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गीता दर्शन–(प्रवचन–102)

अज्ञेय जीवन—रहस्‍य—(प्रवचन—पहला) श्रीमद्रभगवइगीता अथ दशमोउध्याय--अध्‍याय—10 श्रीभगवानुवाच: भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वच:। यतेउहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।। 1।। न मे बिंदु:— सुरगणा: प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।।...

गीता दर्शन–ओशो (भाग–05)

गीता दर्शन—भाग—5 (ओशो) (इस पुस्तक में गीता के दसवें व ग्यारहवें अध्याय—विभूति—योग व विश्वरूप—दर्शन—योग—तथा विविध प्रश्नों व विषयों पर चर्चा है।) अर्जुन को पता हो या...

गीता दर्शन–(प्रवचन–101)

क्षणभंगुरता का बोध—(प्रवचन—तेरहवां) अध्‍याय—9 सूत्र: मां हि पार्थ व्यपाश्त्यि येऽपि स्युः पापयोनय:। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रस्तिऽपि यान्ति परां गतिम्।। 32।। किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–100)

नीति और धर्म—(प्रवचन—बारहवां) अध्‍याय—9 सूत्र: समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:। ये भजन्ति तु मां भक्त्‍या मयि ते तेषु चाप्यहम्।। 29।। अपि चेत्सुदराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवलितो...

गीता दर्शन–(प्रवचन–099)

कर्ताभाव का अर्पण—(प्रवचन—ग्‍यारहवां) अध्‍याय—9 सूत्र: पत्रं पष्पं फलं तोर्य यो मे भक्या प्रकछीत। तदहं भक्मुष्ठतमश्नामि प्रयतात्मन:।। 26।। यत्करोषि यदश्नासि यज्‍जुएषि ददासि यत्। यत्तयस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्य मदर्यणम्।। 27।। शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कमंबन्धनै:। संन्यासयोगयुक्तात्मा...

गीता दर्शन–(प्रवचन–098)

खोज की सम्‍यक दिशा—प्रवचन—दसवां अध्‍याय—9 सूत्र येऽम्मन्यदेक्ता भक्त? यजन्ते श्रद्धायान्त्रिता। तेऽयि मामेव कौन्तेय यजन्‍त्यविधिपूर्वकम् ।। 23।। अहं हि सर्वज्ञानां भोक्‍ता च प्रभुरेव च। न तु मामीभजानन्ति तत्‍वेनातश्व्यवन्ति ते।। 24।। यान्ति देवव्रता...

गीता दर्शन-(प्रवचन–(097)

वासना और उपासना—(प्रवचन—नौवां) अध्‍याय—9 सूत्र: ते तं भुक्त्‍वा स्वर्ग्लोकं विशलं क्षीणे पुण्ये मर्त्‍यलोकं विशान्‍ति। एवं त्रयींधर्ममच्छुयन्‍ना गतरगतं काक्कामा लभन्ते।। 21।। अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते। तेषां नित्याभिस्त्युक्‍तानां योग्स्सेमं वहाम्यहम्।। 22।। और...

गीता दर्शन-(प्रवचन–(096)

जीवन के ऐक्‍स का बोध—अ—मन में—(प्रवचन—आठवां) अध्‍याय—9 सूत्र: तपाम्यहमहं वर्ष निग्ष्टृणान्स्पृउजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चछमर्जुन ।। 19।। त्रैविद्या मां सोमया: पूतपापा यज्ञैरिष्टवा स्वग्रतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमामाद्य सुरेन्द्रलस्केम् अश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्...

गीता दर्शन-(प्रवचन–(095)

मैं ओंकार हूं—(प्रवचन—सातवां) अध्‍याय—9 सूत्र: पिताहमस्य जगतो माता धाता पिताम्ह:। वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च।। 17।। गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुह्रत्। प्रभव: प्रलय: स्थानं निधान बीजमध्ययम्।। 18।। और हे...

गीता दर्शन-(प्रवचन–(094)

ज्ञान, भक्‍ति, कर्म—प्रवचन—छठवां अध्‍याय—9  सूत्र: ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्‍वेन पृथक्‍त्‍वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ।। 12।। अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम् मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमीग्नरहं हुतम्।। 13।। कोई तो मुझ विराट स्वरूय परमत्‍मा को ज्ञान— यज्ञ...

गीता दर्शन-(प्रवचन–(093)

दैवी या आंसुरी धारा—(अध्‍याय—9) प्रवचन—पाँचवाँ अध्‍याय—9  सूत्र: महात्मानस्तु मां पार्थ दैवौं प्रकृतिमश्रिता:। भजज्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।। 13।। सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्‍या नित्‍ययुक्‍ता उपासते ।। 141। परंतु हे...

