पड़ता है। बातें बड़े ज्ञान की करते हैं वे कि उसकी मरजी के बिना क्या होगा? सब उसी पर छोड़ दिया है। छोड़ा उन्होंने कुछ भी नहीं है। कुछ कर नहीं सकते, कुछ करने की हिम्मत नहीं है, ऊर्जा नहीं है, और तमस से राग बना लिया है, रस बना लिया है। इसलिए बड़ी ऊंची बातें करते हैं।

अगर कोई दूसरा धन कमा रहा है, वह कह रहा है, क्या करोगे कमाकर भी? उसकी मरजी होगी, तो लंगड़े पहाड़ चढ़ जाते, अंधे पढ़ने लगते, बहरे सुनने लगते। और उसकी मरजी न होगी, तो दौड़ते रहो, क्या होगा? वह अपने को समझा लेता है। वह कहता है कि मैं संतोषी हूं। भीतर सब तरह की वासनाएं जलती हैं, भीतर सब तरह की महत्वाकांक्षाएं उठती हैं, सब सपने उठते हैं। लेकिन उन सपनों के लिए तो दाव लगाना पड़े, वह उसकी हिम्मत नहीं है। वह कहता है, मैं संतुष्ट हूं। जो दे दिया, ठीक है, काफी है, पर्याप्त है। मैं ज्यादा की माग नहीं करता। वह ज्ञानी का ढोंग करता है।

तुम ऐसे आदमी को देख सकते हो; उसे पहचानने में अड़चन न होगी। क्योंकि जिसका संतोष सात्विक है, तुम उसके संतोष की कथा उसकी आंखों, उसके चेहरे, उसके जीवन पर लिखी हुई पाओगे। तुम उसे आह्लादित पाओगे, तुम उसे विधायक रूप से प्रसन्न और उत्कुल्ल पाओगे। तुम उसमें फूल खिलते देखोगे, तुम उसके रोएं—रोएं में कोई बांसुरी बजती हुई पाओगे। तुम उसके पास बैठोगे, तो धन्य हो जाओगे, जैसे स्नान कर लिया। उसकी पवित्रता तुम्हें छुएगी।

लेकिन अगर उसका संतोष केवल आलस्य को ढांकने का, छिपाने का रेशनलाइजेशन है। वह कहता है कुछ करना न पड़े, इसलिए वह कहता है, जो होना है, वह होगा। तुम पाओगे, उसके चेहरे पर उदासी की पर्तें हैं। उसकी आंखों में तुम धुंध पाओगे, उज्ज्वल प्रकाश नहीं। उसके पास बैठकर तुम्हें नींद और जम्हाई आएगी, स्नान नहीं होगा। उसके पास बैठकर तुम थके हुए अनुभव करोगे, क्योंकि तामसी व्यक्ति दूसरे की शक्ति को चूसता है। इसलिए जब भी तुम तामसी व्यक्ति को मिलोगे, तुम पाओगे, तुम कुछ खोकर लौटे।

राजसी व्यक्ति अपनी शक्ति को देता है। इसलिए राजसी व्यक्ति के पास जाकर तुम पाओगे कि तुम्हारी भी महत्वाकांक्षा के दीए जलने लगे। वह तुम्हें भी रोग पकड़ा देगा। वह कहेगा, क्या कर रहे हो बैठे—बैठे! इस चुनाव में ही खड़े हो जाओ। बुद्ध से बुद्ध मंत्री हुए जा रहे हैं। तुम क्यों पीछे खड़े हो? कुछ न बनता हो, तो कम से कम तीन दिन का अनशन ही कर लो! कम से कम अखबारों में नाम तो छप जाएगा। तुम अपनी तरफ से आमरण अनशन करो, तुड़वाने की हम कोशिश करेंगे। नाम तो कर जाओ, ऐसे ही मर जाओगे! वह कुछ न कुछ उपद्रव सुझा देता है।

अगर राजसी व्यक्ति के पास बैठें, तो सम्हलकर बैठना। क्योंकि वह खुद उपद्रव से भरा है, वह बांटता है, वह देता है। उसके पास बैठकर तुम उपद्रव लेकर लौटोगे। किसी राजनेता की सभा से तुम लौटोगे, तो तुम्हारी तबियत होगी कि उठाकर पत्थर बस में ही मार दें। कोई कारण नहीं है, लेकिन वह राजनेता तुम्हें बीमारी दे गया। वे राजनेता कहे चले जाते हैं कि हम बिलकुल अहिंसात्मक हैं। हम किसी को हिंसा थोड़े ही सिखाते हैं। मगर वे सब हिंसा सिखाते हैं। उनका होने का ढंग हिंसात्मक है।

जयप्रकाश कितना ही कहें कि बिहार में जो उपद्रव हुआ, उसकी मेरी जिम्मेवारी नहीं……। किसी और की जिम्मेवारी नहीं है। वे कितना ही कहें कि मैं तो अहिंसा की बात करता हूं; अब अगर लोगों ने पत्थर फेंक दिए बसों पर और आग लगा दी पुलिस थानों में, इसका मैं क्या कर सकता हूं?

वे गलत बात कह रहे हैं। ऊपर से तुम अहिंसा की बात करते हो, लेकिन भीतर से तुम्हारे सारे जीवन की ऊर्जा जो है, वह रजस

 

की है। तुम लोगों को भड़काते हो, तुम लोगों को उकसाते हो। पहले भड़काते हो, फिर उनको कहते हो, शांत हो जाओ, अहिंसा का पालन करो। पहले भाग लगा देते हो, फिर पानी छिड़कते हो। पहले आग लगा देते हो, फिर बुझाने की कोशिश करते हो!

लोगों को भड्का दो, उनके भीतर का रजस जग जाए, उपद्रव करने को वे निकल पड़े, फिर तुम्हारे हाथ के बाहर है। हो सकता है, तुमने सोचा भी न हो कि वे मकानों में आग लगाएंगे, दुकानें जलाएंगे। तुम्हारे सोचने न सोचने का सवाल नहीं है। तुमने जो ऊर्जा उन्हें दी, वह ऊर्जा उपद्रवी है।

तामसी व्यक्ति तुम्हारी ऊर्जा को चूसता है, वह आलस्य से भरा हुआ है। वह तुम जब उसके पास जाते हो, तो वह शोषण करता है। उसके पास से तुम थके लौटोगे, उदास लौटोगे, हारे हुए लौटोगे। तुम्हारी भी तबियत सो जाने की होगी।

राजसी व्यक्ति भड़काता है। वह तुम्हें त्वरा से भरता है, बुखार से, कि कुछ कर गुजरो। उसके शब्द सुनकर दुनिया में उपद्रव होते हैं। उसके पास से आकर लोग झंझट में पड जाते हैं।

एक मित्र परसों ही मुझसे पूछे आकर। जयप्रकाश के साथी हैं। कहने लगे, मैं बड़ी मुसीबत में पड़ गया हूं, दुविधा खड़ी हो गई है। आपको क्या पढ़ा, एक झंझट हो गई। अब जयप्रकाश या आप? क्या करूं? क्या दोनों के बीच कोई समन्वय नहीं हो सकता?

मैंने कहा, तुम कोशिश करो समन्वय की; उसमें तुम पगला जाओगे। वह समन्वय हो नहीं सकता। क्योंकि दो अलग लोग, अलग आयाम।

वहां तुम्हें जयप्रकाश भड्का रहे हैं, यहां मैं तुम्हें शांत करने की कोशिश कर रहा हूं। तुम तालमेल कैसे बिठाओगे? वे कह रहे हैं, पूर्ण क्रांति, मैं कह रहा हूं पूर्ण शांति। इसमें तालमेल कैसे बिठाओगे? वे कहते हैं, संसार को बदलकर रहेंगे। मैं कहता हूं? तुम अपने को बदल लो, तो काफी है। इसमें कोई तालमेल हो नहीं सकता।

तो मैंने उनको कहा कि तुम मुझे भूल जाओ। इस झंझट में तुम पड़ो ही मत। किताबें वगैरह मेरी फेंक दो; मुझे भूल जाओ। और तुम जयप्रकाश के पीछे चलो। उन्होंने कहा, वह तो असंभव है। वह नहीं हो सकता अब। शक तो पैदा हो ही गया है। तो फिर मैंने कहा कि शक अगर पैदा हो गया है, तो जयप्रकाश को छोड़ दो। कहने लगे, लेकिन यह भी बड़ा मुश्किल है।

तो मरो, दुविधा में मरो। इसमें मैं क्या कर सकता हूं? कोई भी क्या कर सकता है? तो तुम्हारी बैलगाड़ी में दोनों तरफ बैल जोत लो और चलो। दोनों को हाको। अस्थिपंजर टूट जाएंगे। घसिटोगे; पहुंचोगे कहीं भी नहीं।

क्योंकि मेरे लिए तो जयप्रकाश रुग्ण हैं, विक्षिप्त मन की दशा है, सभी राजनीतिज्ञ होते हैं। इसलिए जब मैं यह कह रहा हूं तो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इंदिरा विक्षिप्त नहीं है। पद पर जो होते हैं, उनकी विक्षिप्तता दिखाई नहीं पड़ती। जो पद पर नहीं होते, उनकी विक्षिप्तता दिखाई पड़ती है। मोरारजी पद पर होते हैं, तब बड़े समझदार मालूम पड़ते हैं। जब पद के बाहर होते हैं, तब विक्षिप्त हो जाते हैं।

पद की समझदारी कोई समझदारी है? पद की समझदारी तो यह है कि जो अपने पास है, वह छूट न जाए, इसलिए उपद्रव से डरने लगता है आदमी। लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उसका तुम छुडाओगे क्या? नंगा नहाएगा, निचोड़ेगा क्या? तो वह कहता है, पूर्ण क्रांति करवा देंगे। उसका तो कुछ खोना नहीं है, इसलिए वह उपद्रवी हो जाता है।

पद पर बैठे हुए लोग उतने ही पागल हैं, जितने पद के बाहर। उनकी जमात एक है। उनकी भाषा एक है। उनकी दुनिया एक है। रजस वाले व्यक्ति के पास से तुम रोग लेकर लौटोगे।

सात्विक व्यक्ति न तो तुम्हें कुछ देता है, न तुम से कुछ लेता है। सात्विक व्यक्ति के पास बैठकर तुम तुम ही हो जाओगे। यही थोड़ी समझने की बात है। वह तुमसे कुछ नहीं लेता; वह तुम्हें कुछ देता भी नहीं। वह तुम्हें सिर्फ तुम्हारे होने का मौका देता है। उसकी छाया में बैठकर तुम तुम हो जाओगे, तुम जो हो। तुम्हें अपना सत्य सुनाई पड़ने लगेगा। तुम्हें अपने भीतर के संगीत की थोड़ी भनक पड़ने लगेगी।

सात्विक व्यक्ति कुछ देता नहीं, लेता नहीं; सिर्फ उसकी मौजूदगी तुम्हारे भीतर एक रूपांतरण बनने लगती है। तुम उसकी मौजूदगी में शांत होने लगते हो। तुम उसकी मौजूदगी में भीतर के द्वंद्व को क्षीण करने लगते हो। तुम उसकी मौजूदगी के प्रकाश में एक भीतर के आतरिक सहयोग को उपलब्ध हो जाते हो। वह तुम्हें सामंजस्य देता है, कुछ देता नहीं, कुछ लेता नहीं। वह तुम्हें तुम्हारी सुध देता है, तुम्हें तुम्हारी थोड़ी—सी भनक देता है; वह तुम्हें तुम्हीं बनाना चाहता है।

सात्विक व्यक्ति वही है, जो तुम्हें तुम्हीं बनाना चाहे। इसलिए तुम्हारे बहुत—से महात्मा सात्विक नहीं हैं। तुम्हारे बहुत—से महात्मा राजसिक हैं। वे तुम्हें गति देते हैं कि छोड़ो। यह छोड़ो, वह छोड़ो।

 

यह व्रत ले लो, वह कसम ले लो। चलो, ब्रह्मचर्य की कसम खा लो। वह कुछ न कुछ उपद्रव तुम उनके पास से लेकर लौटोगे। वह महात्मा सात्विक नहीं है। उन्हें राजनीतिज्ञ होना था। वे गलती जगह फंस गए हैं।

कई दफा हो जाता है, आदमी गलती जगह फंस जाता है। कुछ महात्मा राजनीति में फंस जाते हैं, कुछ राजनीतिज्ञ महात्मा होने में फंस जाते हैं। तब बड़ी अड़चन होती है।

जो महात्मा तुम्हें बदलने की कोशिश करे, तुम्हें कुछ देने की कोशिश करे कि तुम ऐसे हो जाओ, तुम वैसे हो जाओ, जो तुम्हें आदर्श दे, वह महात्मा नहीं है, वह राजनीतिज्ञ है।

सात्विक व्यक्ति तुम्हें आदर्श देता ही नहीं, तुम्हारी स्वयंता देता है, तुम्हारी निजता देता है। तुम जो हो, बस वही। उसी के लिए तुम राजी हो जाओ। जैसा संगीत उसने अपने भीतर पाया, वैसा संगीत तुम्हारे भीतर भी हो जाए।

सात्विक व्यक्ति एक आशीष है बस, उपदेश नहीं; आदेश तो बिलकुल नहीं, सिर्फ एक आशीष। इसलिए पुरानी परंपरा है कि हम संतों के पास सिर्फ आशीर्वाद मांगने जाते हैं, और कुछ मांगने नहीं। और कुछ मायने की बात ही गलत है। और कुछ मांगना हो, तो राजसी के पास जाना चाहिए, तामसी के पास जाना चाहिए। सात्विक के पास तो सिवाय आशीष के और कुछ भी नहीं है। लेकिन उसके आशीष की छाया में परम रूपांतरण घटित होते हैं। उसके आशीष की छाया में अंधेरे घर प्रकाशित हो जाते हैं, बुझे दीए जल जाते हैं।

और जो सत्य को उपलब्ध हो जाता है—सत्य चट्टान है, जहां से एक में छलांग लगती है।

तामसी व्यक्ति की श्रद्धा आलस्य की होगी। वह अपने आलस्य को ही अपनी श्रद्धा बनाएगा। राजसी व्यक्ति की श्रद्धा राजस की होगी। वह अपने राजसीपन को ही अपनी श्रद्धा बनाएगा। वह कहेगा, कर्म—योग। वह राजसी व्यक्ति की श्रद्धा है।

लोकमान्य तिलक ने गीता—रहस्य लिखा। वह किताब राजसी व्यक्ति की लिखी गई किताब है। और उसका बड़ा प्रभाव हुआ। क्योंकि गीता में उन्होंने सिद्ध किया कि कर्म—योग ही गीता का प्रतिपाद्य विषय है।

इससे झूठी कोई बात नहीं हो सकती। इसमें लोकमान्य तिलक ने अपने को ही गीता में पढ़ लिया। वे राजसी व्यक्ति थे, राजनेता थे। वे खाली नहीं बैठ सकते थे। यह गीता—रहस्य भी खाली न बैठने के कारण लिखी गई। मंडाले के जेल में क्या करें? कुछ काम— धाम न रहा। खाली बैठ नहीं सकते। सात्विक व्यक्ति होता, तो ध्यान कर लेता। मंडाले का जेल महान समाधि बन जाता।। लेकिन अब यह राजसी व्यक्ति क्या करे? कुछ उपाय नहीं।

तो कोयले के टुकड़ों से दीवाल पर गीता—रहस्य की पहली टीकाएं लिखनी उन्होंने शुरू कीं। फिर कागज के टुकड़ों पर धीरे— धीरे टीका लिखी।

यह टीका राजसी व्यक्ति की टीका है, राजनेता की। फिर इसी टीका ने गांधी को प्रभावित किया विनोबा को प्रभावित किया। और वह गीता—रहस्य हिंदुस्तान के लिए पचास साल का पूरा इतिहास बन गई।

कर्म करो, तिलक ने कहा। और गांधी ने कहा, कर्म—योग ही असली योग है। सेवा करो, समाज सुधारो, अस्पताल बनाओ। गरीबों को मकान दो, जमीन दो। यह करो, वह करो। भूदान आया, सर्वोदय आया। वह सब गीता—रहस्य से सूत्रपात हुआ। लेकिन वह राजसी व्यक्ति की व्याख्या थी। सात्विक व्यक्ति की व्याख्या बडी भिन्न होगी।

सात्विक व्यक्ति की व्याख्या शांति की होगी, सेवा की नहीं। इसका यह अर्थ नहीं है कि शांत व्यक्ति सेवा नहीं कर सकता। लेकिन शांत व्यक्ति का सेवा लक्ष्य नहीं होता, उसकी शांति से निकलती है। इसका यह अर्थ नहीं कि शांत व्यक्ति कुछ भी नहीं करेगा। लेकिन करने की उसमें त्वरा नहीं होती, करने की आकांक्षा नहीं होती। जीवन जो करा ले, वह करता है। लेकिन करने के पीछे पागल नहीं होता। ऐसा नहीं है कि वह खाली नहीं बैठ सकता, इसलिए करता है। जरूरत हो, तो करता है, जरूरत नहीं होती, तो शांत बैठता है। कर्म उसके लिए कोई रोग नहीं है, कोई न्यूरोसिस नहीं है। कर्म उसके लिए जीवन—ऊर्जा का खेल है।

और जीता वह सदा अपने सत्व में है, अपनी शांति में है। कोई कर्म उसकी शांति को व्याघात नहीं कर पाता। आग लगी हो, तो वह बुझाका; बैठा नहीं रहेगा। लेकिन आग लग गई है, बुझाएगा। जरूर, लेकिन भीतर आग की कोई भी खबर न पहुंचेगी। भीतर की शांति अखंड रहेगी। आग भीतर की शांति को न जलाएगी। वह बेचैन न होगा। वह कर्म भी करेगा, वह विश्राम भी करेगा। वह जीवन के अनेक रंग—रूपों में रहेगा। लेकिन भीतर का स्वर संगीत का रहेगा, वह लयबद्धता कायम रहेगी।

सात्विक व्यक्ति की श्रद्धा क्या है? सात्विक व्यक्ति की श्रद्धा है भीतर की परम कुंवारी दशा, चैतन्‍य की शुद्धतम दशा को उपलब्ध हो जाना। वह अपने सारे जीवन के दर्शन को इस भांति सोचेगा, जैसे कि वह भी भाग्य की बात करेगा……।

अब यह थोड़ा समझ लेने जैसा है।

तामसी व्यक्ति भाग्य की बात करेगा, अपने को कर्म से बचाने के लिए। राजसी व्यक्ति भाग्य की बात करेगा, अपने को कर्म में डालने के लिए। वह कहेगा, भाग्य में जो लिखा है वह होगा। अब भाग्य में लिखा है कि मुझे प्रधानमंत्री होना है। मैं पूरी क्या कर सकता हूं? लिखा है, वह होकर रहेगा। जो भाग्य में लिखा है, उससे बचा कैसे जा सकता है? वह अपने कर्म को बचाएगा, भाग्य से।

सात्विक व्यक्ति भी भाग्य की बात करेगा, लेकिन उसके भाग्य में कोई बचाव नहीं होगा। वह कहेगा, जो होगा, वह होगा; जो होना है, वह होता है। इसलिए न तो वह करने को बेचैन होगा और न वह न—करने को पकड़ेगा। जीवन उसे जहां ले जाएगा—युद्ध के मैदान में, तो युद्ध के मैदान में खड़ा हो जाएगा, पहाड़ की कंदराओं में, तो पहाड़ कंदराओं में मौन होकर बैठ जाएगा। उसे सब स्वीकार है। और उसकी स्वीकृति तुम पहचान सकोगे, क्योंकि उसके चारों तरफ अहोभाव का नाद बजता रहेगा।

श्रीकृष्ण बोले, मनुष्यों की वह स्वभाव से उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्विकी और राजसी तथा तामसी, ऐसी तीन प्रकार की होती है, उसको तू मुझसे सुन।

 

आज इतना ही।

 

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गीता दर्शन—(भाग—आठ) ओशो /2016/11/03/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%86%e0%a4%a0-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/ /2016/11/03/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%86%e0%a4%a0-%e0%a4%93%e0%a4%b6%e0%a5%8b/#respond Thu, 03 Nov 2016 11:30:40 +0000 /?p=6992 (ओशो द्वारा श्रीमदभगवद्गीता के अध्‍याय सत्रह ‘श्रद्धात्रय—विभाग—योग’ एवं अध्‍याय अठारह ‘मोक्ष—संन्‍यास—योग’ पर दिए गये बत्‍तीस अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)

भूमिका:

(ओशो कृष्‍ण चेतना)

गीता एक महावाक्य, एक महाश्लोक, एक महाकाव्य है—किन शब्दों, किस भाषा में इसे परिभाषित किया जाए! जैसे अमृतमय, अव्याख्येय, अनूठे—अनमोल बोल कृष्ण ने गीता में बोले हैं वैसे बोल अन्य किसी देश में न तो कभी बोले गए और न कभी सुने गए। इसमें कविता है, संगीत है, सुगंध है। न जाने किस—किस प्रकार के रस अपने में समाए है यह गीता! रागी के लिए इसमें जगह है तो विरागी के लिए भी इसमें स्थान है। संन्यासी भी इसमें रस ले सकता है तो गृहस्थ भी इसमें डूब सकता है। लगता है कि गीता में कोई व्यक्ति नहीं, कोई समाज नहीं, कोई देश विशेष नहीं, समस्त अस्तित्व ही बोल रहा है। यह किसी जाति, किसी संप्रदाय का ग्रंथ नहीं, यह सार्वभौम शाश्वत वाणी है। वेद न रहे, कुरान न रहे, इंजील न रहे, बाइबिल न रहे तो कोई बात नहीं। यदि गीता है तो सारे ग्रंथ मौजूद हैं, सारे प्रज्ञा—पुरुष—महावीर, बुद्ध, क्राइस्ट, मोहम्मद—सभी हमारे पास हैं। चिंतन के दर्शन के जितने आयाम हो सकते हैं वे सभी इस एक ग्रंथ में समाहित हो गए हैं। यह ग्रंथों का ग्रंथ है। भारतीय मनीषा के मानसर में खिला हुआ गीता वो नील कमल है जिसकी सुगंध, जिसकी रूपाभा शताब्दियां बीत जाने के बाद भी आज तक कम नहीं हुई है।

जीवन और जगत के इतने सारे आयाम एक साथ समेटने के लिए जिस विराट—चेतना की आवश्यकता है—वही कृष्ण—चेतना है। और इस कृष्ण—चेतना को ग्रहण करने के लिए जो समर्पण— भाव अपेक्षित है—वही अर्जुन है। लेकिन गीता के अनेक भाष्यकार समर्पण की इस मुद्रा तक पहुंच नहीं सके हैं। सभी ने मात्र पंडित बनकर इसकी व्याख्याएं की हैं, अर्जुन बनकर इसे आत्मा में उतारा नहीं है और कृष्ण होना तो बहुत दूर की बात है। सच तो ये है कि लोगों ने गीता की व्याख्या न करके अपनी—अपनी पूर्व—निर्धारित मान्यताओं को ही अपनी—अपनी वृत्ति के अनुसार निरूपित किया है। किसी ने इसमें भक्तियोग, किसी ने कर्मयोग, किसी ने ज्ञानयोग और किसी ने सांख्ययोग की तलाश इसमें की है। जितने मुसाफिर हैं उतनी ही मंजिलें हैं। ऐसा इसलिए भी संभव हो सका है कि गीता एक ऐसा महासागर है कि इसमें जो भी छलांग लगाएगा, उसे अवश्य ही कुछ न कुछ प्राप्त होगा, भले ही वो शंख हो, सीप हो या मोती।

कृष्ण—चेतना के नाम से आज संसार में कितने ही आंदोलन चल रहे हैं—लेकिन कृष्ण—चेतना का अर्थ न तो छापा—तिलक ही है और न भजन—संकीर्तन ही। वह वैश्विक चेतना है—अस्तित्व के साथ तदाकार की स्थिति। और अस्तित्व जिसका नाम है वह सर्वग्राही, सर्वांगी है—एकांगी नहीं। वहा राग और विराग, जय और पराजय, जन्म और मृत्यु, योग और भोग, भौतिकता और आध्यात्मिकता सभी का समन्वय है। कृष्ण ही वो चेतना हैं जहां बांसुरी और पाञ्चजन्य, मोरपंख और राजदंड, परिग्रह और अपरिग्रह सभी एकाकार हो गए हैं। वहा पग—पग पर समन्वय के साथ विरोध भी है। इसलिए कृष्ण—चेतना को समग्रत: ग्रहण करना अथवा उसके साथ एकाकार हो जाना अत्यंत दुष्कर है।

ओशो के रूप में युगों बाद संसार में वास्तविक कृष्ण—चेतना का जन्म हुआ है। उनकी मुस्कान—मुद्रा, उनकी प्रेम—मुद्रा, उनकी ज्ञान—मुद्रा, उनकी ध्यान—मुद्रा को यदि मिला दिया जाए तो लगेगा कि समस्त अस्तित्व ही जैसे ओशो—कृष्ण के रूप में मूर्तिमंत हो गया है। संत ज्ञानेश्वर, तिलक, गांधी—विनोबा आदि अनेक विद्वानों के गीता— भाष्य मैंने पढ़े हैं, लेकिन सभी ने गीता को देखा है एक विद्वान की तरह, एक टीकाकार की तरह—अर्जुन की तरह गीता को किसी ने भी आत्मसात नहीं किया है और न ही कोई कृष्ण—चेतना में प्रवेश पा सका है। गीता समझने—समझाने की चीज नहीं, वह तो आत्मा से पान किया जाने वाला अमृत है। ओशो ही एकमात्र वह व्यक्ति हैं जो एक साथ कौन्तेय—चेतना और कृष्ण—चेतना के स्वर्ण—सेतु पर आरूढ़ होकर गीता—रहस्य को उद्घाटित करते हैं। इसलिए आत्मा के जिस स्तर तक ओशो की गीता पहुंचती है वहा तक अन्य किसी भाष्य की गीता नहीं।

गीता के प्रथम अध्याय का प्रथम श्लोक ”धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे……. मामका: पाण्डवाश्चैव….. ” महाभारत की भूमिका है और इसका अंतिम अठारहवा अध्याय उपसंहार है। धृतराष्ट्र संजय से पूछता है— ”कुरुक्षेत्र जो धर्मक्षेत्र है उसमें युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए, हे संजय! मेरे तथा पांडु—पुत्रों ने क्या किया? ” सचमुच ही यह संसार कर्मक्षेत्र है और इसके द्वारा ही धर्म की प्राप्ति होती है। लेकिन जब अहंकार—ग्रस्त चेतना इसे मेरे और तेरे (मामका: पाण्डवाश्चैव) में बांटकर देखने लगती है तब द्वंद्व, संघर्ष और महाभारत का जन्म होता है। मेरे—तेरे में उलझा हुआ मन सत्य को नहीं, तथ्य को देखता है। शब्द के पीछे जो मौन है, गणना के पीछे जो शून्य है, रूप के पीछे जो अरूप, अनश्वर, अविनाशी आत्मा है, उस तक उसकी दृष्टि नहीं जाती। इसलिए ऐसी दृष्टि अंध—दृष्टि ही कही जाती है—तभी तो धृतराष्ट्र अंधा है।

समस्त जीवन—संग्राम, समस्त महाभारत इसी अंध—दृष्टि का ही परिणाम है। गीता इसी अहंकार—ग्रस्त अंध—दृष्टि से मोक्ष तक की महायात्रा है। अहंकार का विसर्जन ही मोक्ष है। इस महायात्रा के दौरान त्रिगुणात्मक प्रकृति के जाल में भी मनुष्य फंसता है। इससे छूटने का उपाय है संन्यास और संन्यास ही मोक्ष का मार्ग है। एक साधन है, एक साध्य। संसार की अन्य संस्कृतियां अर्थ से चलकर धर्म तक तो पहुंचीं, लेकिन मोक्ष की कल्पना भारतीय मनीषा की सर्वथा मौलिक और अनूठी कल्पना है। और यह मोक्ष भी संसार से भागकर नहीं, संसार में रहते हुए भी घटित हो सकता है। गीता का यही सार है।

गीता के सत्रहवें और अठारहवें अध्यायों में प्रकृति की सात्विक, राजस और तामस वृत्तियों को भिन्न—भिन्न आयामों और परिवेशों में रखकर ओशो ने जिस तरह देखा और परखा है और संन्यास तथा मोक्ष की अनेक सरणियों और रूपों की जो व्याख्या उन्होंने की है, वह इतनी सहज और सुगम है कि उसे सामान्य से सामान्य पाठक भी बड़ी सरलता से ग्रहण कर सकता है। यह उनकी वाणी का चमत्कार है। ओशो के बोल सचमुच ही अनूठे, अनुपम और अप्रतिम हैं।

 

गोपालदास ‘नीरज’

सुप्रसिद्ध महाकवि

जनकपुरी, मेरिस रोड

अलीगढ़ ( उ. प्र.)

 

इस युग को कृष्ण की जरूरत है

अहंकार पक गया है।

संकल्प प्रगाढ हुआ है।

मनुष्य के हाथ में बड़ी ऊर्जा है।

यह ऊर्जा नर्क ले जाएगी।

यह ऊर्जा पृथ्वी को हिरोशिमा और नागासाकी में बदल देगी।

अगर जल्दी ही इस ऊर्जा का रूपांतरण न हुआ,

अगर यह ऊर्ज। संकल्प से हटकर समर्पण की तरफ न बही,

तो यह रेगिस्तान में खो जाएगी, मरुस्थल में खो जाएगी।

इसके साथ आदमी। भी खो जाएगा। एक महा अग्‍नि होगी,

महा विस्फोट होगा। मनुष्य की प्रौढ़ता पकी है,

और कृष्ण के संदेश की ऐसे क्षण में जरूरत है।

 

ओशो

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गीता दर्शन–(प्रवचन–176) /2016/11/01/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-176/ /2016/11/01/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-176/#respond Tue, 01 Nov 2016 03:59:36 +0000 /?p=6985 नरक के द्वार: काम, क्रोध, लोभ—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—16    सूत्र—

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।

काम: क्रोधस्तथा लौभस्तस्मादैतन्त्रयं त्यजेत्।। 21।।

एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमद्धोरैस्प्रिभिर्नर:।

आचरत्यक्ष्मन: श्रेयस्‍स्‍ततो यति परां गतिम्।। 22।।

यः शास्त्रविश्वैमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।

न स सिद्धिमावाप्‍नोतिप्त न सुखं न परां गतिम्।। 23।।

तस्माच्‍छात्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्‍यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्‍तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।। 24।।

 

और हे अर्जुन, काम, क्रोध तथा लोभ, ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्‍मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले है, इससे इन तीनों को त्याग देना चाहिए। क्योंकि है अर्जुन, इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्‍त हुआ पुरूष अपने कल्याण का आचरण करता है। इससे वह परम गति को जाता है अर्थात मेरे को प्राप्त होता है।

और जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से बर्तता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परम गति को तथा न सुख को ही प्राप्त होता है।

इसलिए तेरे लिए हम कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर तू शास्त्र— विधि से नियत किए हुए कर्म को ही करने के लिए योग्य है।

 

पहले कुछ प्रश्न।

 

पहला प्रश्न : ईश्वर और धर्म यदि परम नियम के ही नाम हैं, उससे अन्यथा कुछ भी नहीं, तो प्रार्थना, भक्ति, आराधना, सब व्यर्थ हो जाते हैं। तब तो धर्म विज्ञान का पर्याय हो जाता है और उस परम नियम की खोज में निकलना मात्र धर्म रह जाता है। इस पर कुछ और प्रकाश डालें।

 

सा प्रश्न मन में उठेगा। यदि धर्म मात्र नियम है, तो स्वभावत: धर्म वितान ही हो गया। फिर प्रार्थना कैसी? किससे? आराधना कैसी और किसकी? पूजा, भक्ति सब व्यर्थ हो जाते हैं।

क्योंकि हमने अब तक ऐसा ही समझा है कि प्रार्थना तभी हो सकती है, जब व्यक्तिगत रूप से ईश्वर मौजूद हो। हमने अब तक ऐसा ही सुना और समझा है कि पूजा तभी हो सकती है, जब पूजा लेने वाला मौजूद हो। आराधना और भक्ति तभी सार्थक है, जब भगवान हो, कोई व्यक्ति की तरह मौजूद हो, जो स्वीकार करे, अस्वीकार करे, स्तुति से प्रसन्न हो, निंदा से नाराज हो। कोई प्रतिक्रिया करने वाला मौजूद हो, तो ही हमारे प्रेम की पुकार का कोई अर्थ है, कोई जबाब दे! हमने अब तक ऐसा ही समझा है, इसलिए प्रश्न उठता है।

लेकिन हमारी समझ भ्रांत है, हमारी समझ में भूल है।

प्रार्थना की उपादेयता परमेश्वर है, इससे जरा भी नहीं है। प्रार्थना करने का सारा का सारा विज्ञान प्रार्थना करने वाले से संबंधित है। भगवान हो या न हो, व्यक्ति की तरह कोई आकाश में बैठकर जीवन को चलाता हो या न चलाता हो, भक्ति का उससे कुछ लेना—देना नहीं है। भक्ति तो भक्त की अंतर्दशा है।

भक्त को कठिन होगा बिना भगवान के भक्तिपूर्ण होना, इसलिए सभी धर्मों ने भगवान की धारणा को पोषित किया है। यह सिर्फ भक्त को सहारा देने के लिए है। लेकिन अगर समझ हो, तो भक्ति अपने आप में पूरी है, भगवान की कोई भी जरूरत नहीं। प्रार्थना अपने आप में पूरी है, कोई उसे सुनता हो कि न सुनता हो; सुनने वाला आवश्यक नहीं। आराधना पर्याप्त है, आराध्य जरा भी आवश्यक नहीं है।

जब मैं यह कहता हूं तो क्या मेरा अर्थ होगा! क्योंकि बात कठिन लगेगी। आराधना हमारे लिए तभी समझ में आती है, जब आराध्य हो, पूजा तभी समझ में आती है, जब कोई पूज्य हो। लेकिन मैं आपको कहना चाहूंगा कि पूजा चित्त की एक दशा है। बुद्ध किसी भगवान को मानते नहीं, फिर भी उनकी आराधना में रत्तीभर कमी नहीं है। किसी परमेश्वर की उनके मन में कोई धारणा नहीं है, लेकिन बुद्ध से ज्यादा प्रार्थनापूर्ण हृदय आप खोज पाइएगा? एच .जी वेल्स ने लिखा है कि बुद्ध जैसा ईश्वररहित और ईश्वर जैसा व्यक्ति खोजना कठिन है—सो गॉडलेस एंड सो गॉड लाइक।

इसे हम थोड़ा—सा अंतर्मुखी हों, तो खयाल में आ सकेगा।

क्या आप प्रेमपूर्ण हो सकते हैं बिना प्रेमी के हुए? क्या प्रेमपूर्ण होना आपके जीवन का ढंग और शैली हो सकती है? क्या प्रेमपूर्ण होना आपकी भाव—दशा हो सकती है?

तो फिर आप उठेंगे भी तो प्रेम से, बैठेंगे भी तो प्रेम से, भोजन करेंगे तो भी प्रेम से, सोने जाएंगे तो भी प्रेम से। कोई प्रेमी नहीं होगा, लेकिन आप प्रेमपूर्ण होंगे। फिर जो भी आपके मार्ग पर आ जाएगा, वही आपको प्रेमी जैसा मालूम पड़ेगा। एक पक्षी भी उड़ जाएगा आपके अपान से और आप प्रेमपूर्ण होंगे, तो पक्षी प्रेमी हो जाएगा। कोई भी न होगा, सूना आकाश होगा आपके आगन का और आपका हृदय प्रेमपूर्ण होगा, तो सूना आकाश भी व्यक्तित्व ले लेगा।

व्यक्ति की जरूरत नहीं है, हृदय प्रेमपूर्ण हो, तो प्रेमपूर्ण हृदय जिस तरफ भी प्रकाश डालता है, वहीं व्यक्तित्व निर्मित हो जाता है। भगवान नहीं है, भक्त है। और भक्त का हृदय जहां भी देखता है, वहीं भगवान प्रकट हो जाता है।

इसे थोड़ा समझने की जरूरत है।

यह भक्त के हृदय की सृजनकला है कि वह जहां भी आंख डालता है, वहा भगवान पैदा हो जाता है। वह वृक्ष में देखेगा, तो वृक्ष में भगवान प्रकट हो जाएगा। यह आपकी आंख पर निर्भर है कि आप क्या पैदा कर लेते हैं। भगवान भक्त का सृजन है।

धर्म तो नियम है। धर्म कोई व्यक्ति नहीं है, धर्म तो शक्ति है। इसलिए भगवान शब्द ठीक नहीं है, भगवत्ता! डीइटी नहीं, डिविनिटी! कोई व्यक्ति की तरह बैठा हुआ पुरुष नहीं है ऊपर, जो चला रहा हो। लेकिन यह सारा जगत चल रहा है। चलने की घटना घट रही है; कोई चलाने वाला नहीं है। यह जो चलने का विराट उपक्रम चल रहा है, यह जो चलने की महान ऊर्जा है, यह जो शक्ति है, यह शक्ति ही भगवान हो जाती है, अगर हृदय में भक्ति हो। यह शक्ति ही प्रकृति मालूम पड़ती है, अगर हृदय में भक्ति न हो।

प्रकृति और परमात्मा दो तरह के हृदय की व्याख्याएं हैं। जिसके हृदय में कोई भक्ति नहीं, उसे चारों तरफ प्रकृति दिखाई पड़ती है, पदार्थ दिखाई पड़ता है। जिसके हृदय में भक्ति है, उसे चारों तरफ परमात्मा दिखाई पड़ता है, परमेश्वर दिखाई पड़ता है। परमेश्वर और प्रकृति एक ही विराट घटना की व्याख्याएं हैं। और आपके हृदय पर निर्भर है कि व्याख्या आप कैसी करेंगे। आप वही देख लेंगे, जो आपके हृदय में आविर्भूत हुआ है।

प्रार्थना, पूजा, आराधना भगवान के कारण नहीं हैं। लेकिन प्रार्थना, पूजा, आराधना के कारण जगत भगवान जैसा दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है। भगवान है और इसलिए हम प्रार्थना करते हैं, ऐसा नहीं। हम प्रार्थना करते हैं, इसलिए भगवान हो जाता है।

लोग कहते हैं, भगवान ने आपको बनाया, और मैं आपको कहता हूं कि आपकी भक्ति भगवान को सृजित करती है। जहां आपकी भक्ति होगी, वहां भगवान प्रकट हो जाता है। जहां से आपकी भक्ति विदा हो जाएगी, वहीं भगवान विदा हो जाएगा। भगवान आपकी आंखों के देखने का ढंग है।

धर्म तो नियम है। लेकिन उस नियम में उतरना, आपको अपने को बदलना पड़े, तभी हो सकता है।

प्रार्थना आपको बदलने के लिए है। आमतौर से हम प्रार्थना करते हैं परमात्मा को बदलने के लिए। आप बीमार हैं, तो आप प्रार्थना करते हैं कि मुझे ठीक करो। परमात्मा का इरादा बदलने की चेष्टा है हमारी प्रार्थना। अगर आप बीमार हैं और सच में ही भक्त हैं, तो आपको स्वीकार करना चाहिए कि परमात्मा चाहता है कि मैं बीमार होऊं, इसलिए मैं बीमार हूं।

परमात्मा का दृष्टिकोण बदलने की चेष्टा हम करते हैं कि मुझे स्वस्थ कर; कि मैं गरीब हूं? मुझे अमीर कर; कि मैं दुखी हूं मुझे सुखी कर, अपनी दृष्टि बदल। हम परमात्मा का ध्यान आकर्षित करते हैं कि बदलो, जो चल रहा है, वह ठीक नहीं; मैं उससे राजी नहीं हूं।

और हम उसकी खुशामद करते हैं। क्योंकि हमने जीवन में सीखा है कि मनुष्य को हम खुशामद से प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए हम सोचते हैं, जिस ढंग से आदमी प्रभावित होता है, उसी ढंग से परमात्मा भी प्रभावित होगा। तो हम स्तुति करते हैं; हम उसका गुणगान करते हैं। हम कहते हैं, तुम बहुत महान हो। लेकिन हमारी इस सारी चेष्‍टा में छिपा क्या? मन की आकांक्षा क्या?

यही कि तुम जो कर रहे हो, वह ठीक नहीं। और हमारी इस स्तुति में एक तरह की धमकी है कि अगर तुम यह बंद नहीं करोगे, तो यह स्तुति बंद हो जाएगी, तो यह प्रार्थना समाप्त हो जाएगी; फिर तुम्हें कोई पूजने वाला नहीं है। अगर पूजा जारी रखवानी है, तो हमारी मरजी के अनुसार थोड़ा कुछ करो।

हमारी सारी प्रार्थनाएं मांगें हैं, हम कुछ मांगते हैं। और हमारी मौलिक मांग यह है कि हम ठीक हैं और तुम गलत हो।

एक बहुत बड़े विचारक अल्डुअस हक्सले ने लिखा है कि परमात्मा से हम जब भी प्रार्थना करते हैं, हम चाहते हैं कि दो और दो चार न हों।

हमारी सारी प्रार्थनाओं का रूप यही है कि दो और दो चार न हों। हमने पाप किए हैं, उसके कारण हम दुख भोगते हैं। वह दो और दो चार हो रहे हैं। हम चाहते हैं, दुख हमें न मिले। पाप हमने किए हैं, क्षमा तुम कर दो।

जो भी हम भोग रहे हैं, वह हमारे कृत्यों का जोड़ है। लेकिन उसमें तुम बदलाहट कर दो। दो और दो तो चार होते हैं, लेकिन हम चाहते हैं, या तो तुम पांच करो या तुम तीन करो, चार भर न हो पाएं। हमारी सारी प्रार्थनाएं गणित को डगमगाने के लिए हैं, नियम को तोड्ने के लिए हैं। अन्यथा प्रार्थना का हमारा क्या प्रयोजन है?

इस प्रार्थना की अगर आप धारणा रखते हैं, तब तो बिना परमात्मा के प्रार्थना व्यर्थ हो जाएगी। क्योंकि अगर वहां कोई है ही नहीं, सिंहासन खाली है, तो आप सिर पटकते रहो, बेकार है। आप तभी तक सिर पटक सकते हो, जब तक भरोसा रहे कि सिंहासन पर कोई है, तो शायद हमारे सिर पटकने से बदलेगा।

और हम अपने मन को समझा लेते हैं, अगर कभी बदलाहट हो जाती है। हमारी प्रार्थनाओं के कारण कोई बदलाहट नहीं होती, न कोई परमात्मा बदलाहट करने वाला है। लेकिन जीवन के अनंत संयोगों में कभी—कभी हमारी प्रार्थना संयोगों से मेल खाती है बदलाहट हो जाती है, तो हम उसे धन्यवाद देते हैं। अगर बदलाहट नहीं होती, तो हम नाराजगी जाहिर करते हैं।

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि हम तो छोड़ने की स्थिति में आ गए थे, कि यह धर्म—वर्म सब व्यर्थ है। लेकिन प्रार्थना पूरी हो गई, तब से आस्था बढ़ गई। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, हम थक गए प्रार्थना कर—करके, कभी कोई फल न आया; आस्था उठ गई।

आस्था किसी की भी नहीं है। प्रार्थना पूरी हो जाए, तो आस्था जमती है। प्रार्थना न पूरी हो, तो आस्था उखड़ जाती है।

मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन रोज सुबह प्रार्थना करता था काफी जोर से। परमात्मा सुनता था कि नहीं, पड़ोस के लोग सुन लेते थे कि सौ रुपए से कम न लूंगा; निन्यानबे भी देगा, नहीं लूंगा। जब भी दे, सौ पूरे देना।

आखिर पड़ोसी सुनते—सुनते परेशान हो गए। एक पड़ोसी ने तय किया कि इसको एक दफा निन्यानबे रुपए देकर देखें भी तो सही। वह कहता है कि निन्यानबे कभी न लूंगा, सौ ही लूंगा। उसने एक दिन सुबह जैसे ही मुल्ला प्रार्थना कर रहा था, एक निन्यानबे की थैली उसके झोपड़े के आगन में फेंक दी।

मुल्ला ने पहला काम रुपए गिनने का किया। वह आधी प्रार्थना आधी रह गई; वह पूरी नहीं कर पाया, नमाज पूरी नहीं हो सकी। उसने जल्दी से पहले गिनती की। निन्यानबे पाकर उसने कहा, वाह रे परमात्मा, एक रुपया थैली का तूने काट लिया!

उसने निन्यानबे स्वीकार कर लिए।

हमारी बनाई हुई प्रार्थना; हमारी प्रार्थना; और हम हिसाब लगा रहे हैं। वहां कोई है या नहीं, इससे बहुत प्रयोजन नहीं है। इसलिए अगर आपको पक्का हो जाए कि परमात्मा नहीं है, तो आपकी प्रार्थना टूट’ जाएगी, यह मैं जानता हूं। इसलिए प्रश्न सार्थक है। लेकिन जो प्रार्थना परमात्मा के न होने से टूट जाती है, वह प्रार्थना थी ही नहीं। प्रार्थना का कोई भी संबंध परमात्मा को बदलने से नहीं है, प्रार्थना आपको बदलने की कीमिया है। जब आप प्रार्थना करते हैं, तो वहां आकाश में बैठा हुआ परमात्मा नहीं रूपांतरित होता। जब आप प्रार्थना करते हैं, तो उस प्रार्थना करने में आप बदलते हैं।

तो प्रार्थना एक प्रयोग है, जिस प्रयोग से आप अपने अहंकार को तोड़ते हैं, अपने को झुकाते हैं। वहां कोई नहीं बैठा है, जिसके आगे आप अपने को झुकाते हैं। झुकने की घटना का परिणाम है। आप झुकते हैं। आपको कठिन है बिना परमात्मा के, इसलिए कोई हर्जा नहीं। आप मानते रहें कि परमात्मा है, लेकिन असली जो घटना घटती है, वह आपके झुकने से घटती है।

आप झुकना सीखते हैं, किसी के सामने समर्पित होना सीखते हैं। कहीं आपका माथा झुकता है, जो सदा अकड़ा हुआ है, वह कहीं जाकर झुकता है। कहीं आप घुटने के बल छोटे बच्चे की तरह हो जाते हैं; कहीं आप रोने लगते हैं, आंखों से आंसू बहने लगते हैं, हलके हो जाते हैं। और मैं कर सकता हूं यह धारणा प्रार्थना से टूटती है। तू करेगा! तू करेगा सवाल नहीं है; मैं कर सकता हूं, यह धारणा टूटती है। मैं नहीं कर सकूंगा, तभी हम प्रार्थना करते हैं। मुझसे नहीं हो सकेगा।

अगर इसके गहरे अर्थ को समझें, तो इसका अर्थ है, जहां भी आपको समझ में आ जाता है कि कर्ता मैं नहीं हूं वहीं प्रार्थना शुरू हो जाती है। यह कर्तृत्व को खोने की तरकीब है। वह जो कर्तृत्व है कि मैं करता हूं, वह जो अहंकार है, वह जो मेरी अस्मिता है कि करने वाला मैं हूं उसके टूटने का नाम प्रार्थना है।

जब आप घुटने टेक देते हैं, सिर झुका देते हैं और कहते हैं, मुझसे कुछ भी न होगा, अब तू ही कर, मेरे बस के बाहर है। तू ही उठा; अब मुझसे नहीं चलना हो सकेगा, तू ही चला। यह उससे इसका कोई संबंध नहीं है, वहा कोई है भी नहीं, जो इसको सुन रहा है। लेकिन यह कहने वाला हृदय अपने अहंकार को विसर्जित कर रहा है। और जो आनंद इस प्रार्थना से घटित होगा, वह किसी का दिया हुआ नहीं है; वह आपके ही अहंकार छोड़ने से आपको मिलता है।

धर्म तो एक नियम है। जो झुकता है, उसकी समृद्धि बढती चली जाती है, जो अकड़ता है, उसकी समृद्धि टूटती चली जाती है। जो जितना अकड़ जाता है, उतना मुर्दा हो जाता है। जो जितना झुक जाता है, जितना लोचपूर्ण हो जाता है, फ्लेक्सिबल हो जाता है, उतना ही जीवंत हो जाता है।

बच्चे में और के में वही फर्क है। के की हड्डी—हड्डी अकड़ गई है। अब वह झुक नहीं सकता। बच्चा लोचपूर्ण है।

प्रार्थना आपको लोच देती है, फ्लेक्सिबिलिटी देती है, आपको झुकना सिखाती है। जो प्रार्थना नहीं करता, वह अकड़ जाता है, असमय में का हो जाता है, असमय में मृत हो जाता है, जीते जी मुर्दा हो जाता है। और जो प्रार्थना करना जानता है, उसे मृत्यु भी नहीं मिटा पाती। मृत्यु के क्षण में भी वह लोचपूर्ण होता है, मृत्यु के क्षण में भी वह बच्चे जैसा जीवंत होता है।

जो व्यक्ति प्रार्थना की कला सीख लेता है, उसे परमात्मा से कोई संबंध नहीं। परमात्मा सिर्फ बहाना है, ताकि प्रार्थना हो सके। परमात्मा सिर्फ खूंटी है, जिस पर हम प्रार्थना के कोट को टांग सकें। असली बात प्रार्थना है।

इसलिए बुद्ध और महावीर जैसे महाज्ञानियों ने परमात्मा को बिलकुल इनकार ही कर दिया। लेकिन प्रार्थना को इनकार नहीं कर सके, प्रार्थना जारी रही। पूजा को इनकार नहीं कर सके, पूजा जारी रही। समर्पण को इनकार नहीं कर सके, समर्पण जारी रहा। इसलिए जैन धर्म बहुत ज्यादा जनता तक नहीं पहुंच सका, क्योंकि यह बात ही समझ में नहीं आती। अगर भगवान ही नहीं है, तो फिर कैसी आराधना? जब परमात्मा नहीं है, तो पूजा किसकी?

तो जैन विचार बहुत थोड़े लोगों की पकड़ में आया, ज्यादा लोग उसके साथ नहीं चल सके। और जो थोड़े—से लोग भी प्रथम दिन चले थे, वे ही समझदार थे। पीछे तो उनकी संतान सिर्फ अंधेपन के कारण चलती है। क्योंकि उनके मां—बाप जैन थे, वे भी जैन हैं। लेकिन उनकी भी समझ में नहीं आता।

और इसलिए उन्होंने फिर नए उपाय कर लिए। बिना परमात्मा के तो पूजा हो नहीं सकती, तो फिर महावीर को ही परमात्मा की जगह बिठा दिया; फिर पूजा जारी हो गई! अब कोई फर्क नहीं है जैन और हिंदू में। हिंदू प्रार्थना कर रहा है, राम से, कृष्ण से। जैन प्रार्थना कर रहा है, महावीर से, ऋषभ से, नेमीनाथ से। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

लेकिन परमात्मा के बिना प्रार्थना करना बड़ा कठिन है; जो कर पाए, उसके जीवन में बड़े फूलों की वर्षा हो जाती है। लेकिन आप न कर पाते हों, तो परमात्मा से शुरू करें; कोई हर्जा नहीं है। परमात्मा सिर्फ खिलौना है, असली चीज प्रार्थना घट जाए। जिस दिन प्रार्थना घट जाएगी, उस दिन तो आप खुद समझ जाएंगे कि परमात्मा के होने न होने का सवाल नहीं है।

धर्म नियम है, इसलिए मैंने कहा। और जो भी घटता है जीवन में, वह एक आत्यंतिक नियम के कारण घटता है। आपकी प्रार्थनाओं के कारण कुछ भी नहीं घटता। आपकी पूजा के कारण कुछ भी नहीं घटता। ही, अगर पूजा आपकी, प्रार्थना आपकी आपको बदल देती हो, तो आप नियम के अनुकूल बहने लगते हैं। उस नियम के अनुकूल बहने से घटना घटती है।

हम जीवन में करीब—करीब उन्हीं—उन्हीं भूलों को बार—बार दोहराते हैं। पिछले जन्म में भी आपने वही भूलें कीं, उसके पिछले जन्म में भी वही भूलें कीं, आज भी वही कर रहे हैं। और डर यह है कि शायद कल और आने वाले जन्म में भी वही भूलें करेंगे। हर पीढ़ी उन्हीं को दोहराती है; हर आदमी उन्हीं को दोहराता है।

बड़ी से बड़ी भूल जो है, वह यह है कि हम अंतरस्थ भावों को भी बिना आब्जेक्टिफाइ किए, बिना उनको वस्तु में रूपांतरित किए स्वीकार नहीं कर पाते। भाव तो भीतरी है, लेकिन उस भाव को भी सम्हालने के लिए हमें बाहर के सहारे की जरूरत पड़ती है। यह बुनियादी भूलों में से एक है।

अगर आप प्रसन्न हैं और कोई आपसे पूछे कि आप क्यों प्रसन्न हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि मैं बस, प्रसन्न हूं। क्यों का क्या सवाल है? आप कारण बताएंगे कि मैं इसलिए प्रसन्न हूं कि आज मित्र घर आया। इसलिए प्रसन्न हूं कि धन मिला। इसलिए प्रसन्न हूं कि लाटरी जीत गया। आप कोई कारण बताएंगे। आप इतनी हिम्मत नहीं कर सकते कि कह सकें कि मैं प्रसन्न हूं क्योंकि प्रसन्न होने में प्रसन्नता है।

और मूढ़ हैं, जो कारण खोजते हैं। क्योंकि कारण खोजने वाला बहुत ज्यादा प्रसन्न नहीं हो सकता। कितने कारण खोजिएगा? रोज कारण नहीं मिल सकते। और आज कारण मिल जाएगा, घड़ीभर बाद कारण चुक जाएगा। लाटरी मिल गई, एक धक्का लगा, खुशी आ गई। फिर? मित्र आज घर आ गया, कल कोई और घटना घट गई, अगर जिंदगी में कारण से प्रसन्नता आती हो, तो बहुत थोड़ी प्रसन्नता आएगी।

इसीलिए लोगों के जीवन में सुख बहुत कम है, दुख बहुत ज्यादा है। क्योंकि कारण से जब सुख मिलेगा, तब सुख; अन्यथा दुख ही दुख है। दुख अकारण हमने स्वीकार किया है, सुख के लिए हम कारण खोजते हैं।

और अगर आप प्रसन्न हैं बिना कारण के, तो लोग समझेंगे, आप पागल हैं। बिना कारण के प्रसन्न हैं! कोई कारण तो चाहिए। अगर आप प्रसन्न हो रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं, नाच रहे हैं, बिना किसी कारण के, न लाटरी मिली, न पत्नी मायके गई, कोई खुशी का कारण नहीं है, और आप प्रसन्न हो रहे हैं, तो लोग समझेंगे कि आप पागल हैं।

ये जो, जिनको हमने संत कहा है, उनके जीवन का रहस्य यही है कि उन्होंने बिना कारण प्रसन्न होने का रास्ता खोज लिया। संत और संसारी में यही भेद है। संसारी कारण खोजता है पहले। पहले सब प्रमाण मिल जाएं, तब वह प्रसन्न होगा। संत प्रसन्न होता है, प्रमाण का कोई आधार नहीं खोजता। क्या फर्क हुआ?

संत अंतरस्थ भाव में जीता है। बाहर आब्जेक्टिफिकेशन नहीं खोजता, बाहर वस्तु रूप में प्रमाण नहीं चाहता। तो संत कहता है, प्रार्थना काफी है, परमात्मा हो या न हो। हो तो ठीक, न हो तो भी उतना ही ठीक। इससे संत की प्रार्थना में कोई फर्क नहीं पड़ता। संत प्रेम करता है, प्रेमी की तलाश नहीं करता। प्रेम में ही इतना आनंद है कि अब प्रेमी का उपद्रव लेने की कोई जरूरत नहीं है। संत ध्यान करता है, लेकिन ध्यान के लिए कोई विषय नहीं खोजता। विषय से मुक्ति हो, वस्तु से मुक्ति हो, पदार्थ से मुक्ति हो और अंतर्भाव में रमण हो, तो जीवन की परम समाधि अपने आप सध जाती है।

लेकिन हमें सब जगह बाहर कुछ चाहिए। अगर बाहर हमें कुछ न मिले, तो हम बिलकुल खाली हो जाते हैं। क्योंकि भीतर हमने कभी फिक्र नहीं की। और हमने भीतर की जड़ें नहीं खोजी, जिनसे सारे जीवन के फूल खिल सकते हैं, बाहर की कोई भी जरूरत नहीं है। जब तक ऐसा समझ में न आए, तब तक बाहर का सहारा लेकर चलें। लेकिन ध्यान रखें कि वह सहारा सिर्फ सहारा है, वहां कोई है नहीं। इसका क्या अर्थ हुआ? इसका क्या यह अर्थ हुआ कि मैं कह रहा हूं परमात्मा नहीं है?

नहीं, मैं सिर्फ इतना ही कह रहा हूं जिस परमात्मा को आप सोचते हैं, वह नहीं है। जो परमात्मा आप निर्मित किए हैं, वह नहीं है। परमात्मा का तो एक ही अर्थ है, यह समग्र अस्तित्व, यह टोटेलिटी, यह जो पूर्णता है। ये जो वृक्ष हैं, पौधे हैं, पत्थर हैं, जमीन है, चांद—तारे हैं, मनुष्य हैं, पशु—पक्षी हैं, यह जो सारा फैलाव है, यह जो ब्रह्म है, यह जो विस्तार है, यह सब कुछ परमात्मा है। और जिस दिन आपको अपने में झुकने की कला आ जाएगी, आपका मस्तक झुक सकेगा, लोचपूर्ण होगा, हृदय आनंदित, प्रफुल्लित होगा, प्रार्थना के स्वर वहा गूंजते होंगे, पैरों में धुन होगी आराधना की, भक्त का भाव होगा, तब आप पाएंगे कि यह सब परमात्मा है। उस दिन आप देखेंगे, जीवन नियम से चल रहा है। और धर्म भी विज्ञान है। वस्तुत: धर्म परम विज्ञान है, सुप्रीम साइंस है।

इस प्रश्न का दूसरा हिस्सा भी समझने जैसा है तब तो धर्म विज्ञान का पर्याय हो जाता है और उस परम नियम की खोज में निकलना मात्र धर्म रह जाता है।

निश्चित ही, उस परम नियम की खोज में निकलना ही धर्म है। लेकिन वह परम नियम अगर बाहर आप खोजते हैं, तो आप वैज्ञानिक हो जाते हैं। और अगर उस परम नियम को आप भीतर खोजते हैं, तो धार्मिक हो जाते हैं।

वैज्ञानिक भी धर्म ही खोज रहा है, लेकिन पदार्थ में खोज रहा है, बाहर खोज रहा है। और अगर आप भी धर्म को मंदिर में खोजते हैं, मस्जिद में खोजते हैं, तो आप भी बाहर खोज रहे हैं। आप में और वैज्ञानिक में बहुत फर्क नहीं है।

धार्मिक उसी नियम को भीतर खोजता है। क्योंकि धार्मिक व्यक्ति की यह प्रतीति है, जिसे मैं भीतर न पा सकूंगा, उसे मैं बाहर कैसे पा सकूंगा। क्योंकि भीतर मेरा निकटतम है, जब भीतर ही मेरे हाथ नहीं पहुंच पाते, तो बाहर मेरे हाथ कहां पहुंच पाएंगे? हाथ बड़े छोटे हैं।

अपने ही भीतर नहीं छू पाता उसे, तो फिर मैं आकाश में उसे कैसे छू पाऊंगा? और जो मेरे हृदय के भी पास है, और जो मेरे प्राणों से भी निकट है, जो मेरी धड़कन— धड़कन में समाया है, वहां नहीं सुन पाता उसे, तो बादलों की गड़गड़ाहट में कैसे सुन पाऊंगा? बहुत दूर हैं बादल। और जो ज्योति मेरे भीतर जल रही है, वहां उससे मेरा मिलन नहीं होता, तो सूरज, चांद, तारों की ज्योति में मैं उसे नहीं पहचान पाऊंगा।

जब सत्य इतना निकट हो और हम उसे वहां चूक जाते हों, तो हमारी दूर की सब यात्रा व्यर्थ है। भीतर मुझे वह दिखाई पड़ जाए, तो सब जगह मैं उसे पहचान लूंगा। निकट पहचान हो जाए तो दूर भी वह मुझे दिखाई पडने लगेगा। क्योंकि जिसे हम दूरी कहते हैं, वह भी निकटता का ही फैलाव है। पर पहली घटना, पहली क्रांति भीतर घटेगी।

वैज्ञानिक दृष्टि का मतलब है, सदा बाहर। धार्मिक दृष्टि का अर्थ है, सदा भीतर।

वैज्ञानिक दूर से शुरू करता है और निकट आने की कोशिश करता है। यह कभी भी नहीं हो पाएगा, क्योंकि वह दूरी अनंत है; जीवन बहुत छोटा है। अनेक— अनेक जन्म खोते जाएंगे, तो भी वह दूरी बनी रहेगी।

धार्मिक उसे भीतर से शुरू करता है और फिर बाहर की तरफ जाता है। और भीतर जिसने उसे छू लिया, वह तरंग पर सवार हो गया, उसने लहर पकड़ ली; उसके हाथ में नाव आ गई। अब कोई जल्दी भी नहीं है। वह दूसरा किनारा न भी मिले, तो भी कुछ खोता नहीं है। वह दूसरा किनारा कभी भी मिल जाएगा, अनंत में कभी भी मिल जाएगा, तो भी कोई प्रयोजन नहीं है। कोई डर भी नहीं है उसके खोने का। मिले तो ठीक, न मिले तो ठीक। लेकिन आप ठीक नाव पर सवार हो गए।

जिसने अंतस में पहचान लिया, उसकी यात्रा कभी भी मंजिल पर पहुंचे या न पहुंचे, मंजिल पर पहुंच गई। वह बीच नदी में डूबकर मर जाए, तो भी कोई चिंता की बात नहीं है। अब उसके मिटने का कोई उपाय नहीं है। अब नदी का मध्य भी उसके लिए किनारा है।

धार्मिक व्यक्ति भीतर से बाहर की तरफ फैलता है। और जीवन का सभी विस्तार भीतर से बाहर की तरफ है। आप एक पत्थर फेंकते हैं पानी में; छोटी—सी लहर उठती है पत्थर के किनारे, फिर फैलना शुरू होती है। भीतर से उठी लहर पत्थर के पास, फिर दूर की तरफ जाती है। आपने कभी इससे उलटा देखा कि लहर किनारों की तरफ पैदा होती हो और फिर सिकुड़कर भीतर की तरफ आती हो!

एक बीज को आप बो देते हैं। फिर वह फैलना शुरू हो जाता है, फिर वह फैलता जाता है, फिर एक विराट वृक्ष पैदा होता है। और उस विराट वृक्ष में एक बीज की जगह करोड़ों बीज लगते हैं। फिर वे बीज भी गिरते हैं। फिर फूटते हैं, फिर फैलते हैं।

हमेशा जीवन की गति बाहर से भीतर की तरफ नहीं है। जीवन की गति भीतर से बाहर की तरफ है। यहां बूंद सागर बनती देखी जाती है, यहां बीज वृक्ष बनते देखा जाता है। धर्म इस सूत्र को पहचानता है। और आपके भीतर जहां लहर उठ रही है हृदय की, वहीं से पहचानने की जरूरत है। और वहीं से जो पहचानेगा, वही पहचान पाएगा।

लेकिन जैसा मैंने कहा कि हम नियमित रूप से बंधी—बधाई भूलें दोहराते हैं। आदमी बड़ा अमौलिक है। हम भूल तक ओरिजिनल नहीं करते, वह भी हम पुरानी पिटी—पिटाई करते हैं।

मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी उस पर नाराज थी। बात ज्यादा बढ़ गई और पत्नी ने चाबियों का गुच्छा फेंका और कहा कि मैं जाती हूं। अब बहुत हो गया और सहने के बाहर है। मैं अपनी मां के घर जाती हूं और कभी लौटकर न आऊंगी।

नसरुद्दीन ने गौर से पत्नी को देखा और कहा कि अब जा ही रही हो, तो एक खुशखबरी सुनती जाओ। कल ही तुम्हारी मां तुम्हारे पिता से लड़कर अपनी मां के घर चली गई है। और जहां तक मैं समझता हूं वहां वह अपनी मां को शायद ही पाए।

एक वर्तुल है भूलों का। वह एक—सा चलता जाता है। एक बंधी हुई लकीर है, जिसमें हम घूमते चले जाते हैं। हर पीढ़ी वही भूल करती है, हर आदमी वही भूल करता है, हर जन्म में वही भूल करता है। भूलें बड़ी सीमित हैं।

धर्म की खोज की दृष्टि से यह बुनियादी भूल है कि हम बाहर से भीतर की तरफ चलना शुरू करते हैं। क्योंकि यह जीवन के विपरीत प्रवाह है, इसमें सफलता कभी भी मिल नहीं सकती। सफलता उसी को मिल सकती है, जो जीवन के ठीक प्रवाह को समझता है और भीतर से बाहर की तरफ जाता है।

 

दूसरा प्रश्न :

 

आप कहते हैं कि सभी द्वैत से ऊपर उठकर परम मुक्ति को उपलब्ध होने के लिए समस्त जीवेषणा की निर्जरा अनिवार्य है। आज के समय के अनुकूल मृत्यु—साधना की कोई सम्यक विधि बताएं?