गीता दर्शन–(प्रवचन–092)

विराट की अभीप्‍सा—(अध्‍याय—9)—प्रवचन—चौथा अध्‍याय—9 सूत्र: मयाध्‍यक्षेण प्रकृति: सूयतेसचाराचरम्। हेतुनानेन कौन्तेय जगद्धइयीश्वर्त्से।। 10।।। अवजानीन्त मां मूढ़ा मानुषी तनुमख्सिम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। 11।। मोघाशा मोघकर्माणो मोख्ताना विचेतस:। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मौहिनौं श्रिता:।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–091)

जगत एक परिवार है(अध्‍याय—9)—प्रवचन—तीसरा अध्‍याय—9 सूत्र: सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये युनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।। 7।। प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य धिसृजामि पुन: पुन:। भूतग्राममिमं कृल्लमवशं क्कृतैर्वशात्।। 8।। न च मां तानि कमगॅण...

गीता दर्शन–(प्रवचन–090)

अतर्क्‍य रहस्‍य में प्रवेश—(अध्‍याय—9) प्रवचन—दूसरा अध्‍याय—9 सूत्र: मया ततमिदं सर्व जगदस्थ्यमूर्तिना। मत्‍स्‍थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्यवीस्थ्य:।। 4।। न च मत्‍स्‍थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्‍न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:।। 5।। यथाकाशीस्थ्योनित्यं...

गीता दर्शन–(प्रवचन–089)

गीता दर्शन—(अध्‍याय—9) प्रवचन—पहला श्रीमद्भगवद्गीता (अथ नवमोऽध्याय) श्रीभगवानवाच: हदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसीहतं यज्ञ्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।। 1।। राजविद्या राजगुह्मं यीवप्रीमदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।। 2।। अश्रद्दधाना: पुरूषा धर्मस्यास्य परंतप। अप्राप्‍य मां...

गीता दर्शन–(प्रवचन-088)

तत्‍वज्ञ—कर्मकांड के पार—प्रवचन—ग्‍यारहवां अध्‍याय—8 सूत्र: नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्मति कश्‍चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयक्तो भवार्जुन।। 27।। वेदेषु यज्ञषु तप:सु चैव दानेषु यत्‍युण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सवर्मिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–018)

विषाद की खाई से ब्राह्मी-स्थिति के शिखर तक—(प्रवचन—अट्ठारवां) अध्‍याय—1—2 प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।। ६५।। उस निर्मलता के होने पर इसके संपूर्ण दुखों का अभाव...

गीता दर्शन–(प्रवचन–017)

मन के अधोगमन और ऊर्ध्वगमन की सीढ़ियां—(प्रवचन—सत्रहवां) अध्‍याय—1—2 ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते। संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।। ६२।। विषयों को चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो...

गीता दर्शन–(प्रवचन–016)

विषय-त्याग नहीं-- रस-विसर्जन मार्ग है—(प्रवचन—सोलहवां) अध्‍याय—1—2 दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।। ५६।। तथा दुखों की प्राप्ति में उद्वेगरहित है मन जिसका और सुखों की प्राप्ति में...

गीता दर्शन–(प्रवचन–015)

मोह-मुक्ति, आत्मत्तृप्ति और प्रज्ञा की थिरता—(प्रवचन—पंद्रहवां) अध्‍याय—1—2 यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।। ५२।। और हे अर्जुन, जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूप...

गीता दर्शन–(प्रवचन–087)

दक्षिणायण के जटिल भटकाव—(प्रवचन—दसवां)  अध्याय—8 धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।। 25।। शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः।। 26।।   तथा जिस मार्ग...

गीता दर्शन–(प्रवचन–086)

जीवन ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन--उत्तरायण पथ—(प्रवचन—तैरासीवां)  अध्याय—8  यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ।। 23।। अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–085)

अक्षर ब्रह्म और अंतर्यात्रा—(प्रवचन—बयासीवां)  अध्याय—8  अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।। 21।। पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–084)

सृष्टि और प्रलय का वर्तुल—(प्रवचन--इक्‍यासीवां)  अध्याय—8 अव्यक्तात् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके।। 18।। भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे।। 19।। परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु...

गीता दर्शन–(प्रवचन–083)

वासना, समय और दुःख—(प्रवचन—अस्‍सीवां)  अध्याय—8  मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः।। 15।। आब्रह्मभुवनालोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।। 16।। सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः। रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः।। 17।।   और...

गीता दर्शन–(प्रवचन–082)

योगयुक्त मरण के सूत्र—(प्रवचन—उन्‍नास्‍सीवां) अध्याय—8 सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।। 12।। ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। 13।। अनन्यचेताः सततं यो...

गीता दर्शन–(प्रवचन–081)

भाव और भक्ति—(प्रवचन—अठटतवां) अध्याय—8  प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।। 10।। यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–080)

स्मरण की कला—(प्रवचन—सतहत्ररवां)  अध्याय—8 तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पित मनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्।। 7।। अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।। 8।। कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयां समनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।।...