 

जीवेषणा, लस्ट फार लाइफ का अर्थ ठीक से समझ लें। हम जीना चाहते हैं। लेकिन यह जीने की आकांक्षा बिलकुल अंधी है। कोई आपसे पूछे, क्यों जीना चाहते हैं, तो उत्तर नहीं है। और इस अंधी दौड़ में हम पौधे, पक्षियों, पशुओं से भिन्न नहीं हैं। पौधे भी जीना चाहते हैं, पौधे भी जीवन

की तलाश करते हैं।

मेरे गांव में मेरे मकान से कोई चार सौ कदम की दूरी पर एक वृक्ष है। चार सौ कदम काफी फासला है। और मकान में जो नल का पाइप आता है, वह अचानक एक दिन फूट पड़ा, तो जमीन खोदकर पाइप की खोजबीन करनी पड़ी कि क्या हुआ! चार सौ कदम दूर जो वृक्ष है, उसकी जड़ें उस पाइप की तलाश करती हुई पाइप के अंदर घुस गई थीं, पानी की खोज में।

वैज्ञानिक कहते हैं कि वृक्ष बड़े हिसाब से अपनी जडें पहुंचाते हैं—कहां पानी होगा? चार सौ कदम काफी फासला है और वह भी लोहे के पाइप के अंदर पानी बह रहा है। लेकिन वृक्ष को कुछ पकड़ है। उसने उतने दूर से अपनी जड़ें पहुंचाईं। और ठीक उन जड़ों ने आकर अपना काम पूरा कर लिया, कसते—कसते उन्होंने पाइप को तोड़ दिया लोहे के। वे अंदर प्रवेश कर गईं और वहां से पानी पी रही थीं; वर्षों से वे उपयोग कर रही होंगी।

वृक्ष को भी पता नहीं कि वह क्यों जीना चाहता है। अफ्रीका के जंगल में वृक्ष काफी ऊंचे जाते हैं। उन्हीं वृक्षों को आप यहां लगाएं, उतने ऊंचे नहीं जाते। ऊंचे जाने की यहां कोई जरूरत नहीं है। अफ्रीका में जंगल इतने घने हैं कि वैज्ञानिक कहते हैं, जिस वृक्ष को बचना हो, उसको ऊंचाई बढ़ानी पड़ती है। क्योंकि वह ऊंचा हो जाए, तो ही सूरज की रोशनी मिलेगी। अगर वह नीचा रह गया, तो मर जाएगा।

वही वृक्ष अफ्रीका में ऊंचाई लेगा तीन सौ फीट की। वही वृक्ष भारत में सौ फीट पर रुक जाएगा। जीवेषणा में यहां संघर्ष उतना नहीं है।

वैज्ञानिक कहते हैं, जेब्रा है, ऊंट है, उनकी जो गर्दनें इतनी लंबी हो गई हैं, वह रेगिस्तानों के कारण हो गई हैं। जितनी ऊंची गर्दन होगी, उतना ही जानवर जी सकता है, क्योंकि इतने ऊपर वृक्ष की पत्‍तियों को वह तोड़ सकता। सुरक्षा है जीवन में, तो गर्दन बड़ी होती चली गई है।

चारों तरफ जीवन का बचाव चल रहा है। छोटी—सी चींटी भी अपने को बचाने में, खुद को बचाने में लगी है। बड़े से बड़ा हाथी भी अपने को बचाने में लगा है। हम भी उसी दौड़ में हैं।

और सवाल यह है—और यहीं मनुष्य और पशुओं का फर्क शुरू होता है कि हमारे मन में सवाल उठता है—कि हम जीना क्यों चाहते हैं? आखिर जीवन से मिल क्या रहा है जिसके लिए आप जीना चाहते हैं?

जैसे ही पूछेंगे कि मिल क्या रहा है, तो हाथ खाली मालूम पड़ते हैं। मिल कुछ भी नहीं रहा है। इसलिए कोई भी विचारशील व्यक्ति उदास हो जाता है, मिल कुछ भी नहीं रहा है।

रोज सुबह उठ आते हैं, रोज काम कर लेते हैं; खा लेते हैं; पी लेते हैं; सो जाते हैं। फिर सुबह हो जाती है। ऐसे पचास वर्ष बीते, और पचास वर्ष बीत जाएंगे। अगर सौ वर्ष का भी जीवन हो, तो बस यही कम दौड़ता रहेगा। और अभी तक कुछ नहीं मिला, कल क्या मिल जाएगा?

और मिलने जैसा कुछ लगता भी नहीं है। मिलेगा भी क्या, इसकी कोई आशा भी बांधनी मुश्किल है। धन मिल जाए, तो क्या मिलेगा? पद मिल जाए, तो क्या मिलेगा? जीवन रिक्त ही रहेगा। जीवेषणा अंधी है, पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है। और इसलिए जीवेषणा से उठने का जो पहला प्रयोग है, वह आंखों के खोलने का प्रयोग है कि मैं अपने जीवन को देखूं कि मिल क्या रहा है! और अगर कुछ भी नहीं मिल रहा है, यह प्रतीति साफ हो जाए, तो जीवेषणा क्षीण होने लगेगी।

मैं जीना इसलिए चाहता हूं कि कुछ मिलने की आशा है। अगर यह स्पष्ट हो जाए कि कुछ मिलने वाला नहीं है, कुछ मिल नहीं रहा है, तो जीने की आकांक्षा से छुटकारा हो जाएगा, उसकी निर्जरा हो जाएगी।

‘पहली बात, आंख खोलकर देखना जरूरी है, सजग होना जरूरी है कि जीवन क्या दे रहा है!

फिर दूसरी बात, देखना जरूरी है कि मिल तो कुछ भी नहीं रहा और जीवन रोज मौत में उतरता जा रहा है। और आज नहीं कल मैं मरूंगा।

हालांकि कोई इसको सुनने के लिए राजी नहीं होता। हम सब यही सोचते हैं कि सदा दूसरे ही मरते हैं, मैं तो कभी मरता ही नहीं। !, जब भी कोई मरता है, और कोई मरता है, मैं तो कभी मरता नहीं। इसलिए भांति बनी रहती है कि मैं नहीं मरूंगा।

चीन का एक बहुत बड़ा कथाकार हुआ, स्लम। उसने एक छोटी—सी कहानी लिखी है। उसमें लिखा है कि एक युवक एक ज्योतिषी के पास ज्योतिष सीखता था। उसने अपने गुरु से एक दिन पूछा कि अगर मैं लोगों को सत्य—सत्य कह देता हूं उनकी हाथ की रेखाएं पढ़कर, तो पिटाई की नौबत आ जाती है। झूठ मैं कहना नहीं चाहता। झूठ कहता हूं तो लोग बड़े प्रसन्न होते हैं।

एक घर में बच्चे का जन्म हुआ। लोगों ने मुझे बुलाया। तो मैंने देखकर उनको बताया, झूठ बोला, कि महायशस्वी होगा। सभी मां—बाप को भरोसा होता है; सभी बच्चे प्रतिभाशाली की तरह पैदा होते हैं। सभी मां—बाप को भरोसा होता है कि इसका तो कोई मुकाबला नहीं।

महायशस्वी होगा, बड़ा प्रतिभाशाली है। धन्यभाग हैं तुम्हारे। वे लोग बड़े खुश हुए, उन्होंने काफी भेंट दी, शाल ओढ़ाई, भोजन कराया, सेवा की।

मगर मैं झूठ बोला था, तो उससे मेरे मन में चोट पड़ती रही। दूसरे घर में बच्चा पैदा हुआ, तो मैंने सत्य ही कह दिया कि बाकी तो और कुछ पक्का नहीं है, लेकिन यह एक दिन मरेगा, इतना भर पक्का है। तो मेरी वहां पिटाई हुई। लोगों ने मुझे मारा और कहा कि तुम ज्योतिष तो दूर, तुम्हें शिष्टाचार का भी पता नहीं!

तो उसने अपने गुरु से पूछा कि आप मुझे कुछ रास्ता बताएं। झूठ भी मुझे न बोलना पड़े और पिटाई की नौबत भी न आए। क्योंकि अब यह धंधा मैंने स्वीकार कर लिया है ज्योतिष का।

तो उसके गुरु ने कहा, अगर ऐसा अवसर आ जाए तो मैं तुम्हें अपना सार बता देता हूं जीवनभर का, जो मैं करता हूं। अगर झूठ भी न बोलना हो और पिटना भी न हो, तो तुम कहना, वाह—वाह, क्या बच्चा है! ही—ही—ही। तुम कुछ वक्तव्य मत देना, तो तुम झूठ बोलने से भी बचोगे और पिटाई भी नहीं होगी।

सभी होशियार ज्योतिषी आपको देखकर यही करते हैं।

जीवेषणा की तरफ अगर थोड़ी—सी भी ध्यान की प्रक्रिया लौटे, थोड़ा—सा आपका होश बढ़े, तो दूसरा सवाल साफ ही हो जाएगा कि यह जीवन कहीं नहीं ले जा रहा है सिवाय मौत के। यह कहीं नहीं जा रहा है सिवाय मौत के। जैसे सभी नदियां सागर में जा रही हैं, सभी जीवन मौत में जा रहे हैं।

तब दूसरा बोध स्पष्ट होना चाहिए कि जो जीवन मौत में ले जाता है, जो अनिवार्यरूपेण मौत में ले जाता है, अपरिहार्य जिसमें मृत्यु है, मृत्यु से बचने का जिसमें कोई उपाय नहीं, वह आकांक्षा के योग्य नहीं है, वह एषणा के योग्य नहीं है, वह कामना के योग्य नहीं है।

ये दो बातें अगर गहन होने लगें आपके भीतर, इनकी सघनता बढ़ने लगे, तो जीवेषणा की निर्जरा हो जाती है। और जिस दिन व्यक्ति जीने की आकांक्षा से मुक्त होता है, उसी दिन जीवन का द्वार खुलता है। क्योंकि जब तक हम जीवन की इच्छा से भरे रहते हैं, तब तक हम इस बुरी तरह उलझे रहते हैं जीवन में कि जीवन का द्वार हमारे लिए बंद ही रह जाता है, खुल नहीं पाता।

हम इतने व्यस्त होते हैं जीवित होने में, जीवित बने रहने में, कि जीवन क्या है, उससे परिचित होने का हमें न समय होता है, न सुविधा होती है। उस मंदिर के द्वार अटके ही रह जाते हैं, बंद ही रह जाते हैं।

जिन्होंने जीवेषणा छोड़ दी, उन्होंने जीवन का राज जाना। वे ही परम बुद्धत्व को प्राप्त हुए। और जिन्होंने जीवेषणा छोड़ दी, उन्होंने अमृत को पकड़ लिया, अमृत को पा लिया। जिन्होंने जीवेषणा पकड़ी, वे मौत पर पहुंचे।

इतना तो तय है कि जो जीवेषणा से चलता है, वह मृत्यु पर पहुंचता है। इससे उलटा भी सच है—लेकिन वह कभी आपका अनुभव बने तभी—कि जो जीवेषणा छोड़ता है, वह अमृत पर पहुंचता है। इसको हम निरपवाद नियम कह सकते हैं। अब तक इस जगत में जितने लोगों ने जीवेषणा की तरफ से दौड़ की, वे मृत्यु पर पहुंचते हैं। कुछ थोड़े—से लोग जीवेषणा को छोड्कर चले, वे अमृत पर पहुंचे हैं।

उपनिषद, गीता, कुरान, बाइबिल, धम्मपद, वे उन्हीं व्यक्तियों की घोषणाएं हैं जिन्होंने जीवेषणा छोड्कर अमृत को उपलब्ध किया है।

मृत्यु के पार जाना हो, तो जीवन की इच्छा को छोड़ देना जरूरी है। यह बड़ा उलटा लगेगा। जीवन बड़ा जटिल है। जीवन निश्चित ही काफी जटिल है और विरोधाभासी है, पैराडाक्सिकल है।

इसका मतलब यह हुआ कि जो जीवन को पकड़ता है, वह मृत्यु को पाता है। इसका यह अर्थ हुआ कि जो जीवन को छोड़ता है, वह महाजीवन को पाता है। यह बिलकुल विरोधाभासी लगता है, लेकिन ऐसा है। यह विरोधाभास ही जीवन का गहनतम स्वरूप है।

आप करके देखें। धन को पकड़े और आप दरिद्र रह जाएंगे। कितना ही धन हो, दखि रह जाएंगे। धन को छोड्कर देखें। और आप भिखमंगे भी हो जाएं, तो भी सम्राट आपके सामने फीके होंगे। आप शरीर को जोर से पकड़े। और शरीर से सिर्फ दुख के आप कुछ भी न पाएंगे। और शरीर से आप तादाक्य तोड़ दें, शरीर को पकड़ना छोड़ दें। और आप अचानक पाएंगे कि शरीर को पकड़ने की वजह से आप सीमा में बंधे थे, अब असीम हो गए।

यहां जो छीनने चलता है, उसका छिन जाता है। यहां जो देने चल पड़ता है, उससे छीनने का कोई उपाय नहीं। यह जो विरोधाभास है, यह जो जीवन का पैराडाक्स है, यह जो पहेली है, इसको हल करने की व्यवस्था ही साधना है।

दो काम करें। जीवन ने क्या दिया है, इसकी परख रखें। क्या मिला है जीवन से, क्या मिल सकता है, इसका हिसाब रखें। पाएंगे कि सब हाथ खाली हैं। आशा भी टूट जाएगी कि कल भी कुछ मिल सकता है। क्योंकि जो अतीत में नहीं हुआ, वह भविष्य में भी नहीं होगा। जो कभी नहीं हुआ, वह आगे भी कभी नहीं होगा। और फिर देखें कि सब जीवन मृत्यु के सागर में उंडलते चले जाते हैं। कोई आज, कोई कल। हम सब क्यू में खड़े हैं। आज नहीं कल, बारी आ जाती है और मृत्यु में उतर जाते हैं।

तो यह सारा जीवन मृत्यु में पूरा होता है, निश्चित ही यह मृत्यु का ही छिपा हुआ रूप है। क्योंकि अंत में वही प्रकट होता है, जो प्रथम से ही छिपा रहा हो। तो जिसे हम जीवन कहते हैं, वह मौत है। और जीवेषणा को छोड़ेंगे, तो ही यह मौत छूटेगी। तब हमें उस जीवन का अनुभव होना शुरू होगा, जिसका मिटना कभी भी नहीं होता है।

उस जीवन को ही परमात्मा कहें, उस जीवन को मोक्ष कहें, उस जीवन को आत्मा कहें, उस जीवन को जो भी नाम देना हो, वह हम दे सकते हैं।

 

अब हम सूत्र को लें।

 

और हे अर्जुन, काम, क्रोध तथा लोभ, ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं, इससे इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

क्योंकि हे अर्जुन, इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त हुआ पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है, इससे वह परम गति को जाता है अर्थात मेरे को प्राप्त होता है।

और जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से बर्तता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परम गति को तथा न सुख को ही प्राप्त होता है।

इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर तू शास्त्र—विधि से नियत किए हुए कर्म को ही करने के लिए योग्य है।

एक—एक शब्द को समझने की कोशिश करें। तीन शब्दों को कृष्ण नरक का द्वार कह रहे हैं : काम, क्रोध और लोभ। जिसको मैंने जीवेषणा कहा, वह इन तीन हिस्सों में टूट जाती है।

जीवेषणा का मूल भाव काम है, यौन है, कामवासना है। वैज्ञानिक, जीवशास्त्री कहते हैं कि आदमी में दो वासनाएं प्रबलतम हैं, एक भूख और दूसरा यौन।

भूख इसलिए प्रबलतम है कि अगर भूख का होश आपको न हो, तो आप मर जाएंगे, जी न सकेंगे। एक बच्चा पैदा हो और उसे भूख का पता न चलता हो, तो वह जी नहीं सकेगा। भूख उसके शरीर को बचाने के लिए एकदम जरूरी है। भूख इस बात की खबर है कि शरीर आपसे कहता है, अब मैं बच नहीं सकूंगा, शीघ्र मुझे कुछ दो, मेरी शक्ति खोती है।

तो भूख बचाती है स्वयं के शरीर को। लेकिन अगर भूख ही अकेली हो, तो भी आप कभी के खो गए होते, आप पैदा ही न होते। क्योंकि भूख आपको बचा लेगी, लेकिन आपके बच्चों को नहीं बचा सकेगी। और बच्चों को पैदा करने का कोई भाव नहीं पैदा होगा। भूख में वह कोई शक्ति नहीं है। इसलिए एक दूसरी भूख है, वह है यौन।

पेट की भूख से आप बचते हैं, यौन की भूख से समाज बचता है। ये दो भूखे हैं। और जैसे ही व्यक्ति का पेट भर जाता है, दूसरा जो खयाल आता है, वह सेक्स का है। भूखे आदमी को खयाल चाहे न आए। क्योंकि भूखा आदमी पहले अपने को बचाए, तब समाज को बचाने का सवाल उठता है, तब संतति को बचाने को सवाल उठता है। खुद ही न बचे, तो संतति कैसे बचेगी?

इसलिए धार्मिक लोगों ने सोचा कि उपवास करने से कामवासना से मुक्ति हो जाएगी। वह तरकीब सीधी है, बायोलाजिकल है। क्योंकि जब आदमी भूखा हो, तो वह खुद को बचाने की सोचेगा। भूखे आदमी को कामवासना पैदा नहीं होती। इसलिए अगर आप लंबा उपवास करें, तो कामवासना मर जाती है।

मरती नहीं, सिर्फ छिप जाती है। जब फिर पेट भरेगा, तब फिर कामवासना वापस आ जाएगी। इसलिए वह तरकीब धोखे की है, उससे कुछ हल नहीं होता। जैसे ही समाज समृद्ध होता है, वैसे ही कामवासना तीव्र हो जाती है।

लोग सोचते हैं, अमेरिका में बहुत सेक्यूअलिटी है। ऐसा कुछ भी नहीं है। अमेरिका का पेट भरा है, आपका पेट खाली है। जहां भी पेट भर जाएगा, वहां भूख का तो सवाल खत्म हो गया। इसलिए पूरे जीवन की ऊर्जा सिर्फ सेक्स में दौड़ने लगती है। आपकी दो में दौड़ती है, भूख में और सेक्स में। फिर अगर पेट बिलकुल ही भूखा हो, तो सेक्स में दौड़ना बंद हो जाती है, फिर भूख में ही दौड़ती है, क्योंकि भूख पहली जरूरत है। आप बचें, तो फिर आपके बच्चे बच सकते हैं। जैसे ही पेट भरा कि जो दूसरा खयाल उठता है, वह कामवासना का है।

जीवेषणा दो पहलुओं से चलती है, व्यक्ति बचे और संतति बचे। इसलिए कामवासना बहुत गहरे में पड़ी है। और उससे छुटकारा इतना आसान नहीं, जितना साधु—संत समझते हैं। उससे छुटकारा बड़ी आंतरिक वैज्ञानिक प्रक्रिया के द्वारा होता है, बच्चों का खेल नहीं है। नियम और व्रत लेने से कुछ हल नहीं होता, कसमें खाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब तक कि जीवन का रोआं—रोआं रूपांतरित न हो जाए, जब तक बोध इतना प्रगाढ़ न हो कि आप शरीर से अपने को बिलकुल अलग देखने में समर्थ न हो जाएं, तब तक कामवासना पकड़ती ही रहती है।

यह जो कामवासना है, अगर आप इसके साथ चलें, इसके पीछे दौड़े, तो जो एक नई वृत्ति पैदा होती है, उसका नाम लोभ है। लोभ कामवासना के फैलाव का नाम है। एक स्त्री से हल नहीं होता, हजार स्त्रिया चाहिए! तो भी हल नहीं होगा।

सार्त्र ने अपने एक उपन्यास में उसके एक पात्र से कहलवाया है कि जब तक इस जमीन की सारी स्त्रियां मुझे न मिल जाएं, तब तक मेरी कोई तृप्ति नहीं।

आप भोग न सकेंगे सारी स्त्रियों को, वह सवाल नहीं है; लेकिन मन की कामना इतनी विक्षिप्त है।

जब तक सारे जगत का धन न मिल जाए, तब तक तृप्ति नहीं है। धन की भी खोज आदमी इसीलिए करता है। क्योंकि धन से कामवासना खरीदी जा सकती है; धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, सुविधाएं कामवासना में सहयोगी हो जाती हैं।

लोभ कामवासना का फैलाव है। इसलिए लोभी व्यक्ति कामवासना से कभी मुक्त नहीं होता। यह भी हो सकता है कि वह लोभ में इतना पड़ गया हो कि कामवासना तक का त्याग कर दे। एक आदमी धन के पीछे पड़ा हो, तो हो सकता है कि वर्षों तक स्त्रियों की उसे याद भी न आए। लेकिन गहरे में वह धन इसीलिए खोज रहा है कि जब धन उसके पास होगा, तब स्त्रियों को तो आवाज देकर बुलाया जा सकता है। उसमें कुछ अड़चन नहीं।

यह भी हो सकता है कि जीवनभर उसको ख्याल ही न आए वह धन की दौड़ में लगा रहे। लेकिन धन की दौड़ में गहरे में कामवासना है।

सब लोभ काम का विस्तार है। इस काम के विस्तार में, इस लोभ में जो भी बाधा देता है, उस पर क्रोध आता है। कामवासना है फैलता लोभ, और जब उसमें कोई रुकावट डालता है, तो क्रोध आता है।

काम, लोभ, क्रोध एक ही नदी की धाराएं हैं। जब भी आप जो चाहते हैं, उसमें कोई रुकावट डाल देता है, तभी आप में आग जल उठती है, आप क्रोधित हो जाते हैं। जो भी सहयोग देता है, उस पर आपको बड़ा स्नेह आता है, बड़ा प्रेम आता है। जो भी बाधा डालता है, उस पर क्रोध आता है। मित्र आप उनको कहते हैं, जो आपकी वासनाओं में सहयोगी हैं। शत्रु आप उनको कहते हैं, जो आपकी वासनाओं में बाधा हैं।

लोभ और क्रोध से तभी छुटकारा होगा, जब काम से छुटकारा हो। और जो व्यक्ति सोचता हो कि हम लोभ और क्रोध छोड़ दें काम को बिना छोड़े, वह जीवन के गणित से अपरिचित है। यह कभी भी होने वाला नहीं है।

इसलिए समस्त धर्मों की खोज का एक जो मौलिक बिंदु है, वह यह है कि कैसे अकाम पैदा हो। उस अकाम को हमने ब्रह्मचर्य कहा है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है, कैसे मेरे जीवन के भीतर वह जो दौड़ है एक विक्षिप्त और जीवन को पैदा करने की, उससे कैसे छुटकारा हो। कृष्ण कहते हैं, ये तीन नरक के द्वार हैं।

हमें तो ये तीन ही जीवन मालूम पड़ते हैं। तो जिसे हम जीवन कहते हैं, कृष्ण उसे नरक का द्वार कह रहे हैं।

आप इन तीन को हटा दें, आपको लगेगा फिर जीवन में कुछ बचता ही नहीं। काम हटा दें, तो जड़ कट गई। लोभ हटा दें, फिर क्या करने को बचा! महत्वाकांक्षा कट गई। क्रोध हटा दें, फिर कुछ खटपट करने का उपाय भी नहीं बचा। तो जीवन का सब उपक्रम शून्य हुआ, सब व्यवहार बंद हुए।

अगर लोभ नहीं है, तो मित्र नहीं बनाएंगे आप। अगर क्रोध नहीं है, तो शत्रु नहीं बनाएंगे। तो न अपने बचे, न पराए बचे, आप अकेले रह गए। आप अचानक पाएंगे, ऐसा जीवन तो बहुत घबड़ाने वाला हो जाएगा। वह तो नारकीय होगा। और कृष्ण कहते हैं कि ये तीन नरक के द्वार हैं! और हम इन तीनों को जीवन समझे हुए हैं।

हमें खयाल भी नहीं आता कि हम चौबीस घंटे काम से भरे हुए हैं। उठते—बैठते, सोते—चलते, सब तरफ हमारी नजर का जो फैलाव है, वह कामवासना का है।

अगर अभी एक हवाई जहाज गिर पड़े, आप उसके टूटे अस्थिपंजर के पास जाएं। उसमें जो यात्री मरे हुए पड़े होंगे, उन मरे हुए यात्रियों में भी आपको सबसे पहले जो चीज दिखाई पड़ेगी, वह यह कि कौन स्त्री है, कौन पुरुष।

आप सब चीजें भूल जाते हैं। दस साल पहले कोई आपको मिला था। नाम भूल गया, शक्ल भूल गई, कुछ भी याद नहीं रहा। लेकिन यह आप कभी नहीं भूलते कि वह स्त्री थी कि पुरुष—यह कभी नहीं भूलते। आपको याद है कि आपको कभी ऐसा शक पैदा हुआ हो कि बीस साल पहले एक आदमी, एक व्यक्ति मिला था, वह स्त्री थी या पुरुष? यह शक आपको हो ही नहीं सकता। इसका मतलब क्या है?

इसका मतलब यह है कि आपके ऊपर गहरे से गहरा जो संस्कार पड़ता है, वह स्त्री और पुरुष होने का पड़ता है। उसका चेहरा कैसा था; भूल गया। उसका नाम क्या था, भूल गया। उसकी जाति क्या थी; भूल गई। वह लंबा था कि ठिगना था, सब भूल गया। लेकिन उसका सेक्स, वह आपको याद है। इसका मतलब यह है कि सबसे गहरी आपकी स्मृति इस बात को पकड़ती है। सबसे ज्यादा चेतना इसके आस—पास घूमती है।

यह जो हमारा काम है, यह कोई क्षण दो क्षण की बात नहीं कि कभी—कभी आपको पकड़ता है। यह चौबीस घंटे आपको घेरे हुए है, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। शायद चौबीस घंटे आप काम हैं। फिर इसमें जहां—जहां सहयोग मिलता है, वहां—वहा लोभ पैदा होता है। वह इस काम की धारा में ही लोभ का वर्तुल है।

जैसे नदी बहती है, और उसमें छोटे—छोटे भंवर पैदा हो जाते हैं। तो आपकी काम की जो नदी बहती है, जिस—जिस से सहारा मिलता है, वह आपके लोभ का भंवर हो जाता है। और जिस—जिस से बाधा मिलती है, वह आपके क्रोध का भंवर हो जाता है। फिर उन दोनों की परतें हमारे ऊपर बैठ जाती हैं।

उठते—बैठते, चलते—फिरते, आप खयाल लेते हों, न लेते हों, व्यवहार करते, आपका लोभ और क्रोध काम करता है। आप रास्ते पर चलते आदमी से नमस्कार भी तभी करते हैं, जब कुछ लोभ उससे जुड़ा हो। कोई लोभ—अतीत में, आज या भविष्य में—कहीं न कहीं उससे कुछ लाभ मिल सकता होगा, तो ही आप नमस्कार करते हैं। नहीं तो आप नमस्कार करने वाले भी नहीं। हाथ जोड्ने तक का श्रम आप उठाएंगे नहीं।

और आपकी नजर जहां भी जाती है, वहां तत्क्षण मित्र और शत्रु को पहचानती है। जिससे भी थोड़ी—सी भी विरोध की संभावना है, या थोड़ी—सी भी बाधा पड़ सकती, थोड़ी प्रतियोगिता हो सकती है, उसके प्रति आपका क्रोध जलता ही रहता है। भभक सकता है, किसी भी क्षण मौका मिल जाए तो।

यह जो हमारा क्रोध, लोभ और मोह है, इन्हें आप सिद्धातों की तरह तो समझ ले सकते हैं, लेकिन जीवन व्यवहार में इनके स्वरूप को पहचानना असली सवाल है। और हम उसमें इतने लिप्त होते हैं कि उसे अपने जीवन में पहचानना अक्सर कठिन होता है।

मैंने सुना है कि एक कंजूस आदमी ने अपने बेटे को चश्मा दिलवाया। दूसरे दिन सुबह ही बेटा बाहर बैठा है अपनी किताबें वगैरह लिए। उसके बाप ने भीतर के कमरे से पूछा कि बेटे, क्या कुछ पढ़ रहे हो? उस लड़के ने कहा कि नहीं। तो बाप ने पूछा, तो क्या कुछ लिख रहे हो? उसके लड़के ने कहा, नहीं। तो बाप ने कहा, तो फिर चश्मा उतारकर क्यों नहीं रख देते! लगता है, तुम्हें फिजूलखर्ची की आदत पड़ गई है।

वह जो चश्मा आंख पर रखा है, जब लिख भी नहीं रहे, पढ़ भी नहीं रहे, तो उसका फिजूलखर्च हो रहा है, चश्मे का।

यह हमें हंसने योग्य लग सकता है। लेकिन लोभी आदमी की यह दृष्टि है। वह सब जगह बचा रहा है। और कई दफे ऐसा हो जाता है कि हम लोभ के नाम पर जो बचाते हैं, उसको भी हम अच्छे सिद्धात बता देते हैं।

फ्रायड ने एक बहुत अनूठी बात कही है, उसने कहा है कि आमतौर से जो लोग ब्रह्मचर्य में उत्सुक होते हैं, वे लोभी होते हैं, ग्रीडी होते हैं। वीर्य खो न जाए, इसकी कंजूसी उनको ब्रह्मचारी बना देती है।

यह बड़ी सोचने जैसी बात है। और इधर जैसा मैंने अनेक लोगों को अनुभव किया है, अक्सर यह बात सच है। सौ प्रतिशत सच नहीं है, क्योंकि ब्रह्मचर्य की दिशा में जाने वाला एक प्रतिशत वह आदमी भी होता है, जो कामवासना से मुक्त होकर ब्रह्मचर्य की तरफ जाता है। सौ में निन्यानबे तो वे लोग होते हैं, जो सिर्फ लोभ के कारण ब्रह्मचर्य की तरफ जाते हैं कि कहीं शक्ति खर्च न हो जाए।

आपने शायद इस दिशा से कभी सोचा न हो। और अक्सर आपके साधु—संन्यासी जो आपको समझाते हैं, वे समझाते हैं कि बचाओ अपनी शक्ति को। वीर्य का एक बिंदु खोने का मतलब है, न मालूम कितना सेर खून खो गया। वीर्य का एक बिंदु खो गया, तो न मालूम कितना नुकसान हो गया। वे जो समझा रहे हैं आपको, आपको डरवा रहे हैं; वे आपके लोभ को जगा रहे हैं, वे यह कह रहे हैं कि शक्ति खो न जाए।

इसलिए अक्सर जो मुल्क कंजूस होते हैं, वे ब्रह्मचर्य की बहुत चर्चा करते हैं। और जो जातियां निपट कंजूस होती हैं, वे ब्रह्मचर्य को बड़े जोर से पकड़ लेती हैं।

ये जो ब्रह्मचर्य की इस तरह की बात करने वाले निन्यानबे प्रतिशत लोग हैं, इनमें से अधिक लोग कब्जियत के शिकार होंगे। क्योंकि जैसा वे वीर्य को बचाना चाहते हैं, ऐसा वे सब चीजों को बचाना चाहते हैं। वे मल तक को इकट्ठा करना सीख जाते हैं।

अभी आधुनिक विज्ञान बड़ी महत्वपूर्ण बातें कहता है। वह कहता है, जो व्यक्ति भी कब्जियत का शिकार है, वह यह बता रहा है कि वह मल को भी छोड़ने को राजी नहीं है। उसकी चित्त की दशा सब चीजों को पकड़ लेने की है।

मनोवैज्ञानिक कई अनूठे नतीजों पर पहुंचे हैं, जो धर्म को और धर्म की खोज में जाने वाले लोगों को ठीक से समझ लेना चाहिए। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि सब चीजें प्रतीकात्मक हैं। और एक बड़ी अनूठी बात है, जो एकदम से समझ में नहीं आती, लेकिन सही हो सकती है। वे कहते हैं, मल का जो रंग है, पीला रंग, वही सोने का रंग है। और सोने को जो लोग पकड़ते हैं, वे लोग कब्जियत के शिकार हो जाते हैं। वे मल को भी नहीं छोड़ सकते। और धन हाथ का मल ही है, वह मैल ही है, उससे ज्यादा है भी नहीं। लेकिन हर चीज को पकड़ लेना है, रोक लेना, कुछ भी छोड़ते नहीं बनता उनसे। जीवन उनका महारोग हो जाता है।

काम विक्षिप्तता लाता है। लोभ उस विक्षिप्तता को बढ़ाने के लिए दूसरों का सहारा मलता है, फैलाव मांगता है। क्रोध उस विक्षिप्तता में कोई भी बाधा डाले, उसको नष्ट करने को तैयार हो जाता है।

ये तीनों नरक के द्वार हैं। और हम जीवन में जितने दुख खड़े करते हैं, वह इनके द्वारा ही खड़े करते हैं। नरक कहीं कोई स्थान नहीं है, जहां द्वारों पर लिखा है कि काम, क्रोध, लोभ, कि यहां से भीतर मत जाइए। जहां—जहां ये तीन हैं, वहां—वहां नरक है, वहा—वहां जीवन दुख और संताप से भर जाता है। वहां—वहा जीवन की प्रफुल्लता कुम्हला जाती है, जीवन के फूल वहां नहीं लगते।

आपने कभी कंजूस आदमी को प्रसन्न देखा है? कंजूस प्रसन्न हो ही नहीं सकता। प्रसन्नता में भी उसे लगेगा, कुछ खर्च हो रहा है, कुछ नुकसान हुआ जा रहा है। वह प्रसन्नता तक को रोके रखता है। वह हृदयपूर्वक हंस नहीं सकता; वह कठिन है, मुश्किल है; वह उसके व्यक्तित्व का ढंग नहीं है। वह किसी चीज में शेयर नहीं कर सकता, भागीदार नहीं बना सकता।

इसलिए कंजूस कभी प्रेम नहीं कर सकता, किसी को प्रेम नहीं कर सकता। क्योंकि प्रेम में उसे डर लगता है कि जिससे प्रेम किया 1 उसको कुछ बांटना पड़ेगा, कुछ साझेदारी करनी पड़ेगी।

कंजूस किसी चीज में बंटाव नहीं कर सकता। कंजूस अकेला जीता है, आइसोलेटेड। अपने में बंद हो जाता है, और उसके चारों तरह कारागृह खड़ा हो जाता है। और अपने चारों तरफ कारागृह खड़ा हो जाए; हम किसी चीज में साझेदारी न कर सकें, मुस्कुरा भी न सकें, बांट भी न सकें……।

जीवन के सब आनंद बंटने से जुड़े हुए हैं। जो आदमी जितना बांट सकता है, जो जितना अपने को फैला सकता है, जो जितना अपने को दूसरों को दे सकता है, उतना ही प्रफुल्लित होता है, उतना ही आनंदित होता है।

अगर परमात्मा परम आनंद है, तो उसका इतना ही अर्थ है कि परमात्मा ने अपने को पूरा का पूरा इस जगत को दे दिया है, इस पूरे अस्तित्व को अपने को दे दिया है। वह सब तरफ फैल गया है। उसे आप कहीं भी खोज नहीं सकते। आप अंगुली करके इशारा नहीं कर सकते कि यह रहा परमात्मा। क्योंकि वह एक जगह होता, तो कंजूस होता, कृपण होता, बंधा होता। वह सब जगह है।

इसलिए आप जहां भी कहें, वहां वह है। और जहां भी आप इशारा करें, वहीं आप पाएंगे कि मुश्किल है, वह सब जगह है। उसने अपने को सब तरह फैला दिया है। वह पूरा बंट गया है कि अब उसके पास कुछ भी नहीं बचा है, अपने जैसा कुछ भी नहीं बचा है, इसलिए परम आनंद है, इसलिए सच्चिदानंद है।

मैंने सुना है कि नानक एक गांव में ठहरे। गांव बड़े भले लोगों का था, बड़े साधुओं का था, बड़े संत—सज्जन पुरुष थे। नानक के शब्द—शब्द को उन्होंने सुना, चरणों का पानी धोकर पीया। नानक को परमात्मा की तरह पूजा। और जब नानक उस गांव से विदा होने लगे, तो वे सब मीलों तक रोते हुए उनके पीछे आए और उन्होंने कहा, हमें कुछ आशीर्वाद दें। तो नानक ने कहा, एक ही मेरा आशीर्वाद है कि तुम उजड़ जाओ।

सदमा लगा। नानक के शिष्य तो बहुत हैरान हुए, कि यह क्या बात कही! इतना भला गांव। लेकिन अब बात हो गई और एकदम पूछना भी ठीक न लगा। सोचेंगे, विचार करेंगे, फिर पूछ लेंगे। फिर दूसरे गांव में पड़ाव हुआ। वह दुष्टों का गांव था। सब उपद्रवी जमीन के वहा इकट्ठे थे। उन्होंने न केवल अपमान किया, तिरस्कार किया, पत्थर फेंके, गालियां दीं, मार—पीट की नौबत खड़ी हो गई; रात रुकने भी न दिया।

जब गांव से नानक चलने लगे, तो वे तो आशीर्वाद मांगने वाले थे ही नहीं। शोरगुल मचाते, गालियां बकते नानक के पीछे गांव के बाहर तक आए थे। गांव के बाहर आकर नानक ने अपनी तरफ से आशीर्वाद दिया कि सदा यहीं आबाद रहो।

तब शिष्यों को मुश्किल हो गया। उन्होंने कहा कि अब तो पूछना ही पड़ेगा। यह तो हद हो गई। कुछ भूल हो गई आपसे। पिछले गांव में भले लोग थे, उनसे कहा, बरबाद हो जाओ! उजड़ जाओ! और इन गुंडे—बदमाशों को कहा कि सदा आबाद रहो, खुश रहो, सदा बसे रहो!

नानक ने कहा कि भला आदमी उजड़ जाए, तो बंट जाता है। वह जहां भी जाएगा, भलेपन को ले जाएगा। वह फैल जाए सारी दुनिया पर। और ये बुरे आदमी, ये इसी गांव में रहें, कहीं न जाएं। क्योंकि ये जहां जाएंगे, बुराई ले जाएंगे।

लेकिन बंटना बुरे आदमी का स्वभाव ही नहीं होता, अच्छा है यह। वह सिकुड़ता है, यह बड़ी कृपा है। भला आदमी बटता है। बांटना उसका स्वभाव है। दान उसके जीवन की व्यवस्था है। यह सवाल नहीं कि वह कुछ देता है कि नहीं देता है; यह उसके रहने—होने का ढंग है कि वह साझेदारी करता है, वह शेयर करता है। ये जो तीन हैं, काम, क्रोध, लोभ, ये सिकोड़ देते हैं। और सिकुड़ा हुआ आदमी नरक बन जाता है।

ये अधोगति में ले जाने वाले हैं, इन तीनों को त्याग देना चाहिए। क्योंकि हे अर्जुन, इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त हुआ पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है, इससे वह परम गति को जाता है अर्थात मुझको प्राप्त होता है।

इन तीन से जो मुक्त हुआ पुरुष है, वही केवल कल्याण का आचरण करता है। कल्याण का अर्थ है, जिससे हित हो, मंगल हो; जिससे आनंद बढ़े, फैले।

लेकिन जो आदमी कामवासना से भरा है, लोभ और क्रोध से भरा है, उसका आचरण कल्याण का नहीं हो सकता। उसका आचरण अहंकार—केंद्रित होगा। वह अपने लिए सबको मिटाने की कोशिश करेगा। वह चारों तरफ विध्वंस फैलाएगा। उसकी आकांक्षा यही है किं सब मिट जाएं, मैं अकेला रहूं। क्योंकि जब तक दूसरा है, तब तक मैं चाहे बांटू या न बांटू वह इस जगत की संपत्ति में से बंटाव तो कर ही रहा है। जब तक दूसरा है, कम से कम श्वास तो ले ही रहा है। तो इतनी आक्सीजन जिस पर मैं कब्जा कर सकता था, वह कब्जा कर रहा है। तब तक सूरज की रोशनी तो पी ही रहा है, सूरज पूरा का पूरा मेरा हो सकता था, उसमें वह बंटाव कर रहा है। तब तक आकाश में पूर्णिमा का चांद निकलता है, तो वह भी प्रसन्न होता है। उतनी मेरी प्रसन्नता खो रही है।

वह जो आदमी काम, क्रोध, लोभ से भरा हुआ है, उसका मौलिक आधार जीवन का यह है कि मैं अकेला रहूं और सब मिट जाएं। वह नहीं मिटा पाता, यह दूसरी बात है। कोशिश पूरी कर रहा है। हजारों दफे उसने प्रयोग किए हैं कि वह सबको पोंछकर समाप्त कर दे, अकेला रहे। कल्याण तो उससे हो ही नहीं सकता।

कल्याण तो उसी व्यक्ति से हो सकता है, सब रहें, चाहे मैं मिट जाऊं। मैं चाहे खो जाऊं, चाहे मेरी कोई जगह न रह जाए, लेकिन शेष सब रहे। फूल और जोर से खिले, चांद और जोर से निकले, लोग और आनंदित हों, जीवन की बांसुरी बजती रहे, मेरे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। अगर मैं बाधा बनता हूं तो हट जाऊं। अगर सहयोग बन सकता हूं तो ही रहूं।

लेकिन ये तीन द्वार जब बंद हो जाएं, तभी कल्याण का जीवन शुरू होता है।

यह जो शब्द कल्याण है, मंगल है, यह बड़ा समझने जैसा है। इसका अर्थ दूसरे का सुख है। और दूसरे के सुख को अगर आप सोचना भी शुरू कर दें…..।

हम तो कंसीडर भी नहीं करते। दूसरा है, यह भी विचार नहीं करते। दूसरे के जीवन में भी सुख की कोई संभावना हो सकती है, दूसरे को भी सुख मिलना चाहिए, यह तो हमारे मन में कभी कौंधता ही नहीं।

महावीर ने कहा है, जैसे तुम जीना चाहते हो, वैसे ही सभी जीना चाहते हैं। जैसे तुम सुख पाना चाहते हो, वैसे सभी सुख पाना चाहते हैं। तो जो तुम अपने लिए चाहते हो, वह सबके लिए चाहो। जीसस ने कहा है, जो तू न चाहता हो कि लोग तेरे प्रति करें, वह तू कभी भूलकर भी दूसरे के प्रति मत करना। यह कल्याण का सूत्र हुआ। और जो तू चाहता हो कि लोग तेरे प्रति करें, वही तू उनके प्रति करना। क्योंकि जो तेरे भीतर जीवन की छिपी चाह है, वही दूसरों के भीतर भी जीवन की छिपी चाह है। और तेरे भीतर जो जीवन है और दूसरे के भीतर जो जीवन है, वह एक ही का विस्तार है।

कल्याण का अर्थ है कि मेरे भीतर और आपके भीतर जो है, वह एक ही चेतना का फैलाव है। और अगर मैं आपका सुख चाहता हूं तो वस्तुत: यही मैं अपने सुख का आधार रख रहा हूं। और अगर मैं आपका दुख चाहता हूं तो मैं अपने ही हाथ—पैर तोड़ रहा हूं, क्योंकि आप मेरे ही फैले हुए रूप हैं। अगर आपको मैं दुखी करता हूं तो मैं अपने ही दुख का इंतजाम कर रहा हूं। देर—अबेर यह दुख मुझे पकड़ लेगा। आपको सुख दे रहा हूं तो देर—अबेर यह सुख मेरे पास आ जाएगा।

एक बार जिस आदमी को यह समझ में आ गया कि इस जगत में अलग—अलग कटे —कटे लोग नहीं हैं; हम अलग—अलग आयलैंड नहीं हैं, द्वीप नहीं हैं, हम एक महाद्वीप हैं। और अगर हमारे बीच में फासला दिख रहा है, तो वह फासला भी बीच में आ गए पानी की दीवार का है। नीचे हम जुड़े हैं, नीचे जमीन एक है। और उस पानी की दीवार का कोई बहुत मूल्य नहीं है। पानी की भी कोई दीवार होती है?

यह जो मेरे और आपके बीच में दीवार है, यह पानी की भी नहीं, हवा की ही दीवार है। इस दीवार के दोनों तरफ जिस हवा से आप श्वास ले रहे हैं, उसी हवा से मैं श्वास ले रहा हूं हम दोनों जुड़े हैं। हम सब जुड़े हैं। इस संयुक्तता का बोध आ जाए, तो जीवन में कल्याण का भाव आता है।

और जो काम, क्रोध, लोभ से भरा है, उसे यह संयुक्तता का भाव नहीं आ सकता। उसके लिए सब दुश्मन हैं, सब प्रतियोगी हैं। जो चीजें वह छीनना चाह रहा है, वही दूसरे छीनना चाह रहे हैं। इसलिए दूसरों का सुख वह कैसे चाह सकता है! दूसरों के लिए आशीर्वाद उससे नहीं बह सकता। अभिशाप ही दूसरों के लिए उसके पास है।

और जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से बर्तता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परम गति को और न सुख को ही प्राप्त होता है।

इस बात को समझना बड़ा जरूरी है और गहरा है।

जो व्यक्ति शास्त्र की विधि को त्यागकर…..।

शास्त्र की विधि क्या है न: शास्त्र क्या है? इसे समझें।

शास्त्र का अर्थ है, सदियों—सदियों में, सनातन से जिन्होंने जाना है, उनका सार निचोड़। जिन्होंने जीवन के आनंद को अनुभव किया है, जीवन के वरदान की वर्षा जिन पर हुई है, उन्होंने जो कहा है, उसका जोड़।

आज कठिन हो गई है यह बात। ऐसी कठिन उस दिन बात न थी, जब कृष्ण ने यह कहा था। उस दिन हर कोई शास्त्र नहीं लिखता था। कोई सोच ही नहीं सकता था कि बिना जाने मैं लिखूं। वह सोचने के बाहर था। क्योंकि बिना जाने लिखने में कोई अर्थ

 

भी नहीं था। शास्त्रों पर किसी के नाम भी नहीं थे। वह कोई व्यक्तियों की संपदा भी नहीं थी। अनंत— अनंत काल में, अनंत—अनंत लोगों ने जो जाना है, उस जानने को लोग निखारते गए। शास्त्र संपदा थी सबके अनुभव की।

वेद हैं, वे किसी एक व्यक्ति के वचन नहीं हैं। अनंत—अनंत ऋषियों ने जो जाना है, वह सब संगृहीत है। उपनिषद हैं, वे किसी एक व्यक्ति के लिखे हुए विचार नहीं हैं। वह अनंत— अनंत लोगों ने जाना है, उनका सारभूत है। कुछ पक्का पता लगाना भी मुश्किल है कि किसने जाना है। व्यक्ति खो गए हैं, सिर्फ सत्य रह गए हैं। कृष्ण ने जब यह बात कही, तब शास्त्र का अर्थ था, जाने हुए लोगों के वचन। इन वचनों को त्यागकर जो अपनी इच्छा से बर्तता है, वह सिद्धि को प्राप्त नहीं होता। क्योंकि एक व्यक्ति का अनुभव ही कितना है! एक व्यक्ति की छोटी—सी बुद्धि कितनी है! वह ऐसे ही है, जैसे सूरज निकला हो, और हम अपना टिमटिमाता दीया लेकर रास्ता खोज रहे हैं।

एक व्यक्ति का अनुभव बहुत छोटा है। एक व्यक्ति का होश बहुत छोटा है। अपने ही अनुभव से जो चलने की कोशिश करेगा, वह अनंत काल लगा देगा भटकने में। लेकिन जाने हुए पुरुषों का, जागे हुए पुरुषों का जो वचन है, उसका सहारा लेकर जो चलेगा, वह व्यर्थ के भटकाव से बच जाएगा।

रास्ता छोटा हो सकता है, अगर थोड़ा—सा नक्यग़ भी हमारे पास हो। शास्त्रों का अर्थ है, नक्यो। शास्त्रों को सिर पर रखकर बैठ जाने से कोई मंजिल पर नहीं पहुंचता। लेकिन वे नक्यो हैं, उन नक्यग़ें का अगर ठीक से उपयोग करना समझ में आ जाए, तो आप बहुत—सी भटकन से बच सकते हैं। जहां जो भूल—चूक जिन लोगों ने पहले की, उसको आपको करने की जरूरत नहीं है।

शास्त्र कोई बंधे—बंधाए उत्तर नहीं हैं; शास्त्र तो केवल मार्ग को खोजने के इशारे हैं। और उन इशारों को जो ठीक से समझ लेता है और उनके अनुसार चलता है, वह सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। और जो उनको त्याग देता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है, न परम गति को, औयन सुख को ही प्राप्त होता है। वह भटकता है।

यह आज के युग में बात और कठिन हो गई, क्योंकि आज शास्त्र बहुत हैं। कोई पांच हजार शास्त्र प्रति सप्ताह लिखे जाते हैं। पुस्तकें बढ़ती चली जाती हैं। और कुछ पक्का पता लगाना मुश्किल है, कौन लिख रहा है, कौन नहीं लिख रहा है। पागल भी लिख रहे हैं। उनको राहत मिलती है, केथार्सिस हो जाती है। उनका पागलपन निकल जाता है, किताब में रेचन हो जाता है। फिर उन पागलों की लिखी किताबों को दूसरे पागल पढ़ रहे हैं। उनका तो रेचन हो जाता है, इनकी खोपड़ी भारी हो जाती है। अब तय करना मुश्किल है। क्योंकि बहुत—से सूत्र खो गए।

पहला सूत्र तो यह खो गया कि बिना जागे कोई व्यक्ति न लिखे; बिना जागे कोई व्यक्ति न बोले, बिना जाग्रत हुए कोई किसी दूसरे को सलाह न दे। यह पुराने समय में सोचना ही असंभव था कि कोई बिना जागे हुए किसी को सलाह दे देगा।

लेकिन आज कठिन है। आज तो सोए आप कितने ही हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, आप सलाह दे सकते हैं। सोया हुआ आदमी और भी उत्सुकता से सलाह देता है। वह चाहे अपने सपने में बड़बड़ा रहा हो, लेकिन उसको अनुयायी मिल जाते हैं। लोग उसके पीछे चलने लगते हैं। जितने जोर से कोई चिल्ला सकता हो, उतना ज्यादा पीछे अनुसरण करने वाले मिल जाते हैं।

आज कठिन है। लेकिन आज भी व्यक्ति अपनी ही खोजबीन से चले, तो बहुत समय व्यय होगा, बहुत जन्म खो जाएंगे। आज भी व्यक्ति को शास्त्र की खोज करनी चाहिए। लेकिन आज की कठिनाई को ध्यान में रखकर मैं कहूंगा कि आज शास्त्र से ज्यादा सदगुरु..।

कृष्ण ने जब कहा, तब शास्त्र सदगुरु का काम करता था, क्योंकि सिर्फ सदगुरुओं के वचन ही लिपिबद्ध थे। आज मुश्किल है। छापेखाने ने पागलखाने के द्वार खोल दिए हैं। कोई भी लिख सकता है, कोई भी किताबों का प्रचार कर सकता है, कुछ अड़चन नहीं है अब। आज शास्त्र उतना सहयोगी नहीं हो सकता। आज शास्त्र को भी पहचानना हो, तो भी सदगुरु के ही माध्यम से पहचाना जा सकता है।

एक बहुत पुरानी कहावत है, सतयुग में शास्त्र, कलियुग में गुरु। उसमें बड़ा अर्थ है। क्योंकि कलियुग में इतने शास्त्र हो जाएंगे कि यही तय करना मुश्किल हो जाएगा, कौन—सा शास्त्र है और कौन—सा शास्त्र नहीं है! और कौन आपको कहे? अब तो कोई निजी आत्मीय संबंध बन जाए आपका किसी जाग्रत पुरुष से, तो ही रास्ता बन सकता है। क्योंकि उसके माध्यम से शास्त्र भी मिल सकेगा। और जीवित पुरुष मिल जाए, तो शास्त्र की जरूरत भी नहीं रह जाती।

लेकिन शास्त्र का मतलब ही इतना है, जागे हुए पुरुषों के वचन, चाहे वे जिंदा हों, चाहे जिंदा न हों। अगर आपको जीवन की बहुत—सी अड़चन, भटकन, व्यर्थ खोजबीन से बचना हो, भूल—चूक में बहुत समय खराब न करना हो, तो जरूरी है कि जिसने जाना हो, उसकी बात समझें; जिसने पहचाना हो, उसकी बात समझें।

और आप कैसे पहचानेंगे किसी व्यक्ति को कि उसने जान लिया, पहचान लिया? एक ही कसौटी है कि जिस व्यक्ति को आप देखें कि उसकी कोई खोज नहीं अब, उसका कोई प्रश्न नहीं अब। अब उसको पाने का कुछ, आपको दिखाई में न पड़ता हो। कोई व्यक्ति लगता हो कि ऐसे जी रहा है, जैसे उसने सब पा लिया। जो सब तरफ से तृप्त हो, जिसकी तृप्ति का वर्तुल बंद हो गया हो, जो। कहीं से खुलता न हो अब। तो ऐसे व्यक्ति की सन्निधि खोजना जरूरी है। आपके लिए वही शास्त्र होगा। उसके माध्यम से आपको वेद, उपनिषद, कुरान और बाइबिल के द्वार भी खुल जाएंगे।

इससे तेरे लिए उस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर तू शास्त्र—विधि से नियत किए हुए कर्म को ही करने के लिए योग्य है।

अर्जुन क्षत्रिय है, योद्धा है। कृष्ण शास्त्र की बात कह रहे हैं, क्योंकि शास्त्र उस दिन तय किया था, समाज चार हिस्सों में विभाजित था। बड़ी कुशलता से विभाजित किया था। कुशलता अनूठी है। हिंदुओं की खोज बड़ी गहरी है।

आज पाच हजार साल हो गए। पांच हजार साल में दुनिया में बहुत तरह के लोगों ने मनुष्यों को बांटने की कोशिश की है, कि कितने प्रकार के मनुष्य हैं? अभी अत्याधुनिक कार्ल गुस्ताव वा की कोशिश है, पश्चिम के बड़े मनोवैज्ञानिक की। वह भी मनुष्यों को चार हिस्सों में ही बांट पाता है। इन पांच हजार सालों में दुनिया के कोने—कोने में अलग—अलग जातियों ने, अलग—अलग विचारकों ने खोज की है कि आदमी कितने प्रकार के हैं। वह हमेशा चार के ही आकड़े पर आ जाते हैं।

हिंदुओं ने बड़ी पुरानी खोज की थी कि व्यक्ति चार तरह के हैं। और उन चार तरह के व्यक्तियों को बांट दिया था। और न केवल ऊपर से बांट दिया था, बल्कि ऐसे समाज की संरचना की थी कि आप मर भी जाएं आज, तो कल आपकी आत्मा अपने ही टाइप की जाति को खोज ले। वह बड़ी गहरे व्यूह की रचना थी।

ब्राह्मण मरकर ब्राह्मण घर में जन्म ले सके और अनंत जन्मों में ब्राह्मण घरों में तैर सके, तो उसका ब्राह्मणत्व सिद्ध होता चला जाएगा। और किसी भी जन्म में, शास्त्र ने ब्राह्मण के लिए जो कहा है, वह उसका मार्ग होगा।

अर्जुन क्षत्रिय है। आज के क्षत्रिय को तय करना मुश्किल है। — आज कौन क्षत्रिय है, तय करना मुश्किल है। क्योंकि शास्त्र की वह व्यवस्था टूट गई। और समाज का वह जो ढंग था, चार विभाजन स्पष्ट कर दिए थे, जिनमें कोई लेन—देन नहीं था एक तरह का, जिनमें आत्माएं एक—दूसरे में प्रवेश नहीं कर पाती थीं, वह आज संभव नहीं है। आज सब अस्तव्यस्त हो गया है। और समाज—सुधार के नाम पर नासमझ लोगों ने बड़ी उपद्रव की बातें खड़ी कर दी हैं। उन्हें कुछ पता भी नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं।

लेकिन उस दिन जिस दिन अर्जुन से कृष्ण ने यह बात कही, सब स्थिति साफ थी।

अर्जुन क्या कह रहा है? अर्जुन ब्राह्मण की माग कर रहा है। वह इस ढंग का व्यवहार कर रहा है, जो ब्राह्मण को करना चाहिए। वह जो प्रश्न उठा रहा है, वे ब्राह्मण के हैं। यह हिंसा होगी, लोग मर जाएंगे, इस राज्य को पाकर क्या करूंगा; किसके लिए पाऊं; इससे तो बेहतर है, मैं सब छोड़ दूं और संन्यस्त हो जाऊं। वह प्रश्न उठा रहा है, जो ब्राह्मण—चरित्र के व्यक्ति के लिए उचित है। और अगर अर्जुन ब्राह्मण होता, तो कृष्ण ने यह गीता उससे नहीं कही होती।

कृष्ण यह गीता कहने को मजबूर हुए क्योंकि अर्जुन का जो टाइप था, उसके जो व्यक्तित्व का ढांचा था, वह क्षत्रिय का था। और वह कोई एक जन्म की बात न थी। अर्जुन अनंत जन्मों से क्षत्रिय था। बहुत—बहुत बार क्षत्रिय रह चुका था। क्षत्रिय होना उसका गहरा संस्कार था। वह उसके रोएं—रोएं में समाया था। उसकी आत्मा क्षत्रिय की थी।

इसलिए यह अगर ब्राह्मण भी बन जाए, तो इसका ब्राह्मण होना ऊपर—ऊपर होगा, धोखा होगा, पाखंड होगा। यह जनेऊ वगैरह पहन ले और चंदन—तिलक लगा ले और बैठ जाए तो भी यह जंचेगा नहीं। इसके भीतर जो ढंग है, वह योद्धा का है। यह ब्राह्मण होने के योग्य नहीं है। यह ब्राह्मण हो भी नहीं सकता। क्योंकि ब्राह्मण होना कोई एक क्षण की बात नहीं है। इसके अनंत जन्मों के संस्कार साफ करने होंगे, तब यह ब्राह्मण हो सकता है। यह कोई एक क्षण का निर्णय नहीं है कि हमने तय किया और हम हो गए।

जैसे आज आप तय कर लें कि स्त्री होना है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा आपके तय करने से। आप स्त्री के कपड़े पहन सकते हैं, चाल—ढाल थोड़ी सीख सकते हैं। लेकिन स्त्रियां भी आप पर हसेंगी। रहेंगे आप पुरुष ही। वह स्त्री होना ऊपर का पाखंड हो जाएगा और सिर्फ हंसी योग्य हो जाएंगे।

कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि तू शास्त्र की तरफ देख, क्षत्रिय के लिए शास्त्र ने क्या कहा है! तू उससे यहां—वहा मत हट, क्योंकि वही तेरी सिद्धि है। क्षत्रिय होकर ही और क्षत्रिय के धर्म का ठीक—ठीक अनुसरण करके ही तेरा मोक्ष तुझे मिलेगा।

तो क्षत्रिय की क्या सिद्धि होगी? और क्या उसका मार्ग होगा?

कृष्ण कह रहे हैं, क्षत्रिय सोचता ही नहीं कि कोई मरता है; क्षत्रिय सोचता ही नहीं कि भविष्य में क्या होगा। क्षत्रिय सोचता ही नहीं। क्षत्रिय लड़ना जानता है। लड़ना उसका ध्यान है। वह युद्ध में ध्यानस्थ हो जाता है। वह न यह जानता है कि मैं मर रहा हूं कि दूसरा मर रहा है; वह युद्ध में निर्भय हो जाता है। युद्ध के क्षण में उसकी चित्त की दशा न तो मारने के, न तो मरने के विचार से डोलती। वह निश्चित खड़ा हो जाता है। कौन मरता है, यह गौण है। युद्ध उसके लिए एक खेल है, वह अभिनय है, वह उसके लिए कोई बहुत गंभीरता का प्रश्न नहीं है। वह दोपहर लड़ेगा, सांझ तक लड़ेगा, सांझ बात भी नहीं करेगा कि युद्ध में क्या हुआ। रात विश्राम करेगा। रात उसकी नींद में खलल भी नहीं पड़ेगी कि दिनभर इतना युद्ध हुआ, इतने लोग कटे। वह रात मजे से सोएगा। सुबह उठकर फिर युद्ध की तरफ चल पड़ेगा। युद्ध उसके लिए एक खेल और अभिनय है।

कृष्ण कह रहे हैं कि तू इस पूरे युद्ध को एक नाटक से ज्यादा मत जान। और तेरी जो शिक्षा है, तेरी जो दीक्षा है, तेरा जो संस्कार है, शास्त्र जो कहता है, तू उसके हिसाब से चुपचाप चल। तू अपना कर्तव्य पूरा कर। तू चिंता में मत पड़। यह चिंता तुझे शोभा नहीं देती। अगर इस चिंता में—यह करूं या वह करूं; हं। या न, अच्छा या बुरा—तू उलझ गया, तो तू अपने धर्म से च्‍यूत हो जाएगा। और तब तुझे अनंत जन्म लग जाएंगे। और यहां इस युद्ध के क्षण में इसी क्षण तू मुक्त हो सकता है। बस इतना ही तुझे करना है कि तू अपने कर्ता का भाव छोड़ दे।

क्षत्रिय वही है, जो कर्ता नहीं है।

जापान में क्षत्रियों का एक समूह है, समुराई। वह अब भी क्षत्रिय है। और अनेक पीढ़ियों से समुराई तैयार किए गए हैं। क्योंकि हर कोई समुराई नहीं हो सकता, बाप समुराई रहा हो, तो ही बेटा समुराई हो सकता है।

हम, जैसा कि फलों की फसल तैयार करते हैं, तो अच्छे फलों का बीज चुनते हैं। फिर और उनमें से अच्छे फल, फिर उनमें से अच्छे फल। फिर फल बड़ा होता जाता है, सुस्वादु होता चला जाता है।

तो अनेक पीढ़ियों में समुराई चुने गए हैं। वह क्षत्रियों की जाति है। समुराई का एक ही लक्ष्य है कि जब मैं युद्ध में लडूं? तो युद्ध तो हो, मैं न रहूं। मेरी तलवार तो चले, लेकिन चलाने वाला न हो। तलवार जैसे परमात्मा के हाथ में आ जाए, वही चलाए; मैं सिर्फ निमित्त हो जाऊं।

इसलिए कहते हैं कि अगर दो समुराई युद्ध में उतर जाएं, तो बड़ा मुश्किल हो जाता है कि कौन जीते, कौन हारे। क्योंकि दोनों ही अपने को मिटाकर लड़ते हैं। दोनों की तलवारें चलती हैं; लेकिन दोनों की तलवारें परमात्मा के हाथ में होती हैं। कौन हारे, कौन जीते।

समुराई—सूत्र है कि वही आदमी हार जाता है, जो थक जाता है जल्दी और वापस अपने अहंकार को लौट जाता है। जिसको भाव आ जाता है मैं का, वह हार जाता है। जो आदमी धैर्यपूर्वक परमात्मा पर छोड्कर चलता जाता है, उसके हारने का कोई भी उपाय नहीं है। कृष्ण कह रहे हैं, तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है, ऐसा जानकर तू शास्त्र—विधि से नियत किए हुए कर्म को ही करने के लिए योग्य है।

यह कर्तव्य और अकर्तव्य की व्याख्या कृष्ण ने की। क्या करने योग्य है, क्या करने योग्य नहीं है! क्या त्याग देना है, और क्या जीवन में बचा लेना है! कौन—से नरक के द्वार हैं, वे बंद हो जाएं, तो कैसे मोक्ष का द्वार खुल जाता है!

ये सारी बातें आपने सुनीं। ये बातें अर्जुन को कही गई हैं। इन पर आप सोचना। अगर आपकी चित्त—दशा अर्जुन जैसी हो, तो ये बातें आपके लिए बिलकुल सीधा मार्ग बन जाएंगी। अगर आपकी चित्त—दशा अर्जुन जैसी न हो, और आप कोई संबंध ही न जोड़ पाते हों अपने और अर्जुन में, तो आप इन बातों को अपने पर ओढ़ने की कोशिश मत करना। क्योंकि वह भूल हो जाएगी वही, जो अर्जुन कर रहा था।

इन बातों को समझना, सोचना, इनके साथ—साथ अपने स्वभाव को समझना और सोचना। दोनों को समानांतर रखना। अगर उनमें कोई मेल उठता हो, अगर दोनों में एक—सी धुन बजती हो, अगर दोनों में संयोग बनता हो, तो ये सूत्र आपके काम आ सकते हैं।

लेकिन गीता में करीब—करीब कृष्ण ने वे सारे सूत्र कह दिए हैं, जितने प्रकार के मनुष्य हैं। वे सारे सूत्र कह दिए हैं। इसलिए गीता इतनी लंबी चली। अर्जुन के बहाने कृष्ण ने पूरी मनुष्य जाति को उदबोधित किया है।

तो चाहे इस अध्याय में, चाहे किसी और अध्याय में, आपके लिए भी कहे गए वचन हैं। इतनी थोड़ी—सी मेहनत आपको करनी पड़ेगी कि अपने को थोड़ा समझें और अपने योग्य, अपने अनुकूल वचनों को थोड़ा पहचानें। और उचित ही है कि इतनी मेहनत आप करें। क्योंकि बिलकुल चबाया हुआ भोजन मिल जाए, तो आत्मघाती है। थोड़ा आप चबाएं और पचाएं। और यहां उत्तर बंधे हुए नहीं हैं, उत्तर खोजने पड़ेंगे।

मैंने सुना है, एक अदालत में मुकदमा चला एक आदमी पर, उसने हत्या की थी। और एक गवाह को मौजूद किया गया, गांव के एक किसान को। और उस गवाह से वकील ने पूछा कि जब रामू ने पंडित जी पर कुल्हाड़ी से हमला किया, तो तुम कितनी दूर खड़े थे? उसने कहा कि छ: फीट साढ़े छ: इंच; उस किसान ने कहा। वकील भी चौंका, अदालत भी होश में आ गई, मजिस्ट्रेट भी चौंका। और वकील ने कहा, तुमने तो इस तरह बताया है कि जैसे तुमने पहले से ही सब नाप—जोखकर रखा हो। छ: फीट साढ़े छ: इंच!

उस किसान ने कहा, मुझे पता था कि कोई न कोई मूर्ख आदमी यह सवाल मुझसे यहां जरूर पूछेगा; तो यहां आने के पहले पहला काम मैंने यह किया। बिलकुल नापकर आया हूं।

इस तरह बंधे हुए सवाल और उत्तर आपको गीता में नहीं मिल सकते। सब जवाब वहां मौजूद हैं, सब सवालों के जवाब मौजूद हैं। लेकिन पहले एक तो आपको अपना सवाल पहचानना पडेगा, फिर अपने सवाल को लेकर गीता में खोजना पड़ेगा। जवाब आपको मिल जाएगा। और वह जवाब जब तक न मिले, तब तक गीता को ऊपर से ओढने की कोशिश मत करना, क्योंकि वह खतरनाक हो सकती है।

गीता एक आदमी के लिए कही गई है, लेकिन एक आदमी के बहाने सब आदमियों से कही गई है। इसलिए उसमें बहुउत्तर हैं, अनंत उत्तर हैं, आपका उत्तर भी वहा है। और आप अपने को पहचानते हों, तो उस उत्तर को खोज ले सकते हैं। फिर वही उत्तर आपके जीवन की साधना बन सकता है।

आज इतना ही।

(गीता दर्शन—सातवां भाग समाप्‍त)

 

 

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अध्‍याय—16     सूत्र:

अत्मसंभाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता:।

यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।। 17।।

अहंकारं बलं दर्प कामं क्रोध च संश्रता:।

मामत्‍मपरहेहेषु प्रद्धईषन्तोऽभ्यसूक्का:।। 18।।

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षियाम्यजस्रमशुभानासुरीष्येव योनिषु।। 19।।

आसुरी योनिमापन्‍ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामाप्राप्‍यैव कौन्तेय ततो यान्‍त्‍यधमां गतिम्।। 29।।

 

वे अपने आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमंडी पुरुष बन और मान के मद से युक्‍त हुए, शास्त्र— विधि से रहित केबल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखंड से यजन करते हैं।

तथा वे अहंकार, बल, धमंड, कामना और क्रोधादि के परायण हुए एंव दूसरों की निंदा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अंतर्यामी से द्वेष करने वाले हैं। ऐसे उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बारंबार आसुरी योनियों में ही गिरता हूं।

इसलिए हे अर्जुन, वे मूढ पूरूष जन्म— जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त हुए, मेरे को न प्राप्त होकर, उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं।

 

पहले कुछ प्रश्न।

 

पहला प्रश्न : कल कहा गया कि दुनिया में अच्छाई और बुराई का संतुलन है। ये दोनों सदा ही सम परिमाण हैं। एक बुरा मिटता है, तो अच्छा भी कम होता है। अगर इस संतुलन में कभी बदल होने वाला नहीं है, तो साधना का प्रयोजन क्या है?