गीता दर्शन–(प्रवचन–079)

मृत्यु-क्षण में हार्दिक प्रभु-स्मरण—(प्रवचन—छीहत्ररवां)  अध्याय—8  अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।। 4।। अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।। 5।। यं यं...

गीता दर्शन–(प्रवचन–078)

स्वभाव अध्यात्म है—(प्रवचन—पीचहत्‍तरवां)  अध्याय—8  श्रीमद्भगवद्गीता (अथ अष्टमोऽध्यायः) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।। 1।। अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।।...

गीता दर्शन (भाग—4) ओशो

(ओशो द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के अध्‍याय आठ ‘अक्षर—ब्रह्म—योग’ एंव अध्‍याय नौ ‘राजविद्या—राजगुह्म—योग’ पर दिए गए चौबीस अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)  कृष्‍ण ने यह गीता कही—इसलिए...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–20)

मिलन होता है—बीसवां प्रवचन बीचवां प्रवचन, 30 मार्च1978; श्री रजनीश आश्रम पूना। प्रश्‍न सार : 1--प्रार्थना क्या है? और क्या प्रार्थना अपने ही लिए है? 2--अहंकार के पास भी कोई...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–19)

प्रेम ही मंदिर है—उन्नीसवा प्रवचन उन्‍नीसवां प्रवचन 29 मार्च 1978; श्री रजनीश आश्रम, पूना। सूत्र : अनन्यभकया तदबुद्धिर्बुद्धिलयादत्यन्तम्।। 96।। आयुश्चिरयितरेषां तु हानिनास्पदत्वात्।। 97।। संसृतिरेषाम् भक्ति: स्यान्नाज्ञानात् कारणसिद्धे:।। 98।। त्रीण्येषां...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–18)

जगत की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता : प्रेम—अठारहवी प्रवचन अठारहवां प्रवचन 28 मार्च 1978; श्री रजनीश आश्रम पूना। प्रश्‍न सार : 1--वेदों में वर्णित होमापक्षी की कथा का आशय समझाने...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–17)

ऊर्ध्वगति का आयाम है परमात्मा—सत्रहवां प्रवचन सत्रहवां प्रवचन 27 मार्च 1978; श्री रजनीश आश्रम, पूना। सूत्र : फलस्माद्वादरायणो दृष्टत्वात्।। 91।। ब्यूत्कमदप्ययस्तथा दृष्टम्।। 92।। तदैक्यं नानात्वकैत्वमुपाधियोगहानादादित्यवत्।। 93।। पृथगिति चेन्नापरेणासम्बन्धात् प्रकाशानाम्।। 94।। न विकारिणस्तु कारणविकारात्।।...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–16)

मौजूदगी ही उसकी है—सोलहवां प्रवचन सोलहवां प्रवचन 26 मार्च 1978; श्री रजनीश आश्रम, पूना। प्रश्‍न सार : 1--संसार में ही परमात्मा के छिपे होने का प्रमाण क्या हो? 2--पूर्वजन्म के...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–15)

सदगुरु शास्त्रों का पुनर्जन्म है—पंद्रहवां प्रवचन पंद्रहवां प्रवचन 25 मार्च 1978; श्री रजनीश आश्रम, पूना। सूत्र : तल्छक्तिर्माया उड्सामान्यात्।। 86 ।। व्यापकत्वाद्वयाप्यानाम्।। 87 ।। न प्राणिबुद्धिभ्योऽसम्भवात्।। 88 ।। निर्मायोच्चावच श्रुतीश्च...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–14)

प्रार्थना निरालंभ दशा है—(प्रवचन--चौहदवां) 14 मार्च 1978; श्री रजनीश आश्रम, पूना। प्रश्‍न सार: 1--मैं क्या करूं? कैसे प्रार्थना करूं? कैसे अर्चना करूं? 2--आपने कहा : 'न मैं पूर्ण...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–13)

विकास, क्रांति और उत्कांति—तेरहवां प्रवचन तेरहवां प्रवचन 23 मार्च 1978, श्री रजनीश आश्रम, पूना। सूत्र : उत्कांतिस्मृतिवाक्यशेषाच्च।। 81।। महापातकिनां त्वातौं।। 82।। सैकान्तभावो गीतार्थप्रत्यभिज्ञानात्।। 83।। परां कृत्वैव सर्वेषा तथाह्याह।। 84।। भजनीयेनाद्वितीयमिदं...

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–12)

अभीप्सा व प्रतीक्षा की एक साथ पूर्णता—प्रार्थना की पूर्णता—बारहवां प्रवचन बारहवां प्रवचन 22 मार्च 1978; श्री रजनीश आश्रम, पूना। प्रश्‍न सार : 1--धर्म क्या है? और आप कैसा...