 

प्रश्न महत्वपूर्ण है। साधकों को गहराई से सोचने जैसा है।

साधना के संबंध में हमारे मन में यह भांति होती है कि साधना भलाई को बढ़ाने लिए है। साधना का कोई संबंध भलाई को बढ़ाने से नहीं है; न साधना का कोई संबंध बुराई को कम करने से है। साधना का संबंध तो दोनों का अतिक्रमण, दोनों के पार हो जाने से है। साधना न तो अंधेरे को मिटाना चाहती है, न प्रकाश को बढ़ाना चाहती है। साधना तो आपको दोनों का साक्षी बनाना चाहती है।

इस जगत में तीन दशाएं हैं। एक बुरे मन की दशा है, एक अच्छे मन की दशा है और एक दोनों के पार अमन की, नो—माइंड की दशा है। साधना का प्रयोजन है कि अच्छे—बुरे दोनों से आप मुक्त हो जाएं। और जब तक दोनों से मुक्त न होंगे, तब तक मुक्ति की कोई गुंजाइश नहीं।

अगर आप अच्छे को पकड़ लेंगे, तो अच्छे से बंध जाएंगे। बुरे को छोड़ेंगे, बुरे से लड़ेंगे, तो बुरे के जो विपरीत है, उससे बंध जाएंगे। चुनाव है; कुएं से बचेंगे, तो खाई में गिर जाएंगे। लेकिन अगर दोनों को न चुनें, तो वही परम साधक की खोज है कि कैसे वह घड़ी आ जाए, जब मैं कुछ भी न चुनूं, अकेला मैं ही बधू; मेरे ऊपर कुछ भी आरोपित न हो। न मैं बुरे बादलों को अपने ऊपर ओढु न भले बादलों को ओढूं। मेरी सब ओढ़नी समाप्त हो जाए। मैं वही बचूं जो मैं निपट अपने स्वभाव में हूं।

यह जो स्वभाव की सहज दशा है, इसे न तो आप अच्छा कह सकते और न बुरा। यह दोनों के पार है, यह दोनों से भिन्न है, यह दोनों के अतीत है।

लेकिन साधारणत: साधना से हम सोचते हैं, अच्छा होने की कोशिश। उसके कारण हैं, उस भ्रांति के पीछे लंबा इतिहास है। समाज की आकांशा आपको अच्छा बनाने की है। क्योंकि समाज बुरे से पीड़ित होता है, समाज बुरे से परेशान है। इसलिए अच्छा बनाने की कोशिश चलती है। समाज आपको साधना में ले जाना नहीं चाहता। समाज आपको बुरे बंधन से हटाकर अच्छे बंधन में डालना चाहता है।

समाज चाहता भी नहीं कि आप परम स्वतंत्र हो जाएं, क्योंकि परम स्वतंत्र व्यक्ति तो समाज का शत्रु जैसा मालूम पड़ेगा। समाज चाहता है, रहें तो आप परतंत्र ही; पर समाज जैसा चाहता है, उस ढंग के परतंत्र हों। समाज आपको अच्छा बनाना चाहता है, ताकि समाज को कोई उच्छृंखलता, कोई अनुशासनहीनता, आपके द्वारा कोई उपद्रव, बगांवत, विद्रोह न झेलना पड़े।

समाज आपको धार्मिक नहीं बनाना चाहता, ज्यादा से ज्यादा नैतिक बनाना चाहता है। और नीति और धर्म बड़ी अलग बातें हैं। नास्तिक भी नैतिक हो सकता है, और अक्सर जिन्हें हम आस्तिक कहते हैं, उनसे ज्यादा नैतिक होता है। ईश्वर के होने की कोई जरूरत नहीं है आपके अच्छे होने के लिए; न मोक्ष की कोई जरूरत है। आपके अच्छे होने के लिए तो केवल एक विवेक की जरूरत है। तो नास्तिक भी अच्छा हो सकता है, नैतिक हो सकता है।

धर्म कुछ अलग ही बात है। धर्म का इतने से प्रयोजन नहीं है कि आप चोरी नहीं करते। नहीं करते, बड़ी अच्छी बात है। लेकिन चोरी न करने से कोई मोक्ष नहीं पहुंच जाता है। जब चोरी करने वाले को कुछ नहीं मिलता, तो चोरी से बचने वाले को क्या मिल जाएगा! जब धन इकट्ठा करने वाले को कुछ नहीं मिलता, जब धन इकट्ठा कर—करके कुछ नहीं मिलता, तो धन छोड्कर क्या मिल जाएगा! अगर धन इकट्ठा करने से कुछ मिलता होता, तो शायद धन छोड़ने से भी कुछ मिल जाता। जब काम— भोग में डूब—डूबकर कुछ नहीं मिलता, तो उनको छोड़ने से क्या मिल जाएगा! वह कचरा है, उसको छोड्कर मोक्ष नहीं मिल जाने वाला है। यह थोड़ा कठिन है समझना।

एक बात ध्यान रखें, जिस चीज से लाभ हो सकता है, उससे हानि हो सकती है। जिससे हानि हो सकती है, उससे लाभ हो सकता है। लेकिन जिस चीज से कोई लाभ ही न होता हो, उससे कोई हानि भी नहीं हो सकती। अगर धन के इकट्ठा करने से कोई भी लाभ नहीं होता, तो धन के इकट्ठा करने से कोई हानि भी नहीं हो सकती।

धार्मिक व्यक्ति धन के इकट्ठा करने को मूढ़ता मानता है, बुराई नहीं। वह बाल—बुद्धि है। धर्म कामवासना में डूबे व्यक्ति को पापी नहीं कहता, सिर्फ अज्ञानी कहता है। उसे पता नहीं कि वह क्या कर रहा है। तो धर्म की कोई इच्छा नहीं ‘है कि आप, जिन—जिन चीजों को समाज बुरा कहता है, उन्हें छोड़ देंगे, तो आप मुक्त हो जाएंगे। सज्जन पुरुष हमारे बीच हैं, फिर भी मोक्ष उनसे उतना ही दूर है, जितना दुर्जन से, उस दूरी में कोई फर्क नहीं पड़ता। मोक्ष की दूरी में तो तभी कमी होनी शुरू होती है, जब आप न दुर्जन रह जाते, न सज्जन, न साधु, न असाधु; क्योंकि इन दोनों का द्वंद्व है। और जब तक द्वंद्व नहीं टूटता, तब तक परमहंस अवस्था नहीं आती।

साधना का प्रयोजन है, परमहंस अवस्था आ जाए। इससे हमें डर भी लगता है। क्योंकि अगर कोई व्यक्ति बुराई— भलाई दोनों छोड़ दे, जैसे ही हम यह सोचते हैं, तो हमें डर लगता है कि वह आदमी बुरा हो जाएगा।

अगर आपसे कहा जाए कि बुराई— भलाई दोनों छोड़ दो, तो आपके मन में तत्क्षण बुरे करने के विचार आएंगे। भलाई तो छोड़ना बिलकुल आसान है। उसको तो कभी पकड़ा ही नहीं है, इसलिए छोड़ने का कोई प्रश्न नहीं है। आपको अगर पता चले कि दोनों बेकार हैं, तो आप तत्क्षण बुराई करने में लग जाएंगे। उस खुद की मनोदशा के कारण, धर्म की यह जो परम आत्यंतिक धारणा है, दोनों के पार हो जाना, उससे हमें भय लगता है।

लेकिन अगर आप समझेंगे साधना का अर्थ, साधना का अर्थ है, धीरे—धीरे बाहर से भीतर की तरफ जाना।

अच्छाई भी बाहर है, बुराई भी बाहर है। अगर आप चोरी करते हैं, तो भी आपके अतिरिक्त किसी और का होना जरूरी है। अकेले आप कैसे चोरी करिएगा? अगर इस पृथ्वी पर आप अकेले रह जाएं, सारा समाज नष्ट हो जाए; युद्ध हो जाए तीसरा, सब नष्ट हो जाएं, आप भर अकेले बचें; आप चोरी कर सकिएगा फिर? किसकी चोरी करिएगा? चोरी का अर्थ ही क्या होगा?

अगर आप अकेले हैं, तो चोरी नहीं कर सकते। अगर अकेले हैं, तो दान कर सकिएगा? दान के लिए भी दूसरे की जरूरत है। तो चोरी हो या दान, नीति हो या अनीति, पुण्य हो या पाप, ये सब बाहर की घटनाएं हैं। लेकिन सारी दुनिया नष्ट हो जाए और आप अकेले बचें, तो भी ध्यान कर सकते हैं। ध्यान का दूसरे से कुछ संबंध नहीं है। ध्यान आंतरिक घटना है। इसलिए ध्यान भीतर ले जाता है।

पुण्य भी बाहर भटकाता है, पाप भी बाहर भटकाता है। अच्छाई भी बाहर, बुराई भी बाहर। अच्छाई भी समाज में, बुराई भी समाज में। उन दोनों का कोई अंतस्तल से संबंध नहीं है।

साधना का अर्थ है, ध्यान। साधना का अर्थ है, अंतर्मुखता। साधना का अर्थ है, उसे मैं जानूं जो मैं अपनी निजता में हूं; जिसका दूसरे से संबंधित होने का कोई संबंध नहीं है। साधना का संबंध रिलेशनशिप, संबंधों से जरा भी नहीं है। साधना का संबंध है स्वयं से; मैं उसे जान लूं जो मैं हूं।

तो न तो चोरी करके कोई उसे जान पाता है, न चोरी छोड्कर कोई उसे जान पाता है। चोर भी भटकते हैं, जो चोरी नहीं .करते, वे भी भटकते हैं। न तो बुरा करके उसे कोई कभी जाना है, न भला करके कभी कोई उसे जाना है। उसे जानने वाले को तो सभी करना छोड़ देना पड़ता है, बुरा भी, भला भी। उसे तो भीतर अक्रिया में डूब जाना पड़ता है। उसे तो बाहर से आंख ही बंद कर लेनी पड़ती है।

उसके लिए कामवासना भी व्यर्थ है, उसके लिए ब्रह्मचर्य भी दो कौड़ी का है। क्योंकि ब्रह्मचर्य और कामवासना दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वे अलग—अलग बातें नहीं हैं। आपको ब्रह्मचर्य मूल्यवान दिखाई पड़ता है, क्योंकि कामवासना में आपको रस है। जिस दिन कामवासना में कोई रस न रह जाएगा, उस दिन ब्रह्मचर्य भी दो कौड़ी का है, उसका भी कोई मूल्य नहीं है।

द्वंद्व से कोई संबंध नहीं है। और जगत एक संतुलन है। जगत में बुराई और भलाई सदा संतुलित है। साधना तो जगत के पार उठने की प्रक्रिया है। लेकिन यह खयाल में तभी आएगा, जब थोड़ा—सा अनुभव करेंगे।

अभी तो हम कामों में ही चुनते हैं। यह काम बुरा है, छोड़ दें। यह काम भला है, कर लें। अभी एक्शंन पर, कर्म पर ही हमारा जोर है। वह जो कर्मों के पीछे छिपा हुआ हमारा स्वभाव है, उस पर हमारा कोई जोर नहीं है।

उसे जान लें, जो बुरा भी करता है और भला भी करता है। उसे जान लें, जो दोनों के पीछे छिपा है। उसे जान लें, जो सब करके भी अकर्ता है। उसे जान लें, जो सबका द्रष्टा है। उससे कोई लेना—देना नहीं है आपके कर्म का। आप सुबह पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, स्नान करते हैं कि नहीं करते हैं, मंदिर में जाते हैं कि मस्जिद में—इससे कोई संबंध नहीं है।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप मंदिर मत जाएं। और मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि आप अच्छाई मत करें। मैं सिर्फ इतना ही कह रहा हूं कि करने के पार जाना पड़ेगा, तभी धर्म से संबंध जुड़ेगा। वह अर्जुन भी इसी द्वंद्व से ग्रस्त है। उसका भी सवाल क्या है? उसकी भी चिंता क्या है? उसकी उलझन क्या है?

यही उलझन है। वह देखता है कि यह जो युद्ध है, बुराई है। इसमें सिर्फ लोग मरेंगे, सिर्फ हत्या होगी, खून बहेगा। न मालूम कितनी स्त्रियां विधवा हो जाएंगी। न मालूम कितने बच्चे अनाथ हो जाएंगे। घर—घर में दुख और हाहाकार छा जाएगा। यह बुरा है।

तो वह कृष्ण से यही कह रहा है कि इस बुराई को मैं छोड़ दूं। यह बुराई करने जैसी नहीं लगती। इससे तो अच्छा है कि मैं जंगल चला जाऊं, संन्यास ले लूं विरक्त हो जाऊं, छोड़ दूं सब। बुराई को छोड़ दूं अच्छाई को पकड़ लूं। और कृष्ण उसे क्या समझा रहे हैं? इसलिए कृष्ण का संदेश सरल होते हुए भी अति कठिन है।

कृष्ण उसे यह समझा रहे हैं कि तू जब तक यह सोचता है कि यह बुरा है, इसे छोड़ यह भला है, इसे करूं; तब तक तू उलझन में रहेगा। तू कर्म की धारणा छोड़ दे। तू यह भाव छोड़ दे कि मैं कर्ता हूं।

अगर तू युद्ध छोड्कर चला जाएगा, तो तू सोचेगा, मैंने संन्यास किया, मैंने त्याग किया, मैंने वैराग्य किया; पर कर्म का भाव तुझे बना रहेगा। युद्ध करेगा, तो तू समझेगा, मैंने युद्ध किया, मैंने लोगों को मारा, या मैंने लोगों को बचाया।

दोनों ही धारणाएं भ्रांत हैं। तू करने वाला नहीं है। करने की बात तू विराट पर छोड़ दे। तू सिर्फ निमित्त हो जा। तू सिर्फ विराट को मौका दे कि तेरे भीतर से कुछ कर सके। तू सिर्फ देखने वाला बन जा। तू इस युद्ध में एक द्रष्टा हो।

कृष्ण की पूरी चेष्टा यही है कि अर्जुन बुरे और भले के द्वंद्व से छूट जाए, निर्द्वंद्व हो जाए; दो के बीच चुने नहीं, तीसरा हो जाए; दोनों से अलग हो जाए।

साधना का यही प्रयोजन है।

 

दूसरा प्रश्न :

 

कल के सूत्र में आपने कहा कि वैज्ञानिक कहते हैं कि किसी भी इंद्रिय का यदि तीन साल तक उपयोग न किया जाए, तो वह इंद्रिय क्रियाशील नहीं रह जाती। और हम कामेंद्रिय का उपयोग बीस—पच्चीस वर्षो तक भी नहीं करते, फिर भी हम खुद को कामवासना से मुक्त नहीं पाते। हम— तो क्या, तथाकथित साधु—संन्यासी कई वर्षो की साधना के बाद भी कामवासना से पीड़ित दिखाई पड़ते हैं। क्या यह सिद्धांत काम—इंद्रिय पर लागू नहीं होता?

 

स संबंध में दो—तीन बातें समझनी पड़ें।

पहली बात, काम—इंद्रिय आपकी और इंद्रियों जैसी ही इंद्रिय नहीं है। सच तो यह है कि काम—इंद्रिय आपकी सुरभी इंद्रियों का केंद्र है, आधार—स्रोत है। तो और इंद्रियां ऊपर—ऊपर हैं, परिधि पर हैं। कामेंद्रिय गहन अंतर में है, गहरे में है, जड़ में है।

वृक्ष की शाखाओं को हम काट दें, तो वृक्ष नहीं मरता; नई शाखाएं निकल आती हैं। वृक्ष की जड़ों को हम काट दें, वृक्ष मर जाता है। पुरानी शाखाएं भी जो हरी थीं, वे भी सूखकर समाप्त हो जाती हैं।

आंख ऊपर है, हाथ ऊपर है, कान ऊपर हैं, कामेंद्रिय बहुत गहरे मैं है। इसलिए अगर आप आंख का उपयोग तीन वर्ष तक न करें, तो आंखें क्षीण हो जाएंगी। कान का उपयोग न करें, तो आप बहरे हो जाएंगे। हाथ को न चलाएं, तो हाथ पंगु हो जाएगा। पैर का उपयोग न करें, पैर पक्षाघात से भर जाएंगे। लेकिन कामेंद्रिय भिन्न है। उसके कारण समझ लें।

आपके शरीर का प्रत्येक कण कामवासना से निर्मित है। आंख तो छोटा—सा हिस्सा है, कान तो छोटी—सी हड्डियों का जोड़ है। लेकिन काम—इंद्रिय आपके पूरे शरीर को घेरे हुए है। वह जो मां के गर्भ में पहला अणु निर्मित हुआ था, वह कामवासना से निर्मित हुआ। फिर उसी अणु के विस्तार से आपका पूरा शरीर निर्मित हुआ है। आपका प्रत्येक अणु कामवासना से भरा है।

इसलिए आंख फोड़ लें, कान तोड़ डालें, हाथ काट डालें, कामवासना में अंतर नहीं पड़ेगा। जननेंद्रिय को लोग कामेंद्रिय समझ लेते हैं, उससे भूल हो जाती है। जननेंद्रिय कामेंद्रिय का शरीर के ऊपर सिर्फ अभिव्यक्ति है। जननेंद्रिय सिर्फ कामेंद्रिय के उपयोग का द्वार है। लेकिन आपका पूरा शरीर कामवासना है। इसलिए जननेंद्रिय भी काट डालें, तो भी कामवासना नहीं मिटेगी।

कामवासना तो तभी मिटेगी, जब आप अपनी आत्मा को शरीर से बिलकुल पृथक अनुभव कर लें। उसके पहले नहीं मिटेगी। अगर शरीर से रंचमात्र भी तादात्‍मय है, अगर जरा—सा भी जोड़ है कि मैं शरीर हूं तो उतनी कामवासना कायम रहेगी। आंख नष्ट हो जाएगी बड़ी आसानी से, कामवासना इतनी आसानी से नष्ट नहीं होगी। दूसरी बात, आप कामवासना से पैदा हुए हैं। आपके पैदा होने में कामवासना का प्रगाढ़ हाथ है। तो जब तक आप में जीवन की आकांक्षा रहेगी, तब तक कामवासना से छुटकारा न होगा। जब तक आप चाहते हैं कि मैं बचूं जीऊं, रहूं तब तक आप कामवासना से मुक्त न होंगे। क्योंकि जीवन पैदा ही कामवासना से हुआ है; और आप जीना चाहते हैं, तो कामवासना को बल मिलता है।

जिस दिन आपकी जीवेषणा छूटेगी, और आप कहेंगे कि मैं मिटूं खो जाऊं, समाप्त हो जाऊं, वही मेरा आनंद है; अब मैं बचना नहीं चाहता, अब मैं रहना नहीं चाहता, अब इस देह को घर नहीं बनाऊंगा, अब मैं मुक्त हो जाना चाहता हूं सब सीमाओं से; जिस दिन जीवन की जगह मृत्यु आपका लक्ष्य हो जाएगी, उस दिन कामवासना मिटेगी। उसके पहले कामवासना नहीं मिटेगी।

इसलिए पच्चीस वर्ष, पच्चीस जन्म भी कामवासना को दबाए रखने से उसका अंत नहीं होता। फिर जितना आप उसे दबाते हैं, उतनी ही वह बढ़ती है। क्योंकि भला आप कमेंद्रिय का उपयोग न करें, जननेंद्रिय का उपयोग न करें, लेकिन चित्त कामवासना में लगा ही रहता है। तो आपका शरीर तो संलग्न है।

 

आप पच्चीस वर्ष तक अपने को सब तरह की कामवासना से बचा लें, तो भी ऊपर—ऊपर ही बचाव हो रहा है, भीतर तो मन कामवासना में ही चल रहा है। और वह जो भीतर कामवासना बह रही है, चित्त में जो विचार चल रहे हैं, वे कामेंद्रिय को सजग रखेंगे, जीवित रखेंगे।

हालत तो उलटी है। अगर आपको कामवासना का अतिशय उपयोग करने दिया जाए, तो कामवासना मर भी जाए; उपयोग न करने दिया जाए, तो नहीं मरेगी।

मैं एक फ्रेंच चिकित्सक मोरिस मैक्यू के संस्मरणों का एक संकलन पढ़ रहा हूं आफ मेन एंड प्लांट्स। उसने अपने संस्मरणों की एक किताब लिखी है। वह जड़ी—बूटियों के संबंध में बड़े से बड़ा ज्ञाता है। और जड़ी—बूटियों के द्वारा उसने हजारों मरीजों को ठीक किया है। और दुनिया के बड़े—बड़े लोग उसे निमंत्रण देते रहे हैं। चर्चिल, बड़े अभिनेता, बड़े लेखक, बड़े कवि, राजा—महाराजा उससे इलाज करवाते रहे हैं। तो उसने सारे संस्मरण लिखे हैं। उसने प्रिंस अली खां का भी संस्मरण लिखा है, आगा खां के लड़के का।

प्रिंस अली खां ने उसे फोन किया और कहा कि कुछ निजी बीमारी है, कुछ गुप्त बीमारी है, उसके लिए तुम्हें आना पड़े। प्रिंस अली खां का निमंत्रण बड़ी बात है। चिकित्सक भागा हुआ उनके महल पर पहुंचा। सबको विदा करके प्रिंस अली ने अपनी बीमारी बतानी शुरू की। चिकित्सक को भी लग तो रहा था कि बीमारी कामवासना से संबंधित होगी, यौन की होगी, इसलिए इतनी गुप्तता रखी जा रही है। प्रिंस अली खां ने कहा कि मेरी कामवासना बिलकुल खो गई है, सुधा मेरी मर गई है, मुझे इच्छा ही नहीं होती। कुछ करो!

तो चिकित्सक ने पूछा कि आप महीने में कितनी बार संभोग करते हैं? प्रिंस अली खां खिलखिलाकर हंसने लगा, और उसने कहा, महीने में! हर रोज दिन में तीन बार करता हूं। लेकिन इच्छा बिलकुल मर गई है। कोई वासना नहीं पैदा होती। बस, एक यांत्रिक कृत्य की तरह कर रहा हूं।

अब यह कोई बीमारी न हुई। अगर दिन में कोई तीन बार संभोग कर रहा है, तो इच्छा मर ही जाएगी। इच्छा क्या, वह खुद भी मर जाएगा जल्दी।

कामवासना का अगर ज्यादा उपयोग किया जाए, तो मर जाती है। अगर बिलकुल उपयोग न किया जाए, दबाकर रखा जाए, तो सजीव रहती है, जीवित रहती है। लेकिन न तो बहुत उपयोग करने

से उससे छुटकारा होता है……।

क्षुधा मर गई है, लेकिन और भी गहरी वासना है कि न मरे। वासना क्षीण हो गई है, लेकिन भीतर से मन कह रहा है, इसे जिलाए रखो, कुछ उपाय करो।

अक्सर ऐसा हो जाता है कि व्यभिचारियों की कामवासना शिथिल हो जाती है और ब्रह्मचारियों की नहीं शिथिल हो पाती। क्योंकि व्यभिचारी तो अति कर देते हैं, थक जाते हैं।

गुरजिएफ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि काकेशस में पैदा होने वाला एक खास फल उसे बचपन में बहुत प्रिय था। इतना ज्यादा प्रिय था कि उसकी वजह से वह अक्सर बीमार पड़ जाता था। इतना ज्यादा खा लेता था। और वह नुकसानदायक भी था, और बहुत भारी और वजनी था।

उसने लिखा है कि मेरे दादा ने मुझे कहा कि इससे छूटने का एक ही उपाय है : एक दिन तू जितना खा सके आखिरी दम तक, मौत करीब मालूम होने लगे, तब तक तू इसको खाता जा। गुरजिएफ ने कहा, इससे कैसे छुटकारा होगा! बल्कि उसे रस भी आया कि बात तो बड़ी गजब की है। क्योंकि घर में सभी उसे रोकते थे अब तक कि इसे मत खाओ, इसे मत खाओ, यह ठीक नहीं है, इससे नुकसान है।

लेकिन दादा ने जब कहा, तो फिर वह बड़ी मात्रा में फल जाकर बाजार से ले आया। दादा उसके सामने बैठ गए और कहा कि तू खा जितना तुझे खाना है। वह खाता गया। वह थक गया और एक कौर भी भीतर ले जाने का उपाय न रहा। लेकिन दादा ने कहा, अभी भी तू थोड़ा खा सकता है। तू और खा ले।

फिर उसे उल्टियां होनी शुरू हुईं, दस्त लगने शुरू हुए। वह कोई तीन महीने बीमार रहा। लेकिन वह कहता है, उसके बाद उस फल में मेरा कोई रस नहीं रह गया।

कामवासना से मुक्त होने के लिए दमन तो कतई मार्ग नहीं है; लेकिन कामवासना इस भांति हो जाए कि आप उससे पीडित हो उठें, वह दुख बन जाए विषाद .हो जाए तो शायद जागरण आए। लेकिन उतने से भी कुछ न होगा। क्योंकि फल का छूट जाना एक बात है, कामवासना का छूटना बड़ी अलग बात है। फिर थोड़े दिन में वापस लौट आएगी। दबाएं तो बनी रहेगी, भोगें तो थोड़े दिन शिथिल हो जाएंगे, फिर वापस लौट आएगी।

कामवासना से मुक्त होना हो, तो दो बातें मैंने कहीं। एक तो मैं शरीर नहीं हूं यह दृष्टि थिर हो। दूसरा, जीवन की मेरी कामना नहीं।

मृत्यु कामवासना का विरोध है। जन्म कामवासना से होता है, मृत्यु कामवासना का विरोध है। जिन साधना—प्रक्रियाओं ने—जैसे बुद्ध की साधना—प्रक्रिया ने—कामवासना पर अनूठे प्रयोग किए हैं, तो मृत्यु को उन्होंने साधना का आधार बनाया।

बुद्ध जब किसी व्यक्ति को ब्रह्मचर्य में दीक्षा देते थे, तो उससे कहते थे, तीन महीने पहले मरघट पर तू मृत्यु का ध्यान कर। एकदम से तो सुनकर हमें हैरानी होगी कि ब्रह्मचर्य से और मरघट और मृत्यु का क्या लेना—देना?

लेकिन बुद्ध कहते कि तीन महीने तू मरघट पर सुबह से सांझ, रात, जब भी मुरदे जलते हों, बैठा रह। तेरा वही ध्यान—स्थल है। लाशें आएंगी—बच्चे आएंगे, जवान—बूढ़े, सुंदर—कुरूप, स्वस्थ— अस्वस्थ—सब तरह के लोग आएंगे। बस, तू उनको देखता रह। उनकी जलती चिताएं, उनकी टूटती हड्डियां, उनके गिरते सिर, उनका शरीर हो गया राख, सब खो गया धुएं में, उसे तू देखता रह। तीन महीने जलती हुई चिताओं पर ध्यान कर।

और मुझे लगता है, यह बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रयोग है। क्योंकि मृत्यु अगर बहुत साफ हो जाए तो कामवासना तत्‍क्षण खो जाएगी। इसे आप ऐसा समझें कि एक सुंदरतम स्त्री खड़ी हो और आप वासना से भरे खड़े हों, उसी वक्त एक तार आए कि राज्य ने तय किया है कि आज सांझ आपको फासी लगा देंगे। सुंदर स्त्री तत्‍क्षण आंखों से खो जाएगी। शरीर से वासना का प्रवाह बंद हो जाएगा। फिर कोई कितना ही समझाए, आपका रस अब वासना में नहीं रह जाएगा। सांझ मौत आ रही है!

तो जिस साधक को कामवासना से मुक्त होना हो 1 उसे समझना चाहिए कि यह क्षण आखिरी है, मौत दूसरे क्षण हो सकती है। और सच भी यही है, मौत दूसरे क्षण हो सकती है। जो क्षण मैं जी रहा हूं यह आखिरी है, मौत आने वाली है, इस शरीर से मैं टूट जाने वाला हूं।

जितनी मौत की धारणा गहरी हो जाए और जितना यह शरीर मैं नहीं हूं यह प्रतीति स्पष्ट हो जाए, उतने ही आप कामवासना से मुक्त होंगे। यह मुक्ति न तो दमन से फलित होती है, न भोग से। यह मुक्ति समझ से, अंडरस्टैंडिंग से फलित होती है।

पर यह स्मरण रखें कि कामवासना साधारण इंद्रिय नहीं है। यह कहना उचित होगा कि सभी इंद्रियों का केंद्र कामेंद्रिय है। आंखें भी इसीलिए देखती हैं कि कामवासना आंखों के द्वारा रूप को खोज रही है। कान इसीलिए सुनते हैं कि कामवासना कानों के द्वारा ध्वनि को खोज रही है। संगीत में इतना रस आता है, क्योंकि संगीत कानों के द्वारा कामवासना की तृप्ति है। सौंदर्य को देखकर—सुंदर चित्र, सुबह का उगता सूरज, पक्षियों का आकाश में उड़ना, वृक्षों पर खिले फूल, एक सुंदर चेहरा, सुंदर आंखें, सुंदर रंग आनंदित करते मालूम पड़ते हैं, क्योंकि आंखों के द्वारा यह जगत के साथ संभोग है। आंख रूप को खोज रही है।

इसलिए कुरूप व्यक्ति दिख जाए, तो आपकी वासना सिकुड़ती है। कुरूप व्यक्ति सामने आ जाए, तो आप आंख फेरकर चल पड़ते हैं। सुंदर व्यक्ति सामने आ जाए, तो आप अपना होश खो देते हैं।

तो आप यह मत सोचना कि जननेंद्रिय से ही कामवासना प्रकट होती है; सभी इंद्रियों से प्रकट होती है। हाथ से जब आप कुछ छूना चाहते हैं, तो हाथ के माध्यम से कामवासना स्पर्श खोज रही है। यह पूरा शरीर कामेंद्रिय है। इसका रोआं—रोआं कामवासना से भरा है।

इसलिए जब तक शरीर से तादात्म न छूट जाए तब तक कामवासना से छुटकारा नहीं है। और कुछ भी आप करते रहें, तो उससे सिर्फ समय व्यय होगा, शक्ति व्यय होगी और चित्त आत्मग्लानि से भरेगा। क्योंकि आप बार—बार तय करेंगे छोड़ने का, और छूटेगा नहीं। और जब बार—बार आप असफल होंगे, छोड़ न पाएंगे वासना को, तो धीरे—धीरे आपको आत्मग्लानि आएगी, आत्म—अविश्वास आएगा, और ऐसा लगेगा कि मैं किसी भी योग्य नहीं हूं। मैं बिलकुल पात्र नहीं हूं। मैं पापी हूं अपराधी हूं।

और किसी भी व्यक्ति को, मैं पापी हूं अपराधी हूं ऐसी धारणा गहरी हो जाए तो उसके जीवन में साधना—पथ अति कठिन हो जाता है। तो इस तरह के छोटे—मोटे प्रयोग करने में मत पड़ जाना। कामवासना से छूटा जा सकता है। लेकिन कामवासना जीवन—वासना का पर्यायवाची है। जब आप जीवन की वासना से छूटेंगे……।

इसलिए बुद्ध ने जगह—जगह कहा है, जीवेषणा जब तक है, तब तक मुक्ति नहीं है। जब तक तुम चाहते हो, मैं जीऊं!

बुद्ध के पास लोग पहुंचते हैं। वे कहते हैं कि मान लिया कि सब इच्छाएं छोड़ देंगे, शरीर छूट जाएगा, तो फिर हम मोक्ष में बचेंगे या नहीं? मैं रहूंगा न? आत्मा तो बचेगी, शरीर छूट जाएगा।

और बुद्ध कहते हैं कि यह फिर वही की वही बात है। तुम मिटना नहीं चाहते, तुम बचना ही चाहते हो। शरीर मिट जाए, तो भी तुम राजी हो। क्योंकि तुम देखते हो, शरीर तो मिटेगा, उसे बचाने का कोई उपाय नहीं है। तो फिर आत्मा ही बच जाए।

इसलिए बुद्ध ने एक अनूठी बात कही कि कोई आत्मा नहीं है। इसका यह अर्थ नहीं कि आत्मा नहीं है। यह बात सिर्फ इसलिए कही कि वे जो आत्मा के नाम से अपने को बचाना चाहते हैं, वे उस बचाने की बात को भी छोड़ दें।

जीवेषणा वासना है। मैं जीऊं, यही हमारा पागलपन है। और मजा यह है कि जीकर हम कुछ पाते भी नहीं, लेकिन फिर भी जीना चाहते हैं। जीकर कुछ हाथ में भी नहीं आता, फिर भी कैसी ही कठिनाई हो, तो भी जीना चाहते हैं। जीवन को छोड़ने को हम राजी नहीं होते।

इस सूत्र को याद रख लें, जो जीवन को छोड़ने को स्वेच्छा से राजी है, महाजीवन उसका हो जाता है। और जो जीवन को दरिद्र की तरह पकड़ता है, भिखारी की तरह, उसके हाथ में कुछ भी आता नहीं। सिर्फ जंजीरें ही उसके हाथ में आती हैं।

 

तीसरा प्रश्न :

 

आपने कहा कि सृजनात्मकता दैवी स्वभाव है और विध्वंस व विनाश आसुरी हैं। लेकिन अस्तित्व में तो दोनों प्रक्रियाएं साथ—साथ चलती हैं। और सिर्फ युद्ध में ही विध्वंस होता हो, ऐसा नहीं है। दैवी विपदाएं कम विध्वंस नहीं करती हैं।

 

दैवी संपदा सृजनात्मक है, इसका यह अर्थ नहीं कि जो सृजन करता है वह मिटाता नहीं। बनाना हो, तो मिटाना पड़ता है। अगर मूर्ति बनानी हो, तो पत्थर को मिटाना पड़ता है। अगर वृक्ष निर्मित करना हो, तो बीज को मिटाना पड़ता है। अगर परमात्मा को खोजना हो, तो अपने को मिटाना पड़ता है। सृजनात्मकता भी बिना मिटाए तो नहीं होती। कुछ मिटता है, तो कुछ बनता है। मिटना बनने का ही प्रयोग है।

फिर फर्क क्या हुआ? क्योंकि दैवी संपदा भी मिटाती है, आसुरी संपदा भी मिटाती है। दोनों में फर्क क्या है?

फर्क लक्ष्य का है। दैवी संपदा सदा ही बनाने को मिटाती है। आसुरी संपदा सदा ही मिटाने को मिटाती है। आसुरी संपदा बनाती भी है, तो सिर्फ मिटाने को।

फर्क यह है, आसुरी संपदा अगर बनाती भी दिखाई पड़ती हो, तो भी समझना कि वह मिटाने को ही बना रही है। वह बनाना वैसे ही है, जैसे आप घर में एक बकरा पाल लें। और उसे खूब खिलाएं, उसकी सेवा करें, क्योंकि उसको बलि के दिन काटना है। उसकी सेवा भी चले, धुलाई भी चले, भोजन भी चले। ऐसे बकरे की कोई इतनी पूजा नहीं करता, जैसी आप करें। लेकिन बलि के दिन उसको काटकर फिर भोजन कर लेना है, वह तैयारी चल रही है। आप बना रहे हैं मिटाने के लिए।

लक्ष्य मिटाना होगा, आसुरी संपदा में। लेकिन जिसको मिटाना है, उसे भी बनाना पड़ता है। क्योंकि बिना बनाए मिटाइएगा कैसे? दैवी संपदा में लक्ष्य होगा बनाना। अगर मिटाना भी पड़ता है, तो यही नजर होती है कि बनाएंगे। अगर नया मकान बनाना हो, तो पुराना मकान गिरा देना पड़ता है। पुराने मकान से जमीन साफ हो जाए तो नया बन सके।

सभी सृजन में विध्वंस छिपा है; सभी विध्वंस में सृजन छिपा है। लक्ष्य का फर्क है। दैवी संपदा हमेशा सोचती है, निर्मित करने को। अगर मिटाना भी पड़ता है, तो सिर्फ इसीलिए ताकि कुछ और श्रेष्ठतर बन सके। आसुरी संपदा सदा सोचती है मिटाने को। अगर बनाना भी पड़ता है, तो सिर्फ इसीलिए कि बनाएंगे, ताकि मिटा सकें।

उस लक्ष्य को खयाल में रखें, तो बात आसान हो जाएगी और ठीक से समझ में आ जाएगी। रस कहां है आपका? तोड्ने में रस है कि निर्माण करने में रस है?

वही रस ध्यान में रहे, तो फिर आप कितना ही तोड़े, हर्ज नहीं। लेकिन हर तोड़ना एक कदम हो बनाने के लिए। फिर आपके विध्वंस में भी सृजन आ गया; फिर आपके युद्ध में भी शाति आ गई; फिर आप कुछ भी करें, अगर यह लक्ष्य सदा ध्यान में बना रहे, तो आप जो भी करेंगे, वह शुभ होगा।

जगत द्वंद्व है। वहां विध्वंस भी है, निर्माण भी है। उन दोनों में किसको आप ऊपर रखते हैं, उससे आपकी संपदा निर्णीत होगी।

 

चौथा प्रश्न :

 

आपने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में साध्य है, परम मूल्य है। दैवी संपदा का यह सिद्धात अपने प्रति तो आसानी से लागू किया जा सकता है, लेकिन दूसरों के प्रति उसे लागू करना बहुत कठिन है। ऐसा क्यों है?

 

साफ ही है। अपने प्रति लागू करना आसान है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति सोचता है, मैं साध्य हूं और सभी मेरे साधन हैं। लक्ष्य मैं हूं, यह पूरा जगत मेरे लिए है। आकाश मेरे लिए चांद—तारे मेरे लिए वृक्ष—पौधे, पशु—पक्षी मेरे लिए। मैं केंद्र हूं।

यह तो कोई भी सोचता है। इसमें दैवी संपदा का सवाल ही नहीं है। यही तो आसुरी संपदा का केंद्र है कि मैं जगत का केंद्र हूं सब कुछ मेरे लिए घूम रहा है। मेरे लिए सब भी मिट जाए तो भी कुछ हर्ज नहीं है। मैं बचूं। सब कुछ मेरा साधन है, यही तो आसुरी संपदा का केंद्र है।

दैवी संपदा का केंद्र यह है कि दूसरा लक्ष्य है, दूसरा साध्य है, उसका मैं साधन की तरह उपयोग न करूं। वह परम मूल्य है। उसकी सेवा तो मैं कर सकता हूं लेकिन शोषण नहीं। अगर जरूरत पड़े मिटने की, तो उसके लिए मैं तो मिट सकता हूं लेकिन उसको नहीं मिटाऊंगा।

कभी—कभी जीवन के कुछ क्षणों में ऐसा आपको लगता है किसी व्यक्ति के संबंध में, उसको हम प्रेम कहते हैं। जब आपको ऐसा सारे जगत के संबंध में लगने लगे, तो उसको हम प्रार्थना कहेंगे। कभी एक व्यक्ति के संबंध में ऐसा लगता है कि चाहे मैं मिट जाऊं, लेकिन यह व्यक्ति बचे; तो वह साध्य हो गया। मां मर सकती है बच्चे के लिए या पत्नी मर सकती है पति के लिए या पति अपने को खो सकता है पत्नी के लिए। कभी एक व्यक्ति के साथ आपको क्षणभर को भी ऐसा लग जाता हो कि मैं ना—कुछ, वह सब कुछ; मैं परिधि, वह केंद्र; तो प्रेम घटा।

इसलिए प्रेम एक आध्यात्मिक घटना है। छोटी—सी घटना है, पर बड़ी मूल्यवान। चिनगारी है, सूरज नहीं; लेकिन अग्नि वही है, जो सूरज में होती है। और यह चिनगारी अगर फैलने लगे, तो किसी दिन सूर्य भी बन सकती है। जिस दिन ऐसा सारे जगत के प्रति लगने लगे, उस दिन समझना कि प्रार्थना है।

महावीर जमीन पर पांव फूंककर रखते हैं। चींटी भी न मर जाए क्योंकि उसका भी परम मूल्य है। चींटी भी साध्य है, वह हमारा साधन नहीं है कि हम उससे इस तरह व्यवहार कर सकें।

कणाद वृक्षों से फल तोड़कर नहीं खाते। जो कण खेत में अपने आप गिर जाते हैं सूखकर, पककर, उनको बीन लेते हैं। इसीलिए उनका नाम कणाद है; कण—कण बीनकर जीते हैं। कच्चे फल को भी तोड़ते नहीं, क्योंकि वृक्ष हमारा साधन नहीं है। वृक्ष का अपना जीवन है। वृक्ष अपने आप में मूल्यवान है। हम उसका शोषण नहीं कर सकते। अहिंसा की धारणा इसी बात से निर्मित है। जीवन में जो भी परम है, श्रेयस्कर है, वह सब इसी विचार से निकलता हैं।

लेकिन पहली बात तो बिलकुल आसान है। हम सभी को लगता है कि मैं ही केंद्र हूं; मेरा हित, मेरा स्वार्थ, मेरा अहंकार! शेष सब…….।

मैंने सुना है, यूनान में एक सम्राट ने उन दिनों यूनान के एक महा मनीषी सोलन को अपने राजमहल बुलाया। सोलन एक सुकरात जैसा मनीषी था। सम्राट ने बुलाया सिर्फ इसलिए कि सोलन की बड़ी ख्याति थी। उसके एक—एक शब्द का मूल्य अकूत था। तो कुछ उससे ज्ञान लेने नहीं बुलाया था। कुछ उससे सीखने नहीं बुलाया था। सिर्फ सोलन को बुलाया था कि देख मेरे महल को! मेरे साम्राज्य को! मेरी धन—संपदा को! और सम्राट चाहता था कि सोलन प्रशंसा करे कि आप जैसा सुखी और कोई भी नहीं है, तो इस वचन का मूल्य होगा। सारा यूनान, यूनान के बाहर भी लोग समझेंगे कि सोलन ने कहा है।

सोलन आया, महल घुमाकर दिखाया गया। अकूत संपदा थी सम्राट के पास, न मालूम कितना उसने लूटा था। बहुमूल्य पत्थरों के ढेर थे, स्वर्ण के खजाने थे, महल ऐसा सजा था, जैसे दुल्हन हो। फिर सम्राट उसे दिखा—दिखाकर प्रतीक्षा करने लगा कि वह कुछ कहे। लेकिन सोलन चुप ही रहा। न केवल चुप रहा, बल्कि गंभीर होता गया। न केवल गंभीर हुआ, बल्कि ऐसे उदास हो गया, जैसे सम्राट मरने को पड़ा हो और वह सम्राट को देखने आया हो। आखिर सम्राट ने कहा कि तुम्हारी समझ में आ रहा है कि नहीं? मैंने तो सुना है कि तुम बड़े बुद्धिमान हो! मुझ जैसा सुखी तुमने कहीं कोई और मनुष्य देखा है? मैं परम सुख को उपलब्ध हुआ हूं। सोलन, कुछ बोलो इस पर!

सोलन ने कहा कि मैं चुप ही रहूं वही अच्छा है, क्योंकि क्षणभंगुर को मैं सुख नहीं कह सकता। और जो शाश्वत नहीं है, उसमें सुख हो भी नहीं सकता। सम्राट, यह सब दुख है। बड़ा चमकदार है, लेकिन दुख है। तुम इसे सुख समझे हो, तो तुम मूढ़ हो।

सम्राट को धक्का लगा। जो होना था, वह हुआ। सोलन चुप ही रहता, तो अच्छा था। सोलन को उसी वक्त गोली मार दी गई। सामने महल के एक खंभे से लटकाकर, बंधवाकर सम्राट ने कहा, अभी भी माफी मांग लो। तुम गलती पर हो। अभी भी कह दो कि सम्राट, तुम सुखी हो।

सोलन ने कहा, झूठ मैं न कह सकूंगा। मृत्यु में कुछ हर्जा नहीं है, क्योंकि मरना मुझे होगा ही; किस निमित्त मरता हूं यह गौण है। तुमने मारा, कि बीमारी ने मारा, कि अपने आप मरा, यह सब गौण है। मौत निश्चित है। झूठ मैं न कहूंगा। शाश्वत सुख ही सुख है। क्षणभंगुर सुख दिखाई पड़ता है, लेकिन दुख है। सम्राट! तुम भूल में हो।

गोली मार दी गई।

फिर दस वर्षों बाद, यह सम्राट पराजित हुआ। विजेता ने इसे अपने महल के सामने एक खंभे पर बांधा। जब वह खंभे पर लटका था और गोली मारे जाने को थी, तब उसे अचानक सोलन की याद आई। ठीक दस वर्ष पहले ऐसा ही सोलन खंभे पर लटका था! तब उसे उसके शब्द भी सुनाई पड़े, कि जो शाश्वत नहीं, वह सुख नहीं। जो क्षणभंगुर है, उसका कोई मूल्य नहीं। यह चमकदार दुख है सम्राट! उसी चमकदार दुख को सुख मानकर यह सम्राट इस खंभे पर लटक गया।

सम्राट की आंखें बंद हो गईं। वह अपने को भूल ही गया, सोलन को देखने लगा। और जब उसे गोली मारी जा रही थी, तब उसके होंठों पर मुस्कुराहट थी। और आखिरी शब्द जो उसके मुंह से निकले, वे यह थे : सोलन, सोलन, मुझे क्षमा कर दो। तुम ही सही थे।

विजेता सम्राट सुनकर चकित हुआ; कौन सोलन? किसके वचन सही? और इस मरते सम्राट के होंठों पर मुस्कुराहट कैसी? उसने सारी खोज—बीन करवाई, तब यह पूरी कथा पता चली।

वह जो हमें सुख जैसा मालूम होता है, वह सुख नहीं है। और वह जो हमें सुख जैसा मालूम होता है, उसके लिए हम सबको दुख देते हैं, सब का साधन की तरह उपयोग करते हैं, सब को चूसते हैं, शोषण करते हैं।

हमारा जीवन हमें इतना मूल्यवान होता है मालूम कि अगर सबकी मृत्यु भी उसके लिए घट जाए तो भी कोई हर्ज नहीं। अगर हमें दूसरों के सिरों पर पैर रखकर, सीढ़ियां बनाकर राजमहल तक पहुंचने का उपाय हो, तो हम लोगों के सिरों का उपयोग सीढ़ियों की तरह करेंगे। सभी महत्वाकांक्षी करते हैं। लोग उनके लिए सीढियों से ज्यादा नहीं हैं। धन की यात्रा करता हो कोई, पद की यात्रा करता हो, लोगों का उपयोग करता है सीढ़ियों की तरह। सभी राजनीतिज्ञ जानते हैं।

राजनीतिज्ञों के सबसे बड़े दार्शनिक मेक्यावेली ने लिखा है कि तुम जिस आदमी का सीढ़ी की तरह उपयोग करो, उपयोग करने के बाद उसे जिंदा मत छोड़ना। उसको काट—पीट डालना। क्योंकि तुम उसका सीढ़ी की तरह उपयोग कर सके हो, दूसरे भी उसका सीढ़ी की तरह उपयोग कर सकते हैं।

इसलिए सभी राजनीतिज्ञ यही करते हैं। जिनके कंधे पर पैर रखकर राजनीतिज्ञ पहुंचता है राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के पद पर, पहुंचते ही उस आदमी को गिराने में लगता है। क्योंकि वह आदमी खतरनाक है, उसके कंधे पर दूसरा भी कल कोई आ सकता है। इसके पहले कि दूसरा उसके कंधे पर सवार हो, उसका विनाश कर देना जरूरी है। या उसे उस जगह पहुंचा देना जरूरी है, जहां वह सीढ़ी का काम न दे सके।

इसलिए सब राजनीतिज्ञ, जिन सीढ़ियों से चढ़ते हैं, उनको जला देते हैं। जिन रास्तों से गुजरते हैं, उनको तोड़ देते हैं। जिन सेतुओं को पार करते हैं, उनको गिरा देते हैं, ताकि दूसरा पीछे से उन पर न आ सके। धन की यात्रा करने वाला भी वही करेगा।

महत्वाकांक्षी अपने को साध्य मानता है, दूसरे को साधन। महत्वाकांक्षी कभी भी धार्मिक नहीं हो सकता। एंबीशन, महत्वाकांक्षा इस जगत में सबसे अधार्मिक घटना है।

धर्म का सूत्र तो कृष्ण कह रहे हैं; वह यह है कि दूसरा साधन नहीं है, साध्य है। दैवी संपदा का व्यक्ति दूसरे को साध्य मानता है। कभी जरूरत पड़े, तो वह सीढ़ी बन सकता है, लेकिन दूसरे को सीढ़ी नहीं बनाएगा। अपने सुख के लिए दूसरे के दुख का सवाल नहीं है। अगर अपना सुख दूसरे के सुख से ही मिल सकता हो, तो ही दैवी संपदा का व्यक्ति उस सुख को स्वीकार करेगा।

और यह समझ लेने जैसा है कि अगर आपके सुख से दूसरा भी सुखी होता हो, तो वह सुख आनंद है। यह आनंद का फर्क है। जिस आपके सुख से दूसरा दुखी होता हो, वह आनंद नहीं है। और वह सिर्फ दिखाई पड़ता है सुख है, वह सुख भी नहीं है। और एक दिन आप अनुभव करेंगे, तब आपके भीतर से भी आवाज आएगी कि सोलन, सोलन, तू ठीक था। मुझे क्षमा करना। मैं गलती पर हूं। मेरा सुख अगर आस—पास सभी का सुख बनता हो, तो ही आनंद है। उसे फिर कोई भी छीन न सकेगा।

दैवी और आसुरी संपदा, दूसरों का हम उपयोग करते हैं, कैसा उपयोग करते हैं, इससे विभाजित होती है। दैवी संपदा का व्यक्ति दूसरे का उपयोग ही नहीं करता, दूसरे के उपयोग आ सकता है।

इसलिए जीसस या उन जैसे महाप्रज्ञावान पुरुषों ने सेवा को, दूसरे की सेवा को धर्म की आधारशिला बनाया। उसमें मूल्य है। उस बात का इतना ही मूल्य है कि दूसरे के लिए जरूरत पड़े, तो तुम मिट जाना, लेकिन किसी को भी अपने लिए मत मिटाना। पूछा है, यह कैसे संभव होगा कि हम दूसरे को साध्य समझ लें? समझने का सवाल नहीं है, यह तथ्य है। यह वास्तविक स्थिति है कि आप केंद्र नहीं हैं इस जगत के। आप एक छोटी—सी लहर हैं। इस विराट अस्तित्व में आप एक छोटा—सा कण हैं। यह विराट अस्तित्व आपके लिए नहीं है, आप इस विराट अस्तित्व के लिए हैं। जैसे ही यह खयाल में आ जाएगा…..।

और इसे खयाल में लाने के लिए कुछ सोचने की जरूरत नहीं है, सिर्फ आंख खोलने की जरूरत है, और यह दिखाई पड़ जाएगा।

आप कल नहीं थे, आज हैं, कल नहीं हो जाएंगे। यह अस्तित्व आपके पहले भी था, अब भी है, आपके बाद भी होगा। आप इस अस्तित्व में से उठते हैं, इसी अस्तित्व में डूब जाते हैं। यह अस्तित्व आपसे बड़ा है, विराट है। आप एक छोटे—से अंश हैं। अंश केंद्र नहीं हो सकता, अंशी ही केंद्र होगा। अंश सब को मिटाकर अपने को बचाने की बात सोचे, तो पागलपन है। यह होने वाला नहीं है।

वह खुद ही मिटेगा। लेकिन यह अंश अगर अपने को मिटाकर सारे को बचाने की सोचे, तो कभी भी नहीं मिटेगा। क्योंकि समग्र उसे स्वीकार कर लेगा। समग्र के साथ आत्मसात और एक हो जाएगा।

जिनको हमने भगवत्ता को उपलब्ध व्यक्ति कहा है—कृष्ण को, बुद्ध को, महावीर कों—उनको भगवत्ता को उपलब्ध व्यक्ति इसीलिए कहा है कि उन्होंने अपने अंश को अंशी में छोड दिया। अब वे लड़ नहीं रहे; अब उनका कोई विरोध इस जगत से नहीं है। इस अस्तित्व से उनका रत्तीमात्र फासला नहीं है। उन्होंने अपने को पूरा इसमें समर्पित कर दिया, लीन कर दिया।

जो व्यक्ति स्वयं को साध्य मानता है, वह लीन कैसे करे? समर्पण कैसे करे? जो अपने को निमित्त और साधन मान लेता है, वह तत्क्षण लीन हो जाता है।

कृष्ण की पूरी शिक्षा अर्जुन को यही है कि तू निमित्त बन जा। यह खयाल ही छोड़ दे कि तू है। तू यही समझ कि परमात्मा है और तू केवल उसका एक मार्ग है, कि जैसे परमात्मा की बांसुरी है दूर परमात्मा बोल रहा है, उसकी वाणी है और तू सिर्फ बांस की पोली नली है। तू सिर्फ मार्ग दे, स्वरों को बहने दे, अवरोध मत कर। इसे हम कैसे उपलब्ध करें?

कैसे उपलब्ध करने का सवाल नहीं है। यह स्थिति है। थोड़ा—सा सजग और आंख खोलकर देखने की जरूरत है। ऐसा है। जैसे आपकी दो आंखें हैं, दो हाथ हैं; आप आंख बंद किए बैठे हैं और कहते हैं, मैं कैसे मानूं कि मेरे दो हाथ हैं! तो मैं यह कहूं आंख खोलें और देखें, दो हाथ हैं। इसको मानने की जरूरत नहीं है, सिर्फ आंख खोलने की जरूरत है।

जब भी आप थोड़ा—सा देखेंगे चारों तरफ, तो यह आपको समझने में कठिनाई नहीं होगी कि आप केंद्र नहीं हो सकते। विक्षिप्तता है यह मानना कि मैं केंद्र हूं।

अब हम सूत्र को लें।

 

वे अपने आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमंडी पुरुष धन और मान के मद से युक्त हुए, शास्त्र—विधि से रहित केवल नाममात्र यज्ञों द्वारा पाखंड से यजन करते हैं।

तथा वे अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोधादि के पारायण हुए एवं दूसरों की निंदा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अंतर्यामी से द्वेष करने वाले हैं।

ऐसे उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बारंबार आसुरी योनियों में ही गिराता हूं। इसलिए हे अर्जुन, वे मूढ़ पुरुष जन्म—जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त हुए, मेरे को न प्राप्त होकर, उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं। आसुरी संपदा के जो व्यक्ति हैं, वे अपने आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले हैं। उनके लिए श्रेष्ठता का एक ही अर्थ है कि जो भी मैं हूं, वही श्रेष्ठता है। अपना होना उनकी श्रेष्ठता की परिभाषा है। श्रेष्ठता और अहंकार में उन्हें कोई भेद नहीं है।

नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा है..। उसने कुछ कानून बनाए फिर उनको बदल दिया, फिर बदल दिया। तो उसके राजमत्रियों ने कहा कि आप यह क्या कर रहे हैं! कानून थिर होना चाहिए। और इस तरह तो अराजकता हो जाएगी। तो नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा, आइ एम दि लॉ—और कोई कानून नहीं है, मैं कानून हूं। जो मुझसे निकलता है, वह कानून है। कोई कानून मेरे ऊपर नहीं है, मैं ही कानून हूं।

यही आसुरी संपदा वाले का प्राथमिक लक्षण है, मैं श्रेष्ठ हूं। और धन और मान के मद से युक्त हुए..।

ऐसे व्यक्ति अगर धर्म भी करते हैं, तो उनका धर्म भी धन और मद का ही मान होता है। वे बड़ा मंदिर खड़ा कर सकते हैं, जो आकाश को छुए। वे यज्ञ करवा सकते हैं, करोड़ों रुपए उसमें खर्च कर सकते हैं। लेकिन यह भी उनके अहंकार की ही यात्रा है। उनके मंदिर का अर्थ है, उनसे बड़ा मंदिर और कोई खड़ा नहीं कर सकता। उनके यश का अर्थ है कि ऐसा यज्ञ पृथ्वी पर कभी हुआ नहीं। उनका धर्म भी उनकी श्रेष्ठता को ही सिद्धश्करे, इतना ही उनके धर्म का प्रयोजन है।

शास्त्र—विधि से रहित केवल नाममात्र यज्ञों द्वारा पाखंड से यजन करते हैं…….।

वे अगर शुभ भी करेंगे, तो सिर्फ इसलिए ताकि वे पूजे जाएं। वे अगर कुछ भला भी करेंगे, दान भी देंगे, तो सिर्फ इसलिए ताकि वे जाने जाएं। उनके प्रत्येक कृत्य का लक्ष्य वे स्वयं हैं।

तथा वे अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोधादि के परायण हुए एवं दूसरों की निंदा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अंतर्यामी से द्वेष करने वाले हैं।

परमात्मा कहीं भी हो, उससे उन्हें द्वेष होगा। क्यों? क्योंकि परमात्मा की स्वीकृति, अपने अहंकार का खंडन है।

नीत्से ने अपने एक वचन में लिखा है—जब वह पागल हो गया, तब उसने अपनी डायरी में लिखा है—कि मैं परमात्मा को स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि अगर परमात्मा है, तो फिर मैं नंबर दो हूं इसलिए मैं परमात्मा को स्वीकार नहीं कर सकता। नंबर एक तो मैं ही हो सकता हूं और या यह हो सकता है कि नंबर एक कोई भी नहीं है। लेकिन परमात्मा कहीं भी है, तो फिर मैं पीछे पड़ता हूं। फिर मेरी स्थिति नीची हो जाती है।

इसलिए परमात्मा को स्वीकार करना आसुरी वृत्ति वाले व्यक्ति को अति कठिन है। इसलिए नहीं कि उसको पता है कि परमात्मा नहीं है। इसलिए भी नहीं कि तर्कों से सिद्ध होता है कि परमात्मा नहीं है। वह तर्क भी देगा, वह सिद्ध भी करेगा। लेकिन न तो तर्कों से सिद्ध होता है कि परमात्मा है और न सिद्ध होता है कि परमात्मा नहीं है। इसे थोड़ा समझ लें।

मनुष्य की बुद्धि न तो पक्ष में कुछ तय कर सकती है, न विपक्ष में। अब तक हजारों—हजारों तर्क दिए गए हैं। जितने पक्ष में हैं, उतने ही विपक्ष में। बराबर संतुलन है। कोई आस्तिक किसी नास्तिक को राजी नहीं कर सकता कि ईश्वर है, और कोई नास्तिक किसी आस्तिक को राजी नहीं करवा सकता कि ईश्वर नहीं है। दोनों बातें समतुल हैं। तर्कों से कुछ सिद्ध नहीं हुआ है।

. लेकिन फिर भी कुछ लोग मानते हैं कि ईश्वर है। कुछ लोग मानते हैं, नहीं है। तो किस आधार पर मानते होंगे, क्योंकि तर्क से कुछ भी सिद्ध नहीं होता। तब आधार दूसरे हैं; तब आधार का कारण आसुरी संपदा और दैवी संपदा है।

वे जो समझते हैं कि मैं ही श्रेष्ठ हूं, मुझसे ऊपर कोई भी नहीं, वे परमात्मा को नहीं मान सकते। फिर वे तर्क खोज लेते हैं। लेकिन वे तर्क पीछे आते हैं, वे तर्क रेशनलाइजेशस हैं। वह अपनी ही मानी हुई बात को सिद्ध करने का उपाय है।

और दूसरे वे लोग हैं, जो जानते हैं कि मैं कैसे केंद्र हो सकता हूं! मैं केवल एक लहर हूं। वे परमात्मा को स्वीकार कर लेते हैं। उनकी स्वीकृति भी तर्क से नहीं आती, उनकी दैवी संपदा से आती है।

और इन दोनों के बीच में अधिक लोग हैं, जिन्होंने कुछ तय ही नहीं किया। जिनको हम अधिकतर आस्तिक कहते हैं, वे बीच के लोग हैं; आस्तिक नहीं हैं। उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि परमात्मा है या नहीं। आप में से अधिक लोग उस तीसरे हिस्से में ही हैं।

अगर आप कहते हैं कि होगा, तो उसका मतलब यह नहीं कि आप मानते हैं कि ईश्वर है। आप मानते हैं, सोचने योग्य भी नहीं है। लोग कहते हैं; होगा। और क्या हर्जा है, हो तो हो। और कभी वर्ष में एकाध बार अगर मंदिर भी हो आए तो क्या बनता—बिगड़ता है! और होशियार आदमी दोनों तरफ कदम रखकर चलता है। अगर हो ही, तो मरने के बाद कोई झंझट भी नहीं होगी। न हो, तो हमने कुछ उसके लिए खोया नहीं। हमने संसार अच्छी तरह भोगा। और मानते रहे कि परमात्मा है। हम दोनों नाव पर सवार हैं।

बहुत थोड़े—से लोग हैं, जो मानते हैं कि परमात्मा है। वे वे ही लोग हैं, जो अपने अहंकार को तोड़ते हैं, घमंड को छोड़ते हैं, गर्व को गिराते हैं। बहुत लोग हैं, जो मानते हैं परमात्मा नहीं है। उनका कुल कारण इतना है कि वे खुद अपने को साध्य समझे हैं। इसलिए अपने से परम को स्वीकार करना उनके लिए आसान नहीं है। और अधिक लोग हैं, जिनको कोई चिंता ही नहीं है, जिनको कोई प्रयोजन नहीं है, जो उपेक्षा से भरे हैं।

इसमें आप कहा हैं? और आप जहां भी होंगे, मजे की बात यह है कि वहीं के लिए आप तर्क खोज लेंगे।

फ्रायड ने एक बहुत बड़ी खोज इस सदी में की। और उसने यह खोज की कि लोग तय पहले कर लेते हैं, तर्क बाद में खोजते हैं। आप एक स्त्री के प्रेम में पड़ जाते हैं। कोई आपसे पूछे कि आप प्रेम में क्यों पड़े हैं इसके? तो आप कहते हैं, वह इतनी सुंदर है। लेकिन फ्रायड कहता है, मामला बिलकुल उलटा है। वह स्त्री दूसरों को सुंदर नहीं दिखाई पड़ती। आप कहते हैं, सुंदर है, इसलिए प्रेम में पड़े। फ्रायड कहता है, आप प्रेम में पड़ गए, इसलिए सुंदर दिखाई पड़ती है।

यह बात ज्यादा सही मालूम होती है, क्योंकि और किसी को सुंदर नहीं दिखाई पड़ती। और दूसरों को शायद कुरूप दिखाई पड़ती हो। शायद दूसरे चकित होते हों कि आपका दिमाग खराब हो गया है कि आप इस स्त्री के चक्कर में पड़े हैं! और आप अपने मन में सोचते हैं कि दुनिया भी कैसी मूढ़ है; अज्ञानीजन हैं। इनको इस स्त्री का असली रूप दिखाई ही नहीं पड़ रहा है।

प्रेम में हम पहले पड़ते हैं, फिर तर्क हम बाद में इकट्ठा करते हैं।

किसी व्यक्ति को आप देखते ही घृणा करने लगते हैं, फिर आप तर्क खोजते हैं, फिर आप कारण खोजते हैं। क्योंकि बिना कारण हमें अड़चन होती है। अगर कोई हमसे पूछे कि क्यों घृणा करते हो, और हम कहें कि बिना कारण करते हैं, तो हम मूढ़ मालूम पड़ेंगे। तो हम कारण खोजते हैं कि यह आदमी मुसलमान है; मुसलमान बुरे होते हैं। यह आदमी हिंदू है; हिंदू भले नहीं होते। कि यह आदमी मांसाहारी है, कि इस आदमी का चरित्र खराब है। आप फिर हजार कारण खोजते हैं। वे कारण आपने पीछे से खोजे हैं। भाव आपका पहले निर्मित हो गया। और भाव अचेतन है और कारण चेतन है।

फ्रायड की खोज बड़ी बहुमूल्य है कि प्रत्येक व्यक्ति अंधे की तरह जीता है और सिद्ध करने को कि मैं अंधा नहीं हूं कारणों की तजवीज करता है। उनको उसने रेशनलाइजेशस कहा है। फिर उनको वह बुद्धि—युक्त ठहराता है।

ईश्वर के साथ भी यही होता है, गुरु के साथ भी यही होता है। मैंने सुना है, एक सूफी फकीर के पास दो युवक गए। वे साधना में उत्सुक थे और सत्य की खोज करना चाहते थे। उस फकीर ने कहा, सत्य और साधना थोड़े दिन बाद, अभी मुझे कुछ और दूसरा काम तुमसे लेना है। लकड़ी चुक गई हैं आश्रम की, तो तुम दोनों जंगल चले जाओ और लकड़ियां इकट्ठी कर लो। और अलग— अलग ढेर लगाना। क्योंकि तुम्हारी लकड़ी का ढेर केवल लकड़ी का ढेर नहीं है, उससे मुझे कुछ और परीक्षा भी करनी है। तो दोनों युवक गए; उन्होंने लकड़ी के दो ढेर लगाए। फिर गुरु सात दिन बाद आया, तो उसने पहले युवक के लकड़ी के ढेर में आग लगाने की कोशिश की। सांझ तक परेशान हो गया। आंखों से आंसू बहने लगे। धुआं ही धुआं निकला, आग न लगी। सब लकड़िया गीली थीं। शिष्य ने क्या कहा गुरु को? कि मैं चला। जब तुमसे लकड़ी में आग लगाना नहीं आता, तो तुम मुझे क्या बदलोगे!

दूसरे युवक की लकड़ियों में गुरु ने आग लगाई; लकड़िया भभककर जल गईं। सूखी लकड़ियां थीं। दूसरा युवक भी पहली घटना देख रहा था।

और पहला युवक छोड्कर जा चुका था, और जाकर उसने गांव में प्रचार करना शुरू कर दिया था कि यह आदमी बिलकुल बेकार है। एक तो हमारे सात दिन खराब किए लकड़ी इकट्ठी करवाईं। हम गए थे सत्य को खोजने! इसमें कोई तुक नहीं है, संगति नहीं है। फिर हमने पसीना बहा—बहाकर, खून—पसीना करके लकड़ियां इकट्ठी कीं। और इस आदमी को आग लगाना नहीं आता। तो उसने लकड़ियां भी खराब कीं, धुआं पैदा किया, हमारी तक आंखें खराब हुईं। और यह आदमी किसी योग्य नहीं है। भूलकर कोई दुबारा इसकी तरफ न जाए।

दूसरा युवक भी यह देख रहा था कि पहला युवक जा चुका है। दूसरे युवक की लकड़ियां जब भभककर जलने लगीं, तो उसने कहा कि बस, ठहरो। यह मत समझ लेना कि बड़े अकलमंद हो तुम। लकड़ियां सूखी थीं, इसलिए जल रही हैं, इसमें तुम्हारी कोई कुशलता नहीं है। और मैं चला। अगर तुम इसको अपना ज्ञान समझ रहे हो कि सूखी लकड़ियों को जला दिया तो कोई बहुत बड़ी बात कर ली, तो तुम से अब सीखने को क्या है!

दोनों युवक चले गए। गुरु मुस्कुराता हुआ वापस लौट आया। आश्रम में लोगों ने उससे पूछा, क्या हुआ? तो उसने कहा, जो होना था ठीक उससे उलटा हुआ। पहला युवक अगर कहता कि लकड़ियां गीली हैं, मैं गीला हूं इसलिए तुम्हें जलाने में इतनी कठिनाई हो रही है, तो उसका रास्ता खुल जाता। दूसरा युवक अगर कहता कि तुम्हारी कृपा है कि मेरी लकड़ियों में आग लग गई, तो उसका रास्ता खुल जाता। लेकिन दोनों ने रास्ते बंद कर लिए। और अब दोनों जाकर प्रचार कर रहे हैं; दोनों ने धारणा बना ली, अब दोनों उसके लिए तर्क जुटा रहे हैं। मुझसे उन्होंने पूछा नहीं। मेरी तरफ देखा नहीं। मैं क्या कर रहा था, मेरा क्या प्रयोजन था, इसकी उन्होंने कोई खोज न की। सतह से कुछ बातें लेकर वे जा चुके हैं।

आप भी, जहां भी आपको दूसरे को श्रेष्ठ मानना पड़ता है, वहा बड़ी अड़चन आती है। दूसरे को अपने से नीचा मानना बिलकुल सुगम है। हम हमेशा तैयार ही हैं। हम पहले से माने ही बैठे हैं कि दूसरा नीचा है। सिर्फ अवसर की जरूरत है और सिद्ध हो जाएगा। और अगर कोई दूसरा हमसे आगे भी निकल जाए कभी, तो हम जानते हैं कि चालाकी, शरारत, कोई धोखाधड़ी, कोई भाई— भतीजा वाद, कुछ न कुछ मामला होगा, तभी दूसरा आगे गया, नहीं तो हमसे आगे कोई जा कैसे सकता था! अगर दूसरा हमसे पीछे रह जाए, तो हम समझते हैं, रहेगा ही पीछे; क्योंकि हमसे आगे जाने की कोई योग्यता भी तो होनी चाहिए।

हम जो भी होते हैं, जहां भी होते हैं, उसके अनुसार तर्क खोज लेते हैं।

ईश्वर है या नहीं है, यह बडा सवाल नहीं। जो व्यक्ति ईश्वर को मान सकता है कि है, उसने अपने को झुकाया, यह बड़ी भारी बात है। ईश्वर न भी हो, तो भी जिसने स्वीकार किया कि ईश्वर है और अपने को झुकाया, इसके लिए ईश्वर हो जाएगा। और जो कहता है, ईश्वर नहीं है—चाहे ईश्वर हो ही—इसने अपने को अकड़ाया। ईश्वर हो, तो भी इसके लिए नहीं है, तो भी इसके लिए नहीं हो सकेगा, तो भी क्योंकि इसके द्वार बंद हैं।

वह जो आसुरी संपदा का व्यक्ति है, अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोधादि के परायण हुआ, दूसरों की निंदा करने वाला, दूसरों के शरीर में मुझ अंतर्यामी से द्वेष करने वाला है। ऐसे उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार—बार आसुरी योनियों में ही गिराता हूं।

यह वचन थोड़ा कठिनाई पैदा करेगा, क्योंकि हमें लगेगा कि क्यों परमात्मा गिराएगा! होना तो यह चाहिए कि कोई आसुरी वृत्ति में गिर रहा हो, तो परमात्मा उसे रोके, बचाए, दया करे। क्योंकि हम निरंतर प्रार्थना करते हैं कि हे पतितपावन! हे करुणा के सागर! दया करो, बचाओ, मैं पापी हूं। और ये कृष्ण कह रहे हैं कि ऐसे नराधम, क्रूरकर्मी को मैं संसार में बार—बार आसुरी योनियों में ही गिराता हूं!

जब ईसाई या इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग इस तरह के वचन पढ़ते हैं, तो उनको बड़ी कठिनाई होती है। क्योंकि इस्लाम में तो परमात्मा के सभी नाम—रहीम, रहमान, करीम—स्ब नाम दया के हैं कि वह दयालु है। यह कैसी दया! और जीसस ने कहा है कि तुम प्रार्थना करो, तो सब तरह की क्षमा संभव है। तुम पुकारो, तो क्षमा कर दिए जाओगे।

लेकिन कृष्ण का यह वचन! इसका तो अर्थ यह हुआ, और यही भारतीय प्रज्ञा की खोज है, कि परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है कि तुम पुकारों और वह क्षमा कर दे। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है कि तुम उसे फुसला लो, राजी कर लो—प्रशंसा से, खुशामद से, स्तुति से—और वह बदल दो परमात्मा एक नियम है, व्यक्ति नहीं। पहुंच जाता है।

इसको थोड़ा समझ लें।

परमात्मा एक व्यवस्था है, व्यक्ति नहीं। तो आग में कोई आदमी हाथ डाले, तो आग जलाकी। आग जलाने को उत्सुक नहीं है। आग इस आदमी को जलाने के लिए पीछे नहीं दौड़ती। लेकिन यह आदमी आग में हाथ डालता है, तो आग जलाती है। क्योंकि आग का स्वभाव जलाना है, वह उसका नियम है। अगर हम आग से पूछें, तो वह कहेगी, जो मुझमें हाथ डालेगा, उसे मैं जलाऊंगी। आग चूंकि बोलती नहीं, इसलिए हमें खयाल में नहीं है।

कृष्ण परमात्मा की तरफ से बोल रहे हैं। वह जो जागतिक नियम है, युनिवर्सल ली है, वह जो जीवन का आधार—स्तंभ है, उसकी तरफ से बोल रहे हैं। वह कहते हैं, जो व्यक्ति ऐसा कर्म करेगा, इस तरह की दृष्टि और धारणा रखेगा, ऐसा पाप में डूबेगा, उसे मैं गिराता हूं। गिराने का कुल मतलब इतना ही है, ऐसा करने से वह अपने आप गिरता है, कोई परमात्मा उसको धक्का नहीं देता। धक्का देने की कोई जरूरत नहीं है। वह ऐसा करता है, इसलिए गिरता है।

इसलिए भारत की जो गहरी से गहरी खोज है, वह कर्म का सिद्धात है। यह खोज इतनी गहरी है कि जैनों और बौद्धों ने परमात्मा को विदा ही कर दिया। उन्होंने कहा, यह सिद्धात ही काफी है। परमात्मा को बीच में लाने की कोई जरूरत भी नहीं है। जैनों और बौद्धों ने परमात्मा को इनकार ही कर दिया कि कोई जरूरत ही नहीं है परमात्मा को बीच में लाने की। कर्म से मामला साफ हो जाता है। और सच में ही साफ हो जाता है।

लेकिन परमात्मा को इनकार करने की कोई भी जरूरत नहीं, क्योंकि परमात्मा का अर्थ ही वह महानियम है जो इस जीवन को चला रहा है। उसे हम कर्म का नियम कहें, या परमात्मा कहें, एक ही बात है।

वह जो गिरता है अपने हाथ से, नियम उसे गिराता है। आप जमीन पर चलते हैं, सम्हलकर चलते हैं, तो ठीक। उलटे—सीधे चलते हैं, तो गिर जाते हैं, हाथ—पैर टूट जाते हैं। कोई जमीन आपको गिराती नहीं है। लेकिन उलटा—सीधा जो चलता है, नियम के विपरीत, उसके हाथ—पैर टूट जाते हैं।

जमीन स्वेच्छा से, आकांक्षा से आपका हाथ—पैर नहीं तोड़ती। लेकिन जमीन का नियम है, उसके विपरीत जो जाता है, वह टूट जाता है। उसके अनुकूल जो जाता है, वह सहजता से मंजिल पर पहुंच जाता है।

जगत के नियम को समझकर उसके अनुकूल चलने का नाम धर्म है।

बुद्ध ने धर्म शब्द का अर्थ ही नियम किया है, दि ली। जब बुद्ध कहते हैं, धम्म शरणं गच्छामि, तो वह कहते हैं, धर्म की शरण जाओ, तो उसका यही अर्थ है कि नियम की शरण जाओ। और नियम के अनुकूल चलोगे, तो तुम मुक्त हो जाओगे। नियम के प्रतिकूल चलोगे, तो अपने हाथ से बंधते चले जाओगे। नियम के विपरीत जो जाएगा, वह दुख पाएगा। नियम के अनुकूल जो जाएगा, वह आनंद को उपलब्ध हो जाता है।

इसलिए हे अर्जुन, वे मूढ़ पुरुष जन्म—जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त हुए मेरे को न प्राप्त होकर उससे भी अति नीची गति को ही प्राप्त होते हैं।

जब कोई व्यक्ति गिरना शुरू हो जाता है, तो वह मोमेंटम पकड़ता है, गिरने में भी गति आ जाती है। आप कभी सोचें, अगर आप एक झूठ बोलें, तो फिर दूसरा और तीसरा और चौथा। और दूसरा पहले से बड़ा, और तीसरा दूसरे से बडा, क्योंकि फिर और बड़ा झूठ बोलना जरूरी है पिछले झूठ को सम्हालने के लिए। फिर एक गति आ जाती है। फिर उस गति का कोई अंत नहीं है।

एक पाप करें, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और बड़ा, और बड़ा; तब आप अपने ही हाथ से गिरते चले जाते हैं। और अगर आप गिरना चाहते हैं, तो नियम सहयोग देता है। अगर आप उठना चाहते हैं, तो नियम सीढ़ी बन जाता है। गहरे में समझने पर, आप जो करते हैं, उससे आपकी दिशा निर्मित होती है।

सुबह आप उठे और आपने क्रोध किया। आपने दिन के लिए चुनाव कर लिया। अब दूसरा क्रोध पहले से ज्यादा आसान होगा, तीसरा दूसरे से ज्यादा आसान होगा। सांझ तक आप अनेक बार क्रोध करेंगे और सोचेंगे, न मालूम किस दुष्ट का चेहरा देखा!

आईने में अपना ही देखा होगा। क्योंकि किसी दूसरे के चेहरे से आपके जीवन की गति का कोई संबंध नहीं है, आपसे ही संबंध है। इसलिए सारे धर्मों ने फिक्र की है कि सुबह उठकर पहला काम परमात्मा की प्रार्थना का करें। उससे मोमेंटम बदलेगा, उससे गति बदलेगी। प्रार्थना के बाद एकदम से क्रोध करना मुश्किल होगा। और प्रार्थना के बाद और प्रार्थनापूर्ण होना आसान हो जाएगा।

जो बात गलत के संबंध में सही है, वही सही के संबंध में भी सही है। जो आप करते हैं, उसी दिशा में करने की और गति आती है। जिस तरफ आप चलते हैं, उस तरफ आप दौड़ने लगते हैं। दिशा चुनना बड़ा जरूरी है। सुबह उठते ही प्रेम और प्रार्थना और करुणा का भाव हृदय में भर जाए, तो आपके दिन की यात्रा बिलकुल दूसरी होगी। लेकिन सुबह अगर आप चूक गए, तो बड़ी कठिनाई हो जाती है।

यही बात पूरे जीवन के संबंध में भी लागू है। अगर बचपन में दिशा प्रार्थना और परमात्मा की हो जाए, तो पूरे जीवन की यात्रा आसान हो जाएगी। इसलिए हम अपने बच्चों को इस मुल्क में पुराने दिनों में, पहले चरण में गुरुकुल भेज देते थे कि पच्चीस वर्ष तक वे प्रार्थनापूर्ण जीवन व्यतीत करें। क्योंकि उससे गति बनेगी, एक यात्रा का पथ निर्मित होगा। फिर बहुत आसानी से आगे सब हो जाएगा।

एक बार बचपन खो गया, गति बिगड़ गई, पैर डावाडोल हो गए, उलटी दिशा पकड़ गई, फिर उसी दिशा में दौड़ शुरू हो जाती है। जवानी दौड़ का नाम है। बचपन में जो दिशा पकड़ ली, जवानी उसी दिशा में दौड़ती चली जाएगी। फिर बुढ़ापा ढलान है। जिस दिशा में आप जवानी में दौड़े हैं, उसी दिशा में आप बुढ़ापे में ढलेंगे। क्योंकि शक्ति फिर क्षीण होती चली जाती है।

अब तो मनोवैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि सात वर्ष की उम्र के बच्चे को हम जो दिशा दे देंगे, सौ में निन्यानबे मौके पर वह उसी दिशा में जीवनभर यात्रा करेगा। बहुत शक्ति की जरूरत है फिर बाद में दिशा बदलने के लिए। शुरू में दिशा बदलना बिलकुल आसान है। कोमल पौधा है, झुक जाता है। फिर रास्ता पकड़ लेता है, फिर उस झुकाव को तोड़ना बहुत कठिन हो जाता है।

बचपन में जाने का तो अब कोई उपाय नहीं, लेकिन रोज सुबह आप फिर से थोड़ा—सा बचपन उपलब्ध करते ‘हैं। कम से कम दिन को दिशा दें। दिन जुड़ते जाएं। और अनेक दिन जुड़कर जीवन बन जाते हैं। गलत कदम उठाने से रोकें। उठ जाए, तो बीच से वापस लौटा लें। सही कदम उठाने की पूरी ताकत लगाएं; आधा भी जा सकें, तो न जाने से बेहतर है। थोड़े ही दिन में आपकी जीवन—ऊर्जा दिशा बदल लेगी।

आसुरी दिशा, हम जो कर रहे हैं, क्रोध, मान, अहंकार, उसमें हमें बढ़ाती जाती है। उससे रुकेंगे नहीं, बदलेंगे नहीं, हाथ हटाएंगे नहीं, कुछ छोड़ेंगे नहीं गलत, खाली न होंगे हाथ, तो दैवी संपदा की तरफ बढ़ना बहुत मुश्किल है। और जिस तरफ आप जाते हैं, उस तरफ…..।

कृष्ण कहते हैं, और भी मैं अति नीची योनियों में गिराता हूं। वे गिराते नहीं। कोई गिराने वाला नहीं है, कोई उठाने वाला नहीं है। आप ही गिरते हैं। नियम न पक्षपात करता है, न चुनाव करता है। नियम निष्पक्ष है। इसलिए जो भी आप हैं, अपनी ऊर्जा, दिशा और नियम, तीन का जोड़ हैं।

नियम शाश्वत है, सनातन है; आपकी ऊर्जा शाश्वत है, सनातन है; ये दोनों समानांतर हैं। इन दोनों के बीच में एक और तत्व है, आपका चुनाव, इस ऊर्जा को नियम के अनुकूल बहाना या नियम के प्रतिकूल बहाना।

नदी बह रही है, नाव आपके पास है, वह आपका जीवन है, नदी नियम है। अब इस नदी के साथ नाव को बहाना है या नदी के विपरीत नदी से लड़ने में नाव को लगाना है?

जो नदी के विपरीत बहेगा, वह आसुरी चित्त—दशा को उपलब्ध होता जाएगा। जो नदी के साथ बह जाएगा—उस साथ बहने का नाम ही समर्पण है—वह दिव्यता को उपलब्ध हो जाता है।

 

आज इतना ही।

 

 

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गीता दर्शन–(प्रवचन–174) /2016/11/01/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-174/ /2016/11/01/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%9a%e0%a4%a8-174/#respond Tue, 01 Nov 2016 03:50:39 +0000 /?p=6981 ऊर्ध्‍वगमन और अधोगमन—(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—16     सूत्र—

इदमद्य मया लब्‍धमिमं प्राप्‍स्‍ये मनोरथम्।

इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।। 13।।

असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्‍ये चापरानपि।

ईश्वरोऽहम्हं भोगी सिद्धोsहं बलवान्तुखी।। 14।।

आढ्योऽभिजनवानस्मि कीऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्‍ये दास्यामि मौदिष्य इत्‍याज्ञानविमीहिता:।। 15।।

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता:।

प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेsशुचौ।। 16।।

 

और उन आसुरी पुरूषों के विचार इस प्रकार के होते है, कि मैने आज यह तो पाया है और हस मनोरथ को प्राप्त होऊंगा तथा मेरे पास यह हतना धन है और फिर भी यह भविष्य में और अधिक होवेगा।

तथा वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा। मैं ईश्वर अर्थात ऐश्वर्यवान हूं और ऐश्वर्य को भोगने वाला हूं और मैं सब सिद्धियों से युक्त एवं बलवान और सुखी हूं।

मैं का धनवान और के कुटुंब वाला हूं; मेरे समान दूसरा कौन है! मैं यज्ञ करूंगा, दान देऊंगा, हर्ष को प्राप्त होऊंगा—इस प्रकार के अज्ञान से आसुरी मनुष्य मोहित हैं। वे अनेक प्रकार से भ्रमित हुए चित्त वाले अज्ञानीजन मोहरूप जाल में फंसे हुए एवं विषय—भोगों में अत्यंत आसक्त हुए महान अपवित्र नरक में गिरते हैं।

 

पहले कुछ प्रश्न।

 

पहला प्रश्न : गीता के इस अध्याय में देवों और असुरों के गुण बताए गए। हम असुरों से तो धरती पटी पड़ी है, किंतु देव तो करोड़ों में कोई एक होता है। ऐसा क्यों है?

 

जीवन में एक अनिवार्य संतुलन है। जितनी यहां बुराई है, उतनी ही यहां भलाई है। जितना यहां अंधेरा है, उतना ही यहां प्रकाश है। जितना यहां जीवन है, उतनी ही यहां मृत्यु है। दोनों में से कोई भी कम—ज्यादा नहीं हो सकते। दोनों की बराबर मात्रा चाहिए, तो ही जीवन चल पाता है। वे गाड़ी के दो चाक हैं

संसार चल रहा है, चलता रहा है, चलता रहेगा। उसके दोनों चाक बराबर हैं, इसीलिए। लेकिन फिर भी प्रश्न सार्थक है। क्योंकि साधारणत: देखने पर हमें यही दिखाई पड़ता है कि असुरों से तो पृथ्वी भरी है; देव कहां हैं?

समझने की कोशिश करें।

हमें वही दिखाई पड़ता है, जो हम हैं। पृथ्वी असुरों से भरी दिखाई पड़ती है, वह हमारी अपनी आसुरी वृत्ति का दर्शन है। देव को तो हम पहचान भी नहीं सकते। वह दिखाई भी पड़े, मौजूद भी हो, तो भी हम उसे पहचान नहीं सकते। क्योंकि जब तक दिव्यता की थोड़ी झलक हमारे भीतर न जगी हो, तब तक दूसरे के भीतर जागे हुए देव से हमारा कोई संबंध निर्मित नहीं होता।

जो हमें दिखाई पड़ता है, वह हमारी ही आंखों का फैलाव है, वह हमारी दृष्टि का ही फैलाव है। हमें वह नहीं दिखाई पड़ता जो है, बल्कि वही दिखाई पड़ता है जो हम हैं।

दैवी संपदा से भरे व्यक्ति को इस जगत में असुर कम और देवता ज्यादा दिखाई पड़ने लगते हैं। संत को बुरा आदमी दिखाई पड़ना बंद हो जाता है। हमें जो बुरा दिखाई पड़ता है, संत को वही .उसकी व्याख्या बदल जाती है। और व्याख्या के अनुसार जो हमें दिखाई पड़ता है, उसका रूप बदल जाता है।

लेकिन संत को दिखाई पड़ने लगता है, सभी भले हैं। असंत को दिखाई पड़ता है, सभी बुरे हैं। दोनों ही बातें अधूरी हैं। और जब आप परिपूर्ण साक्षी— भाव को उपलब्ध होते हैं, जहां न तो आप अपने को जोड़ते हैं साधुता से, न जोड़ते हैं असाधुता से, जहां बुरे और भले दोनों से आप पृथक हो जाते हैं, उस दिन आपको दिखाई पड़ता है कि जगत में दोनों बराबर हैं। और बराबर हुए बिना जगत चल नहीं सकता, क्षणभर भी नहीं जी सकता।

तो यदि हमें दिखाई पड़ती है पृथ्वी असुरों से भरी, तो इसका केवल एक ही अर्थ लेना कि हम आसुरी संपदा में जी रहे हैं। इसका दूसरा कोई और अर्थ नहीं है। पृथ्वी से इसका कोई संबंध नहीं है। मुल्ला नसरुद्दीन ने एक रात भांग पी ली। भाग के नशे में जमीन घूमती हुई दिखाई पड़ने लगी। तो सुबह उठकर जब वह होश में आ गया, उसने कहा, मैं समझ गया। जिस आदमी ने यह सिद्ध किया कि पृथ्वी घूमती है, वह भंगेड़ी रहा होगा!

हमारा अनुभव ही हम फैलाते हैं, दूसरा कोई उपाय भी नहीं है। जो हमारे भीतर है, उसके माध्यम से ही हम दूसरे को देखते हैं। तो दूसरे की वास्तविक स्थिति हमें दिखाई नहीं पड़ती, हमारा ही मन उस पर छा जाता है, हमारी छाया ही उसे आच्छादित कर लेती है। फिर जो हम देखते हैं, वह अपने ही मन का फैलाव है। दूसरा व्यक्ति जैसे परदा बन जाता है। हमारा ही चित्त उस परदे पर हमें दिखाई पड़ता है। दूसरे में हम स्वयं को ही देखते हैं। दूसरा जैसे दर्पण है।

तो अगर लगता हो कि सारी पृथ्वी असुरों से भरी है, तो जानना कि आपका चित्त आसुरी संपदा से भरा है। इसके अतिरिक्त यह बात किसी और चीज का लक्षण नहीं है। इससे पृथ्वी के संबंध में कोई खबर नहीं मिलती, सिर्फ आपके संबंध में खबर मिलती है; आपकी आंखों के संबंध में खबर मिलती है, आंखों के पीछे छिपे मन के संबंध में खबर मिलती है।

और अगर आपको कभी—कभी कोई एकाध देव भी दिखाई पड़ जाता है, तो उसका केवल इतना ही अर्थ है कि आपके भीतर की दैवी संपदा भी थोड़ी—बहुत सक्रिय है। वह बिलकुल मर नहीं गई है, जीवंत है। उसकी भी कोई एक किरण इस अंधेरे में मौजूद है, इसलिए कभी—कभी आप झलक दूसरे में उसकी भी देख लेते हैं। जैसे—जैसे आप दैवी संपदा में लीन होंगे, वैसे—वैसे जगत आपको दिव्य मालूम पड़ने लगेगा।

लेकिन ध्यान रहे, योग की जो परम दशा है, वह दोनों ही भावनाओं से मुक्त हो जाना है। जिस दिन जगत आपको उसकी वस्तुस्थिति में दिखाई पड़े, जिस दिन आपके भीतर से कोई भाव जगत पर न फैले, उस दिन आपको अनूठा अनुभव होगा कि जगत में सभी चीजें संतुलित हैं। यहां बुरा और भला बराबर है। यहां पापी और पुण्यात्मा बराबर हैं। यहां ज्ञानी और अज्ञानी बराबर हैं। उनकी मात्रा सदा ही बराबर है। उस मात्रा में जरा भी विचलन हुआ कि जगत नष्ट हो जाता है। वह संतुलन बना रहता है।

जिस दिन आपको ऐसा दिखाई पड़ जाएगा, यह संतुलन की अवस्था अनुभव में आ जाएगी, उस दिन न तो आप जगत को बुरा कहेंगे, न भला कहेंगे। उस दिन बुरे आदमी को भी बुरा नहीं कहेंगे, भले आदमी को भी भला नहीं कहेंगे। उस दिन आप कहेंगे, बुरा और भला एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उस दिन आप बुरे को मिटाना नहीं चाहेंगे, भले को बचाना नहीं चाहेंगे। क्योंकि उस दिन आप जानेंगे कि बुरा मिटे, तो भला भी मिटता है; भला बचे, तो बुरा भी बचता है।

लाओत्से ने कहा है, जब दुनिया धार्मिक थी, तो न कोई भला आदमी था, न कोई बुरा आदमी था।

जब आप भी परम धार्मिक होंगे, तो न कोई बुरा रह जाएगा, न कोई भला रह जाएगा। तब बुरा और भला एक जागतिक संयोग होगा। जैसे हाइड्रोजन और आक्सीजन से मिलकर पानी बनता है, वैसे बुरे और भले से मिलकर संसार बनता है। और वह मात्रा सदा बराबर है।

जगत एक संतुलन है। पर हमें संतुलन दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि हम संतुलित नहीं हैं। हम साक्षी होंगे, तो संतुलित होंगे। तो जीवन में तीन दिशाएं हैं। एक दिशा है कि अपने भीतर जो आसुरी संपदा है, उसको हम अपना स्वभाव समझ लें, तो फिर सारा जगत बुरा है। दूसरी संभावना है कि हमारे भीतर जो दैवी संपदा है, हम उसके साथ अपने को एक समझ लें, तो सारा संसार भला है। और एक तीसरी परम संभावना है कि हम इन दोनों गुणों से, इस द्वैत से अपने को मुक्त कर लें और साक्षी हो जाएं, तो फिर जगत बुरे और भले का संयोग है, रात और दिन का जोड़ है, अंधेरे और प्रकाश का मेल है, ठंडे और गरम का संतुलन है। और जिस दिन आप इस तरह चुनावरहित, विकल्परहित भीतर दोनों संपदाओं में से किसी को भी न चुनेंगे, उसी दिन आपकी परम मुक्ति है। हमारे पास तीन शब्द हैं। एक शब्द नरक है। नरक का अर्थ है, जिसने अपने को आसुरी संपदा से एक कर लिया। दूसरा शब्द स्वर्ग है। स्वर्ग का अर्थ है, जिसने अपने को दैवी संपदा से एक कर लिया। और तीसरा शब्द मोक्ष है। मोक्ष का अर्थ है, जिसने अपने को दोनों संपदाओं से मुक्त कर लिया।

देव भी मुक्त नहीं है, वह भी बंधा है। उसके बंधन प्रीतिकर हैं। उसकी जंजीरें सोने की हैं। उसका कारागृह बहुमूल्य है, उसका कारागृह बहुत सजा है। उसका जीवन आभूषणों से लदा है। लेकिन लदा है, वह निर्भार नहीं है। बुरा आदमी लोहे की जंजीरों से बंधा है; अच्छा आदमी सोने की जंजीरों से बंधा है। लेकिन बंधन में जरा भी कमी नहीं है।

सिर्फ भारत ने एक अनूठे शब्द का प्रयोग किया है, मोक्ष। दुनिया के किसी दूसरे धर्म ने, दुनिया की किसी जाति ने मोक्ष की कल्पना नहीं की है। स्वर्ग और नरक सारी दुनिया को पता हैं। इस्लाम या ईसाइयत या यहूदी, स्वर्ग और नरक से परिचित हैं। मोक्ष की धारणा एकांतिक रूप से भारतीय है।

मोक्ष का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति, जो नरक से तो मुक्त हुआ ही, स्वर्ग से भी मुक्त है। जिसने बुरे को तो छोड़ा ही, भले को भी छोड़ा। इसे समझना बहुत कठिन है, क्योंकि भला हमें लगता है, छोड़ने का सवाल ही नहीं है। लेकिन तब हमें जीवन की गहरी व्यवस्था का कोई अनुभव नहीं है। भले के पीछे बुरा तो छिपा ही रहेगा।

अगर आप कहते हैं कि मैं सत्य ही बोलता हूं सदा सत्य ही बोलूंगा, और सदा सत्य को पकड़े रहूंगा! तो एक बात पक्की है, आपके भीतर झूठ भी उठता है। नहीं तो आपको सत्य का पता कैसे चलेगा! सत्य को आप बचाएंगे कैसे! सत्य को सम्हालेंगे कैसे! झूठ भीतर मौजूद है, उसके विरोध में ही सत्य उठता है।

अगर आप कहते हैं, मैं ब्रह्मचर्य का साधक हूं मैं ब्रह्मचर्य को पकड़े रहूंगा, मैं कभी ब्रह्मचर्य को छोडूंगा नहीं! तो उसका अर्थ है, कामवासना आपके भीतर लहरें लेती है। जिसके भीतर कामवासना समाप्त हो गई, उसको ब्रह्मचर्य का पता भी नहीं चलेगा।

जिसकी बीमारी बिलकुल मिट गई, उसे स्वास्थ्य का भी पता नहीं चलेगा। इसलिए जब आप बीमार पड़ते हैं और स्वस्थ होते हैं, तब आपको स्वास्थ्य की थोड़ी—सी झलक मिलती है। बीमारी में गिरने के बाद जब आप पहली दफे स्वस्थ होना शुरू होते हैं, तब आपको पता चलता है, स्वास्थ्य क्या है। अगर आप सदा ही स्वस्थ रहें, आपको स्वास्थ्य भूल जाएगा; उसका आपको कोई स्मरण ही नहीं रहेगा।

दुख के कारण सुख का पता चलता है, बुरे के कारण भले का पता चलता है।

मोक्ष का अर्थ है, अब मेरे दोनों ही बंधन न रहे; अब मैं मुक्त हूं; मेरा कोई चुनाव नहीं। न यह संपदा मेरी है, न वह संपदा मेरी है। संपदाएं ही मैंने छोड़ दी हैं। यह परम दशा है। यह परमहंस की अवस्था है।

अभी जहां आप खड़े हैं, अगर जगत आपको बुरा लगे, तो समझना कि आसुरी संपदा आपकी आंखों पर छाई है। अगर जगत अच्छा लगे, तो समझना कि दैवी संपदा ने आपको घेरा है। जगत दोनों लगे और दोनों में संतुलन दिखाई पड़े, तो समझना कि साक्षी के स्वर का जन्म हुआ है।

उस तीसरे की खोज जारी रखनी है। जब तक वह न हो जाए, तब तक समझना कि अभी हम धर्म के मंदिर के बाहर ही भटकते हैं, अभी हमारा भीतर प्रवेश नहीं हुआ है।

 

दूसरा प्रश्‍न:

आपने कहा किं मनुष्य दैवी और आसुरी संपदा बराबर मात्रा में लेकर पैदा होता है। तब ऐसा क्यों है कि इस जगत में आसुरी संपदा ही अधिक फूलती—फलती नजर आती है? दैवी संपदा की फसल इतनी दुर्लभ क्यों है?

 

सुरी संपदा फूलती—फलती नजर आती है, क्योंकि वही हमारी कामना है। एक चोर सफल होता हमें दिखाई पड़ता है। एक चोर धन को इकट्ठा कर लेता है, प्रतिष्ठा बना लेता है। हमारे मन में काटा चुभता है इससे। चाहते तो हम भी इसी तरह का महल, इसी तरह का धन, इसी तरह की पद—प्रतिष्ठा हैं। चोरी करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं और चोर ने जो जुटा लिया है, उसकी भी आका्ंक्षा मन में है; उससे मन को चोट लगती है। उससे मन कहता है कि चोर फल—फूल रहा है। हम साधु हैं और फल—फूल नहीं रहे हैं।

अगर आप साधु हैं, तो आपको दिखाई पड़ेगा कि चोर दुख पा रहा है। अगर आप असाधु हैं, तो दिखाई पड़ेगा कि चोर सफल हो रहा है।

दुनिया में दो तरह के चोर हैं बड़ी मात्रा में। एक वे, जो चोरी की हिम्मत कर लेते हैं; और एक वे, जो चोरी की हिम्मत नहीं करते, सिर्फ विचार करते हैं।

मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, हम अपना जीवन संतोष से बिताते हैं, बुरा काम नहीं करते, किसी को चोट नहीं पहुंचाते, फिर भी असफलता हाथ लगती है। और देखें, फलां आदमी ब्लैक मार्केटिंग कर रहा है, कि स्मगलिंग कर रहा है, कि चोर है, बेईमान है, धोखाधड़ी कर रहा है, और सफल हो रहा है!

उसकी सफलता आपको सफलता दिखाई पड़ती है, क्योंकि आप भी वैसी ही सफलता चाहते हैं। अगर सच में ही आपका साधु—चित्त होता, तो आपको उस आदमी की पीड़ा भी दिखाई पड़ती। भला उसने महल खड़ा कर लिया हो, लेकिन महल के भीतर वह जिस संताप से गुजर रहा है, वह आपको दिखाई पड़ता।

उस संताप से आपको कोई प्रयोजन नहीं है। उसकी भीतरी पीड़ा से आपको कोई प्रयोजन नहीं है। उसका बाहर जो ठाठ है, वह आपको दिखाई पड़ रहा है, क्योंकि बाहर का ठाठ आप भी चाहते हैं! जो उसने पा लिया है, वह आप नहीं पा सके, इससे मन में काटा चुभता है। इसलिए वह सफल लगता है और स्वयं आप असफल लगते हैं।

सिर्फ बुरा आदमी ही बुरे आदमी की सफलता को सफलता मान सकता है। भले आदमी को तो दया आएगी; भले आदमी को बुरे आदमी पर दया आएगी। क्योंकि वह उसके भीतर देखेगा, झांकेगा, और पाएगा कि उसने धन तो इकट्ठा कर लिया, स्वयं को खो दिया। वह पाएगा कि उसने संपदा तो इकट्ठी कर ली, लेकिन शांति नष्ट हो गई। वह पाएगा कि उसके पास साधन तो काफी इकट्ठे हो गए, लेकिन वह खुद भटक गया है। उसके जीवन की सफलता साधु—चित्त व्यक्ति को आत्मघात जैसी मालूम पड़ेगी। उसने अपने को सड़ा डाला, उसने अपने को बेच लिया।

लेकिन हमें हो सकता है दिखाई पड़े कि आदमी सफल हो रहा है, बुरा आदमी सफल हो रहा है। रोज चारों तरफ लोगों को दिखाई पड़ता है, बुरे आदमी सफल हो रहे हैं।

बुरा आदमी सफल हो ही नहीं सकता। और अगर सफल होता दिखाई पड़े, तो समझना कि आपकी सफलता की व्याख्या में कहीं कोई भांति है। बुरा आदमी तो असफल होगा ही।

मैंने सुना है, सिकंदर अपने साम्राज्य को बढ़ाता हुआ नील नदी के किनारे पहुंचा। रास्ते में उसने न मालूम कितनी सीमाएं तोड़ी, कितने राज्य नष्ट किए, कितनी सेनाओं को पराजित किया, लेकिन नील नदी के किनारे पहुंचकर उसको बड़े अचंभे का अनुभव हुआ। जगह—जगह उसे प्रतिरोध मिला, टक्कर मिली। लोग हारे, तो भी आखिरी दम तक लड़े। लेकिन नील नदी के किनारे जब वह आया, तो उसे स्वागत मिला—वंदनवार, फूलों की वर्षा, निमंत्रण, उत्सव—लड़ने का कोई सवाल ही नहीं! वह चकित भी हुआ, हैरान भी हुआ।

जिस पहले नगर में उसने प्रवेश किया, नगर के लोगों ने पूरी सिकंदर की फौजों को निमंत्रण दिया, रात्रि— भोज का आयोजन किया। सुंदरतम भोजन, शराब, नृत्य—संगीत की व्यवस्था की। सिकंदर चकित भी था, हैरान भी था। यह कौन—सा ढंग है दुश्मन के प्रवेश पर स्वागत करने का! थोड़ा लज्जित भी था। क्योंकि वे तलवार लेकर खड़े होते, तो सिकंदर उन्हें जीत लेता। लेकिन वे प्रेम लेकर खड़े हुए, तो जीतना मुश्किल मालूम पड़ेगा।

जब उसके सामने भोजन की थाली लाई गई, तो वह एकदम नाराज हो गया; उसने जोर से घूंसा मारा टेबल पर और कहा कि यह क्या है? मेरा मजाक किया जा रहा है? क्योंकि थाली में सोने की रोटी थी, हीरे—जवाहरातों की सब्जियां थीं। सिकंदर ने कहा कि तुम मूढ़ तो नहीं हो? शक तो मुझे तभी हुआ। जब मैं गांव में प्रवेश किया कि यह पागलों का गांव है, क्योंकि तुम लड़े नहीं, उलटे तुमने स्वागत किया। हम जीतने आए हैं, तुमने हमें फूलमालाएं पहनाई। शक तो मुझे तभी हुआ; लेकिन अब बिलकुल पक्का हो गया कि तुम्हारे दिमाग खराब हैं। सोने की रोटी खाई नहीं जाती! तो एक के आदमी ने, जो गांव का सर्वाधिक का था, उसने कहा, अगर गेहूं की रोटी ही खानी थी, तो वह तो आपको अपने घर ही मिल जाती। हम सोचे कि इतनी तकलीफ उठाकर आ रहे हैं, तो सोने की रोटी की तलाश होगी!

वह जो चोर है, लुटेरा है, बदमाश है, आपको उसकी सोने की रोटी दिखाई पड़ती है। लेकिन सोने की रोटी कोई खा तो पा नहीं सकता, भीतर भूखा मरता है। और आपको सोने की रोटी में सफलता दिखाई पड़ती है, क्योंकि आका्ंक्षा वही आपकी भी है, आप वही खुद भी चाहते हैं।

जो हम चाहते हैं, उससे ही हमारी संपदा का पता चलता है। अगर चोर आपको सफल होता दिखाई पड़ता है, तो आप चोर हैं। भला आपने कभी चोरी न की हो। अगर आपको चोर सफल होता हुआ मालूम होगा, तो साधु आपको असफल होता हुआ मालूम होगा। तो आप दया कर सकते हैं साधु पर। ईर्ष्या आपकी चोर से है। साधु को आप कह सकते हैं कि भोला— भाला है, जाने भी दो। समझ इसकी कुछ है नहीं। लेकिन ईर्ष्या आपकी चोर से है, प्रतियोगिता चोर से है।

पहली बात तो यह समझ लें कि बुराई कभी भी सफल नहीं होती, सफल होती दिखाई पड़ सकती है। देखने में भूल है, भांति है। भलाई सदा सफल होती है, असफल होती दिखाई पड़ सकती है। क्योंकि बुराई की सफलता बाहर—बाहर है, भलाई की सफलता आंतरिक है।

इस जगत में जिन्होंने थोड़ा भी आनंद जाना है, उन्होंने भलाई के कारण जाना है। जिन्होंने महा दुख झेला है, उन्होंने बुराई के कारण झेला है।

अगर हम हिटलर और चंगेज और तैमूर के हृदय उघाड़कर देख सकें, तो हमें महानरक का दर्शन होगा। लेकिन इतिहास में नाम उनके हैं; सदा रहेंगे। आप भी सोच सकते हैं कि सफल हुए; बड़े साम्राज्य उन्होंने खड़े किए हैं, तो आप भी सोच सकते हैं, सफल हुए।

वस्तुत: जो सफल हुए हैं इस जमीन पर, शायद उनका नाम भी इतिहास में नहीं है, उनके नाम का आपको पता भी नहीं है। कौन सफल होता है जीवन में? जिसे शांति का अनुभव हो जाए, जिसे आनंद की प्रतीति हो जाए, जिसे समाधि की झलक मिल जाए।

अगर मुझसे पूछें सफलता की परिभाषा, तो समाधि सफलता की परिभाषा है। जिन्हें समाधि का थोड़ा रस आ जाए, जो नाच उठें समाधि में, जिनका हृदय पुलकित हो उठे समाधि में, वे ही केवल सफल हैं।

और बुरा कभी समाधिस्थ नहीं हो सकता। बुरा तो संतप्त ही होगा, चिंतित होगा। उसका मन धीरे— धीरे और नारकीय, और नारकीय होता चला जाएगा।

तो पहली बात तो यह, आसुरी संपदा फूलती—फलती दिखाई पड़ती है, क्योंकि उसी संपदा की चाह हमारे भीतर है। आसुरी संपदा कभी फली—फूली नहीं है। जिनके मन में दैवी संपदा की चाह है, वे हमेशा देखेंगे कि आसुरी संपदा सदा भटकी है, दुखी हुई है, कभी फली—फूली नहीं, सदा नष्ट हुई है।

और दूसरी बात, दैवी संपदा की फसल इतनी दुर्लभ क्यों है? दुर्लभ इसलिए है कि जीवन के कुछ नियम समझ लें, तो खयाल में आ जाए।

एक, कि बुरा करने के लिए आपको कुछ भी करना नहीं पड़ता, वह ढाल है। पानी को बहा दिया, पानी अपने आप गड्डों में चला जाता है। गड्डों में जाने के लिए पानी को कुछ करना नहीं पड़ता। पहाड़ पर चढ़ना हो, तो बड़ी कठिनाई है। फिर पानी को चढ़ाने का आयोजन करना पड़ता है। आयोजन में श्रम होगा। आयोजन में असफलता भी हो सकती है।

बुरा ढलान है। बुरे का मतलब यह है कि जो हमसे नीचे है। भले का अर्थ है कि जो हमसे ऊपर है। बुरे का अर्थ है, जहां से हम गुजर चुके। हम पशु थे, पौधे थे। वहां से हम गुजर चुके। अगर आप वापस लौटना चाहते हैं, तो बिलकुल आसान है।

ऐसा समझें कि एक व्यक्ति स्कूल में परीक्षाएं पार कर—करके मैट्रिक में पहुंच गया है। अगर वह पहली की परीक्षा फिर से देना चाहे, तो क्या कठिनाई होगी! कोई कठिनाई न होगी। अगर वह पहली कक्षा में प्रवेश पाना चाहे, तो कोई अड़चन नहीं है, कोई उसे रोकेगा भी नहीं। और वह बड़ा सफल भी होगा पहली कक्षा में!

जहां से हम गुजर चुके हैं, विकास की जिन सीढ़ियों को हम पार कर चुके हैं, उनमें वापस उतरना हमेशा आसान है। बूढ़े से के आदमी को अगर आप क्रोध में ला दें, तो वह बच्चे के जैसा व्यवहार करने लगता है। वह बिलकुल आसान है। बच्चे का मतलब है, वापस लौट जाना। होशियार से होशियार आदमी भी क्रोध में आ जाए, तो नासमझी का व्यवहार करता है, जो बचकाना है। बच्चों की तरह पैर पटक सकता है, सामान तोड़ सकता है, चीख—पुकार मचा सकता है। यह रिग्रेशन है, पीछे लौटना है।

पीछे लौटना हमेशा आसान है। क्योंकि पीछे लौटने का मतलब है, वहां से हम गुजर चुके हैं, वह रास्ता परिचित है, उसे पाने के लिए कोई खोज नहीं करनी है।

दैवी संपदा का अर्थ है कि हमें आगे बढ़ना है, ऊंचाई छूनी है। जितनी ऊंचाई छूनी है, उतना श्रम होगा। और जितनी ऊंचाई छूने की हम कोशिश करेंगे, उतनी भूल—चूक भी होगी, हम गिरेंगे भी। याद रखें, केवल वही गिरता है, जो ऊंचा उठना चाहता है। नीचे गिरने वाले को तो गिरने का कोई कारण ही नहीं है।

दैवी संपदा हमसे ऊपर है, उसके लिए हाथ बढ़ाने पड़े, यात्रा करनी पड़े, हिमालय के शिखर की तरह हमें गौरीशंकर की तरफ बढ़ना पड़े। उसमें अड़चन होगी ही, असफलता भी हो सकती है; गिरेंगे भी, कभी रास्ता भी खो जाएगा। नीचे उतरने के लिए न गिरने का कोई डर है, न रास्ता खोने का कोई डर है, रास्ता परिचित है, जाना—माना है, उससे हम गुजर चुके हैं। और फिर नीचे उतरने में कोई प्रतिरोध न होने से सुगमता है। ऊपर चढ़ने में सारे शरीर पर जोर पड़ेगा।

अमेरिका का बहुत बड़ा वैज्ञानिक हुआ, थामस अल्वा एडिसन। उसने कोई एक हजार आविष्कार किए। दूसरे किसी मनुष्य ने इतने आविष्कार नहीं किए। छोटे से लेकर बड़े तक, बिजली, रेडियो, टेलीफोन, अनेक आविष्कार उसने किए हैं। उसका घर आविष्कारों से भरा था। लोग उसके घर आते थे, तो चकित होते थे, क्योंकि सब चीजों में उसने कुछ न कुछ किया था। उसके पूरे घर में नए—नए आविष्कार थे। पानी की टोंटी के नीचे हाथ रखिए और पानी गिरने लगे, खोलने की जरूरत नहीं, हाथ अलग करिए और पानी बंद हो जाए!

एक दिन अमेरिका का प्रेसिडेंट उसके घर उसके आविष्कार देखने गया था। हर चीज देखकर चकित हुआ। उसने अनूठे—अनूठे यंत्र खोजे थे। चलते वक्त अमेरिकी प्रेसिडेंट ने कहा, और सब तो ठीक है, एक बात मेरी समझ में नहीं आई। तुम जैसा आविष्कारक बुद्धि का आदमी, जिसने घर को आविष्कारों से भर रखा है, जिसकी हर चीज अनूठी और तिलिस्मी है, लेकिन तुम्हारे मकान का जो बगीचे का दरवाजा है, वह इतना भारी है कि खोलने में बड़ी ताकत लगती है। तुम्हें इसका खयाल नहीं आया?

उसने कहा, आप समझे नहीं। खयाल मुझे है। जो आदमी भी मेरा दरवाजा एक बार खोलता है, पांच गैलन पानी मेरी टंकी में पहुंच जाता है। तो मैं नौकर नहीं रखे हुए हूं। जो देखने आने वाले हैं—दिनभर आते हैं—वे खोलते, बंद करते हैं। बस, हर बार खोलो, बंद करो, तो पांच गैलन पानी दरवाजा ऊपर फेंक रहा है। जब भी कुछ ऊपर भेजना हो, तो थोड़ा श्रम तो होगा, थोड़ा भारी भी लगेगा, क्योंकि हम नियम जीवन के तोड़ रहे हैं।

जमीन चीजों को नीचे की तरफ खींचती है, ग्रेविटेशन है। पत्थर को आप ऊपर की तरफ फेंकते हैं, तो आपका हाथ थकता है, चोट लगती है। जितनी जोर से ऊंचा फेंकेंगे, उतनी ज्यादा शक्ति खोएगी। लेकिन पत्थर फिर नीचे चला आता है। जैसे ही आपकी भेजी हुई ऊर्जा पत्थर में चुक जाती है, जमीन उसे नीचे खींच लेती है। नीचे खींचते वक्त किसी ताकत की जरूरत नहीं पड़ती, जमीन स्वभावत: चीजों को नीचे खींच रही है।

आसुरी संपदा ग्रेविटेशन है, वह जमीन की कशिश है।

छोटा बच्चा एकदम खड़ा नहीं हो सकता मां के पेट से पैदा होकर। क्योंकि खड़े होने का मतलब है, ग्रेविटेशन से लड़ना, वह जो जमीन की कशिश है। इसलिए बच्चा पहले जमीन पर लेटकर सरकता है। वह जमीन खींच रही है, अभी बच्चा खड़ा होगा, तो फौरन गिरेगा। तो सरकेगा, फिर घुटनों के बल अपने को सम्हालेगा। वह जमीन की कशिश से ऊपर उठने की कोशिश कर रहा है। फिर किसी का सहारा लेकर खड़ा होगा। फिर अपने भरोसे पर दो कदम चलेगा; लेकिन गिरेगा, घुटने टूटेंगे, चोट लगेगी। फिर धीरे—धीरे, धीरे— धीरे.। और पैर उसके समर्थ हैं, वह खड़ा हो सकता है, शरीर उसका पूरा का पूरा तैयार है, लेकिन ग्रेविटेशन से संघर्ष करना होगा। फिर एक दिन आएगा कि वह अपने को संतुलित कर लेगा, खड़ा हो जाएगा।

फिर आपको खड़ा होना आसान मालूम पड़ता है। लेकिन अभी भी जब भी आप थक जाते हैं, तो लेटना ही पड़ता है। क्योंकि खड़े होने में, चाहे आपको कितना ही आसान हो गया हो, जमीन आपको खींच रही है और थका रही है। इसलिए खड़े—खड़े हम थक जाते हैं। जब भी थक जाते हैं, तब हमें जमीन पर लेटना पड़ता है।

रात सोकर हमें जो सुख मिलता है, वह जमीन की कशिश से लड़ाई छोड़ देने के कारण! तो हम समतल जमीन पर सो जाते हैं; फिर छोटे बच्चे हो गए, फिर जमीन से हमारी कोई लड़ाई नहीं है। हमने स्वीकार कर लिया। रातभर हमको विश्राम मिल जाता है। सुबह हम फिर खड़े होने में समर्थ हो जाते हैं।

खड़े होने का मतलब संघर्ष है। और अगर आदमी उड़ना चाहे, तो और बड़ा संघर्ष है, क्योंकि फिर जमीन से बिलकुल उसको अपनी मुक्ति चाहिए।

आसुरी संपदा जमीन की कशिश जैसी है। सुगम है। बुरा होने के लिए कोई बड़ी चितना नहीं करनी पड़ती। बुरा होने के लिए कोई बहुत बड़ी बुद्धिमत्ता की जरूरत नहीं है।

अपराधियों के अध्ययन किए गए हैं। और मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अपराधियों में नब्बे प्रतिशत जड़बुद्धि होते हैं, ईडिआटिक होते हैं, उनके पास कोई बुद्धिमत्ता नहीं है। पर बड़ी हैरानी की बात है कि वे बुद्धिहीन जो हैं, वे बुराई करके कई दफा हमें सफल होते भी दिखाई पड़ते हैं। बुद्धिमान हारता दिखाई पड़ जाए, बुद्धिहीन सफल होते दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि बुद्धिहीन में एक क्षमता तो है, वह क्षमता है नीचे गिरने की। अगर नीचे गिरने में ही प्रतियोगिता हो, तो वह आपसे जीत जाएगा। और हम सभी उसके साथ प्रतियोगिता कर रहे हैं। इसलिए वह हमें जीतता मालूम पड़ता है।

जो जितना नीचे गिर सकता है, उतने जल्दी सफल हो जाएगा। चाहे धन की दौड़ हो, चाहे राजनीति की दौड़ हो, वह जो बुरा आदमी है, सफल हो जाता है, क्योंकि वह ज्यादा नीचे गिर सकता है। दो राजनीतिज्ञों में वह राजनीतिज्ञ जीत जाएगा, जो ज्यादा नीचे गिर सकता है, उसको कम श्रम पड़ेगा।

मैंने सुना है कि विंसटन चर्चिल एक चुनाव में जिस क्षेत्र से लड़ रहे थे, एक बूढ़े आदमी के पास वोट मांगने गए थे। उनके विरोध में कोई खड़ा था। उस के आदमी ने कहा कि मैं सोचूंगा। चर्चिल ने उस पर दबाव डाला और कहा, कुछ तो कहो; कुछ तो धारणा बना ही लो, अब चुनाव करीब आ रहा है।

तो उस आदमी ने कहा, तुम मानते नहीं तो मैं कहूं कि मैं यही प्रार्थना करता हूं भगवान से कि तेरी बड़ी कृपा है कि दो में से एक ही जीत पाएगा। क्योंकि दोनों उपद्रवी हैं, और इतना ही अच्छा है कि दोनों नहीं जीतेंगे, एक ही जीतेगा। कम से कम एक ही बुराई जीतेगी।

मैंने सुना है, एक किसान एक बार स्वर्ग के द्वार पर पहुंचा। उसे बड़ी उदासी हुई वहां, जो हाल उसने देखा। बड़ी देर तक दरवाजा खटखटाता रहा, किसी ने फिक्र ही न की। तब उसने देखा कि उसके पीछे एक राजनीतिज्ञ है, जो उसके बाद में मरा और उसके बाद स्वर्ग के द्वार पर पहुंचा। उसने जाकर दस्तक दी। दस्तक दी नहीं कि द्वार खुल गए। द्वारपाल ने उसे भीतर ले लिया।

वह किसान तो खड़ा ही रहा। सोचने लगा मन में कि शायद यहां भी मेरी कोई चिंता होने वाली नहीं है। राजनीतिज्ञ यहां भी जीत जाएगा। और भीतर बैंड—बाजों की आवाज आने लगी। राजनीतिज्ञ का स्वागत हो रहा है।

फिर थोडी देर बाद जब बैंड—बाजे बंद हो गए, द्वार खुला; किसान को भीतर ले जाया गया। उसने सोचा कि शायद अब बैड—बाजे मेरे लिए भी बजेंगे। वे नहीं बजे! तो उसने द्वारपाल से पूछा कि यह पक्षपात यहां भी है? द्वारपाल ने कहा, पक्षपात जरा भी नहीं है। तुम्हारे जैसे लोग तो रोज यहां आते हैं। यह कोई हजारों साल के बाद राजनीतिज्ञ स्वर्ग में आया है। इसका विशेष स्वागत होना ही चाहिए।

राजनीति में भला होना मुश्किल है, भला होने वाला हारेगा। क्योंकि वहां गिरने की प्रतियोगिता है, कौन कितना गहरा गिर सकता है!

धर्म राजनीति से उलटी यात्रा है। वहां ऊपर आकाश में उड़ने की प्रतियोगिता है, कौन कितना पृथ्वी के आकर्षण से दूर जा सकता है! वहां कठिनाई पड़नी शुरू हो जाएगी। जितने आप दूर जाएंगे, उतनी ही पृथ्वी खींचेगी और संघर्ष बढ़ेगा। लेकिन उसी संघर्ष से आत्मा का जन्म होता है। उसी तनाव से, उसी प्रतिरोध से, उसी संयम से आपके भीतर व्यक्तित्व निर्मित होता है, इंटीग्रेशन घटता है, आप केंद्रित होते हैं।

तो यह ठीक है। दैवी संपदा की फसल इतनी दुर्लभ इसलिए है। और इसलिए भी कि हमारे चारों ओर सभी लोग आसुरी संपदा को पैदा करने में लगे हैं। और आदमी जीता है भीड़ से, भीड़ का अनुगमन करता है। भीड़ जहां जाती है, आप भी चल पड़ते हैं। आपके मां—बाप, आपका परिवार, आपका समाज जो कर रहा है, बच्चा पैदा होता है, वही बच्चा सीख लेता है, वह भी करना शुरू कर देता है।

आसुरी संपदा के लिए शिक्षण की काफी सुविधा है। दैवी संपदा के लिए शिक्षण की कोई सुविधा नहीं मालूम पड़ती। और जिस चीज की सुविधा हो उस तरफ आसानी हो जाती है, हम उसमें कुशल हो जाते हैं। जिस तरफ कोई सुविधा न हो, उस तरफ हमारे अंग पंगु हो जाते हैं।

आप चलते हैं, इसलिए पैरों में गति है, जान है। आप मत चलें, पैर सिकुड़ जाएंगे, पैरालाइब्द हो जाएंगे, लकवा लग जाएगा। आप देखते हैं, तो आंखें सजग हैं। मत देखें, अंधेरे में रहे आएं, थोड़े दिन में आंखें अंधी हो जाएंगी। आप सुनते हैं, तो कान तेज हैं। संगीतज्ञ के कान सबसे ज्यादा तेज हो जाते हैं। क्योंकि सुनने के लिए वह इतना आतुर होता है, एक छोटी से छोटी ध्वनि के परिवर्तन को वह पकड़ना चाहता है। चित्रकार की आंखें सतेज हो जाती हैं। दार्शनिक की बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है।

आप जो करते हैं, वह कुशल हो जाता है। आप जो नहीं करते हैं, उसमें आप अकुशल हो जाते हैं। अगर जन्म से ही हमारी आंखों पर पट्टियां बांध दी जाएं, और फिर जब हम जवान हो जाएं तब पट्टियां खोली जाएं, तो हम सब अंधे ही पट्टियों के बाहर आएंगे। वैज्ञानिक कहते हैं कि तीन साल तक कोई भी इंद्रिय काम न करे, तो जड़ हो जाएगी।

और आसुरी संपदा का तो हम उपयोग कर रहे हैं जन्मों—जन्मों से, दैवी संपदा का हमने उपयोग नहीं किया जन्मों—जन्मों से, इसलिए कठिन मालूम पड़ती है। वहा भूमि सख्त हो गई है। उस पर हमने कभी न हल चलाया, न कुछ खेती की, न बीज डाले। सब सूख गया है। पठार हो गया है, पत्थर जैसा मालूम होता है। जिस तरफ हम खेती करते रहे हैं, वहा आसानी मालूम होती है, वहां जमीन तैयार है, वहां जमीन फुसफुसी है, वहां बीज पकड़ना आसान है।

लेकिन कितनी ही कठिन हो दैवी संपदा की फसल, एक बार जो करना शुरू कर देगा, वह पाएगा कि वह कठिनाई भी कठिन नहीं है। और एक बार स्वाद आ जाए, तो आपको पता चलेगा कि आसुरी संपदा बड़ी कठिन थी, पुरानी आदत की वजह से सरल मालूम पडती थी। कठिनाइयां उसमें बहुत थीं, दुख बहुत था, दुख ही दुख था।

जहां फसल सरलता से हो जाती हो, लेकिन फल सदा दुख के ही हाथ लगते हों, उस सरलता का मूल्य भी क्या है? भला फसल कठिनाई की हो, लेकिन फल आनंद के लगते हों, तो उसे सरल और सहज ही मानना होगा।

जिन्होंने भी जाना है, उन सबने कहा है कि वह समाधि बड़ी सहज है, बड़ी सरल है; वह अंतिम उपलब्धि कठिन नहीं है। लेकिन हमें तो कठिन लगती है। क्योंकि हमने उस तरफ कोई कदम नहीं उठाया। हमने उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। उस दिशा में हमने कोई कदम ही नहीं उठाया है, कोई यात्रा ही नहीं की है, हमारे पैर उस तरफ पंगु हैं।

तो बैठकर सोचते मत रहें कि वह कठिन है, कुछ करें और उसे सरल बनाएं। करने से चीजें सरल होती हैं।

आप कभी पानी में नहीं तैरे हैं, तो बहुत कठिन लगेगा। और आप यह भरोसा ही नहीं कर सकते कि आपको पानी में छोड़ दिया जाए, तो आप बच सकेंगे। लेकिन जो लोग तैरने की कला सिखाते हैं, वे कुछ भी नहीं करते, वे सिर्फ आपको पानी में छोड़ते हैं। पानी में छोड़ते से ही आप हाथ—पैर तड़फड़ाने लगते हैं बचाने के लिए खुद को। तैरना तो आपको आता नहीं, तैरने का तो आपको कोई पता नहीं, अपने को बचाने के लिए हाथ—पैर तड़फड़ाते हैं।

यह हाथ—पैर तड़फड़ाना ही तैरने की शुरुआत है। फिर इसको ही थोड़ी व्यवस्था से फेंकने लगेंगे, तैरना हो जाएगा। थोड़ी व्यवस्था ही सीखनी है। अभी थोड़ा अस्तव्यस्त फेंकते हैं, अराजक। फिर सिस्टम हो जाएगी, फिर आप ढंग से फेंकने लगेंगे। एक दफा ढंग से फेंकना आ गया, तो आप पाएंगे कि तैरने से सरल और कुछ भी नहीं हो सकता। अभी तो तैरने में लगेगा कि जान जाने का खतरा है, अगर नहीं जानते तो।

शुरू करें! यह ऊपर की तरफ जो उड़ान है, यह भी एक तैरना है। शुरू में कठिनाई होगी; स्वाभाविक है। जैसे—जैसे अभ्यास गहन होगा, वैसे—वैसे कठिनाई बदलती जाएगी। और एक ऐसा क्षण आता है, जब समाधि ही एकमात्र सरलता रह जाती है। तब बुरे होने से ज्यादा कठिन कुछ भी नहीं होता।

अब हम सूत्र को लें।

और उन आसुरी पुरुषों के विचार इस प्रकार के होते हैं, कि मैंने आज यह तो पाया है और इस मनोरथ को प्राप्त होऊंगा तथा मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह भविष्य में और अधिक होवेगा। आसुरी संपदा के व्यक्ति को और की दौड़ होती है। उसके पास जो भी हो, उसे वह और बढ़ा लेना चाहता है। जो भी उसके पास हो, उतनी मात्रा उसे कभी काफी नहीं मालूम पड़ती।

 

आसुरी संपदा का व्यक्ति मात्रा में बड़ा उत्सुक होता है, क्वांटिटी में उत्सुक होता है। दस रुपए हों, तो हजार हो जाएं; हजार हों, तो दस हजार हो जाएं; दस हजार हों, तो दस करोड़ हो जाएं; उसकी मात्रा बढ़ती जाती है। आकड़ों में जीता है, कितने बड़े आकड़ों का फैलाव हो जाए! और उसकी पकड़ है। उसके पास जो भी है, वह कम है।

दूसरी बात, उसके पास जो भी है, उसमें उसे कोई सुख नहीं है। सुख सदा वहां है, जो उसके पास नहीं है।

आसुरी संपदा वाले व्यक्ति को सुख सदा आकाश में कहीं दूर है। आसुरी संपदा वाला व्यक्ति आशा में जीता है। जो उसके पास है, उसमें तो कुछ खास रस नहीं है। ठीक है। जो नहीं है, आनंद वहां छिपा है। और जब तक वह उसे न पा ले, तब तक आनंदित न हो सकेगा। वह दौड़ता रहता है। आज नष्ट करता है कल के लिए। कल को फिर नष्ट करेगा और आगे आने वाले कल के लिए। ऐसे पूरे जीवन को वह नष्ट करता जाएगा और जीने को पोस्टपोन करता रहेगा। वह कहेगा कि कल जब सब मेरे पास होगा, तब मैं जीऊंगा।

जर्मनी का एक विचारक हुआ। उसके पास बहुत धन था, और अध्ययन की बड़ी रुचि थी, और बड़ी आकांक्षा थी कि जितना ज्यादा से ज्यादा जान सकूं? जान लूं। तो उसने दुनियाभर से जो भी अनूठी से अनूठी पुस्तकें हों, दुर्लभ शास्त्र हों, अनेक भाषाओं के शास्त्र इकट्ठे करने शुरू कर दिए।

उसके पास विशाल पुस्तकालय खड़ा हो गया। पचासों भाषाओं की पुस्तकें उसके पास इकट्ठी हो गईं। ऐसा कोई ग्रंथ नहीं था दुनिया में, जो उसने खोजकर इकट्ठा न कर लिया हो। लेकिन यह इकट्ठा करते—करते उसने पाया कि वह नब्बे वर्ष का हो गया है। जब उसे होश आया कि इकट्ठा तो मैंने कर लिया, लेकिन इसको मैं पढूंगा कब!

और कहते हैं, यह धक्का उस पर इतना भारी पड़ा कि यह धक्का ही उसकी मृत्यु का कारण हुआ। और यह नब्बे वर्ष वह रोज सोच रहा था, कल! कल! और इकट्ठा हो जाए! और इकट्ठा हो जाए! पहले इकट्ठा कर लूं र फिर अध्ययन कर लूंगा, फिर ज्ञान को उपलब्ध हो जाऊंगा।

आसुरी संपदा वाला व्यक्ति भी ऐसे ही दौड़ता रहता है। धन इकट्ठा करता है। पद इकट्ठा करता है। उसे सुविधा तो कभी मिल ही नहीं पाती कि वह उसका उपयोग कर ले। आगे की दौड़ उसे पकड़े रहती है। और रोज को वह कुर्बान करता है। भविष्य के लिए, वर्तमान को वह बलि चढ़ाता है भविष्य के लिए।

और ध्यान रहे, वर्तमान के अतिरिक्त किसी चीज की कोई सत्ता नहीं है। भविष्य तो बिलकुल सपना है। जो आज को खो रहा है कल के लिए, वह आज को व्यर्थ ही खो रहा है। और एक बार यह आदत बन गई आज को खोने की, तो मैं सदा आज को खोता रहूंगा। और जब भी समय आता है, वह आज की तरह आता है; कल तो कभी आता नहीं।

और यह जो और की दौड़ है, इसका कोई भी अंत नहीं हो सकता, क्योंकि यह हर चीज पर जुड़ जाएगी। जो भी आप पा लेंगे, आपका आसुरी संपदा वाला मन कहेगा, और! आप सोच भी नहीं सकते कोई ऐसी स्थिति, जब आपका मन कहे कि बस, काफी! आप सोचें, कभी एकांत में बैठकर यही सोचें कि कितना धन आपको मिल जाए, तो आपका मन और नहीं कहेगा। तो आप अपने साथ ही खेल में पड़ जाएंगे। पहले सोचेंगे, दस करोड़। लेकिन भीतर—अभी कोई दस करोड़ दे भी नहीं रहा है, मिल भी नहीं गए हैं—लेकिन भीतर कोई कहेगा, इतने कम पर राजी क्यों होते हो जब दस अरब हो सकते हैं!

तो जो आपको आखिरी संख्या मालूम है, वहां तक तो आपका मन दौड़ाएगा। और आखिरी संख्या पर भी आपको बेचैनी अनुभव होगी कि और गणित क्यों न सीख लिया! और गणित जानते, तो आज यह मुसीबत तो न होती। आज अटक गए यहां आकर, दस महाशंख या एक करोड़ महाशंख, कहा अब जो संख्या आती है, वह भी छोटी मालूम पड़ेगी। सार